आकृति एक छोटे-से कस्बे में अपने तीन भाई-बहनों के साथ रहती थी। माता-पिता ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार सभी बच्चों का पालन-पोषण किया था। माँ घर सँभालती और पिता दिन-रात मेहनत करके किसी तरह धन अर्जन करते थे। आकृति ने बचपन से ही अभावों का जीवन देखा था। उसके मन में कुछ करने की चाह थी, बड़े-बड़े सपने थे, लेकिन घर की परिस्थितियों के कारण उसके सपने मन के किसी कोने में ही दुबक कर रह गए।
आकृति जब छोटी थी, माँ रोज सुबह उसकी दो चोटियाँ बनातीं और उन चोटियों को मोड़कर लाल फीता बाँध देतीं। आकृति तुरंत दीवार से लटके हुए छोटे से आईने के सामने खड़ी होकर टेढ़ा-मेढ़ा मुँह बनाते हुए खुद को देखती। न जाने क्यों उसे हमेशा लगता, कि उसकी एक चोटी ऊँची और दूसरी नीची है।
वह घर के किसी कोने में जाकर चुपके से उन चोटियों को खोल देती और उन्हें दोबारा बनाने की कोशिश करती, लेकिन बना नहीं पाती थी। माँ की नजर पड़ते ही उसे अपनी ओर खींचते हुए, सिर पर हल्की-सी चपत लगाते हुए कहतीं-
“सुबह से कितने काम पड़े हैं और तुम्हें अपनी चोटी खोलने की पड़ी है!”
आकृति फिर आईने के सामने खड़ी हो जाती। अपनी चोटियों को गौर से देखते हुए मन ही मन बुदबुदाती,
“माँ, इस बार भी तुमने मेरी चोटी अच्छी नहीं बनाई।”
माँ हँसकर कहतीं,
“अब खोलना मत, नहीं तो सच में मार पड़ेगी।”
आकृति मुँह फुलाकर आईने से हट जाती।
बचपन में उसकी एक और शिकायत रहती थी- कि उसके पास सुंदर कपड़े नहीं थे। एक दिन उसने माँ से कहा,
“माँ, तुम मुझे एक सुंदर-सी फ्रॉक लाकर दो। देखो, चुमकी कितनी सुंदर फ्रॉक पहनती है।”
माँ कुछ क्षण चुप रहीं। फिर उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं,
“बेटा, कभी किसी की नकल नहीं करनी चाहिए। हमारे पास जो भी है, उसी में गुजारा करना चाहिए और उसी से अपना अच्छा वक्त बनाना चाहिए।”
उस समय आकृति को माँ की बात समझ नहीं आई।
धीरे-धीरे वह बड़ी होने लगी। दीवार पर टँगा वह छोटा-सा आईना वहीं रहा। आकृति कई बार माँ से कहती,
“माँ, एक बड़ा आईना क्यों नहीं ले आतीं? इसमें तो पूरा चेहरा भी ठीक से नहीं दिखाई पड़ता।”
माँ मुस्कुराकर कहतीं,
“जब इससे काम चल रहा है तो दूसरे आईने की क्या जरूरत है?”
आकृति कुछ कहना चाहती, लेकिन चुप हो जाती।
वह बचपन से बड़े-बड़े सपने देखती थी। कभी अध्यापिका बनने का सपना, कभी किसी दफ्तर में काम करने का। हमेशा अपने पैरों पर खड़े होने के बारे में सोचती। लेकिन परिस्थितियों ने उसके सपनों को धीरे-धीरे छोटा कर दिया।
आठवीं करने के बाद उसकी पढ़ाई छूट गई और कुछ समय बाद उसका विवाह अंकुश के साथ हो गया।
अंकुश का परिवार भी साधारण था। यहाँ भी वही अभाव थे, जिन्हें वह अपने मायके में छोड़कर आई थी। कभी घर का खर्च पूरा पड़ता तो कभी महीने के अंतिम दिनों में राशन का हिसाब लगाना पड़ता।
वह मन ही मन अक्सर माँ की बात दोहराती-
“हमारे पास जैसा है उसी में गुजारा करना चाहिए और उसी से ही अपना अच्छा वक्त बनाना चाहिए।”
समय बीतता गया। आकृति दो बच्चों की माँ बन गई।
अब उसके जीवन का सबसे बड़ा सपना उसके बच्चे थे। उसने मन में एक गाँठ बाँध ली-
जो वह नहीं कर पाई उसके बच्चे जरूर करेंगे।
एक दिन उसने हिम्मत करके अंकुश से कहा,
“मैं नौकरी करना चाहती हूँ।”
अंकुश हँस पड़ा।
“क्या करोगी तुम? बस आठवीं पास किया है। इससे ज्यादा पढ़ भी नहीं पाईं। कौन नौकरी देगा तुम्हें?”
आकृति चुप हो गई।
उस रात वह देर तक जागती रही। उसे अपना बचपन याद आया। लाल फीते वाली चोटियाँ, दीवार पर टँगा छोटा-सा आईना और माँ की आवाज।
उसने पहली बार महसूस किया कि शायद उसकी माँ ने जो कहा था, उसका अर्थ यह नहीं था कि अभावों को स्वीकार कर लो।
शायद माँ कहना चाहती थीं- अभावों को अपनी पहचान मत बनने दो।
अगले दिन आकृति ने बच्चों की पुरानी किताबें निकालीं। रात में जब सब सो जाते,तब वह उन्हें पढ़ने लगी। पहले उसे बहुत कठिनाई हुई। कई शब्द उसे समझ नहीं आते। वह बच्चों से पूछती और बच्चे हँसते हुए उसे समझाते।
बच्चों ने पहली बार अपनी माँ को विद्यार्थी की तरह पढ़ते हुए देखा था।
कुछ महीनों बाद आकृति ने खुली शिक्षा के माध्यम से अपनी पढ़ाई आगे बढ़ाने का निर्णय लिया।
अंकुश और उसके घर वालों ने पहले विरोध किया, लेकिन आकृति ने इस बार किसी की नहीं सुनी। उसने मन ही मन प्रतिज्ञा ली कि वह अब हार नहीं मानेगी। वह मन ही मन बुदबुदाते हुए बोली-
“तुमने ठीक कहा है,” उसने शांत स्वर में अंकुश से कहा, “आठवीं पास को नौकरी कौन देगा। इसलिए मैं आगे पढ़ना चाहती हूँ यह मेरा अन्तिम फैसला है।”
अंकुश उसके चेहरे को देखता ही रह गया।
वक्त धीरे-धीरे अपना धूरी पर घुमता रहा।
आकृति ने दसवीं पास कर लिया यह उसकी सफलता का पहला पायदान था। तत्पश्चात वह बारहवीं कक्षा के साथ -साथ कंप्यूटर सीखने लगी। उसने घर गृहस्ती और बच्चों की देखरेख के साथ-साथ अपनी पढ़ाई को कभी विराम नहीं दिया।
नौकरी करने का इरादा अब उसने अपने दिमाग से निकाल फेंका। वह अपनी प्रबंधक खुद बनेगी। स्नातकोत्तर करने के पश्चात उसने बैंक से लोन लेकर कुछ कम्प्यूटर खरीदें। घर के बाहरवाले कमरे में उसने बच्चों को कम्प्यूटर सिखाना शुरू किया। शुरुआत में दो बच्चे आए। फिर पाँच। फिर दस।
छोटे-से कमरे में शुरू हुई उसकी कम्प्यूटर की पाठशाला। धीरे-धीरे पूरे मोहल्ले में पहचानी जाने लगी। अब पहचान के साथ -साथ पैसा भी आने लगा।
बच्चे अपनी मांँ की लगनशीलता देखते हुए आगे बढ़ रहे थे और उन्हें ही अपना प्रेरणा स्रोत मानने लगे
अब आकृति को आईने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। क्योंकि अब उसे अपने भीतर का चेहरा साफ दिखाई देने लगा था।
वर्षों बाद उसके दोनों बच्चे अच्छे पदों पर पहुँच गए। बेटी अध्यापिका बनी और बेटा एक प्रतिष्ठित कंपनी में काम करने लगा।
एक दिन बेटी ने माँ के हाथ में एक सुंदर-सा पैकेट रखा।
“माँ, इसे खोलिए।”
आकृति ने पैकेट खोला। उसमें एक बड़ा, सुंदर आईना था।
वह कुछ क्षण उसे देखती रही।
बेटी मुस्कुराकर बोली,
“माँ, बचपन में आप कहती थीं न कि घर में बड़ा आईना होना चाहिए? आज मैं आपके लिए लाई हूँ।”
आकृति की आँखें भर आईं।
वह आईने के सामने खड़ी हुई।
उसमें अब वह छोटी-सी लड़की नहीं थी, जो अपनी एक ऊँची और एक नीची चोटी देखकर परेशान होती थी।
अब उसके बालों में सफेदी और चेहरे पर उम्र की महीन रेखाएँ थीं, लेकिन आँखों में स्वाभिमान की एक अलग चमक थी।
अचानक उसे अपना बचपन याद आ गया।
वह लाल फीता…
वह दीवार पर टंगा हुआ छोटा-सा आईना…
माँ की हल्की-सी चपत…
और वह बात-
“हमारे पास जैसा है, उसी में गुजारा करना चाहिए और उसी से अपना अच्छा वक्त बनाना चाहिए।”
आज उसे उस बात का अर्थ समझ आ गया था।
माँ ने उसे अभावों के आगे झुकना नहीं सिखाया था। उन्होंने उसे उपलब्ध साधनों से अपना रास्ता बनाने की सीख दी थी।
आकृति ने आईने में खुद को देखा और हल्का-सा मुस्कुराई।
तभी उसकी नजर आईने के कोने में रखी अपनी पुरानी तस्वीर पर पड़ी। तस्वीर में दो चोटियाँ थीं- एक थोड़ी ऊँची, दूसरी थोड़ी नीची।
वह हँस पड़ी।
“माँ, उस दिन भी आपने मेरी चोटियाँ बराबर नहीं बनाई थीं।”
आँखों से आँसू बहते हुए भी उसके चेहरे पर मुस्कान थी।
वक्त सचमुच बहुत कुछ बदल देता है।
कभी वह छोटी सी लड़की अपने छोटे-से आईने में अपनी टेढ़ी-मेढ़ी चोटियाँ देखकर सोचती थी कि उसका जीवन भी शायद दूसरों जैसा सुंदर नहीं है।
लेकिन आज उसी लड़की को समझ में आ गया था-
आईना कभी जीवन की खूबसूरती नहीं बताता, वह तो सिर्फ चेहरा दिखता है। जीवन कितना सुंदर है यह तो वक्त गुजरने के बाद ही दिखाई देता है।
आकृति ने आईने में खुद को भरपूर निहारा।
इस बार उसे अपना चेहरा नहीं, अपना संपूर्ण जीवन के साथ-साथ अपनी उपलब्धियांँ दिखाई दे रही थी।
और उसे लगा-
वक्त का पहिया घूमता जरूर है जो इंसान वक्त के साथ चलने का साहस रखता है वह वक्त के आईने में अपनी सबसे खूबसूरत तस्वीर देखता है।
– सुनीता मुखर्जी “श्रुति”
लेखिका
स्वरचित, मौलिक, अप्रकाशित
हल्दिया, पूर्व मेदिनीपुर पश्चिम बंगाल
#वक्त का पहिया