अर्धांगिनी का मौन तप

“सुनो, आज शाम वाले समारोह में तुम्हें भी मेरे साथ चलना होगा। ज़रा सलीके से अपनी वो कांजीवरम वाली साड़ी पहन लेना, समय पर निकलना है।”

कमरे की दहलीज़ पर खड़े होकर जब उन्होंने ये शब्द कहे, तो मेरे हाथ में पकड़ा चाय का कप तनिक कांप सा गया। पिछले पैंतीस वर्षों के वैवाहिक जीवन में यह पहला अवसर था जब उन्होंने मुझे अपने किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में साथ चलने का ऐसा सीधा आदेश दिया था। अमूमन तो उनका दायरा शहर की बड़ी-बड़ी गोष्ठियों, विश्वविद्यालयों के सेमिनारों और साहित्यिक सम्मेलनों तक फैला रहता था, और मेरा संसार घर के दालान, रसोई की मसालदानी और तुलसी के चौतरे तक ही सीमित था। मैंने कभी कोई शिकायत भी नहीं की थी, क्योंकि मुझे शुरू से यही सिखाया गया था कि एक सफल घर वही होता है जहाँ जिम्मेदारियां चुपचाप निभाई जाएं, ढिंढोरा पीटकर नहीं।

स्मृतियों के झरोखे खुले तो याद आया वो दिन, जब राजस्थान के एक छोटे से कस्बे में मेरे विवाह की बात चली थी। मैंने केवल बारहवीं तक पढ़ाई की थी। घर के लोग परेशान थे कि सांवला रंग-रूप और सामान्य कद-काठी वाली इस लड़की के लिए योग्य वर कहाँ से मिलेगा। जब भी कोई रिश्तेदार आता, माँ मेरी खूबियों की फेहरिस्त गिनाने लगतीं—”लड़की बहुत सीधी-सादी है, घर का सारा काम हंसकर कर लेती है। सिलाई-कढ़ाई हो या रसोई, कभी किसी बात की शिकायत नहीं आने देगी। स्वभाव इतना शांत है कि ऊँची आवाज़ में बोलना तो जानती ही नहीं।”

पिताजी ने जब बताया कि लड़का इंदौर के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में प्राध्यापक है और गंभीर लेखन करता है, तो मुझे लगा कि शायद मैं उनके काबिल कभी नहीं हो पाऊँगी। पर विवाह हुआ और मैं सिर झुकाए उनके घर की देहरी लांघकर आ गई। बाहर की दुनिया के लिए वे प्रोफ़ेसर प्रभात शास्त्री थे—एक गंभीर, मितभाषी और अपने विचारों में खोए रहने वाले विद्वान व्यक्ति। लेकिन घर के बंद कमरों में, जब वे अध्ययन कक्ष की थकान समेटकर मेरे पास आते, तो उनका रूप एकदम बदल जाता था।

वे मुझे मेरे नाम ‘उर्मिला’ से बहुत कम बुलाते थे। उनके होंठों पर मेरे लिए सिर्फ एक ही संबोधन रहता था—’गुड़िया’। उनकी लिखी हर कहानी, हर उपन्यास का केंद्रीय पात्र जब भी प्रेम या समर्पण की बात करता, तो उसमें कहीं न कहीं एक शांत, निश्छल स्त्री की छवि उभरती। उनके पाठक अक्सर गोष्ठियों में उनसे पूछते कि उनकी रचनाओं में इतना ठहराव और इतना गहरा समर्पण कहाँ से आता है। वे बस रहस्यमयी मुस्कान बिखेर देते।

वर्षों बीतते गए। वे पदोन्नत होकर विभागाध्यक्ष बने, फिर कई राष्ट्रीय समितियों के सदस्य बने। घर में ट्रॉफियों, पदकों, मानपत्रों और शॉल-श्रीफलों का अंबार लगता गया। जब भी वे किसी बड़े शहर से सम्मान पाकर लौटते, सूटकेस से वो चमकती हुई शील्ड्स और कीमती उपहार निकालकर सीधे मेरी गोद में रख देते और मुस्कुराते हुए कहते, “लो गुड़िया, इन्हें अपने हाथों से अलमारी में सहेज दो, तुम्हारी अमानत है।” मैं चुपचाप उन्हें साफ करके शीशे की रैक में सजा देती। मुझे लगता था कि यह सब उनकी मेधा और कठिन परिश्रम का फल है, इसमें मेरा क्या हाथ? मैं तो बस सुबह समय पर गर्म चाय, साफ धुले कुर्ते और रात को उनके अध्ययन के समय सन्नाटा सुनिश्चित करने वाली एक साधारण गृहिणी भर थी।

लेकिन आज का दिन पूरी तरह अलग था। मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी और संस्कृति मंत्रालय द्वारा उन्हें राज्य के सर्वोच्च नागरिक व साहित्यिक सम्मान से नवाजा जाना था। शहर के रवींद्र भवन का सभागार खचाखच भरा हुआ था। जिले के बड़े प्रशासनिक अधिकारी, कुलपति, जाने-माने लेखक और नामचीन हस्तियां मौजूद थीं।

जब हम सभागार में दाखिल हुए, तो हर कोई झुककर उनका अभिवादन कर रहा था। मुझे उस चकाचौंध में अजीब सी झिझक हो रही थी। मेरी कांजीवरम साड़ी, जो कभी किसी पारिवारिक विवाह में पहनी थी, आज मुझे बहुत भारी और खुद को असहज महसूस करा रही थी। लोग उन्हें बधाइयां दे रहे थे, और उनके साथ खड़ी होने के कारण अनायास ही कई हाथ मेरे सामने भी जुड़ रहे थे। मेरे मन में बार-बार यही कौतूहल उठ रहा था कि भला मुझे ये लोग क्यों आदर दे रहे हैं? मैंने तो ऐसा कोई तीर नहीं मारा, न कोई किताब लिखी, न कोई भाषण दिया।

उन्हें आदरपूर्वक मंच पर ले जाया गया, जहाँ मुख्य अतिथि और अन्य विशिष्ट जन आसीन थे। मुझे आयोजकों ने सबसे आगे की पंक्ति में, विशिष्ट अतिथियों के बीच एक कुर्सी पर बैठा दिया। मेरे दिल की धड़कनें तेज थीं। मंच पर से एक-एक करके वक्ता उनके जीवन, उनके संघर्ष, उनके शोध और समाज के प्रति उनके योगदान पर बड़े-बड़े व्याख्यान दे रहे थे। सभागार समय-समय पर तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठता।

अंत में, जब मुख्य अतिथि ने उन्हें प्रशस्ति पत्र, स्मृति चिह्न और स्वर्ण पदक से अलंकृत किया, तो पूरा हॉल सम्मान में खड़ा हो गया। इसके बाद उद्घोषक ने कहा, “अब हम सब प्रोफेसर प्रभात शास्त्री जी के प्रेरक विचारों को सुनने के लिए लालायित हैं।”

प्रभात जी पोडियम के सामने आए। उन्होंने माइक को थोड़ा ठीक किया और सभागार में एक शांत दृष्टि डाली। उनका चेहरा हमेशा की तरह गंभीर और गरिमामय था। मैंने उन्हें कॉलेज के छात्रों को पढ़ाते तो कभी-कभार घर से सुना था, पर इतने विशाल मंच पर बोलते हुए पहली बार देख रही थी।

उन्होंने अपने वक्तव्य की शुरुआत बहुत सहज शब्दों से की। उन्होंने समाज, भाषा और मानवीय संवेदनाओं पर बात की। भाषण के अंतिम चरण में पहुँचकर उन्होंने एक गहरा विराम लिया। सभागार में पिन ड्रॉप साइलेंस था। उन्होंने भरे गले से कहा, “मित्रों, आज इस मंच से मुझे जो यश, जो मान और जो प्रतिष्ठा मिली है, वह किसी भी व्यक्ति के जीवन का चरम स्वप्न हो सकती है। लेकिन इस मुकाम पर खड़े होकर मैं एक सच स्वीकार करना चाहता हूँ। आज मैं जो कुछ भी बन सका हूँ, जो शब्द मेरी लेखनी से निकले हैं और जो संवेदना समाज ने सराही है, उसका सम्पूर्ण श्रेय सिर्फ और सिर्फ एक इंसान के मौन तप को जाता है। क्या आप सब उस शख्सियत से मिलना चाहेंगे?”

पूरा हॉल सांस रोके उन्हें देख रहा था। सबकी निगाहें मंच के इर्द-गिर्द घूमने लगीं कि शायद वे किसी बड़े गुरु या मार्गदर्शक का नाम लेने वाले हैं।

तभी उन्होंने सीधे नीचे, पहली पंक्ति में बैठी मेरी ओर देखा। उनकी आँखों में एक अजीब सा अपनत्व और भीगा हुआ भाव था। उन्होंने हाथ का इशारा करते हुए कहा, “सुनिए, आप ज़रा मंच पर आइए…”

मैं हक्की-बक्की रह गई। मुझे लगा कि शायद मेरे पीछे किसी अन्य गणमान्य व्यक्ति को पुकार रहे हैं। लेकिन तभी मेरे बगल में बैठी एक वरिष्ठ महिला अधिकारी ने मुस्कुराते हुए मेरा हाथ थामा और कहा, “अरे शास्त्री जी आपको ही बुला रहे हैं, जाइए मंच पर!”

मेरे पैर जैसे ज़मीन में गड़ गए थे। घबराहट के मारे मेरा गला सूखने लगा। मैंने पल्लू को थोड़ा और आगे खींचा, सिर झुकाया और कांपते कदमों से मंच की सीढ़ियां चढ़ीं। जीवन में पहली बार मैं इतने सारे कैमरों, लाइटों और सैकड़ों अपरिचित आँखों के सामने खड़ी थी।

प्रभात जी ने मेरा हाथ अपने हाथ में लिया और माइक के पास आकर बोले, “देवियों और सज्जनों, ये हैं मेरी धर्मपत्नी, श्रीमती उर्मिला शास्त्री। दुनिया मुझे विद्वान कहती है, पर सच यह है कि जब मैं रातों को जागकर लिखता था, तो यह स्त्री बिना किसी आहट के मेरे कमरे का दरवाज़ा खोलकर गर्म दूध का प्याला रख जाती थी ताकि मेरी एकाग्रता न टूटे। जब मेरे जीवन में आर्थिक तंगियाँ थीं, तब इन्होंने अपने गहने गिरवी रखकर मेरी पुस्तकों के प्रकाशन का मार्ग प्रशस्त किया और कभी माथे पर शिकन तक नहीं आने दी। मेरे क्रोध, मेरी व्यस्तताओं और मेरी अनुपस्थितियों को जिसने अपने असीम धैर्य से सहा, वह यही हैं। यदि इनका त्याग न होता, तो आज प्रभात शास्त्री नाम का कोई अस्तित्व इस दुनिया में न होता। इसलिए, यह सम्मान, यह पदक और यह जयकार असल में इनकी साधना की है, मेरी नहीं।”

इतना कहते हुए उन्होंने अपने गले से स्वर्ण पदक और फूलों की भारी माला उतारी और भरे मंच पर, झुककर मेरे गले में डाल दी। स्मृति चिह्न मेरे हाथों में थमाते हुए उन्होंने भरी आँखों से मुझे देखा।

सभागार कुछ क्षणों के लिए स्तब्ध रह गया, और फिर अगली ही पल पूरा हॉल खड़े होकर तालियां बजाने लगा। वह करतल ध्वनि इतनी तीव्र थी कि मेरे कानों में गूंजने लगी। मेरी आँखों से अविरल अश्रुधारा बह निकली। मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि मैं कहाँ देखूँ, कैसे अपनी इस लाज और संकोच को छुपाऊँ।

समारोह समाप्त हुआ। घर लौटते समय रास्ते भर गाड़ी में सन्नाटा रहा, पर वह सन्नाटा भारी नहीं था, बल्कि एक अगाध तृप्ति से भरा था। घर पहुँचते ही उन्होंने दरवाज़ा बंद किया और एक लंबी, राहत भरी सांस ली। उनका वह प्रोफेसर वाला गंभीर मुखौटा एक पल में उतर गया।

वे मेरे पास आए, मुस्कुराते हुए मेरे दोनों कंधे पकड़े और शरारत भरे लहजे में बोले, “सुनो गुड़िया, आज जब तुम उस मंच पर चढ़ रही थीं, तो सैकड़ों लोगों के बीच मैंने जो तुम्हारा रूप देखा न, मेरे भीतर बरसों से सोई सारी उपमाएं जाग उठीं!”

मैं अभी भी उस सार्वजनिक सम्मान की झिझक से पूरी तरह उबर नहीं पाई थी। मैंने धीरे से अपनी नजरें झुकाते हुए पूछा, “आप भी न… क्या रूप और कैसा रंग? उम्र के इस पड़ाव पर भला क्या बचता है? आप बस कुछ भी बोलते हैं।”

उन्होंने मुझे अपनी ओर खींचते हुए बहुत आत्मीयता से कहा, “सच कह रहा हूँ गुड़िया! उस भव्य मंच पर, अपनी सादगी और शालीनता में तुम साक्षात स्वर्ग की अप्सरा लग रही थीं। एक ऐसी अप्सरा जिसके आगे दुनिया की हर बनावटी सुंदरता फीकी पड़ जाए।”

उनकी बात सुनकर मेरे चेहरे पर लज्जा की लाली दौड़ गई। मैंने सिर झुकाकर कहा, “धत्त! आज आप बहुत ज्यादा खुश हैं, इसलिए बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं। मैं और अप्सरा? कभी जीवन में ऐसा नहीं कहा और आज इतने लोगों के सामने मुझे वहाँ खड़ा कर दिया। आपको अंदाज़ा भी है कि मुझे कितनी शर्म आ रही थी? वो तो अच्छा हुआ कि आपने मंच से मुझे ‘गुड़िया’ कहकर नहीं पुकारा, वरना मैं वहीं लाज के मारे धरती में समा जाती!”

वे ठहाका लगाकर हंस पड़े और बोले, “पगली, अप्सरा सिर्फ परियों की कहानियों में नहीं होती। जो घर को स्वर्ग बना दे और अपने साथी के हर संघर्ष में साये की तरह साथ खड़ी रहे, वही सच्ची अप्सरा होती है।”

उस रात जब मैंने आईने में खुद को देखा, तो गले में पड़ा वह पदक केवल धातु का एक टुकड़ा नहीं लग रहा था। वह उस मौन समझ, उस अटूट विश्वास और उस प्रेम का प्रमाण था, जिसे शब्दों की कभी जरूरत ही नहीं पड़ी थी। दुनिया के लिए मैं चाहे जो भी रही होऊँ, पर उनके लिए मेरा वजूद हमेशा वही था—उनकी अपनी ‘गुड़िया’।

मूल लेखक :निरजंन धुलेकर ।

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