बंजर कोख की अमर छांव

 एक मां के सामने उसका बेटा तड़पे और वह अपने गहने बचाकर रखे, इतनी पत्थर दिल नहीं हूँ मैं।”

पूरा घर सन्न रह गया। मनोरमा चाची, जो ज़िंदगी भर बड़ी मां को अपनी सौतन और दुश्मन समझती रहीं, उनके पैरों में गिरकर फूट-फूट कर रोने लगीं। चाचा हरिशंकर की आंखें शर्म और पश्चाताप के आंसुओं से झुक गईं। उन्हें समझ आ गया कि जिस औरत को उन्होंने सिर्फ इसलिए किनारे कर दिया था क्योंकि वह संतान नहीं दे सकी, उसका दिल उस पूरी हवेली में सबसे बड़ा और पवित्र था।

बचपन की सबसे धुंधली और पहली स्मृति अगर मेरे ज़हन में आज भी साफ़ तैरती है, तो वह हवेली के उस पिछले दालान की है जहाँ तुलसी के चौतरे के पास एक शांत, गरिमामयी औरत चुपचाप दीया जलाया करती थी। वह मेरी बड़ी चाची थीं, जिन्हें घर के सब बच्चे ‘बड़ी मां’ कहते थे और उनका असली नाम सुमित्रा था। मेरी अपनी मां अक्सर दोपहर में जब सिलाई-कढ़ाई लेकर बैठतीं, तो बड़ी मां के अतीत की परतें खोला करती थीं। बड़ी मां किसी बेहद रईस और ज़मींदार घराने की लाडली बेटी रही थीं। उनके मायके में दर्जनों नौकर-चाकर, विशाल कोठियां और अनाज के भरे खलिहान थे। उस दौर के रिवाज़ों के मुताबिक वह ज़्यादा पढ़-लिख तो नहीं पाई थीं, मगर अक्षरों की पहचान उन्हें बखूबी थी। जब वह हवेली के ज़रूरी कागज़ात पर साफ़, सलीकेदार मोतियों जैसे अक्षरों में ‘सुमित्रा देवी’ दस्तखत करती थीं, तो देखने वाले उनकी नफ़ासत पर दंग रह जाते थे।

फिर उनका ब्याह हमारे छोटे चाचा, जिनका नाम हरिशंकर था, उनके साथ हुआ। पुराने संदूक में रखी पीली पड़ चुकी तस्वीरों में जब भी मैं उन दोनों को साथ देखता हूँ, तो लगता है जैसे किसी पुराने दौर की फ़िल्म का कोई हसीन जोड़ा सामने खड़ा हो। चाचाजी अपने ज़माने के बेहद शौकीन, बातूनी और हंसमुख इंसान थे। पूरे इलाके में चर्चा थी कि छोटे बाबू ऐसी बहू ब्याह कर लाए हैं जिसके रूप-रंग के आगे पूरे परगने की औरतें फीकी पड़ जाएं। सब कुछ ठीक चल रहा था, दिन हंसी-खुशी कट रहे थे, पर किस्मत कब अपना पासा पलट दे, इसकी भनक किसी को नहीं होती।

शादी के चार-पांच बरस बीत गए, मगर हवेली के आंगन में किसी नन्हे कदम की आहट नहीं सुनाई दी। वही समाज, वही रिश्तेदार और वही पड़ोसी जो कल तक सुमित्रा चाची के रूप और सलीके के कसीदे पढ़ते नहीं थकते थे, अब बंद दरवाज़ों के पीछे फुसफुसाने लगे। ताने तीर बनकर चलने लगे और हवा में ‘बांझ’ का ज़हरीला शब्द गूंजने लगा। चाचा हरिशंकर का खुशमिज़ाज चेहरा धीरे-धीरे बुझने लगा। वे शहर के बड़े हकीमों और डॉक्टरों के पास गए, पर हर जगह से एक ही निराशाजनक जवाब मिला—कमी चाची में ही थी, वे कभी मां नहीं बन सकती थीं। इसके बाद तो जैसे अंधविश्वासों का बाज़ार सज गया। कभी किसी दरगाह के तावीज़, तो कभी किसी तांत्रिक के भभूत। सात सालों तक चाची हर अपमान, हर कड़वा काढ़ा और हर अजीबोगरीब टोना-टोटका चुपचाप सहती रहीं, इस उम्मीद में कि शायद भगवान उनकी सूनी गोद भर दे।

उधर चाचा हरिशंकर के सिर पर एक अजीब सा जुनून सवार हो गया। उन्होंने खुद को एक कमरे में बंद कर लिया, दाढ़ी बढ़ा ली, सफ़ेद कुर्ते पहनने लगे और हर किसी से कहने लगे कि संसार मिथ्या है, वे घर-बार छोड़कर किसी तीर्थ या आश्रम में संन्यास ले लेंगे। जब भी कोई समझाने आता, वे वैराग्य और मोक्ष की बातें करने लगते। मेरी दादी अपने लाडले बेटे का यह हाल देखकर भीतर तक कांप गईं। उन्हें अपने बेटे का सन्यास लेना किसी प्रलय जैसा लगता था। दादी ने पंचायत और परिवार के बीच एक नया पासा फेंका—”अगर सुमित्रा की कोख बंजर है, तो इसमें मेरे बेटे का क्या कसूर? हरिशंकर का दूसरा ब्याह होगा। नया रिश्ता होगा, आंगन में औलाद खेलेगी, तो इसका वैराग्य खुद-ब-खुद उतर जाएगा।”

दादी को सिर्फ अपने बेटे का कुल और उसकी खुशी दिख रही थी। किसी ने एक बार भी उस बेकसूर औरत की तरफ नहीं देखा, जिसने अपनी पूरी जवानी उस घर की चौखट पर न्योछावर कर दी थी। चाचाजी, जो कल तक मोक्ष की तलाश में हिमालय जाने की कसमें खा रहे थे, उन्होंने भी बिना किसी ठोस विरोध के मौन रहकर इस फैसले पर अपनी मुहर लगा दी। कुछ ही महीनों में ढोल-नगाड़ों के साथ हवेली में एक नई दुल्हन, मनोरमा चाची, का प्रवेश हुआ।

सुमित्रा चाची के लिए यह फैसला किसी जीते-जी चिता पर बैठने जैसा था। जिस आंगन पर कल तक उनका राज था, वहीं अब एक दूसरी औरत का सिंदूर इतरा रहा था। पर बड़ी मां ने न तो मायके जाकर तमाशा किया और न ही ज़हर का घूंट पीकर जान दी। उन्होंने अपनी पीड़ा को भीतर ही समेट लिया और हवेली के एक शांत कोने वाले कमरे में अपनी दुनिया बसा ली। वक्त का पहिया घूमा। मनोरमा चाची ने एक-एक करके तीन सुंदर बेटों को जन्म दिया। चाचा हरिशंकर का सारा वैराग्य, सारी दाढ़ी और हिमालय जाने की कसमें काफूर हो चुकी थीं। वे अपने बेटों की किलकारियों में ऐसे रमे कि उन्हें बड़ी मां के वजूद तक की सुध न रही।

हवेली में अब दो हिस्से बन चुके थे—एक तरफ बच्चों की चहल-पहल, ठाठ-बाट और हंसी थी, और दूसरी तरफ बड़ी मां का एकांत। मगर यहीं से उस कहानी ने करवट ली जो अक्सर परिवारों में देखने को नहीं मिलती। सौतिया डाह और नफ़रत की जगह, बड़ी मां के दिल में उन मासूम बच्चों के लिए ममता का सोता फूट पड़ा। मनोरमा चाची उम्र में छोटी थीं, तुनकमिज़ाज थीं और तीन बच्चों को संभालते-संभालते अक्सर झुंझला जाती थीं। कभी बड़ा बेटा बीमार पड़ता, तो रात-रात भर जागकर उसके माथे पर ठंडे पानी की पट्टियां रखने का काम सुमित्रा चाची ही करतीं।

जब बच्चे थोड़े बड़े हुए, तो वे खुद-ब-खुद अपनी सगी मां की डांट से बचकर बड़ी मां के आंचल में छिपने लगे। बड़ी मां उन्हें पुराने किस्से-कहानियां सुनातीं, उनके फटे बस्ते सिलतीं, और उनके स्कूल का बस्ता तैयार करतीं। मनोरमा चाची शुरू में बहुत जली-भुनीं। उन्हें लगता था कि सौतन उनके बच्चों पर कोई जादू कर रही है। वे कई बार बच्चों को डांटकर बड़ी मां के कमरे से खींच लातीं, पर मासूम दिल तो सिर्फ सच्चा प्यार पहचानते हैं। भूख लगती तो तीनों बच्चे बड़ी मां की रसोई की तरफ ही दौड़ते, क्योंकि वहां डांट नहीं, बल्कि प्यार से घी लगी रोटियां मिलती थीं।

साल गुज़रते गए। बच्चे अब बड़े हो रहे थे। चाचा हरिशंकर की सेहत उम्र के साथ ढलने लगी थी और कारोबार में भी भारी नुकसान हो गया था। हवेली की आर्थिक हालत चरमराने लगी। दूसरी तरफ, मनोरमा चाची की उम्मीदें और खर्चे बढ़ते जा रहे थे, जिसे लेकर घर में रोज़ कलह रहने लगी। जिस औलाद के लिए चाचा ने दूसरा ब्याह रचाया था, अब उसी घर में शांति नाम की कोई चीज़ नहीं बची थी।

इसी बीच सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब सबसे छोटे बेटे, अनिकेत, को गंभीर बीमारी ने घेर लिया। डॉक्टरों ने बताया कि उसकी दोनों किडनियां खराब हो चुकी हैं और तुरंत इलाज व प्रत्यारोपण की ज़रूरत है, जिसमें लाखों का खर्च था। चाचा हरिशंकर के हाथ-पैर फूल गए। ज़मीनें पहले ही बिक चुकी थीं, रिश्तेदारों ने मुंह फेर लिया था। मनोरमा चाची छाती पीट-पीटकर रोने के अलावा कुछ नहीं कर पा रही थीं। घर में मातम का सन्नाटा पसर गया था।

तभी हवेली के उस कोने वाले कमरे का दरवाज़ा खुला। सुमित्रा चाची बाहर आईं। उनके हाथ में एक पुराना, मखमली डिब्बा था। उन्होंने वह डिब्बा सीधे चाचा हरिशंकर के कांपते हाथों में रख दिया। डिब्बे में उनके मायके से मिले पुश्तैनी सोने के कंगन, रानी हार और कुछ बेशकीमती ज़ेवर थे, जिन्हें उन्होंने बुरे से बुरे वक्त में भी कभी हाथ नहीं लगाया था।

चाचा ने हैरान होकर देखा, “सुमित्रा… यह क्या कर रही हो? यह तो तुम्हारा स्त्रीधन है, तुम्हारे मायके की आखिरी निशानी!”

बड़ी मां ने अत्यंत शांत और दृढ़ आवाज़ में कहा, “जब तक यह बेटा बच नहीं जाता, इन पत्थरों की कोई कीमत नहीं है। आपने मुझे औलाद का सुख नहीं दिया, कोई बात नहीं, पर इन बच्चों ने मुझे ‘मां’ कहकर पुकारा है। एक मां के सामने उसका बेटा तड़पे और वह अपने गहने बचाकर रखे, इतनी पत्थर दिल नहीं हूँ मैं।”

पूरा घर सन्न रह गया। मनोरमा चाची, जो ज़िंदगी भर बड़ी मां को अपनी सौतन और दुश्मन समझती रहीं, उनके पैरों में गिरकर फूट-फूट कर रोने लगीं। चाचा हरिशंकर की आंखें शर्म और पश्चाताप के आंसुओं से झुक गईं। उन्हें समझ आ गया कि जिस औरत को उन्होंने सिर्फ इसलिए किनारे कर दिया था क्योंकि वह संतान नहीं दे सकी, उसका दिल उस पूरी हवेली में सबसे बड़ा और पवित्र था।

गहने बेचकर अनिकेत का इलाज बड़े शहर के अस्पताल में कराया गया। अस्पताल के दिनों में भी दिन-रात एक करके जिसने अनिकेत की सेवा की, वह बड़ी मां ही थीं। अनिकेत धीरे-धीरे ठीक होकर घर लौट आया।

इस घटना ने पूरे परिवार की धुरी ही बदल दी। अब हवेली में सौतन का कोई रिश्ता नहीं था, बल्कि दो बहनें थीं। मनोरमा ने घर की चाबियां और सारा मान-सम्मान बड़ी मां के कदमों में रख दिया। तीनों बेटों के लिए अब उनकी सगी मां से भी बढ़कर बड़ी मां का दर्जा था। जब बड़े बेटे की शादी हुई, तो उसने साफ़ कह दिया कि शादी के पहले कार्ड पर और मंडप में आशीर्वाद देने के लिए सबसे आगे बड़ी मां ही बैठेंगी।

जिस औरत को कभी पूरे समाज ने ‘बांझ’ कहकर दुत्कारा था, आज उसी औरत के आंगन में तीन जवान बेटे, उनकी बहुएं और पोते-पोतियां उसकी छांव में पल रहे थे। सुमित्रा चाची ने साबित कर दिया था कि मां केवल वह नहीं होती जो नौ महीने कोख में रखे, मां वह होती है जिसके दिल में ममता का समंदर हो, जो बिना किसी स्वार्थ के अपना सर्वस्व लुटा दे। जीवन के ढलते पड़ाव पर, जब चाचा हरिशंकर दुनिया से विदा हुए, तो उनके चेहरे पर केवल एक ही सुकून था—कि सुमित्रा ने उनके बिखरे हुए परिवार को एक धागे में पिरोकर स्वर्ग बना दिया था।

पाठकों से संवाद:

एक औरत का पूरा अस्तित्व केवल संतान पैदा करने की क्षमता तक सीमित कर देना हमारे समाज की सबसे बड़ी त्रासदी रही है। क्या मातृत्व केवल खून के रिश्तों से बंधा होता है, या फिर त्याग, दुलार और समर्पण ही मातृत्व की असली परिभाषा है? बड़ी मां के इस त्याग और फैसले पर आपकी क्या राय है? अपने विचार नीचे कमेंट में जरूर बताएं।

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लेखिका : मीरा जायसवाल

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