अदालत में जब मयंक के वकील ने नैना के चरित्र पर कीचड़ उछालने की कोशिश की, तो नैना विचलित नहीं हुई। उसने अपने मेडिकल रिपोर्ट्स और मयंक की सच्चाई के पुख्ता सबूत जज के सामने रखे। नैना की निडरता और सच्चाई के आगे मयंक के झूठ टिक नहीं सके। अदालत ने न केवल नैना के पक्ष में तलाक का फैसला सुनाया, बल्कि मयंक को भारी हर्जाना देने का भी आदेश दिया।
दिसंबर की कंपकंपाती शाम में जब दरवाजे की कुंडी जोर-जोर से खटखटाई गई, तो शालिनी ने हाथ की चाय की प्याली मेज पर रख दी। भोपाल की ठंडी हवाएं बरामदे में सरसरा रही थीं। शालिनी ने जैसे ही लकड़ी का भारी दरवाजा खोला, सामने खड़ी आकृति को देखकर उसके हाथ अपने आप कांप उठे। सामने उसकी छब्बीस वर्षीय बेटी नैना खड़ी थी। बिखरे हुए रूखे बाल, चेहरे पर सूजी हुई आंखें, फटी हुई शिफॉन की साड़ी का पल्लू और गाल पर नीले पड़े उंगलियों के निशान। पैरों में एक ही चप्पल थी और दूसरी शायद कहीं रास्ते की भागमभाग में छूट गई थी।
नैना… मेरी बच्ची! तू इस वक्त… और ये हालत कैसे हुई तेरी? ससुराल में सब कुशल तो है? ये चेहरे पर चोट के निशान कैसे हैं? क्या हुआ है नैना, बोल कुछ? शालिनी की ममता अपनी लाडली की यह दुर्दशा देखकर चीख उठी। उसने तुरंत अपनी बाहें फैला दीं।
नैना मां के सीने से लिपटकर फूट-फूटकर रोने लगी। उसकी सिसकियों से पूरा कमरा गूंज उठा। हिचकियों के बीच उसने लड़खड़ाती जुबान से कहा, मां… मुझे उस नरक में दोबारा नहीं जाना। वे इंसान नहीं, कसाई हैं मां। मेरी आत्मा तक छलनी कर दी उन्होंने। मैं अब उनके साथ एक पल भी नहीं रह सकती। मुझे बचा लो मां, मैं इस झूठे रिश्ते से आजाद होना चाहती हूं… मैं उनसे अलग होना चाहती हूं, मुझे तलाक चाहिए मां!
तलाक शब्द नैना के मुंह से निकलते ही बैठक के कोने में आरामकुर्सी पर बैठी कल्याणी देवी यानी नैना की दादी के हाथ से रुद्राक्ष की माला छूटकर गिर पड़ी। उनका चेहरा गुस्से और सदमे से लाल हो गया। वे अपनी छड़ी फर्श पर पटकते हुए आगे बढ़ीं और नैना की ओर उंगली उठाकर गरजने लगीं।
अरे कलमुंही! यह क्या अपशकुन बक रही है अपनी जुबान से! होश में तो है तू? ससुराल की दहलीज लांघकर रात के अंधेरे में मायके भाग आई, ऊपर से तलाक की बात करती है? शादी कोई बच्चों का गुड्डा-गुड़िया का खेल नहीं होती जो जब चाहा तोड़ दिया। चाहे ससुराल में कांटों की सेज मिले या अंगारे, बेटी का असली ठिकाना वहीं होता है। जैसा सास, ससुर और पति कहें, सिर झुकाकर सहना ही एक कुलवधू का धर्म होता है। हमारी पीढ़ियों में कभी किसी ने ऐसा कलंक नहीं देखा। तलाकशुदा औरत का तमगा लग गया तो पूरे खानदान की नाक कट जाएगी। रिश्तेदार और समाज हमारे मुंह पर थूकेंगे। तू तो बदनाम होगी ही, तेरी छोटी बहन का ब्याह भी कोई नहीं करेगा। जा, अपनी यह नौटंकी बंद कर और चुपचाप कल सुबह पहली बस से ससुराल लौट जा!
दादी के विषैले शब्द नैना के कलेजे में तीरों की तरह चुभ रहे थे। वह डरकर अपनी मां के आंचल में और सिमट गई।
तभी शालिनी की सहनशीलता का बांध टूट गया। उसने अपनी कांपती हुई बेटी को कसकर अपनी पीठ के पीछे किया और अपनी सास की आंखों में सीधी नजरें डालकर बोली, बस कीजिए मां जी! बहुत सुन लिया आपका समाज और आपकी परंपराएं। आप भी तो एक औरत हैं, फिर दूसरी औरत का यह दर्द, यह बहता हुआ खून आपको क्यों नजर नहीं आ रहा? बेटी अपनी जान बचाकर अपनी मां की चौखट पर आई है और आप उसका हाल पूछने, उसके आंसू पोंछने की बजाय उसे कुल और खानदान का डर दिखाकर उसी भट्टी में दोबारा झोंकना चाहती हैं? जिस्म पर लगे घाव तो वक्त के साथ भर जाते हैं मां जी, लेकिन अपनों की जुबान से दिए गए ये घाव जिंदगी भर रिसते रहते हैं। जब तक मैं जिंदा हूं, अपनी बेटी को घुट-घुटकर मरने के लिए उस नरक में कभी वापस नहीं भेजूंगी।
कल्याणी देवी शालिनी के इस बदले हुए तेवर से तिलमिला गईं। उन्होंने मुंह बिचकाते हुए कहा, ठीक है, बहुत लाड़ चढ़ा रखा है तूने अपनी बेटी का। मैं तो इस घर की पराई हूं ना! भुगतना तुम दोनों ही जब बिरादरी से हुक्का-पानी बंद होगा। मुझे क्या लेना-देना, मैं तो बैठकर तमाशा देखूंगी। इतना कहकर वे अपने कमरे का दरवाजा जोर से पटकते हुए अंदर चली गईं।
शालिनी ने नैना को सहारा देकर सोफे पर बैठाया। रसोई से गुनगुना पानी और हल्दी वाला दूध लाकर उसके सामने रखा। उसने एक गीले कपड़े से नैना के चेहरे पर जमे खून के कतरे और आंसू साफ किए। नैना का शरीर अभी भी कांप रहा था।
शालिनी ने नैना के सिर पर हाथ फेरते हुए बेहद कोमलता से कहा, नैना, मेरी गुड़िया, डर मत। तेरी मां तेरे साथ खड़ी है। मुझे सच-सच बता, उस घर में तेरे साथ क्या हुआ? मयंक और उसके घरवालों ने तेरे साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार क्यों किया? आखिर क्या वजह है?
नैना ने दूध का घूंट भरा और शून्य में ताकते हुए अपनी आपबीती सुनाने लगी।
मां, शादी के पहले ही दिन से मयंक का बर्ताव मेरे प्रति बिल्कुल अजनबी जैसा था। उन्होंने यह शादी अपनी मर्जी से नहीं, बल्कि अपने माता-पिता के जायदाद के दबाव और समाज के दिखावे के लिए की थी। सुहागरात को मैं कमरे में सजी-धजी बैठी रही, लेकिन वे पूरी रात घर ही नहीं आए। सुबह जब वे लौटे तो उनके चेहरे पर मेरे लिए सिर्फ नफरत थी। जब भी मैं उनसे बात करने या उनके करीब जाने की कोशिश करती, वे झिड़क कर दूर हट जाते। कई हफ्तों तक यही सिलसिला चलता रहा।
नैना की आंखों से आंसुओं की धार फिर बह निकली। उसने आगे कहा, जब एक दिन मैंने हिम्मत जुटाकर पूछा कि आप मुझसे बात क्यों नहीं करते, हर रात देर से क्यों लौटते हैं, तो वे आगबबूला हो गए। उन्होंने मुझे दीवार की तरफ धकेल दिया और चिल्लाकर बोले कि तुम सिर्फ दुनिया को दिखाने के लिए लाई गई एक नौकरानी हो। मुझे तुम में कोई दिलचस्पी नहीं है। मेरी जिंदगी में किसी और के लिए जगह है और यह बात अगर तुमने अपने मायके में किसी को बताई तो तुम्हारी लाश भी वहां नहीं पहुंचेगी।
मां, उस दिन के बाद से उनके जुल्म बढ़ते चले गए। सास-ससुर को जब पता चला कि मैं सच जान चुकी हूं, तो उन्होंने भी मेरा साथ देने की बजाय मयंक का ही पक्ष लिया। वे कहते कि औरत का काम सिर्फ घर संभालना और पति की हर बात सहना है। रोज रात को मयंक शराब पीकर आते और छोटी-छोटी बातों पर मुझ पर हाथ उठाते। कल शाम जब मयंक के फोन पर किसी अनजान लड़की का मैसेज आया और मैंने सिर्फ इतना पूछा कि यह कौन है, तो उन्होंने मुझे लातों और घूंसों से पीटा। सास-ससुर खड़े होकर देखते रहे और ताने देते रहे कि इसका दिमाग खराब हो गया है। आज जब वे सब किसी रिश्तेदार के यहां गए थे, तो मुझे मौका मिला और मैं अपनी जान बचाकर रेलवे स्टेशन की तरफ भागी और इंदौर जाने वाली ट्रेन पकड़कर सीधे यहां आ गई। मां, अगर मैं वहां एक दिन और रुकती तो वे मुझे जान से मार डालते।
नैना की बात सुनकर शालिनी का कलेजा कांप उठा। उसने अपनी बेटी को गले से लगा लिया। उसी वक्त नैना के पिता हरिशंकर भी अपनी दुकान बंद करके घर लौटे। घर का माहौल और नैना की हालत देखकर वे सन्न रह गए। जब शालिनी ने उन्हें पूरी बात बताई, तो हरिशंकर की आंखें भी नम हो गईं, लेकिन उनके चेहरे पर एक गहरा संकल्प उभर आया।
कल्याणी देवी ने कमरे से बाहर आकर फिर से वही राग अलापना शुरू किया कि दामाद जी से बात करो, पैर पकड़ो, माफी मांगो और नैना को वापस भेजो। लेकिन इस बार हरिशंकर ने अपनी मां के आगे हाथ जोड़ लिए और दृढ़ स्वर में कहा, अम्मा, यह मेरी औलाद है, कोई बेजान गुड़िया नहीं जिसे मैं किसी कसाई के खूंटे से बांध आऊं। अगर समाज एक सताई हुई बेटी के साथ खड़े होने पर मुझसे मुंह मोड़ता है, तो मुझे ऐसा समाज कतई मंजूर नहीं। मेरी बेटी अब उस घर में कभी कदम नहीं रखेगी।
अगली सुबह, मयंक और उसके पिता अपनी गाड़ियों के साथ भोपाल आ धमके। उनके चेहरे पर कोई पछतावा नहीं था, बल्कि अहंकार साफ झलक रहा था। मयंक ने बैठक में बैठते ही रौबदार आवाज में कहा, नैना बिना बताए घर से भाग आई है। हमारे खानदान की इज्जत मिट्टी में मिला दी इसने। चुपचाप इसे हमारे साथ भेजिए, वरना अंजाम अच्छा नहीं होगा।
कल्याणी देवी तुरंत आगे बढ़कर दामाद की आवभगत करने लगीं, लेकिन शालिनी और हरिशंकर अपनी बेटी के आगे ढाल बनकर खड़े हो गए।
शालिनी ने मयंक की आंखों में आंखें डालकर कहा, किस इज्जत की बात कर रहे हो मयंक? वह इज्जत जो तुमने अपनी पत्नी के जिस्म पर ये नीले निशान बनाकर उधेड़ी है? तुमने शादी का पवित्र बंधन नहीं, बल्कि एक घिनौना षड्यंत्र रचा था। मेरी बेटी तुम्हारे घर की नौकरानी या पंचिंग बैग नहीं है। तुम लोग अभी इसी वक्त मेरे घर से निकल जाओ, वरना पुलिस की गाड़ी तुम्हारे दरवाजे पर खड़ी होगी।
मयंक के पिता ने अकड़ दिखाते हुए कहा, पुलिस की धमकी हमें मत दो। अगर नैना हमारे साथ नहीं चली, तो हम इसे कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ेंगे। कोर्ट-कचहरी के चक्कर में इसकी जवानी सड़ जाएगी और समाज इसे जीने नहीं देगा।
तभी कमरे का पर्दा हटाकर नैना बाहर आई। इस बार उसकी आंखों में आंसू नहीं थे, बल्कि एक असाधारण चमक और आत्मविश्वास था। उसने अपनी कलाई की कांच की लाल चूड़ियां उतारीं और मयंक के कदमों के आगे फर्श पर फेंक दीं। खनक के साथ वे चूड़ियां चकनाचूर हो गईं।
नैना ने बुलंद आवाज में कहा, मयंक, तुम्हारे जुल्मों का डर अब मेरे मन से खत्म हो चुका है। जिस समाज का डर दिखाकर तुम मुझे घुटने पर लाना चाहते हो, वह समाज मुझे सांस लेने की इजाजत नहीं देता। तुमने मुझे तोड़ा, लेकिन अब मैं खुद को समेटना जानती हूं। मुझे तुम्हारी झूठी छत और खोखले रिश्ते की कोई जरूरत नहीं। हम अब सीधे अदालत में मिलेंगे।
मयंक और उसके पिता नैना के इस रूप को देखकर हक्के-बक्के रह गए। उन्हें उम्मीद थी कि नैना हमेशा की तरह रोएगी और गिड़गिड़ाएगी। जब उन्होंने देखा कि पूरा परिवार एक चट्टान की तरह नैना के पीछे खड़ा है, तो वे बड़बड़ाते और धमकियां देते हुए उल्टे पांव लौट गए।
उस दिन के बाद का सफर नैना और उसके परिवार के लिए आसान नहीं था। रिश्तेदारों के फोन आने लगे, पड़ोसियों की कानाफूसी शुरू हो गई और कल्याणी देवी के ताने भी जारी रहे। लेकिन शालिनी और हरिशंकर अपनी बेटी के पीछे चट्टान बनकर खड़े रहे।
नैना ने हार नहीं मानी। उसने शादी से पहले अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर किया था। उसने अपनी पुरानी किताबों की धूल झाड़ी और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में दिन-रात एक कर दिया। साथ ही, उसने शहर के एक जाने-माने वकील की मदद से घरेलू हिंसा और तलाक का मुकदमा दर्ज कराया।
अदालत में जब मयंक के वकील ने नैना के चरित्र पर कीचड़ उछालने की कोशिश की, तो नैना विचलित नहीं हुई। उसने अपने मेडिकल रिपोर्ट्स और मयंक की सच्चाई के पुख्ता सबूत जज के सामने रखे। नैना की निडरता और सच्चाई के आगे मयंक के झूठ टिक नहीं सके। अदालत ने न केवल नैना के पक्ष में तलाक का फैसला सुनाया, बल्कि मयंक को भारी हर्जाना देने का भी आदेश दिया।
दो साल की कड़ी मेहनत और संघर्ष के बाद, नैना ने राज्य प्रशासनिक सेवा की परीक्षा उत्कृष्ट अंकों के साथ उत्तीर्ण कर ली। जिस दिन उसके चयन का पत्र आया, पूरे मोहल्ले में सन्नाटा खिंच गया जो कभी उसके नाम पर फुसफुसाता था। वही रिश्तेदार जो कल तक मुंह फेर रहे थे, आज बधाई देने के लिए कतार में खड़े थे। दादी कल्याणी देवी ने भी भर आई आंखों से अपनी पोती के सिर पर हाथ रखकर अपनी पुरानी सोच के लिए माफी मांगी।
नैना अब एक स्वतंत्र, स्वाभिमानी और सशक्त महिला बन चुकी थी। उसने साबित कर दिया था कि एक गलत शादी किसी स्त्री के जीवन का अंत नहीं होती, बल्कि अगर आत्मसम्मान और परिवार का साथ हो, तो वह एक नई और शानदार शुरुआत की दहलीज बन सकती है।
अगर आपके सामने कोई ऐसी स्थिति आए जहां किसी बेटी का आत्मसम्मान और समाज का डर आमने-सामने हों, तो एक परिवार को किसका साथ देना चाहिए—बेटी की जिंदगी का या समाज की झूठी प्रतिष्ठा का? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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