भारती तेज कदमों से चलने लगी आज वो जल्दी ही घर पहुँच जाना चाहती थी। जैसे ही बेटी नालंदा ने अपने अस्पताल में नियुक्त होने की फोन में उसको सूचना दी थी तभी से फैक्ट्री में उसका बिल्कुल मन नहीं लग रहा था। घर पहुंचते ही दरवाजे के बाहर खड़ी नालंदा दौड़कर उसके गले लग गई।
भारती की भी आँखें आँसूओं से भीग चुकी थीं । एक पल वो नालंदा को जीभर निहारते रही फिर गले लगा उसका माथा चूम लिया। खुशी से चहकती हुई नालंदा बोली- ‘माँ पता है आपको कल ही मुझे अस्पताल ज्वाइन करना है। कहकर नालंदा भारती के हाथ से उसका थैला अपने हाथ में लेकर भीतर कमरे में आ गई ।
फिर उसने अपने द्वारा लाई मिठाई का डब्बा खोला माँ भारती के मुंह में डालते हुए बोली- बहुत बहुत बधाई हो ‘माँ आपको,आपकी बेटी की सफलता की …अच्छा माँ आप थोड़ा आराम करें तब तक मैं अभी आती हूँ पड़ोस की नर्मदा काकी को भी मिठाई खिलाकर और खुशी की खबर दे आती हूँ ।
नालंदा के जाते ही भारती ने एक गिलास पानी लिया और सामने पड़ी कुर्सी पर बैठ गई क्योंकि आज वो पुरानी यादों में खो जाना चाहती थी….
बीस बरस का लम्बा सफर तय कर आज इस मुकाम पर पहुंची थी वो । बहुत दुख देखे गत बरसों में उसने अपनी इस नीरस जिंदगी में, माँ तो थी नहीं उसकी बचपन में परलोक सिधार गई थी। पिता ने थोड़ा पढ़ा लिखा उसका विवाह कर दिया फिर साल भर में वो भी चल बसे। ससुराल मिला सास तो थी नहीं जहां बुआ सास का अपना ही रूतबा था।
जिसकी मर्जी बिना घर में पत्ता भी न हिल सकता ऐसे वातावरण में दिन कट रहे उसके । फिर एक दिन चोरी का इल्ज़ाम लगा बुआ सास ने घर से निकाल दिया। बेचारी भारती घर के बाहर बैठी सोचती रही ये किस्मत मेरे साथ ही ऐसा मजाक क्यों करती है ?मेरे ही पीछे क्यों पड़े रहते ये सारे दुख ?आखिर “मेरे जैसा बदनसीब दुनिया में कोई नहीं “।
पति मिला वो भी निखट्टू दिन भर बस्ती के लोगों के साथ मटरगश्ती, नशा करता मारपीट छीना-झपटी लूट खसोट बस यही था उसका काम-धाम। बात बात पर भारती पर हाथ उठाता यहां तक की पिता के दिए गहने जो उसकी माँ की अन्तिम निशानी थे वो भी उससे छीनकर बेच कर खा गया था। अब ऐसे में उससे गुहार करने का कोई फायदा तो है नहीं…
भारती घर के बाहर बैठी सोचते-सोचते अपनी किस्मत को कोसती रही। सासु माँ तो थी नहीं जो पति पर निगरानी रखती । ससुर जी का लकड़ी का व्यवसाय उसी सिलसिले में बाहर आना जाना लगा रहता। सारा घर बाहर विधवा बहन को सौप रखा जिसको तो अपने लाड़ले बेटों के अतिरिक्त कोई नजर ही नहीं आता था। उन्हीं की सेवा टहल में लगी रहती बुआ सास भी ।
निराश घर से परित्यक्त भारती ने दो तीन दिन निकट के मंदिर में शरण ली खाने को प्रसाद में जो मिल जाता उसी से गुजारा करने लगी । कई बार वो इतनी निराश हो जाती सोचती उसे मर जाना चाहिए। आखिर वो जीये भी तो किसके लिए जीये । एक दिन देर रात चारों तरफ जब शान्ति फैली हुई थी
मन्दिर के बाहर एक गाड़ी आई एक महिला उतरी उसने एक गर्म कंबल में लिपटे बच्चे को मन्दिर की सीढ़ियों में रखा और वापस गाड़ी से लौटने लगी । भारती दौड़कर उस महिला के पास गई बोली- बहन आप ऐसा क्यों कर रहीं हो ? ये बच्चा इस सर्दी में कैसे जीवित रह पायेगा ? महिला ने बताया उसके मेमसाहब के ये तीसरी लड़की संतान है अभी चार रोज की हुई बड़ी मालकिन दादी मां का जो हुक्म मैं वैसा ही कर रही हूँ ।
कहकर वो गाड़ी में बैठकर वापस चली गई। भारती उस बच्ची को गौद में ले लेती है। उसका मासूम सा चेहरा उसको ममता से भर देता है। उसको भी जीने की वजह मिल जाती है । वो उसकी देखभाल की जिम्मेदारी उठा लेती है। मन्दिर के बाहर आने जाने वाले लोग बच्चे को साथ देखकर भीख स्वरूप उसको कपड़े पैसे खाने पीने को दे जाते।
लेकिन आस पास पहचान वाले तरह – तरह की बातें बनाने लगे। लोगों के ताने-बाने से परेशान होकर एक दिन भारती माता-पिता के गांव लौट आई । पिता का पुराना सा घर उसी को व्यवस्थित करके वहीं रहने लगती है। पड़ोस के साथ के घर में रहने वाली नर्मदा काकी उसकी बहुत मदद करती है।
नर्मदा काकी को वो अपनी दर्द भरी व्यथा सुनाती है नर्मदा काकी खुद दुखी महिला उसके दोनों बेटे उसको अकेला छोड़कर विदेश बस गये थे। पति भी स्वर्गवासी धन सम्पत्ति बेटे ले गये बस काकी के पास थोड़ी बहुत जमीन पुस्तैनी मकान जिसको लालची बेटों से बचाने के लिए काकी को बहुत मुश्किल का सामना करना पड़ा था ।
काकी सिलाई कढ़ाई बुनाई में कुशल लोगों के विवाह उत्सव में काम कर आसानी से घर का गुजारा चला लेती थी। भारती की दुख भरी कहानी सुनकर कहती हैं बेटी एक समय था मैं भी तेरी ही तरह सोचा करती थी। कि “मेरे जैसा बदनसीब दुनिया में कोई नहीं “।
लेकिन मेरी मेहनत काम के प्रति मेरी लगनशीलता मेरा विश्वास दृढ़ इरादा और धैर्य एक दिन रंग ले ही लाया। बेटी भारती खुद पर विश्वास रखों एक दिन तुम भी सफल होकर रहोगी। काकी का सहारा भारती छोटे मोटे काम कर उस लावारिस बच्ची का पालन पोषण करने लगी । काकी के अतिरिक्त उसने किसी को ये पता नहीं लगने दिया वो उसकी अपनी बच्ची नहीं है। काकी की मदद से उसको एक फैक्टरी में काम मिल जाता है। जहां बहुत सी महिलाएं पैकिंग का काम करती थी। भारती थोड़ा पढ़ी लिखी थी उसको कुछ माह देखभाल फिर सुपरवाइजर का काम मिल जाता है। जब वो काम पर जाती तो काकी बच्ची की देखभाल में मदद करती ऐसे ही दिन गुजरते जाते और बच्ची नालंदा बड़ी हो जाती है। गांव में बारहवीं के बाद वो डाक्टरी प्रवेश परीक्षा पास कर लेती है। शहर में पढ़ाई के लिए पैसों की व्यवस्था काकी अपनी थोड़ी जमीन बेचकर कर देती है। भारती के मना करने के बाबजूद वो मदद करती है कहते हुए “ बेटी मैं तो अब बुढ़ी हो गई हूं ये जमीन जायदाद मकान मेरे किसी काम के नहीं हैं, सब छुट जायेंगे यहीं, मैं चाहती हूँ मेरे जीते-जी मेरी आँखों के सामने नालंदा ऊंचा मुकाम हासिल कर ले अपने पैरों पर खड़ी हो जाये तुम्हारा एक मजबूत सहारा बन जाये । हम दोनों ने ज़िन्दगी में बहुत दुख देखे, बहुत कुछ सहा है। मैं नहीं चाहती हमारी बच्ची भी हम दोनों की तरह दुखी हो और ये कभी न कहे ”…..कि
“मेरे जैसा बदनसीब दुनिया में कोई नहीं “ !!
भारती काकी को कहती हैं काकी तुमने मेरे माँ पिता पति सभी की कमी को पूरा कर दिया है। समय बीतता नालंदा डाक्टरी की पढ़ाई पूरी कर लेती है। पहले इन्टर्नशिप फिर शहर के एक बड़े प्रतिष्ठित अस्पताल में उसकी नियुक्ति हो जाती है । आज यह खबर सुनकर भारती फैक्ट्री से दौड़ी चली आती है। आज उसका स्वप्न उसकी मुराद पूरी हो जाती है। अभी भारती कुर्सी पर बैठी ख्यालों में ही खोई होती है तभी नालंदा कमरे में प्रवेश करती है। “अरे माँ आप कहां खो गई हो, चलो उठो और तैयारी करो कल अस्पताल में एक बड़ा फंक्शन भी है जिसमें आप और काकी भी साथ चल रहे हैं मेरे साथ और हाँ अब आप दोनों जल्दी ही मेरे साथ शहर में रहने जाने वाले हो। मुझे जल्दी ही अस्पताल के निकट डाक्टरों के क्वार्टर में रहने की व्यवस्था मिलने वाली है “ । ऐसा कहकर नालंदा ने भारती को दोनों हाथों से पकड़ खुशी से उठा लिया। भारती चिल्लाते हुए बोली- अरे शैतान छोड़ मुझे गिरायेगी क्या ?
नालंदा अस्पताल में नौकरी ज्वाइन कर धीरे-धीरे और आगे पढ़ते हुए बड़ी नामी सर्जन बन जाती है। और डाक्टर नालंदा के नाम से काफी चर्चित हो जाती है। नर्मदा काकी और भारती उसके साथ ही रहते हैं। तीनों एक दूसरे का सहारा बन जाते हैं। इस सोच से एकदम परे मेरे जैसा बदनसीब दुनिया में कोई नहीं ।
इसलिए कहते हैं कि समय पर मदद एक फर्ज ही नहीं बल्कि इंसानियत की मिसाल बन सकता है। ऐसे मदद का जुनून समाज में भरोसा उम्मीद जिंदा रखते हैं। कहानी का संदेशात्मक पक्ष कहता है हर परिस्थिति में संवेदनशील और जिम्मेदार बने रहना बहुत जरूरी है।
लेखिका डॉ बीना कुण्डलिया
#मेरे जैसा बदनसीब दुनिया में कोई नहीं