खिड़की के बाहर सावन की झमाझम बारिश हो रही थी, लेकिन काव्या के अंदर जैसे एक सूखा रेगिस्तान पसर चुका था। उसकी छोटी बहन श्रुति, जो अपनी कॉलेज की छुट्टियों में कुछ दिनों के लिए दीदी के घर रहने आई थी, सोफे पर बैठी स्तब्ध थी। उसने अभी-अभी जो देखा था, उस पर उसे यकीन नहीं हो रहा था।
कुछ देर पहले ही काव्या के पति, विनीत ऑफिस से लौटे थे। उनके चेहरे पर हमेशा की तरह एक अजीब सी खीझ थी। काव्या ने उनके हाथ से लैपटॉप का बैग लेना चाहा, लेकिन विनीत ने बैग ज़ोर से सोफे पर पटक दिया। “तुम्हें कितनी बार कहा है कि मेरे आते ही मुझे चाय चाहिए होती है? दिन भर घर में रहकर भी तुमसे एक काम ढंग से नहीं होता!” विनीत की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि श्रुति भी सहम गई।
काव्या ने कांपते हाथों से पानी का गिलास आगे किया, “मैं बस अभी ला रही हूँ, वो दरअसल गैस पर दूध…” इससे पहले कि काव्या अपनी बात पूरी कर पाती, विनीत ने गिलास पर ज़ोर से हाथ मारा। पानी फर्श पर बिखर गया और काव्या के गाल पर विनीत के हाथ की उंगलियों के निशान उभर आए। “बहाने बनाना बंद करो!” विनीत फुंफकारते हुए बेडरूम में चला गया।
श्रुति की आँखें फटी की फटी रह गईं। जिस जीजू को वो हमेशा एक शांत और सुलझा हुआ इंसान समझती थी, उनका यह भयानक रूप उसने पहली बार देखा था। लेकिन कहानी का सबसे वीभत्स हिस्सा अभी बाकी था।
तभी दरवाजे की घंटी बजी। काव्या ने आंसुओं को पोंछा, दुपट्टा ठीक किया और दरवाज़ा खोला। सामने एक आधुनिक कपड़ों में सजी महिला खड़ी थी, जिसकी उंगली पकड़े एक तीन-चार साल का बच्चा था। महिला का नाम पल्लवी था। पल्लवी बिना किसी झिझक के घर के अंदर आ गई, जैसे वो उसी घर की मालकिन हो। विनीत, जो अभी-अभी कमरे से कपड़े बदलकर निकला था, बच्चे को देखते ही खिल उठा। उसने बच्चे को गोद में उठा लिया और प्यार से चूमने लगा। पल्लवी सीधे किचन में गई और अपने लिए कॉफी बनाने लगी। काव्या चुपचाप एक कोने में खड़ी यह सब देख रही थी, उसकी आँखों में एक ऐसी शून्यता थी जो किसी मुर्दे में होती है।
श्रुति से अब और बर्दाश्त नहीं हुआ। उसने काव्या का हाथ पकड़ा और उसे घसीटते हुए गेस्ट रूम में ले गई। दरवाज़ा बंद करते ही श्रुति फट पड़ी।
“दीदी! आपने कभी मुझे बताया नहीं… जीजू का ऐसा दरिंदगी भरा व्यवहार देखकर मुझे उनसे नफरत हो रही है। वो कैसे इंसान हैं? अपनी पत्नी पर कोई इस तरह हाथ उठाता है क्या? और ये पल्लवी? ये बच्चा? ये सब क्या है दीदी? आप ये सब बर्दाश्त क्यों कर रही हो? आप इस नरक को छोड़कर चली क्यों नहीं जातीं?” श्रुति की आँखों से आंसू बह रहे थे और आवाज़ गुस्से से कांप रही थी।
काव्या बेजान सी बिस्तर पर बैठ गई। उसने एक गहरी सांस ली, जैसे अपने अंदर के सारे दर्द को एक पल के लिए समेटने की कोशिश कर रही हो। फिर उसकी रुलाई फूट पड़ी। वह ऐसे रोई जैसे सालों का बांध आज टूट गया हो।
“कहाँ जाऊं श्रुति?” काव्या की आवाज़ में एक अजीब सी बेबसी थी। “किसके पास जाऊं? तू जानती है ना कि पापा की पिछले साल ही हार्ट की सर्जरी हुई है। डॉक्टर ने उन्हें किसी भी तरह का तनाव लेने से सख्त मना किया है। अगर उन्हें पता चला कि उनकी लाडली बेटी की ज़िंदगी ऐसी है, तो वो यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे।”
“तो क्या आप उनके लिए यहाँ रोज़ मरोगी?” श्रुति ने बीच में टोकते हुए कहा।
काव्या ने कड़वी मुस्कान के साथ कहा, “सिर्फ पापा की बात नहीं है श्रुति। भैया और भाभी को तो तू जानती ही है। जब मैं पिछली बार मायके गई थी, तो भाभी ने बातों-बातों में साफ कह दिया था कि ‘बेटियों का असली घर उनका ससुराल ही होता है, मायके में तो वो बस मेहमान होती हैं।’ भैया भी अब भाभी की ही बोली बोलते हैं। अगर मैं घर छोड़कर वहां गई, तो क्या वो मुझे चैन से जीने देंगे? हर दिन ताने मारेंगे। मेरे नाम पर परिवार की इज़्ज़त का जो रोना रोया जाएगा, वो अलग।”
श्रुति ने काव्या के कंधे पर हाथ रखा, “दीदी, लेकिन ये औरत और बच्चा?”
काव्या की आँखों से एक बार फिर आंसू छलक पड़े। “मेरी मेडिकल रिपोर्ट्स तो तूने देखी थीं ना? शादी के पांच साल बाद भी जब मेरी गोद सूनी रही, तो विनीत और उनकी माँ ने मुझे ताने मार-मार कर अधमरा कर दिया। ‘बांझ’ शब्द तो जैसे मेरे नाम के साथ जुड़ गया। विनीत को बच्चा चाहिए था, अपना वारिस। पल्लवी उनके ऑफिस में काम करती है। दोनों के बीच नज़दीकियां बढ़ीं और जब पल्लवी प्रेग्नेंट हुई, तो विनीत ने उसे छोड़ना मुनासिब नहीं समझा। उसने मुझे साफ कह दिया कि अगर मैं इस घर में रहना चाहती हूँ, तो मुझे पल्लवी और उसके बेटे कबीर को बर्दाश्त करना होगा। वरना मैं इस घर से धक्के मारकर निकाल दी जाऊंगी।”
“दीदी, आप पढ़ी-लिखी हो। आपने एम.एस.सी. की है। आप खुद कमा सकती हो। आपको इन लोगों के टुकड़ों पर पलने की क्या ज़रूरत है?” श्रुति ने अपनी बहन के अंदर की सोई हुई आग को जगाने की कोशिश की।
“पढ़ी-लिखी हूँ, लेकिन शादी के सात सालों ने मेरा सारा आत्मविश्वास खत्म कर दिया है श्रुति। मुझे लगता है कि मैं कुछ नहीं कर सकती। एक औरत जो कभी माँ नहीं बन सकती, उसकी इस समाज में क्या जगह है? मेरी उम्र ढल रही है, बुढ़ापा किसके सहारे बिताऊंगी? कम से कम यहाँ एक छत तो है। मैं इसी घर के एक कोने में पड़ी रहती हूँ। विनीत पल्लवी और कबीर के साथ खुश रहता है। जब उसे गुस्सा आता है, तो वो मुझ पर उतार देता है। मेरी नियति यही है श्रुति। एक बांझ औरत की ज़िंदगी में और क्या ही हो सकता है?” काव्या ने हार मान चुके इंसान की तरह कहा।
श्रुति ने काव्या के दोनों हाथ कसकर पकड़ लिए। “दीदी, एक औरत का वजूद सिर्फ एक बच्चा पैदा करने या किसी मर्द की गुलाम बनकर रहने में नहीं है। क्या माँ न बन पाना कोई पाप है? क्या इसके लिए आपको रोज़ शारीरिक और मानसिक हिंसा सहनी पड़ेगी? छत की बात करती हो? ये छत नहीं, एक पिंजरा है जो धीरे-धीरे आपकी जान ले रहा है।”
श्रुति ने काव्या की आँखों में सीधे देखते हुए कहा, “पापा को कुछ नहीं होगा। वो आपको इस हाल में देखेंगे तो शायद उन्हें ज़्यादा दुख होगा। और भैया-भाभी की चिंता आप क्यों करती हो? आप उनके घर मत जाओ। आप मेरे साथ चलो। मैं अभी पढ़ाई कर रही हूँ, लेकिन हम दोनों मिलकर एक छोटा सा किराए का कमरा ले लेंगे। आप बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू करो। धीरे-धीरे किसी स्कूल में जॉब मिल जाएगी। दीदी, किसी की फेंकी हुई रोटियों पर पलने से बेहतर है, अपनी मेहनत की सूखी रोटी खाना। कबीर को विनीत का प्यार मिल रहा है, वो ठीक है, लेकिन आपके आत्मसम्मान का क्या?”
काव्या चुप थी। सात सालों में पहली बार किसी ने उससे यह नहीं कहा था कि ‘औरत को थोड़ा सहना पड़ता है’ या ‘पति कैसा भी हो, परमेश्वर होता है’। पहली बार किसी ने उसे उसकी खुद की अहमियत याद दिलाई थी।
रात भर काव्या सो नहीं पाई। उसके कानों में श्रुति की बातें गूंज रही थीं— “क्या आप अपनी बाकी की ज़िंदगी एक कोने में सिसकते हुए बिताना चाहती हैं?” सुबह हुई तो बारिश थम चुकी थी। सूरज की किरणें खिड़की से छनकर आ रही थीं। काव्या ने अपना सूटकेस निकाला। उसने उसमें अपने कपड़े रखे, लेकिन अपनी शादी का एल्बम वहीं छोड़ दिया।
विनीत सोकर उठा तो उसने काव्या को सूटकेस के साथ देखा। वह व्यंग्यात्मक लहज़े में हंसा, “क्या हुआ? मायके जाने की धमकी दे रही हो? जाओ, दो दिन में रोती हुई वापस आओगी। तुम्हारे मायके वाले तुम्हें रखने वाले नहीं हैं।”
काव्या ने विनीत की आँखों में देखा। उन आँखों में अब कोई खौफ या बेबसी नहीं थी। “मैं मायके नहीं जा रही विनीत। मैं अपनी ज़िंदगी वापस लेने जा रही हूँ। तुमने मुझे बांझ कहकर मेरे वजूद को कुचलने की कोशिश की, लेकिन मैं अब और नहीं कुचली जाऊंगी। तुम अपनी पल्लवी और कबीर के साथ खुश रहो। तलाक के पेपर्स मेरे वकील तुम्हें भेज देंगे।”
विनीत हैरान रह गया। काव्या ने सूटकेस उठाया और श्रुति का हाथ पकड़कर घर की दहलीज पार कर ली। उसे नहीं पता था कि आगे का रास्ता कितना मुश्किल होगा, लेकिन उसे इतना ज़रूर पता था कि वह रास्ता इस घुटन भरे पिंजरे से लाख गुना बेहतर था। आज एक ‘बांझ’ और ‘बेबस’ औरत मर गई थी, और एक स्वतंत्र इंसान का जन्म हुआ था।
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मूल लेखिका : अर्चना खंडेलवाल