पसीने की स्याही

तान्या के ये शब्द किसी जलते हुए अंगारे की तरह सुमित्रा के सीने पर गिरते। कई बार जब कॉलेज में फॉर्म भरते समय या किसी समारोह में अभिभावक का पेशा पूछा जाता, तो दोनों भाई-बहन ‘स्वर्गीय पिता शिक्षक थे’ लिखकर बात टाल देते, लेकिन कभी यह स्वीकार नहीं करते कि उनकी मां उसी व्यवस्था में चपरासी है। उन्हें अपनी मां के हाथों में पड़े छालों और चेहरे की झुर्रियों से घिन आती थी।

ग्वालियर शहर के एक पुराने और संकरे मोहल्ले में जब भी शाम ढलती, चार नंबर वाली गली के कोने के मकान से अक्सर तीखी आवाज़ें बाहर तैरने लगती थीं। पड़ोस में रहने वाले लोग कान लगाकर सुनते और आपस में फुसफुसाते कि आज फिर उस अभागिन मां की किस्मत पर उसकी ही औलादें पत्थर उछाल रही हैं। उस घर की गृहस्वामिनी थीं सुमित्रा देवी। सुमित्रा जी कोई बहुत पढ़ी-लिखी, आधुनिक या अंग्रेजीदां महिला नहीं थीं। बस किसी तरह गांव के प्राथमिक विद्यालय से सातवीं कक्षा तक अक्षर ज्ञान प्राप्त कर पाई थीं। उनकी शादी बहुत कम उम्र में एक सज्जन और स्वाभिमानी स्कूल शिक्षक सतीश जी से हुई थी। सतीश जी स्थानीय सरकारी हाई स्कूल में गणित के अध्यापक थे। पूरे इलाके में उनका मान-सम्मान था। हर कोई मास्टर जी कहकर सिर झुकाता था।

सुमित्रा जी का जीवन अपने पति की छत्रछाया में बेहद सुकून से बीत रहा था। वे घर-गृहस्थी, चौका-चूल्हा और अपने दो नन्हे बच्चों—बड़ा बेटा मयंक और छोटी बेटी तान्या की परवरिश में पूरी तरह रमी हुई थीं। सतीश जी जब भी शाम को लौटते, सुमित्रा को समझाते कि वह भी थोड़ी बहुत पढ़ाई आगे बढ़ाएं, अखबार पढ़ें, दुनिया को समझें। मगर सुमित्रा हमेशा हंसकर टाल देतीं कि उनके लिए तो सतीश जी ही पूरी दुनिया हैं और बच्चों का भविष्य संवर जाए, बस यही उनकी सबसे बड़ी डिग्री होगी। नियति का क्रूर खेल किसे पता होता है। एक दिन अचानक सतीश जी के पेट में तेज दर्द उठा। अस्पताल ले जाते-जाते पता चला कि उनकी दोनों किडनियां खराब हो चुकी हैं और संक्रमण पूरे शरीर में फैल चुका है। जब तक कोई कुछ समझ पाता या इलाज की व्यवस्था कर पाता, सतीश जी ने सुमित्रा और अपने दोनों मासूम बच्चों का साथ हमेशा के लिए छोड़ दिया।

उस वक्त मयंक केवल दस साल का था और तान्या सात साल की। सुमित्रा देवी की आंखों के आगे गहरा अंधेरा छा गया। पति के जाने के बाद रिश्तेदारों का रुख पलक झपकते ही बदल गया। जो लोग कल तक सतीश जी के अहसानों तले दबे रहते थे, वे अब इस बात की कानाफूसी करने लगे कि बेचारी अनपढ़ औरत अब इन दो बच्चों को भीख मांगने पर मजबूर कर देगी। जब घर में रखे थोड़े-बहुत पैसे दवाओं और श्राद्ध कर्म में खत्म हो गए और चूल्हे पर सूखी रोटियां भी नसीब होना मुश्किल होने लगीं, तब सुमित्रा की ममता ने अपने भीतर की सारी कमजोरी को जलाकर भस्म कर दिया। रोने और छाती पीटने का वक्त बीत चुका था; सामने दो भूखे मुंह थे जो अपनी मां की बेबस आंखों में उम्मीद तलाश रहे थे।

सतीश जी के निधन के बाद सरकार की अनुकंपा योजना के तहत परिवार के किसी एक सदस्य को नौकरी मिल सकती थी। मगर सुमित्रा की न्यूनतम योग्यता के कारण उन्हें कोई बाबू या क्लर्क का पद नहीं मिल सकता था। शिक्षा विभाग ने उन्हें उसी सरकारी स्कूल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी यानी चपरासी के पद पर नियुक्ति की पेशकश की, जहां उनके पति कभी सम्मान से ब्लैकबोर्ड पर गणित के सूत्र हल कराया करते थे। कुछ तथाकथित हितैषियों ने ताना मारा कि मास्टर जी की पत्नी होकर स्कूल में झाड़ू-पोंछा करोगी तो खानदान की क्या इज्जत रह जाएगी? सुमित्रा ने आंसुओं को पीते हुए दो टूक जवाब दिया कि अपने बच्चों का पेट पालने के लिए मेहनत की रोटी कमाना किसी इज्जत को नहीं गिराता, हाथ फैलाना जरूर गिरा देता है।

सुमित्रा देवी ने खाकी रंग की साड़ी पहनकर उसी स्कूल के गलियारों में झाड़ू लगाना, साहबों के कमरों में पानी पहुंचाना और घंटों घंटी बजाने का काम शुरू कर दिया। उनके पति की बनी बनाई प्रतिष्ठित छवि धीरे-धीरे लोगों की यादों से धुंधली हो गई और सुमित्रा केवल एक ‘चपरासिन बाई’ बनकर रह गईं। लेकिन सुमित्रा के मन में कभी कोई हीन भावना नहीं आई। उन्होंने हर सुबह चार बजे उठकर बच्चों के लिए टिफिन बनाना, घर का काम समेटना और फिर समय से स्कूल पहुंचकर पसीना बहाना अपनी नियति मान लिया। उनकी केवल एक ही ज़िद थी—मयंक और तान्या को शहर के सबसे अच्छे कॉलेज में पढ़ाना है ताकि उन्हें कभी किसी के आगे झुकना न पड़े।

साल बीतते गए और वक्त के पहिए ने बच्चों को बड़ा कर दिया। मयंक अब बी.कॉम फाइनल में था और तान्या ने शहर के प्रतिष्ठित डिग्री कॉलेज में बी.ए. प्रथम वर्ष में दाखिला ले लिया था। पर जैसे-जैसे बच्चे बड़े हो रहे थे, उनके भीतर अपनी मां के संघर्ष के प्रति कृतज्ञता की जगह एक अजीब सी शर्मिंदगी घर करने लगी थी। वे जब भी अपने दोस्तों को महंगी गाड़ियों में आते, उनके माता-पिता को फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते देखते, तो उन्हें अपनी साधारण, अनपढ़ और स्कूल में झाड़ू लगाने वाली मां से नफरत सी होने लगती।

सुमित्रा अपने बच्चों को लेकर हमेशा एक खौफ में जीती थीं। जिस दुनिया की कठोरता उन्होंने अकेले झेली थी, वह नहीं चाहती थीं कि उनके बच्चे किसी गलत रास्ते पर भटकें। मयंक लड़का था, इसलिए वह अक्सर दोस्तों के साथ देर रात तक बाहर रहता, तो सुमित्रा दिल पर पत्थर रखकर उसे थोड़ी छूट दे देती थीं कि लड़का है, दुनियादारी सीखेगा। लेकिन तान्या पर उनकी पाबंदियां बहुत सख्त थीं। तान्या बेहद सुंदर, चुलबुली और खुले मिजाज की लड़की थी। वह नए जमाने के तौर-तरीकों में ढलना चाहती थी। उसे कॉलेज के कैफे में बैठना, लड़कों के साथ गपशप करना और देर शाम तक मॉल में घूमना पसंद था।

जब भी तान्या शाम को सात बजे के बाद घर लौटती, सुमित्रा दरवाजे पर ही उसकी राह तकती मिलतीं।

“तान्या, इतनी देर कहां थी? कॉलेज तो चार बजे ही छूट जाता है ना?” सुमित्रा की आवाज में चिंता की थरथराहट होती।

“ओह मां! तुम हर वक्त पुलिस की तरह पूछताछ करना बंद करोगी? मैं कोई बच्ची नहीं हूं। अपने दोस्तों के साथ नोट्स ले रही थी,” तान्या झल्लाकर अपना बैग सोफे पर पटक देती।

“बेटी, जमाना बहुत खराब है। सीधे रास्ते पर चलने वाली लड़कियों को दुनिया जीने नहीं देती। तू अभी नादान है, बाहरी चमक-दमक के पीछे मत भाग। घर की मर्यादा का ध्यान रख,” सुमित्रा हाथ जोड़कर समझातीं।

“मर्यादा? कौन सी मर्यादा मां? तुम्हारी उस टूटी-फूटी झोपड़ी जैसी जिंदगी की मर्यादा? तुम क्या जानो आज की दुनिया कैसी है? अनपढ़ हो, स्कूल में झाड़ू लगाती हो, तुम्हारी सोच भी उसी झाड़ू के तिनकों जैसी बिखरी और गंदी है!”

तान्या के ये शब्द किसी जलते हुए अंगारे की तरह सुमित्रा के सीने पर गिरते। कई बार जब कॉलेज में फॉर्म भरते समय या किसी समारोह में अभिभावक का पेशा पूछा जाता, तो दोनों भाई-बहन ‘स्वर्गीय पिता शिक्षक थे’ लिखकर बात टाल देते, लेकिन कभी यह स्वीकार नहीं करते कि उनकी मां उसी व्यवस्था में चपरासी है। उन्हें अपनी मां के हाथों में पड़े छालों और चेहरे की झुर्रियों से घिन आती थी।

तान्या का ध्यान पढ़ाई से पूरी तरह भटक चुका था। वह कॉलेज के अमीर और लापरवाह लड़कों के एक समूह में शामिल हो गई थी। उनमें एक लड़का था रोहन, जो शहर के एक बड़े व्यापारी का बेटा था। रोहन की चिकनी-चुपड़ी बातों और महंगी कारों की सवारी ने तान्या की आंखों पर पर्दा डाल दिया था। वह परीक्षा की तैयारियों को छोड़कर रोहन और उसके दोस्तों के साथ पार्टियां करने लगी थी। जब प्रथम वर्ष की छमाही परीक्षा का परिणाम आया, तो तान्या तीन विषयों में अनुत्तीर्ण हो गई।

उस दिन घर में बड़ा बवंडर खड़ा हो गया। सुमित्रा के हाथ में जब रिजल्ट की प्रति आई, तो उनका कलेजा मुंह को आ गया। उन्होंने कांपते हाथों से तान्या के सामने कागज रखा, “ये क्या है तान्या? इसी दिन के लिए मैंने अपनी देह का कतरा-कतरा गलाया है? दिनभर स्कूल में अफसरों की डांट सुनती हूं, पसीना बहाती हूं ताकि तेरी कॉलेज की फीस भर सकूं, और तू यहां फेल होकर आ गई?”

तान्या अपनी गलती मानने के बजाय बिफर पड़ी। उसकी आवाज में ज़हर घुला हुआ था, “हां, हो गई फेल! और इसके जिम्मेदार तुम हो मां! तुमने हमें दिया ही क्या है? हर वक्त बंदिशें, यह मत पहनो, वहां मत जाओ, इससे बात मत करो! तुम्हारे इस दमघोंटू माहौल में कोई कैसे पढ़ सकता है? मेरे सारे दोस्त अपने माता-पिता के साथ विदेश घूमने जाते हैं, और मैं जब कॉलेज में किसी को बताती हूं कि मेरी मां चपरासी है, तो लोग पीठ पीछे हंसते हैं। तुमने हमारे लिए किया ही क्या है? हमारे सपनों का गला घोंटा है बस!”

सुमित्रा की आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। उन्होंने तान्या के कंधे को पकड़कर हिलाया, “तान्या, होश में आ बेटी! अगर मैं पढ़ी-लिखी होती तो आज स्कूल में झाड़ू न लगा रही होती। मेरे मां-बाप ने लड़की समझकर मुझे आगे नहीं पढ़ाया। तुम्हारे पिता ने मुझे सिखाना चाहा, पर मैंने लापरवाही की। जब जिंदगी के मैदान में अकेली खड़ी हुई, तब समझ आया कि कलम की ताकत क्या होती है! मैं नहीं चाहती कि कल को तू किसी के आगे हाथ फैलाए। आज तू मुझे कोस रही है, पर जिस दिन ठोकर लगेगी, उस दिन मेरी ये बातें याद आएंगी।”

“बस करो अपना यह पुराना भाषण! मुझे तुम्हारी किसी हमदर्दी की जरूरत नहीं है। अपनी यह छोटी सोच अपने तक ही रखो,” तान्या ने झटके से अपनी मां का हाथ झटक दिया और अपने कमरे का दरवाजा जोर से बंद कर लिया। मयंक भी अपनी बहन की तरफदारी करते हुए मां को ही ताना देकर बाहर निकल गया। उस रात सुमित्रा अपने आंचल में मुंह छिपाकर पूरी रात रोती रहीं। उन्होंने ईश्वर से केवल यही प्रार्थना की कि उनकी औलाद को सही राह दिखाए, भले ही बदले में उनकी जान क्यों न चली जाए।

कुछ महीने बीत गए। तान्या ने मां की हर हिदायत को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया था। रोहन और उसके अमीर दोस्तों ने तान्या को इंदौर के पास एक रिसॉर्ट में एक भव्य वीकेंड पार्टी में चलने का निमंत्रण दिया। तान्या जानती थी कि मां कभी इसकी इजाजत नहीं देगी। इसलिए उसने कॉलेज के एक प्रोजेक्ट और शैक्षणिक भ्रमण का झूठा बहाना बनाया। सुमित्रा का मन किसी अनहोनी की आशंका से कांप रहा था। उन्होंने तान्या से बहुत मिन्नतें कीं कि वह न जाए, लेकिन तान्या ने घर सिर पर उठा लिया और बदतमीजी की हदें पार करते हुए अपना बैग उठाकर चली गई।

रिसॉर्ट में रात की पार्टी शबाब पर थी। तेज संगीत, रंग-बिरंगी रोशनियां और शराब का दौर चल रहा था। तान्या शुरू में तो बहुत उत्साहित थी, लेकिन जैसे-जैसे रात गहराती गई, माहौल का रंग बदलने लगा। रोहन और उसके दोस्तों का व्यवहार अजीब और आक्रामक होने लगा। रोहन ने तान्या को एक कोल्ड ड्रिंक दी, जिसमें उसने कोई नशीला पदार्थ मिला रखा था। तान्या को चक्कर आने लगे और उसका सिर भारी होने लगा। जब उसने घर लौटने की ज़िद की, तो रोहन और उसके तीन साथियों ने रिसॉर्ट के एक कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया।

रोहन के चेहरे पर अब वह शराफत का नकाब नहीं था, बल्कि एक दरिंदे जैसी मुस्कान थी। “कहा जा रही हो तान्या? इतनी जल्दी क्या है? तुम जैसी चपरासी की बेटी को हमने अपनी गाड़ी में बिठाया, महंगे होटलों में खाना खिलाया, तो क्या सिर्फ तुम्हारी बातें सुनने के लिए? आज की रात तो तुम्हें हमारा कर्ज चुकाना पड़ेगा।”

तान्या के पैरों तले से जमीन खिसक गई। उसके कानों में अपनी मां के वे शब्द हथौड़े की तरह बजने लगे—’बाहरी चमक-दमक के पीछे मत भाग बेटी, जमाना बहुत क्रूर है।’ नशे और दहशत के बावजूद तान्या ने अपनी पूरी ताकत से रोहन को धक्का दिया और कमरे के कोने में रखी कांच की सुराही उठाकर जमीन पर दे मारी। शोर सुनकर बाहर का वेटर उधर देखने लगा। तान्या ने फुर्ती से दरवाजा खोला और अंधेरे में रिसॉर्ट के पिछले रास्ते से हाईवे की तरफ भागने लगी। उसके कपड़े फटे हुए थे, पैर में जूते नहीं थे और आंखों में सिर्फ मौत का खौफ तैर रहा था।

पीछे से रोहन की गाड़ी की तेज हेडलाइट्स सड़क पर चमक रही थीं। तान्या बदहवास होकर भागती रही और सड़क किनारे झाड़ियों में छिप गई। किसी तरह उसने अपनी जेब से फोन निकाला। उसने अपने भाई मयंक को फोन लगाया, लेकिन मयंक का फोन ‘नॉट रीचेबल’ आ रहा था। उसने अपने उन तथाकथित आधुनिक दोस्तों को फोन मिलाया, पर किसी ने फोन नहीं उठाया। अब उसके पास केवल एक ही नंबर बचा था—उस अनपढ़ मां का, जिसे उसने दो दिन पहले घर में जलील किया था।

थरथराते हाथों से तान्या ने मां का नंबर डायल किया। पहली ही घंटी पर फोन उठ गया।

“तान्या! तान्या तू ठीक है ना बेटी? मैं शाम से सो नहीं पाई, मेरा कलेजा कांप रहा है,” फोन उठाते ही सुमित्रा की रोती हुई आवाज गूंजी।

“मां… मां मुझे बचा लो! मैं मर जाऊंगी मां… ये लोग मुझे मार डालेंगे!” तान्या झाड़ियों में बैठकर सुबकते हुए चिल्लाई। उसने लड़खड़ाती जुबान में अपनी जगह बताई।

सुमित्रा ने एक पल भी नहीं गंवाया। न उसने तान्या को ताना मारा, न कोई सवाल पूछा। उसने उसी वक्त मोहल्ले के एक पुराने ऑटो वाले चाचा को जगाया, जो सतीश जी के पुराने परिचित थे। सुमित्रा रात के दो बजे, बिना किसी डर के, ग्वालियर से इंदौर वाले हाईवे की ओर निकल पड़ी। ममता के आगे रात का अंधेरा और सुनसान सड़क का सन्नाटा छोटा पड़ गया था।

करीब दो घंटे की मशक्कत और लगातार फोन पर लोकेशन पूछते हुए सुमित्रा आखिरकार उस पेट्रोल पंप के पास पहुंची जहां तान्या झाड़ियों में छिपी कांप रही थी। जैसे ही तान्या ने दूर से उस पुराने ऑटो को देखा और उसमें से अपनी मां को नंगे पैर दौड़ते हुए आते देखा, वह झाड़ियों से निकलकर मां के पैरों में गिर पड़ी।

“मां! मुझे माफ कर दो मां!” तान्या पागलों की तरह रो रही थी। उसका पूरा बदन खौफ से कांप रहा था।

सुमित्रा ने बिना एक शब्द कहे अपनी फटी हुई पुरानी सूती साड़ी का पल्लू खोला और तान्या के बदन को पूरी तरह ढक लिया। उन्होंने अपनी बेटी को अपने सीने से ऐसे भींच लिया मानो कोई शेरनी अपने घायल बच्चे को दुनिया के सारे शिकारियों से छुपा रही हो। सुमित्रा के आंसुओं ने तान्या के माथे की धूल धो दी।

“चुप हो जा मेरी बच्ची… जब तक तेरी मां जिंदा है, कोई तुझे छू भी नहीं सकता। घर चल मेरी गुड़िया।”

उस रात तान्या को समझ आया कि जिस मां के आंचल को वह अपनी तथाकथित प्रतिष्ठा के लिए छोटा समझती थी, वही आंचल दुनिया की सबसे बड़ी ढाल था। घर लौटने के बाद अगले दिन सुमित्रा ने थाने जाकर उस रसूखदार व्यापारी के बेटे के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की गुहार लगाई। पुलिस वालों ने शुरू में टालमटोल की, लेकिन सुमित्रा अपनी बेटी के सम्मान के लिए एक चट्टान बनकर खड़ी हो गई। उसने साफ कह दिया कि चाहे उसकी जान चली जाए, वह अपनी बेटी के गुनहगारों को सजा दिलाकर रहेगी। सुमित्रा के इस साहसी और अडिग रूप को देखकर मयंक की आंखें भी शर्म से झुक गईं। जिस मां को वह लाचार और कमजोर समझता था, वह अपनी संतान के लिए पूरे समाज से टकराने का हौसला रखती थी।

उस भयानक हादसे ने तान्या की आत्मा को झकझोर कर रख दिया था। उसके दिमाग से आधुनिकता का झूठा नशा हमेशा के लिए उतर चुका था। उसने अपनी पुरानी सारी गलत सोहबत छोड़ दी। उसने कॉलेज की पढ़ाई को अपना एकमात्र लक्ष्य बना लिया। अब जब भी वह सुमित्रा को सुबह-सुबह खाकी साड़ी पहनकर स्कूल के लिए निकलते देखती, तो उसकी आंखों में शर्म नहीं, बल्कि अगाध श्रद्धा के आंसू तैर जाते थे। तान्या ने दिन-रात एक कर दिया। वह सुबह जल्दी उठकर मां के साथ घर के काम में हाथ बंटाती और फिर देर रात तक पढ़ाई करती।

तीन साल बाद जब मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) का अंतिम परिणाम घोषित हुआ, तो पूरे ग्वालियर में एक ही खबर छाई हुई थी। शहर के एक साधारण से घर की लड़की तान्या ने पूरे राज्य में तीसरा स्थान हासिल कर डिप्टी कलेक्टर का पद प्राप्त किया था।

समारोह के दिन प्रशासनिक सेवा के बड़े-बड़े अधिकारी, पत्रकार और शहर के गणमान्य लोग हॉल में मौजूद थे। मंच पर तान्या को उसका नियुक्ति पत्र और स्मृति चिह्न दिया जाना था। माइक संभालते ही तान्या की नजरें सबसे पीछे की पंक्ति में बैठी अपनी मां सुमित्रा पर टिक गईं, जो आज भी वही साधारण सूती साड़ी पहने, अपनी रूखी हथेलियों को समेटे चुपचाप गर्व से अपनी बेटी को देख रही थीं।

तान्या ने माइक हाथ में लिया और भरी सभा में उसकी आवाज गूंज उठी, “आज यहां खड़े होकर हर कोई मेरी सफलता की तारीफ कर रहा है। लेकिन मैं आप सबको बताना चाहती हूं कि यह सफलता मेरी नहीं है। यह उस पसीने की जीत है जो मेरी मां ने पिछले बारह सालों से एक सरकारी स्कूल के गलियारों में झाड़ू लगाते हुए बहाया है। हां, मेरी मां एक चपरासी हैं! और मुझे यह कहते हुए गर्व महसूस हो रहा है कि जिस समाज ने उन्हें अनपढ़ कहकर नकारा, उसी अनपढ़ मां ने मुझे अफसर बनने के संस्कार दिए हैं। मैंने अपनी नासमझी में उन्हें बहुत दर्द दिए, उनकी गरिमा को ठेस पहुंचाई, लेकिन उन्होंने मुझे कभी टूटने नहीं दिया।”

हॉल में सन्नाटा छा गया। तान्या मंच से नीचे उतरी। वह सीधे अंतिम पंक्ति की ओर बढ़ी, अपनी मां के पास पहुंची और अपना वह चमचमाता मेडल और नियुक्ति पत्र सुमित्रा के फटे-बिवाइयों वाले पैरों में रख दिया। उसने झुककर अपनी मां के पैर पकड़ लिए और फफक पड़ी, “मां, यह पद, यह सम्मान सब तुम्हारा है। अगर तुम्हारे हाथ में वह झाड़ू न होती, तो आज मेरे हाथ में यह कलम कभी न होती।”

पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। बड़े-बड़े प्रशासनिक अफसर अपनी कुर्सियों से उठकर खड़े हो गए और उस साधारण सी चपरासिन मां के सम्मान में सिर झुका दिया। सुमित्रा ने अपनी बेटी को उठाकर गले से लगा लिया। आज उनकी आंखों में जो आंसू थे, वे किसी लाचारी के नहीं, बल्कि एक विजयी योद्धा के आत्मसम्मान के मोती थे।

दोस्तों, अक्सर युवा पीढ़ी अपने माता-पिता के साधारण रहन-सहन, उनके कम पढ़े-लिखे होने या उनके छोटे काम को देखकर हीन भावना का शिकार हो जाती है। हम भूल जाते हैं कि हमारे महंगे शौक और बड़ी डिग्रियां उन्हीं के फटे कपड़ों और अनथक पसीने की बुनियाद पर खड़ी हैं।

क्या आपको भी लगता है कि आज के आधुनिक दौर में बच्चे अपने माता-पिता के वास्तविक त्याग को समझने में देर कर देते हैं? क्या कभी आपने किसी ऐसे मां-बाप का संघर्ष करीब से देखा है? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर हमसे जरूर साझा करें।

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मूल लेखिका : पुष्पा ठाकुर

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