“आज तक कौन सा सुख पाया मेरी बेटी ने…”

“आज तक कौन सा सुख पाया मेरी बेटी ने… अपने बाबुल के घर में… जो उसे यहां की याद आएगी… क्यों आएगी…!”

यह कहते हुए रविंद्र जी ने एक लंबी, ठंडी आह भरी और धीरे-धीरे बिस्तर पर लेट गए। उनकी आंखें छत पर टिकी थीं, लेकिन मन अतीत की गलियों में भटक रहा था। मन में एक कसक थी, एक खालीपन था, जिसे शब्दों में बयां करना आसान नहीं था।

पूरे एक साल हो गए थे वसुधा के ब्याह को… मगर इन एक सालों में कभी घूम कर वह बाबुल के आंगन नहीं आई…

सच ही तो था… कौन सा सुख मिला था उसे यहां…?

यह सोचते ही रविंद्र जी की आंखों के सामने एक-एक कर पुराने दृश्य तैरने लगे।

वसुधा जब सिर्फ पंद्रह साल की थी, तभी उसकी मां इस दुनिया को छोड़कर चली गई थी। उस दिन से जैसे उस मासूम बच्ची का बचपन भी उसी चिता की आग में जल गया था।

घर में चार बच्चे थे — वसुधा सबसे बड़ी… फिर रत्ना, फिर कुसुम और सबसे छोटा सबका लाड़ला बबलू।

रविंद्र जी ने उस समय दूसरा विवाह करने से साफ इंकार कर दिया था। रिश्तेदारों ने बहुत समझाया—

“रविंद्र, बच्चों के लिए ही सही, दूसरा विवाह कर लो… घर संभालने वाला कोई तो होना चाहिए।”

पर रविंद्र जी ने दृढ़ स्वर में कहा था—

“मैं अपने बच्चों को सौतेली मां का दुख नहीं दूंगा।”

उनकी भावना नेक थी… मगर इस निर्णय का बोझ अनजाने में वसुधा के कंधों पर आ गिरा।

पंद्रह साल की उम्र में ही वह घर की बड़ी बन गई।

वह उम्र जब बच्चे स्कूल से लौटकर खेलते हैं, हंसते हैं, सपने देखते हैं… उस उम्र में वसुधा रसोई में चूल्हे के सामने खड़ी होती थी।

सुबह जल्दी उठकर घर झाड़ना, बर्तन धोना, खाना बनाना, भाई-बहनों को तैयार करना, स्कूल भेजना… फिर अपनी पढ़ाई करना।

सबसे छोटा बबलू तो उस समय सिर्फ तीन साल का था। वह तो वसुधा को ही मां समझता था। उसके लिए वसुधा सिर्फ दीदी नहीं थी… मां थी।

रात को बबलू को गोद में लेकर सुलाना… उसके बाल सहलाना… उसे कहानियां सुनाना… ये सब वसुधा की दिनचर्या बन गया था।

रत्ना और कुसुम थोड़ी समझदार थीं। वे भी अपनी दीदी की मदद करती थीं। लेकिन घर की असली जिम्मेदारी तो वसुधा के ही कंधों पर थी।

दसवीं में पढ़ते-पढ़ते ही वसुधा इतनी समझदार और जिम्मेदार हो गई थी कि मोहल्ले की औरतें भी उसकी तारीफ करती थीं।

“रविंद्र जी, आपकी बेटी तो लक्ष्मी है… इतनी छोटी उम्र में इतना बड़ा घर संभाल रही है।”

रविंद्र जी सुनते तो गर्व से भर जाते… मगर कहीं न कहीं दिल के कोने में एक टीस भी उठती थी।

समय धीरे-धीरे बीतता गया।

वसुधा पढ़ाई भी करती रही और घर भी संभालती रही। उसने कभी शिकायत नहीं की।

उसे अपनी जिंदगी से ज्यादा अपने भाई-बहनों की चिंता रहती थी।

कब वसुधा विवाह के योग्य हो गई, रविंद्र जी को पता ही नहीं चला।

पता तब चला जब वसुधा के ममेरे भाई के विवाह में वे सभी गए थे।

वहीं दीनबंधु जी ने पहली बार वसुधा को ध्यान से देखा।

सादगी से साड़ी पहने, सबका काम करती हुई, मेहमानों की सेवा करती हुई… उस लड़की में एक अलग ही गरिमा थी।

दीनबंधु जी अपने बेटे के लिए ऐसी ही बहू चाहते थे।

उन्होंने वहीं रविंद्र जी से बात की—

“भाई साहब, अगर आप उचित समझें तो मैं आपकी बेटी का हाथ अपने बेटे के लिए मांगना चाहता हूं।”

यह सुनकर जैसे रविंद्र जी को अचानक एहसास हुआ—

“अरे… मेरी वसुधा तो अब विवाह योग्य हो गई…”

पीछे दो और बेटियां थीं… वे भी जवान हो रही थीं… और बबलू भी अब बारह-तेरह साल का हो गया था।

उन्होंने ज्यादा सोच-विचार नहीं किया।

उसी लग्न में… महीने भर बाद ही वसुधा का विवाह तय कर दिया गया।

घर-परिवार अच्छा था, संस्कारी लोग थे।

लेकिन वसुधा का मन अभी विवाह के लिए तैयार नहीं था।

उसने एक दिन पिता के सामने हाथ जोड़कर कहा—

“पापा… मेरी जगह रत्ना का विवाह कर दीजिए… मैं अभी घर छोड़कर नहीं जाना चाहती… मैं पहले अपने भाई-बहनों की जिम्मेदारी पूरी कर लूं… फिर अपने बारे में सोचूंगी…”

रविंद्र जी का दिल उस समय पिघल तो गया था… मगर उन्होंने खुद को मजबूत किया।

उन्होंने कहा—

“बेटी… हर लड़की को एक दिन ससुराल जाना ही होता है… यह जीवन का नियम है…”

और फिर वसुधा का विवाह हो गया।

ससुराल बहुत दूर था…

इतनी दूर कि सोचने भर से नहीं पहुंचा जा सकता था।

शादी के बाद शुरू-शुरू में वसुधा घंटों वीडियो कॉल पर भाई-बहनों से बात करती रहती थी।

वह फोन पर ही घर संभालती थी—

“रत्ना, कुसुम को पढ़ाई में मदद करना…”

“कुसुम, बबलू को समय पर खाना देना…”

“बबलू, शरारत मत करना…”

उसे लगता था जैसे वह अभी भी उसी घर का हिस्सा है।

लेकिन कुछ ही दिनों में रविंद्र जी ने एक दिन बेटी से कहा—

“बेटी… अगर तुम इतना ध्यान इधर रखोगी तो ससुराल कैसे संभालोगी… यहां की जिम्मेदारी अब खत्म हो गई… अब अपने ससुराल को संभालो…”

पिता के इस वाक्य ने वसुधा के दिल को भीतर तक छू लिया।

उसके बाद उसने फोन करना बहुत कम कर दिया।

भाई-बहन भी पापा के डर से कम ही फोन करते थे।

रविंद्र जी कभी-कभी खुद ही बेटी का हाल पूछ लेते थे।

धीरे-धीरे एक साल बीत गया।

इस बीच कई तीज-त्योहार आए…

रक्षाबंधन…

दीवाली…

होली…

लेकिन वसुधा कभी मायके नहीं आई।

परसों रविंद्र जी अपनी नौकरी से रिटायर होने वाले थे।

उनके फोन पर लगातार बधाइयां आ रही थीं।

लेकिन वसुधा का कोई फोन नहीं आया।

रविंद्र जी को लगा शायद वह अचानक आ जाए।

इन्हीं विचारों में खोए हुए थे कि अचानक दरवाजे की घंटी बजी।

दरवाजा खोला तो सामने वसुधा खड़ी थी।

लेकिन वह अकेली नहीं थी…

उसके साथ उसका पूरा परिवार था — सास, ससुर, पति, देवर सभी।

वे सभी रविंद्र जी की रिटायरमेंट सेलिब्रेट करने आए थे।

वसुधा दौड़कर पापा के पास आई और उनके पैर छुए।

रविंद्र जी ने उसे उठाकर सीने से लगा लिया।

दीनबंधु जी आगे बढ़े और रविंद्र जी की पीठ थपथपाते हुए बोले—

“समधी जी… वसुधा की मां भले एक हो… लेकिन पिता तो दो हैं ना… एक पिता का दर्द दूसरा पिता कैसे नहीं समझेगा…”

रविंद्र जी की आंखें भर आईं।

उस दिन घर में खूब खुशियां मनाई गईं।

रिटायरमेंट पार्टी बहुत अच्छे से हुई।

भाई-बहन भी बहुत खुश थे।

लेकिन विदा का समय आया तो फिर वही भावुक क्षण आ गया।

वसुधा जब वापस ससुराल जाने लगी तो उसने पापा के आंसू पोंछे और मुस्कुराकर कहा—

“पापा… आप यह कभी मत सोचिएगा कि मुझे यहां कोई सुख नहीं मिला… मुझे सब कुछ यहीं मिला… आपसे मिला… अपने भाई-बहनों से मिला…”

“मैं इस आंगन को कभी नहीं छोड़ सकती…”

“मैं तन से दूर जा रही हूं… लेकिन मेरा मन हमेशा यहीं रहेगा…”

“जब भी आपको या मेरे भाई-बहनों को मेरी जरूरत होगी… मैं जरूर आऊंगी…”

“अगर आप चाहें भी तो मुझे दूर नहीं कर सकते…”

रविंद्र जी ने बेटी को गले लगा लिया।

उस दिन उन्हें पहली बार लगा—

उन्होंने बेटी को खोया नहीं…

बल्कि एक और घर पा लिया है।


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