कड़वाहट से अपनेपन की ओर

अगले दिन अंकिता ने खुद मयंक भैया को फोन मिलाया। जब मयंक ने फोन उठाया, तो अंकिता ने प्रणाम करते हुए बड़े आदर से कहा, “भैया, मैं आपकी छोटी बहू अंकिता बोल रही हूं। मैं जानती हूं कि आपके दिल पर क्या गुजरी है, और मैं यह भी नहीं कहूंगी कि जो हुआ वह सही था। लेकिन भैया, पौधे को पानी न मिले तो वह सूख जाता है, उसी तरह रिश्ते भी बिना क्षमा के सूख जाते हैं। मां जी हर दोपहर आपकी तस्वीर देखकर रोती हैं। वे बूढ़ी हो रही हैं भैया। क्या एक कड़वे पल की सजा ताउम्र दी जानी चाहिए? रक्षाबंधन आ रहा है, क्या आप और गरिमा भाभी अपने इस छोटे भाई और बहू के घर नहीं आएंगे?”

शहनाइयों की गूंज और मेहमानों की चहल-पहल के बीच सार्थक का विवाह पूरे रीति-रिवाज से संपन्न हुआ था। घर का आंगन फूलों से सजा था, मगर उस सजे-धजे घर में पसरा सन्नाटा सार्थक के दिल को कचोट रहा था। विवाह मंडप में जब सब लोग हंस-बोल रहे थे, तब सार्थक की निगाहें बार-बार दरवाजे की तरफ उठती थीं, इस उम्मीद में कि शायद उसके बड़े भाई मयंक और भाभी गरिमा आ जाएं। लेकिन वे नहीं आए। पिता के गुजर जाने के बाद बड़े भाई ही तो पिता तुल्य थे, पर आज जिंदगी के इतने बड़े मोड़ पर उनका न होना सार्थक को भीतर तक साल रहा था।

विदाई के बाद सार्थक अपनी नवविवाहिता पत्नी अंकिता को लेकर घर पहुंचा। घर में उसकी मां जानकी देवी थीं, जिनके चेहरे पर बेटे के ब्याह की खुशी तो थी, लेकिन आंखों के कोनों में एक अजीब सा रूखापन और अतीत की तल्खी जमी हुई थी। सार्थक अपनी मां के तुनकमिज़ाज स्वभाव से भली-भांति वाकिफ था। पिता के जाने के बाद मां ने दोनों बेटों को अकेले पाला था, पर उम्र के साथ उनका स्वभाव बेहद चिड़चिड़ा और जिद्दी हो गया था। घर में हर छोटी बात पर उनका पारा चढ़ जाना आम बात थी।

शादी की पहली रात, जब कमरा शांत हुआ, तो सार्थक ने देखा कि अंकिता के चेहरे पर कुछ सवाल तैर रहे हैं। शादी की रस्मों के दौरान पूरे परिवार की गैरमौजूदगी किसी भी समझदार लड़की को खटक सकती थी। अंकिता साधारण, सुलझे हुए परिवार से थी और उसने घर के माहौल में मौजूद तनाव को भांप लिया था।

सार्थक ने एक गहरी सांस ली और अंकिता के करीब बैठते हुए कहा, “अंकिता, अब इस घर की दहलीज तुमने लांघी है, तो मुझे लगता है कि तुम्हें यहां के हर सच से वाकिफ होना चाहिए। तुम सोच रही होगी कि भैया और भाभी हमारे साथ क्यों नहीं हैं।”

अंकिता ने धीमे स्वर में पूछा, “हां सार्थक, शादी में परिवार का अधूरापन मुझे भी लगा। क्या भैया-भाभी बहुत दूर रहते हैं?”

सार्थक की आंखों में उदासी घिर आई। उसने कहा, “वे चंडीगढ़ चले गए हैं, लेकिन दूरी केवल शहरों की नहीं, दिलों की है। भैया और भाभी कभी इसी घर की जान हुआ करते थे। भाभी भी खुले विचारों की थीं, लेकिन मां का स्वभाव बहुत सख्त और नियम-कायदों में बंधा हुआ है। मां को हर चीज अपने हिसाब से चाहिए होती थी—सुबह उठने का वक्त, चाय का तरीका, रसोई की व्यवस्था। भाभी अपने ढंग से जीना चाहती थीं। बात-बात पर नोकझोंक शुरू होती और देखते ही देखते वह महाभारत में बदल जाती।”

“क्या कभी किसी ने बैठकर बात सुलझाने की कोशिश नहीं की?” अंकिता ने पूछा।

“कोशिशें बहुत हुईं अंकिता, लेकिन एक दिन सब कुछ बिखर गया,” सार्थक का गला भर आया। “उस दिन रविवार था। भाभी को तेज सिरदर्द था, वे देर से सोकर उठीं और सीधे रसोई में जाकर अपने लिए काढ़ा बनाने लगीं। मां ने देखा तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। मां के अनुसार बिना स्नान किए रसोई की चौखट लांघना धर्म भ्रष्ट करना था। बात केवल डांट तक रहती तो शायद संभल जाती, लेकिन मां ने गुस्से में अपना आपा खो दिया। उन्होंने भैया के सामने भाभी को कह दिया कि ‘तुम जैसी कुलच्छना मेरे घर को बर्बाद करने आई है, निकल जाओ मेरी नजरों के सामने से और जब तक मेरी सांसें चल रही हैं, मुझे अपनी मनहूस शक्ल मत दिखाना।’ भैया ने बीच-बचाव करना चाहा तो मां ने भैया पर भी तीखा वार कर दिया—’तू तो जोरू का गुलाम बन चुका है, तुझे मां की कोई परवाह नहीं, तू भी इसके साथ दफा हो जा।’ उस दिन भैया-भाभी की आंखों से जो आंसू बहे, वे कभी सूखे नहीं। भैया ने अगले ही हफ्ते अपना ट्रांसफर चंडीगढ़ करवा लिया और घर छोड़ दिया।”

अंकिता ने सिहरते हुए कहा, “क्रोध में बोले गए शब्द वास्तव में खंजर की तरह होते हैं, जो सीधे आत्मा को घायल कर देते हैं।”

“बिल्कुल अंकिता,” सार्थक ने उसका हाथ थामते हुए कहा। “भाभी की भी कुछ जिद थी, वे भी मां की उम्र और अकेलेपन को समझकर थोड़ा झुक सकती थीं। लेकिन ताली दोनों हाथों से बजी। अब स्थिति यह है कि भैया-भाभी अपनी दुनिया में सिमट गए हैं और मां अपने अकेलेपन के खोल में बंद होकर और भी कड़वी हो गई हैं। वे कभी जाहिर नहीं करतीं, लेकिन अंदर ही अंदर घुटती हैं। मैं तुमसे बस यही प्रार्थना करता हूं कि तुम मां के गुस्से को दिल पर मत लेना। वे बुजुर्ग हैं, अकेली हैं। क्या तुम अपने धैर्य और प्रेम से इस घर के घावों को भर सकोगी?”

अंकिता ने सार्थक की आंखों में देखा। वहां एक असहाय बेटे की गुहार थी। उसने मुस्कुराकर धीमे से सिर हिलाया और कहा, “सार्थक, आपने मुझ पर भरोसा करके सब सच बताया, इसके लिए धन्यवाद। जब रिश्ता जुड़ता है तो केवल सुख नहीं, जिम्मेदारियां भी बांटी जाती हैं। मैं पूरी कोशिश करूंगी कि मां जी के मन की कड़वाहट को दूर कर सकूं।”

अगली सुबह से अंकिता की परीक्षा शुरू हुई। सुबह जब वह रसोई में गई, तो जानकी देवी पहले से वहां मौजूद थीं। अंकिता ने पूरी श्रद्धा से उनके चरण छुए। जानकी देवी ने बेरुखी से आशीर्वाद दिया और बोलीं, “सुनो बहू, इस घर के कुछ नियम हैं। मुझे सुबह छह बजे काली मिर्च वाली चाय चाहिए और नाश्ते में ज्यादा तेल-मसाला नहीं होना चाहिए। अपनी मनमर्जी इस घर में चलाने की कोशिश मत करना, जैसा पहले होता रहा है।”

अंकिता के मन में ठेस लगी, लेकिन उसने सार्थक की बात याद रखी। उसने मुस्कुराते हुए कहा, “जी मां जी, आप जैसा कहेंगी, बिल्कुल वैसा ही होगा। आप मुझे बताइए कि चाय में अदरक कितना डालना है, ताकि आपके स्वाद में कोई फर्क न आए।” जानकी देवी ने चौंककर अंकिता को देखा। उन्हें उम्मीद थी कि नई बहू शायद मुंह बनाएगी या कोई तर्क देगी, लेकिन अंकिता की सौम्यता ने उनके गुस्से की धार को कुंद कर दिया।

दिन बीतते गए। जानकी देवी अक्सर छोटी-छोटी बातों पर ताने कसतीं—कभी दाल में नमक कम होने पर, कभी झाड़ू लगाने के तरीके पर। लेकिन अंकिता कभी पलटकर जवाब नहीं देती थी। जब भी जानकी देवी नाराज होतीं, अंकिता शांत भाव से सुन लेती और बाद में बड़े प्यार से कहती, “मां जी, मुझसे गलती हो गई, अगली बार ध्यान रखूंगी। आप नाराज मत होइए, आपकी तबीयत खराब हो जाएगी।”

अंकिता ने केवल सहनशीलता ही नहीं दिखाई, बल्कि उसने जानकी देवी के अकेलेपन को भरने की कोशिश की। दोपहर के समय जब सार्थक दफ्तर में होता, अंकिता अपनी सास के पास जाकर बैठ जाती। वह उनसे उनके पुराने दिनों की बातें पूछती, सार्थक के बचपन के किस्से सुनती और कभी-कभी उनके घुटनों में तेल की मालिश कर देती। शुरुआत में जानकी देवी झिझकती थीं और हाथ झटक देती थीं, लेकिन धीरे-धीरे अंकिता के निस्वार्थ सेवाभाव और स्नेह ने उनकी जमी हुई बर्फ जैसी कठोरता को पिघलाना शुरू कर दिया।

एक शाम अंकिता ने देखा कि जानकी देवी अपने कमरे में बैठी पुराने अलबम के पन्ने पलट रही थीं। उनकी उंगलियां मयंक और गरिमा की तस्वीरों पर थमी हुई थीं और उनकी आंखों से चुपचाप आंसू बह रहे थे। अंकिता दरवाजे की ओट में खड़ी होकर सब देख रही थी। उसे समझ आ गया कि मां का गुस्सा दरअसल उनका पश्चाताप और अहंकार का टकराव था। वे अपने बड़े बेटे और बहू को याद तो करती थीं, लेकिन अपने कहे हुए कटु वचनों के बोझ तले दबी थीं और माफी मांगने का साहस नहीं जुटा पा रही थीं।

अंकिता ने उसी रात सार्थक से बात की। उसने कहा, “सार्थक, मां जी अंदर से बहुत टूट चुकी हैं। वे भैया-भाभी को बेइंतहा याद करती हैं, लेकिन उनका अहंकार और संकोच उन्हें रोक रहा है। हमें ही कोई कदम उठाना होगा।”

सार्थक ने उदास होकर कहा, “लेकिन अंकिता, भैया बहुत आहत हैं। उन्होंने शादी में आने से भी मना कर दिया था। क्या वे हमारी बात सुनेंगे?”

अंकिता ने आत्मविश्वास से कहा, “घाव समय के साथ भरते हैं सार्थक, बशर्ते उन पर प्यार का मरहम लगाया जाए। आप भैया को फोन कीजिए, इस बार शिकायत के साथ नहीं, बल्कि मां की गिरती सेहत और उनकी तड़प का सच बताकर।”

अगले दिन अंकिता ने खुद मयंक भैया को फोन मिलाया। जब मयंक ने फोन उठाया, तो अंकिता ने प्रणाम करते हुए बड़े आदर से कहा, “भैया, मैं आपकी छोटी बहू अंकिता बोल रही हूं। मैं जानती हूं कि आपके दिल पर क्या गुजरी है, और मैं यह भी नहीं कहूंगी कि जो हुआ वह सही था। लेकिन भैया, पौधे को पानी न मिले तो वह सूख जाता है, उसी तरह रिश्ते भी बिना क्षमा के सूख जाते हैं। मां जी हर दोपहर आपकी तस्वीर देखकर रोती हैं। वे बूढ़ी हो रही हैं भैया। क्या एक कड़वे पल की सजा ताउम्र दी जानी चाहिए? रक्षाबंधन आ रहा है, क्या आप और गरिमा भाभी अपने इस छोटे भाई और बहू के घर नहीं आएंगे?”

फोन के उस पार गहरा सन्नाटा छा गया। मयंक का दिल भी अपने परिवार के लिए तड़प रहा था। अंकिता के अपनत्व भरे और आदरयुक्त शब्दों ने मयंक के मन के सारे रक्षा कवच तोड़ दिए। मयंक ने रुंधे गले से कहा, “अंकिता, चोट बहुत गहरी लगी थी, इसलिए कदम पीछे खींच लिए थे। लेकिन तुमने आज जिस अधिकार से बात की है, उसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। मैं गरिमा से बात करूंगा।”

अंकिता ने गरिमा भाभी से भी अलग से बात की। उसने भाभी के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाए बिना उनसे कहा, “भाभी, घर की बड़ी बहू तो घर की नींव होती है। अगर आप ही मुंह फेर लेंगी तो हम जैसों को कौन सिखाएगा? मां जी की कही बातों को उनके बुढ़ापे की कमजोरी समझकर माफ कर दीजिए।” गरिमा भी मूलतः बुरी नहीं थी, बस आहत स्वाभिमान ने उसे दूर कर दिया था। अंकिता की विनम्रता ने उसके मन की कड़वाहट भी धो दी।

रक्षाबंधन का दिन आया। घर में सादगी से त्योहार की तैयारी चल रही थी। जानकी देवी उदास मन से भगवान के आगे दीया जलाकर बैठी थीं। तभी दरवाजे की घंटी बजी। सार्थक ने दरवाजा खोला और उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। सामने मयंक और गरिमा अपने छोटे बेटे के साथ खड़े मुस्कुरा रहे थे।

सार्थक की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। उसने लपककर भैया को गले लगा लिया। घर में हलचल सुनकर जानकी देवी कमरे से बाहर निकलीं। सामने अपने बड़े बेटे और बहू को देखकर उनके कदम वहीं जम गए। उनकी आंखें आंसुओं से भर आईं। अपराधबोध और ममता का ऐसा ज्वार उठा कि वे कुछ बोल न सकीं।

मयंक और गरिमा ने आगे बढ़कर जानकी देवी के पैर छुए। गरिमा ने भीगी आंखों से कहा, “मां जी…”

यह सुनते ही जानकी देवी का सारा अभिमान, सारा क्रोध और सारी कड़वाहट आंसुओं के सैलाब में बह गई। उन्होंने दोनों को कसकर सीने से लगा लिया और फफक कर रो पड़ीं, “मुझे माफ कर दो मेरे बच्चों! मैं गुस्से में अंधी हो गई थी। मैंने अपनी ही जुबान से अपने ही आंगन को उजाड़ दिया था। मुझे माफ कर दो…”

मयंक ने मां के आंसू पोंछते हुए कहा, “नहीं मां, जो बीत गया उसे भूल जाइए। गलती हमारी भी थी कि हमने आपके गुस्से के पीछे के प्यार को नहीं समझा और इतनी दूर चले गए।”

उस दिन घर में जो सन्नाटा बरसों से पसरा था, वह हंसी, आंसुओं और अपनों की बातों से गूंज उठा। जानकी देवी ने पलटकर अंकिता को देखा, जो एक कोने में खड़ी संतोष भरी मुस्कान के साथ इस पुनर्मिलन को देख रही थी। जानकी देवी आगे बढ़ीं और उन्होंने अंकिता को अपने गले से लगा लिया। उनके हाथ अंकिता के सिर पर कांप रहे थे। उन्होंने कहा, “बहू, तू केवल इस घर की बहू बनकर नहीं आई, तू तो इस उजड़े हुए बाग की संजीवनी बनकर आई है। अगर तेरा धैर्य और समझदारी न होती, तो मैं अपनी कड़वाहट की आग में खुद भी जलती और इस परिवार को भी कभी जुड़ने न देती।”

सार्थक ने गर्व से अपनी पत्नी की ओर देखा। अंकिता ने साबित कर दिया था कि कड़वे वचनों से टूटे हुए रिश्तों को केवल तर्क या अहंकार से नहीं, बल्कि असीम धैर्य, विनम्रता और निस्वार्थ प्रेम से ही दोबारा जोड़ा जा सकता है। उस शाम घर के आंगन में लगा तुलसी का पौधा भी हवा के झोंकों के साथ खिलखिलाता हुआ प्रतीत हो रहा था, क्योंकि बिखरा हुआ परिवार अब एक सूत्र में बंध चुका था।

परिवार में कभी-कभी गुस्से में कहे गए शब्द बड़े से बड़े रिश्ते में दरार डाल देते हैं। लेकिन क्या उस दरार को भरने के लिए किसी एक का झुक जाना या पहल करना कमजोरी कहलाता है? क्या आपके जीवन में भी कभी ऐसा मोड़ आया है जहां किसी की समझदारी ने टूटते हुए परिवार को बचा लिया? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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