उम्मीद का दीया

यह सुनते ही सुलोचना जी की चीख निकल गई और वे छाती पीटकर रोने लगीं। हरिशंकर जी का पूरा वजूद सुन्न पड़ गया। जिस बेटे को वे बरसों से पत्थरदिल और खुदगर्ज समझकर कोसते रहे थे, वह तो खुद जिंदगी और मौत की भयानक जंग लड़ रहा था। अपने बेटे के चले जाने का गम एक वज्रपात की तरह उन पर टूटा।

अवनि ने दादी के आँसू पोंछते हुए कहा, “दादी माँ, रोइए मत। पापा ने अपने आखिरी दिनों में सिर्फ आपका और दादू का नाम लिया था। वे हर रोज आपकी यह पुरानी तस्वीरें देखकर रोते थे। उन्होंने हमसे वादा लिया था कि जिस दिन हम दोनों अपने पैरों पर खड़े हो जाएँगे, हम अपनी सारी पढ़ाई और नौकरी का इंतजाम भारत में करेंगे और अपने दादा-दादी के पास लौट जाएँगे। पापा ने कहा था कि वे जो फर्ज नहीं निभा सके, वह फर्ज हमें अपनी साँस रहने तक निभाना है।”

  हाथों में दो नए सिल्क के कुर्ते थामे उनकी धर्मपत्नी सुलोचना जी कमरे में दाखिल हुईं। उनके चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान थी, जिसे वे हर साल इन त्योहारों के मौके पर अपने पति का हौसला बढ़ाने के लिए ओढ़ लिया करती थीं।

“क्या जरूरत थी ये सब करने की सुलोचना? बस शाम को भगवान के आगे दो अगरबत्ती जला लेते, वही बहुत था। न इस सजावट का कोई अर्थ है और न ही मन में कोई उमंग बची है,” हरिशंकर जी ने भारी मन से कहा और अपना चेहरा दूसरी तरफ मोड़ लिया।

सुलोचना जी ने प्यार से उनके कंधे पर हाथ रखा और बोलीं, “कैसी बातें करते हैं आप! साल का इतना बड़ा पावन त्योहार है, चारों तरफ खुशियाँ हैं और आप यूँ अंधेरे कोने में मुँह लटकाए बैठे रहेंगे तो घर की बरकत भी रूठ जाएगी। चलिए, जल्दी से उठिए और देखिए, मैं आपके लिए हल्के बादामी रंग का यह सिल्क का कुर्ता लाई हूँ और अपने लिए यह मैरून साड़ी। हम दोनों साथ हैं, एक-दूसरे का सहारा हैं, बस यही हमारे लिए सबसे बड़ी दौलत है।” यह कहते-कहते सुलोचना जी का गला भर आया, जिसे उन्होंने अपनी सूती साड़ी के पल्लू से छिपाने की पूरी कोशिश की।

हरिशंकर जी की आँखें भर आईं। वे फफक पड़े और बोले, “हाँ, आज हम दोनों साथ हैं सुलोचना, लेकिन इस ढलती उम्र और इस काया का क्या भरोसा? कल को हममें से कोई एक पहले चला गया, तो दूसरा किसके सहारे जिएगा? यह बड़ा सा घर काटने को दौड़ेगा। जिस औलाद को उँगली पकड़कर चलना सिखाया, जिसकी हर खुशी के लिए अपनी पूरी जवानी झोंक दी, वही बेटा हमें इस वीराने में बेसहारा छोड़कर सात समंदर पार अमेरिका जा बसा। बीस बरस बीत गए सुलोचना! न वो तीज-त्योहारों पर आया, न अपने दादा-दादी के अंतिम संस्कार में शामिल हुआ। जो बेटा अपने बुजुर्गों के जाने पर नहीं लौटा, वह भला हमारी मौत पर क्या कंधा देने आएगा? हम किसके लिए जिएँ और किससे आस लगाएँ?”

पति को इस कदर टूटता देख सुलोचना जी का कलेजा काँप उठा। उन्होंने अपने आँसुओं को अंदर ही समेटा और एक दृढ़ स्त्री की तरह उनके दोनों हाथ अपने हाथों में थाम लिए।

“उसे गए हुए दो दशक बीत चुके हैं। जब इतने साल हमने हर सुख-दुख, हर करवाचौथ और हर दिवाली अकेले बैठकर एक-दूसरे के सहारे काट ली, तो आज इतना कमजोर क्यों पड़ रहे हैं? दुनिया कहती है कि औरतें दिल से कमजोर होती हैं, पर देखिए, मैं आज भी इस आस के सहारे मुस्करा रही हूँ और आप यूँ टूट रहे हैं। सच यही है कि अब हमें मान लेना चाहिए कि हमारा बेटा अपनी दुनिया में खो चुका है। शायद उसकी अपनी मजबूरियाँ रही हों या शायद वह सचमुच निर्मोही हो गया हो। उसके बच्चे अब बड़े हो गए होंगे, उन्हें तो शायद यह भी नहीं मालूम होगा कि भारत में उनके दादा-दादी आज भी जिंदा हैं। जो बीत गया उसे भूल जाइए। जब तक हमारी सांसें चल रही हैं, हम साथ मिलकर यह दीप जलाएंगे। कल किसने देखा है? क्या पता आने वाला कल हमारे सूने जीवन में कोई नई किरण ले आए या फिर जिंदगी का यह चिराग हमेशा के लिए बुझ जाए।”

हरिशंकर जी ने एक गहरी सांस ली और उदास स्वर में कहा, “तुम न जाने कहाँ से इतनी सकारात्मक सोच ले आती हो सुलोचना। मुझे तो अब लगता है कि इस चौखट पर खुशियाँ कभी कदम नहीं रखेंगी। इस वीराने में हमेशा ऐसा ही मातम और सन्नाटा पसरा रहेगा।”

सुलोचना जी ने उनका हाथ थपथपाया, “शुभ-शुभ बोलिए। मन के हारे हार है और मन के जीते जीत। चलिए, रात बहुत हो गई है, अब सो जाइए। कल सुबह बहुत काम हैं। हम मिलकर पड़ोसियों के घर गुजिया और मिठाइयाँ बाँटने चलेंगे। उन्हीं के बच्चों के साथ फुलझड़ियाँ जलाएँगे, देखिएगा कितना मन बहल जाएगा।”

काफी समझाने-बुझाने के बाद दोनों सोने चले गए, लेकिन उस रात नींद दोनों की ही आँखों से कोसों दूर थी। खामोश रात में केवल बाहर फूटते पटाखों की कभी-कभार आने वाली आवाजें ही कमरे के सन्नाटे को तोड़ रही थीं।

दीपावली की सुबह ठीक पाँच बजे मुख्य द्वार की घंटी अचानक घनघना उठी। उस शांत पहर में घंटी की तेज आवाज सुनकर दोनों चौंक गए। सुलोचना जी ने उठने की कोशिश की, लेकिन हरिशंकर जी ने उन्हें रोकते हुए कहा, “तुम आराम करो, इतनी सुबह शायद दूधवाला आया होगा या अखबार डालने वाला। मैं देखकर आता हूँ।”

हरिशंकर जी ने चप्पल पहनी और मुख्य द्वार की ओर बढ़े। उन्होंने जैसे ही भारी लकड़ी का दरवाजा खोला, सामने का नजारा देखकर उनके कदम वहीं ठिठक गए।

सामने कोई दूधवाला नहीं था। दरवाजे पर दो नौजवान खड़े थे। एक लंबा, गठीले बदन का करीब बीस-इक्कीस वर्ष का युवक, जिसके चेहरे पर एक जानी-पहचानी मासूमियत और तेज था। उसके बगल में करीब सोलह-सत्रह साल की एक बेहद चंचल और खूबसूरत किशोरी खड़ी थी। दोनों के हाथों में बड़े-बड़े ट्रॉली बैग थे और चेहरे पर लंबी यात्रा की थकान के बावजूद गजब की चमक और खुशी तैर रही थी। वे दोनों आपस में धीरे-धीरे किसी बात पर चुहलबाजी कर रहे थे, लेकिन दरवाजा खुलते ही चुप हो गए।

हरिशंकर जी कुछ समझ पाते, इससे पहले ही उन दोनों ने झुककर पूरी श्रद्धा के साथ हरिशंकर जी के पाँव छू लिए और बिना कुछ बोले मुस्कुराते हुए घर के अंदर कदम बढ़ाने लगे।

आज के जमाने के माहौल और आए दिन अखबारों में छपने वाली वारदातों को याद करके हरिशंकर जी एकदम सहम गए। उन्हें लगा कि आजकल अपराधी पढ़े-लिखे बनकर, सूट-बूट में ऐसे ही घरों में घुसते हैं और बुजुर्गों को अपना शिकार बना लेते हैं।

हरिशंकर जी ने कड़क आवाज में उन्हें रोका, “अरे रुको! कौन हो तुम दोनों? इस तरह बिना बताए और बिना परिचय दिए किसी के घर में कैसे घुसे चले आ रहे हो? पहले अपना नाम और पता बताओ!”

शोर सुनकर सुलोचना जी भी कमरे से बाहर निकलकर दालान में आ गईं।

उस लड़की, जिसका नाम अवनि था, ने जब हरिशंकर जी का यह रूप देखा तो वह अपनी हँसी नहीं रोक पाई। वह खिलखिलाकर हँस पड़ी और अपने भाई के कंधे पर हाथ मारकर बोली, “देखा आरव भैया! मैंने फ्लाइट में ही कहा था न कि दादू और दादी हमें पहली नजर में बिल्कुल नहीं पहचान पाएंगे! लो, वही हुआ, दादू तो हमें कोई चोर-लुटेरा समझकर डांट रहे हैं!”

‘दादू और दादी’ ये दो शब्द जैसे ही सुलोचना और हरिशंकर जी के कानों में पड़े, दोनों के बदन में एक सिहरन दौड़ गई। उनके कदम वहीं जम गए।

नौजवान लड़का, जिसका नाम आरव था, आगे बढ़ा। उसने अपने कोट की जेब से एक पुराना, थोड़ा मुड़ा हुआ पासपोर्ट साइज फोटो निकाला और हरिशंकर जी के कांपते हाथों में थमा दिया।

वह फोटो हरिशंकर जी के बेटे मयंक के बचपन की थी, जो उसने अपने स्कूल के दिनों में खिंचवाई थी।

आरव ने बहुत ही विनीत और भावुक स्वर में कहा, “दादू… मैं आरव हूँ, आपका पोता। और यह अवनि है, आपकी पोती। हम दोनों न्यू यॉर्क से सीधे आपके पास आए हैं। हम अपने पापा यानी आपके बेटे मयंक की संतान हैं।”

यह सुनते ही हरिशंकर जी के हाथ से वह फोटो छूटकर फर्श पर गिर पड़ी। सुलोचना जी की आँखें फटी की फटी रह गईं। बीस बरसों का सूखा, बीस बरसों की तड़प और दिल के किसी गहरे कोने में दबी ममता का बाँध एक झटके में टूट गया।

“आरव… अवनि… मयंक के बच्चे?” सुलोचना जी लड़खड़ाते कदमों से आगे बढ़ीं। उन्होंने कांपते हाथों से आरव के चेहरे को छुआ। उसका माथा, उसकी तीखी नाक, उसकी आँखें—सब कुछ मयंक जैसी ही थीं।

अवनि ने आगे बढ़कर तुरंत सुलोचना जी को अपने बांहों के घेरे में ले लिया, “हाँ दादी माँ! हम आपके ही बच्चे हैं। हमें माफ कर दीजिए कि हमें आप तक पहुँचने में इतनी देर हो गई।”

सुलोचना जी फूट-फूटकर रोने लगीं। उन्होंने दोनों बच्चों को एक साथ अपने सीने से चिपका लिया। ममता का ऐसा सैलाब उमड़ा कि बरसों की सारी शिकायतें उस अश्रुधारा में बहने लगीं। हरिशंकर जी अभी भी अविश्वास और गहरे आघात के बीच खड़े थे। उनका मन एक तरफ खुशी से झूम रहा था, तो दूसरी तरफ बीस साल का पुराना घाव रिस रहा था।

हरिशंकर जी ने खुद को संभालते हुए एक कठोर स्वर में पूछा, “तुम दोनों यहाँ क्यों आए हो? जिस बाप ने अपने बूढ़े माँ-बाप को जीते जी मार डाला, जिसने कभी मुड़कर यह नहीं देखा कि उसके जन्मदाता किस हाल में जी रहे हैं, उसकी औलादों को आज हमारी याद कैसे आ गई? क्या मयंक ने तुम्हें भेजा है? कहाँ है वो? खुद क्यों नहीं आया सामना करने?”

यह सुनकर आरव की आँखें भी नम हो गईं। उसने धीरे से अपने दादू के दोनों हाथ अपने हाथों में लिए और उन्हें सोफे पर बैठाया।

“दादू… पापा अब कभी नहीं आ सकते,” आरव की आवाज भर्रा गई।

यह सुनते ही सुलोचना जी के हाथ रुक गए और हरिशंकर जी का दिल एक पल के लिए जैसे थम सा गया। “क्या… क्या कह रहे हो तुम आरव?” सुलोचना जी ने कांपती आवाज में पूछा।

आरव ने गहरी सांस ली और सच्चाई बयाँ करने लगा, “दादू, आप लोग पापा को निर्मोही समझते रहे, लेकिन सच यह नहीं था। जब पापा बीस साल पहले अपनी पढ़ाई और नौकरी के सिलसिले में अमेरिका गए थे, तो शुरुआत में सब ठीक था। लेकिन वहाँ जाने के पाँच साल बाद, जब उनका काम जमने लगा था, उनका एक बहुत भयानक कार एक्सीडेंट हो गया था। उस हादसे में उनकी रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट आई थी और वे कई सालों तक बिस्तर पर रहे। इलाज में उनका सारा पैसा खर्च हो गया। वे किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना चाहते थे और खासकर आप दोनों को तकलीफ में नहीं देखना चाहते थे। वे नहीं चाहते थे कि आप अपनी बुढ़ापे की जमा-पूँजी उनके इलाज में गँवा दें।”

कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया। हरिशंकर जी और सुलोचना जी सांस रोके सुन रहे थे।

आरव ने आगे बताया, “पापा ने जैसे-तैसे खुद को संभाला, फिर हम लोगों की परवरिश की। लेकिन उस पुरानी चोट के कारण उनका स्वास्थ्य कभी पूरी तरह ठीक नहीं हुआ। पिछले साल… पिछले साल एक गंभीर संक्रमण के कारण पापा हमें छोड़कर हमेशा के लिए चले गए।”

यह सुनते ही सुलोचना जी की चीख निकल गई और वे छाती पीटकर रोने लगीं। हरिशंकर जी का पूरा वजूद सुन्न पड़ गया। जिस बेटे को वे बरसों से पत्थरदिल और खुदगर्ज समझकर कोसते रहे थे, वह तो खुद जिंदगी और मौत की भयानक जंग लड़ रहा था। अपने बेटे के चले जाने का गम एक वज्रपात की तरह उन पर टूटा।

अवनि ने दादी के आँसू पोंछते हुए कहा, “दादी माँ, रोइए मत। पापा ने अपने आखिरी दिनों में सिर्फ आपका और दादू का नाम लिया था। वे हर रोज आपकी यह पुरानी तस्वीरें देखकर रोते थे। उन्होंने हमसे वादा लिया था कि जिस दिन हम दोनों अपने पैरों पर खड़े हो जाएँगे, हम अपनी सारी पढ़ाई और नौकरी का इंतजाम भारत में करेंगे और अपने दादा-दादी के पास लौट जाएँगे। पापा ने कहा था कि वे जो फर्ज नहीं निभा सके, वह फर्ज हमें अपनी साँस रहने तक निभाना है।”

आरव ने अपने बैग से एक पत्र निकाला और हरिशंकर जी के हाथ में रख दिया। वह पत्र मयंक ने अपनी मृत्यु से ठीक पहले अपने कांपते हाथों से लिखा था। पत्र में मयंक ने लिखा था:

‘पूज्य पिताजी और प्यारी माँ, मुझे क्षमा कर दीजिएगा। मैं आपका एक अभागा बेटा साबित हुआ जो अपनी मजबूरियों और झूठे स्वाभिमान के चलते कभी आपके चरणों में लौट नहीं सका। मैं नहीं चाहता था कि मेरा लाचार शरीर देखकर आपकी आँखें रोएँ। लेकिन मैं अपने अंश, अपने बच्चों को आपके पास भेज रहा हूँ। वे दोनों अब कभी आपको अकेला नहीं छोड़ेंगे। वे मेरा कर्जा और मेरा फर्ज दोनों निभाएंगे। मुझे माफ कर देना बाबूजी…’

पत्र पढ़ते-पढ़ते हरिशंकर जी की आँखों से आँसुओं की धार बह निकली। उन्होंने पत्र को अपने सीने से लगा लिया। बरसों से जमा हुआ सारा गुस्सा, सारा मलाल और सारा संताप उस एक पल में पिघलकर बह गया। पिता का दिल अपने बेटे के दर्द को महसूस करके तड़प उठा, लेकिन साथ ही यह सुकून भी मिला कि उनका बेटा बेवफा या निर्मोही नहीं था।

आरव ने आगे बढ़कर दादू के आँसू पोंछे और मुस्कुराते हुए कहा, “दादू, मैंने और अवनि ने अपनी कंपनियाँ यहीं ट्रांसफर करवा ली हैं। हम अब कहीं नहीं जाने वाले। यह घर अब कभी खाली या शांत नहीं रहेगा। आज दिवाली है, और पापा की आत्मा तभी खुश होगी जब इस घर का हर कोना दीयों की रोशनी से जगमगाएगा।”

अवनि तुरंत उठ खड़ी हुई और उसने दादी का हाथ पकड़ा, “चलिए दादी माँ! आपने जो नए कपड़े निकाले थे, जल्दी से पहनिए। आज शाम की पूजा हम सब मिलकर करेंगे। मैंने सुना है आप बहुत स्वादिष्ट बेसन के लड्डू बनाती हैं, आज मैं आपसे वही बनाना सीखूँगी।”

घर का वह वीराना पलक झपकते ही खुशियों के उत्सव में तब्दील हो गया। जिस आँगन में बरसों से केवल उदासी और सन्नाटे का वास था, आज वहाँ बच्चों की हँसी, पायल की छनछनाहट और खुशियों की गूँज गूँजने लगी थी।

शाम ढलते-ढलते अरेरा कॉलोनी का वह पुराना मकान सैकड़ों दीपकों की कतारों से जगमगा उठा। हरिशंकर जी ने सिल्क का नया कुर्ता पहना था और सुलोचना जी के चेहरे पर बरसों बाद एक अलौकिक तेज था। पूजा के समय जब आरव और अवनि ने दोनों बुजुर्गों के पाँव छूकर आरती की थाली उठाई, तो हरिशंकर जी को महसूस हुआ कि जीवन में उम्मीद का दीया कभी बुझने नहीं देना चाहिए। अंधेरा चाहे कितना भी घना और लंबा क्यों न हो, सुबह की किरण जब फूटती है, तो वह हर दर्द को रोशनी में बदल देती है। उस रात जलने वाला हर दीया केवल मिट्टी का दीया नहीं था, बल्कि वह प्रेम, क्षमा, समर्पण और पारिवारिक अटूट रिश्तों की अमर ज्योति का प्रतीक था।

जीवन में कई बार गलतफहमियाँ और खामोशियाँ अपनों के बीच गहरी दूरियाँ बना देती हैं, लेकिन जब प्रेम और समर्पण लौटकर आता है, तो हर घाव भर जाता है। क्या आपको भी लगता है कि रिश्तों में संवाद की कमी सबसे बड़ी दूरी की वजह बनती है? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर लिखकर बताएं।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद

  लेखिका : रमा प्रभात 

error: Content is protected !!