देवांग भी कमरे में आए। उनकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी और आंखों के नीचे काले घेरे साफ बता रहे थे कि वे रातों को सोए नहीं हैं। देवांग ने आकर मल्लिका के पैरों के पास बैठकर उसके पैर दबाने शुरू कर दिए। देवांग की आंखों में मल्लिका के लिए जो असीम प्रेम और तड़प थी, उसे देखकर कोई अंधा भी कह सकता था कि इस पुरुष के दिल में मल्लिका के सिवा किसी और का वजूद कभी नहीं हो सकता। वह तो केवल अपनी पत्नी के अंतिम सुकून के लिए इस अग्निपरीक्षा से गुजर रहा था।
सर्दियों की एक उदास, धुंध भरी सुबह थी जब नीलिमा चंडीगढ़ की उस शांत, घनी छायादार सड़क पर एक जाने-पहचाने मकान के सामने अपनी टैक्सी से उतरी। दिल में एक अजीब सी घबराहट और सीने पर मन भर का बोझ था। जिस सहेली के साथ उसने स्कूल की बेंचों से लेकर कॉलेज की अल्हड़ कैंटीन तक हर सुख-दुख साझा किया था, उसी मल्लिका के बारे में जब कुछ दिन पहले यह मनहूस खबर मिली कि वह जीवन के अंतिम पड़ाव पर खड़ी है, तो नीलिमा के पैरों तले से जमीन खिसक गई थी। असाध्य फेफड़ों की बीमारी मल्लिका के प्राणों को दीमक की तरह चाट रही थी और डॉक्टरों ने साफ कह दिया था कि अब केवल कुछ ही हफ्तों या महीनों की मोहलत बाकी है।
भारी कदमों से नीलिमा ने घर की दहलीज पार की। बैठक में एक मद्धिम सी अगरबत्ती की सुगंध फैली थी, जिसमें दवाइयों की तेज, कड़वी गंध घुली हुई थी। दीवान पर सहारा लिए बैठी मल्लिका को देखकर नीलिमा की आंखें छलक पड़ीं। कभी गुलाब की पंखुड़ी जैसी खिलखिलाती मल्लिका अब हड्डियों का एक ढांचा भर रह गई थी। चेहरा पीला पड़ चुका था, मगर उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में वही पुरानी सौम्यता और ठहराव अब भी जिंदा था।
जैसे ही मल्लिका की नजर दरवाजे पर खड़ी नीलिमा पर पड़ी, उसके सूखे होंठों पर एक अलौकिक मुस्कान तैर गई। “नीलू… तू आ गई!” उसने कांपती आवाज में बाहें फैला दीं।
नीलिमा दौड़कर उसके सीने से लग गई और फफक-फफक कर रो पड़ी। दोनों बचपन की सखियां बरसों बाद मिल रही थीं। आंसुओं का वेग जब कुछ थमा, तो बचपन की शरारतें, शिमला की वादियों में बिताए कॉलेज के दिन और कागज़ की नावों की यादें हवा में तैरने लगीं। कुछ पलों के लिए ऐसा लगा मानो काल का क्रूर पहिया पीछे घूम गया हो। मल्लिका अपनी सांसों की घरघराहट और असहनीय पीड़ा को भुलाकर ठहाके लगाने लगी थी। कमरा पुरानी यादों की मिठास से भर गया था।
तभी बाहर मुख्य द्वार की घंटी बजी और कुछ ही पलों में बैठक के दरवाजे से मल्लिका के पति, देवांग ने भीतर कदम रखा। लेकिन देवांग अकेले नहीं थे। उनके हाथ में हाथ डाले, बेहद सलीके से सजी-धजी एक बेहद खूबसूरत और शालीन स्त्री कदमताल करते हुए हंसती-मुस्कुराती भीतर दाखिल हुई। दोनों की खिलखिलाहट से पूरा घर गूंज रहा था। देवांग ने जिस आत्मीयता और अधिकार से उस स्त्री का हाथ थाम रखा था, वह किसी भी ब्याहता के घर में भूचाल लाने के लिए काफी था।
यह नजारा देखते ही नीलिमा की हंसी उसके गले में ही घुट गई। वह अवाक, स्तब्ध और पथराई आंखों से उस अजनबी औरत और देवांग को देखने लगी। खून का दौरा जैसे उसके माथे पर चढ़ गया। जिस सखी की देह चिता की आग के करीब खड़ी थी, उसी के घर में, उसी की आंखों के सामने पति का यह खुला दुराचार? नीलिमा के सीने में आग का दरिया बह निकला।
मगर नीलिमा के पैरों तले जमीन तब पूरी तरह खिसक गई, जब मल्लिका ने अपने कमजोर चेहरे पर बेहद शांत, सहज और आत्मीय मुस्कान बिखेरते हुए उनका स्वागत किया। “आ गए देवांग… आइए नंदिता जी, बैठिए। धूप बहुत तेज थी क्या बाहर?”
नंदिता ने आगे बढ़कर मल्लिका के माथे को बड़े दुलार से छुआ, उसके हाथ में ताजे फलों की टोकरी रखी और देवांग के साथ रसोई की ओर यह कहते हुए बढ़ गई कि वह सबके लिए अदरक वाली चाय बनाकर लाती है।
नीलिमा पत्थर की मूरत बनी बैठी थी। उसका पूरा वजूद कांप रहा था। जैसे ही वे दोनों अंदर गए, नीलिमा अपनी जगह से लगभग चीखते हुए उठी, “मल्लिका! यह… यह सब क्या है? कौन है यह औरत? और देवांग जी… यह सब तुम्हारी आंखों के सामने हो रहा है और तुम… तुम इस बेशर्मी पर मुस्कुरा रही हो? क्या तुम पागल हो गई हो या तुम्हारी बीमारी ने तुम्हारी सोचने-समझने की शक्ति छीन ली है? अपने ही सुहाग को किसी गैर औरत की बांहों में देखकर कोई पत्नी ऐसे कैसे शांत रह सकती है?”
शब्दों का यह उफान नीलिमा के भीतर से लावा बनकर फूट रहा था। वह मल्लिका के स्वाभिमान को झकझोरना चाहती थी।
मल्लिका ने अपने कांपते, ठंडे हाथों से नीलिमा की कलाई पकड़ी और उसे धीरे से अपने पास खींचकर बिठाया। उसकी आंखों में एक भी बूंद आंसू नहीं था, बस एक अगाध, शांत समुद्र जैसा ठहराव था। उसने नीलिमा के कंधे पर सिर टिकाया और धीमी, संयत आवाज में बोली, “शांत हो जा नीलू… मेरी प्यारी बहन, खुद को संभाल। तू जिसे बेशर्मी समझ रही है, वह दरअसल मेरे इस उजड़ते चमन को बचाने की एक आखिरी कोशिश है।”
“कोशिश? किस बात की कोशिश?” नीलिमा का आवेश रत्ती भर भी कम नहीं हुआ था। “एक जिंदा औरत के रहते सौतन को घर में ले आना कौन सी कोशिश होती है मल्लिका?”
मल्लिका ने एक गहरी, तकलीफदेह सांस ली और दूर खिड़की से दिखते सूखे पत्तों की ओर देखने लगी। “नीलू, देख… मुझे भावुकता के चश्मे से मत देख। हकीकत की पथरीली जमीन पर खड़े होकर सोच। डॉक्टर कह चुके हैं कि मेरी सांसों की डोरी अब बस कुछ ही हफ्तों की मोहलत लिए हुए है। मेरे जाने के बाद यह घर, देवांग और मेरा सात साल का नन्हा बेटा आरव… उनका क्या होगा? आरव अभी इतना छोटा है कि उसे अपनी मां के आंचल की सबसे ज्यादा जरूरत है। और देवांग? उन्होंने पिछले दो सालों में मेरी बीमारी की तीमारदारी में अपनी पूरी जवानी, अपनी खुशियां, अपनी नींद सब कुछ होम कर दिया। उन्होंने कभी उफ तक नहीं की।”
मल्लिका की आवाज में दर्द के साथ एक अलौकिक परिपक्वता घुली हुई थी। “नीलू, जब मैं चली जाऊंगी, तो दुनिया देवांग के सामने सौ रिश्ते लेकर खड़ी हो जाएगी। कोई आरव को सौतेला समझकर प्रताड़ित करेगा, कोई सिर्फ देवांग के पैसे से प्यार करेगा। पुरुष को अपने जीवन में एक सहारे की, एक जीवनसंगिनी की जरूरत होती है। मैं स्वार्थी बनकर अपनी आंखों पर पट्टी नहीं बांध सकती। इसलिए मैंने खुद देवांग को राजी किया।”
“तूने खुद?” नीलिमा का गला रुंध गया, उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं।
“हाँ नीलू,” मल्लिका की पलकें हल्की सी भीगीं। “नंदिता मेरी कॉलेज की प्रोफेसर की बेटी है। एक बेहद नेक, सुलझी हुई और मातृत्व से भरी अनाथ स्त्री, जिसने कम उम्र में ही अपनों को खोया है। मैंने खुद उसे अपनी हालत बताई, अपना घर दिखाया और उससे विनती की कि वह मेरे जाने के बाद मेरे देवांग का हाथ थामे और मेरे आरव की मां बने। शुरुआत में दोनों तैयार नहीं थे। देवांग तो फूट-फूट कर रोए थे, उन्होंने हाथ जोड़कर कहा था कि वे मेरे जीते-जी किसी और के बारे में सोच भी नहीं सकते। लेकिन मैंने उन्हें अपने जीवन की अंतिम इच्छा और आरव के भविष्य की दुहाई दी। मैंने उनसे कहा कि अगर वे मुझे सुकून से विदा करना चाहते हैं, तो उन्हें मेरे सामने एक-दूसरे को समझना होगा।”
नीलिमा हक्की-बक्की सी सुन रही थी। मल्लिका के इस आत्मत्याग और जीवन के कठोर यथार्थ के आगे उसके सारे आदर्शवादी तर्क बौने साबित हो रहे थे।
मल्लिका ने आगे कहा, “जो तूने अभी देखा नीलू, वह कोई उथला आकर्षण या वासना नहीं है। वह देवांग का उस औरत के प्रति आदर और कृतज्ञता का भाव है, जो मेरे न रहने पर एक बीमार औरत के अधूरे संसार को समेटने के लिए तैयार हुई है। मैं अपने जीते-जी आरव को नंदिता की गोद में सहज होते देखना चाहती थी। मैं देखना चाहती थी कि मेरे जाने के बाद देवांग अकेलेपन के अंधेरे में घुटकर न मरें। आज जब मैं उन्हें साथ देखती हूँ, तो मेरे सीने का वह बोझ उतर जाता है जो मुझे पिछले एक साल से तिल-तिल कर मार रहा था।”
तभी नंदिता हाथ में चाय की ट्रे लिए कमरे में आई। उसके पीछे छोटा आरव भी दौड़ता हुआ आया और उसने बिना किसी झिझक के नंदिता का पल्लू पकड़ लिया, “छोटी मां, मुझे भूख लगी है।”
नंदिता ने अत्यंत वात्सल्य से झुककर आरव को अपनी गोद में उठाया, उसके माथे को चूमा और प्यार से बोली, “चलो मेरे लाल, तुम्हारी पसंदीदा खीर कटोरी में निकाल कर रखी है, पहले मल्लिका दीदी को दवा खिला दें।”
नंदिता ने ट्रे मेज पर रखी और मल्लिका के पास बैठकर बड़ी नजाकत से उसकी पीठ सहलाई। उसने एक गिलास में पानी और दवाइयां निकालीं और मल्लिका को अपने हाथों से खिलाईं। उस स्पर्श में कोई दिखावा नहीं था, कोई छल या सौतिया डाह नहीं थी; उसमें केवल एक गंभीर समर्पण, अपार सम्मान और उस मरती हुई स्त्री के प्रति अगाध आदर था, जिसने उसे अपने सुहाग का भविष्य सौंप दिया था।
देवांग भी कमरे में आए। उनकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी और आंखों के नीचे काले घेरे साफ बता रहे थे कि वे रातों को सोए नहीं हैं। देवांग ने आकर मल्लिका के पैरों के पास बैठकर उसके पैर दबाने शुरू कर दिए। देवांग की आंखों में मल्लिका के लिए जो असीम प्रेम और तड़प थी, उसे देखकर कोई अंधा भी कह सकता था कि इस पुरुष के दिल में मल्लिका के सिवा किसी और का वजूद कभी नहीं हो सकता। वह तो केवल अपनी पत्नी के अंतिम सुकून के लिए इस अग्निपरीक्षा से गुजर रहा था।
नीलिमा की आत्मा तक इस दृश्य से थर्रा उठी। जिस दृश्य को वह समाज की संकीर्ण नजरों से ‘विश्वासघात’ समझ रही थी, वह दरअसल प्रेम की पराकाष्ठा थी—जहाँ एक पत्नी अपनी विदाई से पहले अपने परिवार के लिए एक अमर छांव का प्रबंध कर रही थी, और एक दूसरी स्त्री किसी के उजड़ते संसार को निस्वार्थ भाव से अपनी ममता से सींचने आई थी।
नीलिमा की आंखों से पश्चाताप और विस्मय के आंसू बह निकले। उसने आगे बढ़कर मल्लिका के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। “मुझे माफ कर दे मल्लिका… मेरी संकीर्ण सोच तेरे इस विशाल हृदय की थाह नहीं ले सकी। तू सिर्फ एक पत्नी और मां नहीं है, तू तो त्याग की साक्षात मूरत है। तूने प्यार को बांधने के बजाय उसे मुक्त करके अमर कर दिया।”
मल्लिका ने मुस्कुराते हुए नंदिता और देवांग का हाथ अपने कांपते हाथों में लिया। उसने देवांग का हाथ नंदिता के हाथ पर रखा और नीलिमा की ओर देखकर बोली, “अब मुझे मौत से कोई डर नहीं नीलू। मेरी दुनिया अब महफूज हाथों में है। जब सांसें टूटने लगें, तो इंसान को समझौतों से नहीं, बल्कि अपनी आने वाली पीढ़ी की खुशियों से तृप्ति मिलती है। मेरा यह समझौता कोई मजबूरी नहीं, मेरे प्रेम की सबसे बड़ी जीत है।”
कमरे में एक दिव्य शांति उतर आई थी। वहां न कोई द्वेष था, न कोई ईर्ष्या। केवल त्याग, सत्य और अगाध अपनत्व का प्रकाश फैला हुआ था, जो आने वाले हर तूफ़ान से उस परिवार की रक्षा करने के लिए तैयार खड़ा था।
क्या मल्लिका का यह कदम एक पत्नी के रूप में उसके स्वार्थहीन और अमर प्रेम का प्रतीक था, या फिर समाज की नजरों में यह आज भी एक अनुत्तरित प्रश्न है? आपकी नज़र में मल्लिका का यह त्याग सही था या गलत? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें, धन्यवाद।