ज़ायका ज़िंदगी का

कई दिनों से मेरी अपनी गृहस्थी की उलझनों के कारण मेरा विश्वनाथ जी के घर जाना नहीं हो पाया था। उस दोपहर जब धूप थोड़ी मद्धम हुई, तो मैंने सोचा कि चलो, अवनि और जानकी जी से हाल-चाल पूछ आऊं। मुख्य दरवाजे की कुंडी खुली हुई थी। जैसे ही मैंने आंगन में कदम रखा, भीतर से अवनि की कुछ ऊंची और परेशान आवाज़ सुनाई दी।

“आप मेरी बात कभी क्यों नहीं सुनते? पिछले पंद्रह दिनों से देख रही हूँ, कुछ भी निगलते हैं तो चेहरा दर्द से लाल हो जाता है। आज शाम को ही आपको अस्पताल जाना पड़ेगा, मैं कोई बहाना नहीं सुनूंगी।”

मैंने चौखट पर दस्तक देते हुए कहा, “अरे अवनि बहू, किस पर इतना गुस्सा हो रही हो? आज तो आंगन तक तुम्हारी आवाज़ गूंज रही है।”

मुझे देखते ही अवनि ने झट से अपने चेहरे का तनाव समेटा और चेहरे पर वही चिर-परिचित आत्मीय मुस्कान बिखेर दी। “अरे मौसी जी, आप! आइए, अंदर बैठिए। देखिए न, आज मैंने सुबह ही ताज़ा सांभर, नारियल की चटनी और एकदम खस्ता वड़े बनाए हैं। मैं अभी आपके लिए गरमा-गरम प्लेट लगाकर लाती हूँ।”

मैंने उसका हाथ थामकर पास के सोफे पर बिठाया और कहा, “खाना तो मैं खाऊंगी ही, तेरे हाथ का स्वाद कोई छोड़ सकता है क्या! पर पहले ये बता, पंकज पर इतनी नाराज़ क्यों हो रही थी?”

सामने कुर्सी पर बैठे पंकज ने थोड़ा मुस्कुराने की कोशिश की, मगर उसकी आंखों में एक अजीब सी थकावट तैर रही थी। अवनि की आंखें भर आईं। वह बोली, “मौसी जी, आप ही समझाइए इन्हें। कुछ हफ़्तों से इनके गले में लगातार चुभन और दर्द रहता है। पानी तक घूंट-घूंट करके पीते हैं। मैं हर रोज़ डॉक्टर के पास जाने की ज़िद करती हूँ, पर ये काम का बहाना बनाकर टालते रहते हैं।”

मैंने पंकज की ओर देखकर थोड़ा सख्त लहजे में कहा, “पंकज बेटा, सेहत से बड़ा कोई काम नहीं होता। इस तरह की तकलीफ को कभी नज़रअंदाज़ नहीं करते। कल का इंतज़ार मत करो, आज ही जाकर अच्छे फिजिशियन को दिखाओ।”

पंकज ने सिर झुकाकर आदर से कहा, “जी मौसी जी, आप कहती हैं तो मैं आज शाम को दफ्तर से लौटते वक्त क्लीनिक चला जाऊंगा। बस थोड़ा काम का दबाव रहता है, इसलिए देरी हो गई।”

अवनि तुरंत रसोई में गई और मेरे लिए एक थाली सजा लाई। सांभर की सुगंध ही भूख जगाने वाली थी। वड़े इतने कुरकुरे और चटनी इतनी संतुलित थी कि मेरा मन तृप्त हो गया। मैंने भरपेट खाया और अवनि की पीठ थपथपाते हुए कहा, “बेटा, तेरे हाथ के इस हुनर की जितनी तारीफ की जाए कम है। अच्छा, अब मैं चलती हूँ। पंकज की जांच हो जाए और रिपोर्ट आ जाए, तो मुझे खबर ज़रूर करना।”

उस दिन मुझे ज़रा भी आभास नहीं था कि इस हंसते-खेलते घर पर दुखों का ऐसा पहाड़ टूटने वाला है।

करीब दस दिन बाद, दोपहर के समय अचानक उनके घर से चीख-पुकार और रोने की आवाज़ें सुनाई देने लगीं। मैं घबराकर भागी-भागी उनके घर पहुंची। वहां का मंज़र देखकर मेरा कलेजा कांप उठा। बैठक में जानकी देवी छाती पीटकर रो रही थीं और विश्वनाथ जी दीवार का सहारा लिए जड़वत बैठे थे, मानो उनकी देह से प्राण ही निकल गए हों। अवनि मुझे देखते ही दौड़कर आई और मेरे सीने से लगकर फूट-फूटकर रोने लगी। उसकी हिचकियां थमने का नाम नहीं ले रही थीं।

“मौसी जी… सब खत्म हो गया… डॉक्टर ने कहा है पंकज को भोजन नली का बहुत खतरनाक कैंसर है… और बीमारी तीसरे स्टेज पर पहुंच चुकी है… ऑपरेशन भी नहीं हो सकता!” अवनि के ये शब्द किसी जलते हुए तीर की तरह मेरे कानों में चुभे।

मैंने भर्राए गले से उसे अपने आंचल में समेटा। “हिम्मत मत हार बेटी… ऊपर वाले पर भरोसा रख। आज के दौर में बड़े-बड़े इलाज हैं, सब ठीक होगा।”

मगर होनी को कुछ और ही मंज़ूर था। आने वाले तीन महीने उस परिवार के लिए किसी नर्क से कम नहीं थे। पंकज की कीमोथेरेपी और दवाइयों में घर की जितनी थोड़ी-बहुत बचत थी, सब पानी की तरह बह गई। पंकज का शरीर कंकाल बनता जा रहा था और उसका दर्द देखा नहीं जाता था। अवनि ने दिन-रात एक कर दिए। न उसने खाना देखा, न नींद। वह बस दवाइयों की बोतलें, अस्पताल के पर्चे और पंकज के सिरहाने बैठी रहती।

लेकिन नियति बहुत क्रूर निकली। तमाम कोशिशों और अवनि की बेइंतहा प्रार्थनाओं के बावजूद, एक काली रात पंकज ने हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं।

घर का सन्नाटा ऐसा था जो रूह को कंपा दे। पंकज के जाने के बाद अवनि पूरी तरह सुध-बुध खो बैठी थी। वह बस शून्य में ताकती रहती। न आंखों में आंसू बचे थे, न होंठों पर कोई शब्द। घर की रीढ़ टूट चुकी थी। बूढ़े सास-ससुर इस उम्र में जवान बेटे की अर्थी देखकर आधे मर चुके थे। छह साल का आरव मां के पल्लू को पकड़कर पूछता, “पापा कब लौटेंगे?” और अवनि के पास कोई जवाब नहीं होता था।

तीसरे दिन अवनि का बड़ा भाई गौरव आया। उसने अपनी बहन की यह उजड़ी हुई हालत देखी तो बर्दाश्त नहीं कर पाया। उसने अवनि का हाथ पकड़कर कहा, “अवनि, चल मेरे साथ। यह घर अब तुझे सिर्फ गम देगा। मां-बाप तो हमारे रहे नहीं, पर मैं तेरा भाई अभी ज़िंदा हूँ। तू और आरव मेरे साथ चलो, मैं तुम दोनों को संभाल लूंगा।”

अवनि ने धीरे से अपना हाथ छुड़ाया। उसने अपनी सूनी आंखों से एक बार कमरे के कोने में लाचार बैठे सास-ससुर को देखा, जो कातर नज़रों से उसे देख रहे थे मानो अपनी बची-खुची ज़िंदगी की भीख मांग रहे हों।

अवनि ने भरभराई आवाज़ में मगर बेहद दृढ़ता से कहा, “नहीं भैया, मैं कहीं नहीं जाऊंगी। यह मेरा घर है। पंकज भले चले गए हों, मगर उनके माता-पिता और उनकी निशानी आरव मेरे पास हैं। अगर मैं अपनी सहूलियत देखकर आपके साथ चली गई, तो इस बुढ़ापे में इन असहाय मां-बाप को कौन देखेगा? कौन इनकी दवा का ख्याल रखेगा? मैं जीते जी इन्हें बेसहारा छोड़कर नहीं जा सकती।”

गौरव ने समझाने की बहुत कोशिश की, “अवनि, तू जज़्बाती हो रही है। अकेली औरत इस ज़माने में बूढ़ों और बच्चे का बोझ कैसे उठाएगी? ज़िंदगी बहुत लंबी है।”

“यह बोझ नहीं भैया, मेरा फ़र्ज़ है। जो सुख के दिनों में मेरा परिवार था, दुख में उसे छोड़ दूं तो मेरी आत्मा मुझे कभी माफ नहीं करेगी,” अवनि ने हाथ जोड़ लिए।

गौरव गहरी सांस लेकर रह गया। जाते वक्त उसने अवनि के हाथ में दस हज़ार रुपये रखे और भारी मन से लौट गया।

शोक के दिन धीरे-धीरे बीते, मगर असली हकीकत अब दरवाज़े पर खड़ी थी—पेट की आग और रोज़मर्रा की ज़रूरतें। राशन खत्म होने को था, आरव की स्कूल फीस का नोटिस आ चुका था और विश्वनाथ जी की दिल की दवाइयां खत्म हो रही थीं।

एक दोपहर मैं अवनि के पास बैठी। वह खामोश बैठी आटे की परात देख रही थी। मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा, “अवनि बेटी, जो चला गया, वह कभी लौटकर नहीं आता। रोने-धोने से यह ज़िंदगी नहीं कटेगी। अब तुझे ही इस घर का बेटा और बेटी दोनों बनना पड़ेगा। यह बता, आगे का कुछ सोचा है? पंकज के दफ्तर से कुछ आर्थिक मदद मिली?”

अवनि ने भारी मन से कहा, “मौसी जी, कंपनी छोटी थी। उन्होंने सिर्फ पंद्रह हज़ार रुपये का अंतिम हिसाब करके दिया है। भाई जो दस हज़ार दे गए थे, उसमें से भी कुछ खर्च हो गए। कुल मिलाकर मेरे पास बमुश्किल बीस-बाईस हज़ार रुपये बचे हैं। समझ नहीं आ रहा कि आगे का रास्ता कैसे कटेगा। मैं कोई बहुत पढ़ी-लिखी तो हूँ नहीं कि कहीं जाकर बड़ी नौकरी कर लूं।”

मैंने कुछ देर सोचा, फिर उसकी दोनों हथेलियां अपने हाथों में थाम लीं। “अवनि, ईश्वर जब एक दरवाज़ा बंद करता है, तो दूसरा खोलता भी है। तू पढ़ी-लिखी कम है तो क्या हुआ, तेरे पास वो हुनर है जो बड़ी-बड़ी डिग्रियों वालों के पास नहीं होता। तेरे हाथ का बना खाना जो एक बार खा ले, वह कभी भूल नहीं सकता। तू रोज़ सुबह घर के काम निपटाकर दाल-बाटी, पुलाव, कढ़ी-चावल या छोले-कुल्चे जैसा सादा और स्वादिष्ट भोजन बनाकर किसी अच्छी जगह फूड स्टॉल लगा सकती है? घर का बना शुद्ध खाना आज के समय में कौन नहीं खाना चाहता?”

अवनि ने चौंककर मेरी तरफ देखा। उसकी आंखों में थोड़ी उम्मीद की चमक तो कौंधी, मगर अगले ही पल संकोच की परत चढ़ गई। “मौसी जी… मैं खाना तो बहुत प्यार से बना लूंगी। मेहनत से मुझे कभी डर नहीं लगा। पर… क्या समाज में यह अच्छा लगेगा? मां जी और बाबूजी क्या सोचेंगे कि उनकी बहू सड़क पर खाना बेचेगी?”

मैंने कहा, “मेहनत की रोटी कमाने में कोई शर्म नहीं होती बेटी। हाथ फैलाने से लाख गुना बेहतर है कि अपने पैरों पर खड़ा हुआ जाए। तू रुक, मैं अभी जानकी जी और विश्वनाथ भाई साहब से बात करती हूँ।”

शुरुआत में सास-ससुर के मन में बहुत झिझक थी। पुरानी पीढ़ी की सोच थी कि घर की बहू बाहर निकलकर दुकान कैसे लगाएगी। लेकिन जब मैंने उन्हें समझाया कि अगर आज अवनि को सहारा नहीं दिया, तो कल इस चौखट पर फाके की नौबत आ जाएगी और अवनि का यह कदम पूरे परिवार की ढाल बनेगा, तो वे रो पड़े। विश्वनाथ जी ने अवनि के सिर पर कांपता हाथ रखकर कहा, “बहू, तू हमारी बेटी है। अगर तू हमारे लिए इतना बड़ा हौसला दिखा रही है, तो हमारा आशीर्वाद हमेशा तेरे साथ है।”

अब सवाल था स्टॉल और जगह का। अवनि ने कहा, “मौसी जी, मेरे पास जो बीस हज़ार हैं, उसमें से राशन और बर्तन तो आ जाएंगे, मगर स्टॉल का ढांचा और जगह की अनुमति कैसे मिलेगी?”

मैंने मुस्कुराकर कहा, “उसकी चिंता तू मत कर। तेरे अंकल नगर निगम के रिटायर्ड कर्मचारी हैं। पास के कमर्शियल कॉम्प्लेक्स के बाहर, जहां सैकड़ों बैंक और आईटी दफ्तर हैं, वहां एक साफ-सुथरा कोना लगवाने और लोहे का एक छोटा, सुंदर फूड कार्ट तैयार करवाने की ज़िम्मेदारी उनकी है।”

अगले एक हफ्ते में सब कुछ तैयार हो गया। कार्ट का नाम रखा गया—’अन्नपूर्णा स्वाद – घर की रसोई’। साफ-सुथरे स्टील के बड़े-बड़े बर्तन, एप्रन और सिर पर बांधने वाला सूती कपड़ा, सब व्यवस्थित किया गया।

पहले दिन अवनि ने सिर्फ तीस प्लेट कढ़ी-चावल और छोले-चावल बनाए। मैं और उसके अंकल भी उसके साथ उस कॉम्प्लेक्स के बाहर खड़े थे। सुबह ठीक साढ़े ग्यारह बजे उसने अपनी कार्ट खोली। शुरुआत में थोड़ी झिझक थी, अवनि का सिर झुका हुआ था। मगर दोपहर के बारह बजते ही दफ्तरों से लोग लंच के लिए बाहर निकलने लगे। बाज़ार के तेल-मसालेदार खाने से ऊबे हुए कर्मचारियों को जब साफ़-सुथरे स्टॉल से घर जैसी खुशबू आई, तो पहले एक ग्राहक आया।

उसने एक प्लेट कढ़ी-चावल चखा और खाते ही उसके चेहरे पर तृप्ति के भाव आ गए। उसने तुरंत अपने साथी को आवाज़ दी, “अरे राहुल, यहां आ! बिल्कुल मां के हाथ का बना खाना है।”

देखते ही देखते, आधे घंटे के भीतर अवनि के सारे बर्तन खाली हो गए। कई लोग तो बिना खाए ही मायूस लौट गए। पहले ही दिन अवनि के चेहरे पर जो आत्मविश्वास और स्वाभिमान की चमक मैंने देखी, उसने मेरा दिल भर दिया।

यह सिलसिला चल पड़ा। अब अवनि की दिनचर्या तय हो चुकी थी। सुबह चार बजे उठकर वह घर का सारा काम, सास-ससुर की सेवा और आरव को तैयार करके स्कूल भेजना निपटा लेती। फिर ताज़ा खाना बनाकर ठीक ग्यारह बजे स्टॉल पर पहुंच जाती। दोपहर तीन बजे तक उसका सारा खाना बिक जाता और वह पैसे समेटकर घर लौट आती। शाम का समय वह आरव की पढ़ाई और परिवार के साथ बिताती।

अवनि के खाने की चर्चा पूरे इलाके में फैल गई। स्वाद इतना लाजवाब और दाम इतने वाजिब कि ग्यारह बजते ही लोग कतार लगाकर खड़े हो जाते। महीने भर के भीतर ही अवनि की आमदनी इतनी अच्छी होने लगी कि घर की आर्थिक तंगी हवा हो गई। उसने न केवल आरव का दाखिला एक अच्छे स्कूल में करवाया, बल्कि ससुर जी की नियमित दवाइयों और घर के खर्च को भी बहुत इज़्ज़त से संभाल लिया।

करीब छह महीने बाद, एक दिन दोपहर में मैं भी टहलते हुए उस कॉम्प्लेक्स के बाहर पहुंची। स्टॉल के इर्द-गिर्द अच्छी-खासी भीड़ थी। अवनि चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान लिए फुर्ती से प्लेटें लगा रही थी।

मैंने पीछे से आवाज़ दी, “अरे बिटिया, ज़रा एक प्लेट गरमा-गरम कढ़ी-चावल इस बूढ़ी मौसी के लिए भी लगाना।”

मेरी आवाज़ सुनते ही अवनि ने सिर उठाया। उसकी आंखें खिल उठीं। उसने तुरंत चम्मच किनारे रखा और बाहर आकर मेरे दोनों हाथ पकड़ लिए। “अरे मौसी जी! आप धूप में क्यों आईं, मुझे कहलवा देती तो मैं घर पर भिजवा देती। बैठिए, मैं अभी आपके लिए स्पेशल प्लेट लगाती हूँ।”

अवनि ने मेरे लिए प्लेट लगाई और पास ही रखी कुर्सी पर मुझे बड़े मान से बिठाया। जब मैंने पहला निवाला खाया, तो स्वाद पहले से भी ज्यादा निखर चुका था। अवनि पास आकर हाथ जोड़कर खड़ी हो गई, उसकी आंखों में कृतज्ञता के आंसू छलक आए। “मौसी जी, आज मैं जो कुछ भी हूँ, आपकी वजह से हूँ। अगर उस दिन आपने मुझे यह रास्ता न दिखाया होता और मेरा हौसला न बढ़ाया होता, तो शायद मैं आज भी आंसुओं में डूबकर अपने बच्चे का भविष्य बर्बाद कर रही होती। आपका यह अहसान मैं कभी नहीं उतार सकती।”

मैंने अवनि के आंसू पोंछे और मुस्कुराते हुए कहा, “पगली, इसमें अहसान कैसा? रास्ता तो कोई भी दिखा सकता है, मगर उस कांटे भरे रास्ते पर चलकर खुद को साबित करना सिर्फ तेरे जैसी हिम्मती बेटी के बस की बात थी। तूने न सिर्फ अपने सास-ससुर को बेसहारा होने से बचाया, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि औरत अगर ठान ले, तो वह अपने परिवार के लिए ढाल भी बन सकती है और अन्नपूर्णा भी। मुझे आज तुझ पर गर्व है।”

अवनि के चेहरे पर स्वाभिमान और संतोष की जो मुस्कान थी, वह दोपहर की धूप से भी ज्यादा चमकदार लग रही थी। जीवन ने उससे बहुत कुछ छीना था, मगर उसने अपनी मेहनत और आत्मसम्मान से अपनी और अपने परिवार की एक नई तकदीर गढ़ ली थी।

जीवन में जब अचानक कोई बड़ा संकट आता है, तो इंसान के पास दो ही रास्ते होते हैं—या तो वह परिस्थितियों के आगे घुटने टेक दे, या फिर अपने आत्मसम्मान और मेहनत के बल पर एक नई राह बनाए। अवनि का यह सफर हमें सिखाता है कि कोई भी काम छोटा नहीं होता और परिवार के प्रति सच्चा समर्पण इंसान को हर मुश्किल से लड़ने की ताकत देता है।

क्या आपके आस-पास भी कोई ऐसी सशक्त नारी है जिसने विषम परिस्थितियों में अपने परिवार के लिए मिसाल कायम की हो? अपनी भावनाएं और विचार हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं।

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