स्वाभिमान की दहलीज

 पति की यह प्रतिक्रिया अनघा के सीने में तीर की तरह चुभी। वह समझ गई कि पुरुष प्रधान व्यवस्था में अंधभक्ति की पट्टी इतनी मोटी होती है कि अपनों का दर्द भी दिखाई नहीं देता। अब वह बिल्कुल अकेली थी। एक तरफ उसका अपना स्वाभिमान था और दूसरी तरफ वह परिवार था जो एक पाखंडी के कदमों में नतमस्तक था। अनघा ने फैसला किया कि वह विदुषी की तरह घुट-घुट कर नहीं जिएगी। किसी भी रिश्ते या मान-मर्यादा की कीमत अपनी अस्मिता और आत्मसम्मान को गिरवी रखकर नहीं चुकाई जा सकती। उसने ठान लिया कि वह सही वक्त का इंतजार करेगी और इस पाखंड का मुखौटा सबके सामने उतारेगी।

  पति मयंक एक सीधे-सादे और परिवार के प्रति समर्पित स्वभाव के इंसान थे। अनघा खुद भी एक पढ़ी-लिखी, सुलझे विचारों वाली और आत्मसम्मान को सर्वोपरि मानने वाली युवती थी। घर में ससुर विशंभर जी, सास जानकी देवी और जेठानी विदुषी भाभी के साथ पूरा भरा-पूरा परिवार था। शादी के शुरुआती दिनों में सब कुछ किसी खूबसूरत सपने जैसा लग रहा था। सुबह की चाय से लेकर रात के भोजन तक घर में एक अजीब सा अनुशासन दिखता था, जिसे सभी सदस्य बिना किसी सवाल के स्वीकार करते थे।

लेकिन अनघा को धीरे-धीरे एहसास होने लगा कि इस घर की बागडोर सास-ससुर या उसके पति के हाथ में नहीं, बल्कि किसी और के इशारों पर घूमती है। वह शख्स थे परिवार के सबसे बड़े दामाद, यशवंत जी। यशवंत शहर के एक बड़े सरकारी ठेकेदार थे और पैसे व रसूख के मामले में उनका हाथ काफी ऊपर था। बड़ी बेटी सुहासिनी के पति होने के नाते वे घर के सबसे बड़े दामाद थे, मगर ससुराल में उनका ओहदा किसी राजा से कम नहीं था। घर में कौन सा त्यौहार कैसे मनेगा, कौन सी गाड़ी खरीदी जाएगी, जमीन-जायदाद के फैसलों से लेकर रसोई के मेनू तक, हर बात में यशवंत जी की मंजूरी पहली शर्त होती थी।

ससुर विशंभर जी तो उनके सामने हाथ बांधे खड़े रहते थे। सास जानकी देवी हर वक्त इसी फिक्र में घुली रहती थीं कि दामाद जी को किसी बात का बुरा न लग जाए, वरना बड़ी बेटी का घर बिगड़ जाएगा। परिवार की दो छोटी बेटियां, रोहिणी और शालिनी, भी विवाहित थीं, लेकिन जब भी वे अपने पतियों के साथ मायके आतीं, तो उन्हें वह तवज्जो कभी नहीं मिलती थी जो यशवंत जी को मिलती थी। रोहिणी और शालिनी के पति भले ही कितने भी शालीन और समझदार क्यों न हों, मगर यशवंत जी की चमक के आगे वे हमेशा पृष्ठभूमि में धकेल दिए जाते थे। इस बात की टीस उन दोनों बहनों के दिलों में हमेशा सुलगती रहती थी, पर पिता के डर से वे भी मौन रहती थीं।

मयंक और उनके बड़े भाई पंकज तो अपने इस बड़े जीजाजी को साक्षात देवतुल्य मानते थे। यशवंत जी जब भी अपने बच्चों और पत्नी के साथ आते, पूरे घर में अफरा-तफरी मच जाती थी। उनकी पसंद का नाश्ता, उनके आराम के लिए विशेष कमरे की सजावट, और उनकी हर बेतुकी बात पर परिजनों का ठहाके लगाना—यह सब अनघा के लिए बिल्कुल नया और असहज करने वाला था।

शादी के तीसरे महीने जब यशवंत जी का परिवार एक हफ्ते के लिए ससुराल आया, तब अनघा को उस काले सच की पहली आहट मिली जिसे देखकर उसकी रूह कांप गई। एक दोपहर जब अनघा रसोई में सबके लिए इलायची वाली चाय बना रही थी, यशवंत जी अचानक वहां आ पहुंचे। रसोई में उस वक्त कोई नहीं था। यशवंत जी ने पानी पीने का बहाना किया और अनघा के बिल्कुल करीब आकर खड़े हो गए। जब अनघा ने उन्हें पानी का गिलास पकड़ाया, तो उन्होंने जानबूझकर अपनी उंगलियां अनघा की हथेली पर काफी देर तक रगड़ीं और एक अजीब सी मुस्कान के साथ उसकी आंखों में झांका।

अनघा बिजली के झटके की तरह पीछे हट गई। उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसने सोचा शायद यह अनजाने में हुआ होगा, लेकिन एक औरत की छठी इंद्री कभी गलत नहीं होती। वह स्पर्श कोई सामान्य या अनजाने में हुआ स्पर्श नहीं था, बल्कि उसमें एक घिनौनी वासना और अधिकार की बू आ रही थी। अनघा ने तुरंत रसोई छोड़ दी।

अगले कुछ दिनों में यह सिलसिला बढ़ने लगा। कभी भोजन की थाली परोसते समय यशवंत जी का अनघा की कमर को छूना, कभी सीढ़ियों से गुजरते हुए उसके पल्लू को खींचने के बहाने उसके कंधे पर हाथ रख देना, तो कभी सबके सामने ही मज़ाक के लहजे में उसके सिर पर हाथ फेरते हुए उसकी गर्दन तक उंगलियां ले जाना। यशवंत जी यह सब इतनी सफाई और धूर्तता से करते थे कि बाहर से देखने वाले को लगता कि बड़ा जीजा अपनी नई छोटी साली-जैसी बहू से स्नेह जता रहा है। मगर अनघा उस स्पर्श के पीछे छुपे भेड़ियानुमा इरादे को अच्छी तरह भांप रही थी।

अनघा ने जब अपनी जेठानी विदुषी पर गौर किया, तो उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। विदुषी का चेहरा हमेशा उतरा रहता था। जब भी यशवंत जी कमरे में आते, विदुषी अपने आंचल को समेटकर सहम जाती थी और नजरें झुका लेती थी। अनघा ने देखा कि एक शाम जब विदुषी हॉल में फल काट रही थी, तो यशवंत जी ने उनके कंधे को दबाते हुए कहा था, “भाभी जी, बड़ी मेहनत करती हैं आप।” विदुषी के चेहरे पर उस वक्त छाई लाचारी और अपमान का भाव अनघा से छुपा नहीं रहा। विदुषी ने सिर्फ अपनी आंखें बंद कर ली थीं और चुपचाप वहां से हट गई थीं। अनघा समझ गई कि इस घर की बड़ी बहू पिछले कई सालों से इस घिनौने दंश को चुपचाप सहती आ रही है, सिर्फ खानदान की इज्जत और बड़ों के मान के नाम पर।

अनघा अंदर ही अंदर घुटने लगी। उसने एक रात अपने पति मयंक से दबी जुबान में बात करने की कोशिश की। उसने कहा, “मयंक, मुझे जीजाजी का इस तरह पास आना और बात-बात पर छूना बिल्कुल ठीक नहीं लगता। उनका व्यवहार सामान्य नहीं है।”

मयंक तुरंत भड़क गए। उन्होंने अनघा को बीच में ही टोकते हुए कहा, “पागल हो गई हो क्या अनघा? जीजाजी हमारे घर के सबसे सम्मानित इंसान हैं। उन्होंने हमारे पूरे परिवार को संभाला हुआ है। वे बड़े हैं, बुजुर्गों समान हैं, उनका दिल साफ है और वे तुम्हें अपनी छोटी बहन जैसा मानते हैं। अपने दिमाग से यह गंदे विचार निकाल दो। अगर पिताजी या मांजी ने यह सुन लिया, तो घर में भूचाल आ जाएगा। खबरदार जो कभी उनके बारे में ऐसी बात सोची भी!”

पति की यह प्रतिक्रिया अनघा के सीने में तीर की तरह चुभी। वह समझ गई कि पुरुष प्रधान व्यवस्था में अंधभक्ति की पट्टी इतनी मोटी होती है कि अपनों का दर्द भी दिखाई नहीं देता। अब वह बिल्कुल अकेली थी। एक तरफ उसका अपना स्वाभिमान था और दूसरी तरफ वह परिवार था जो एक पाखंडी के कदमों में नतमस्तक था। अनघा ने फैसला किया कि वह विदुषी की तरह घुट-घुट कर नहीं जिएगी। किसी भी रिश्ते या मान-मर्यादा की कीमत अपनी अस्मिता और आत्मसम्मान को गिरवी रखकर नहीं चुकाई जा सकती। उसने ठान लिया कि वह सही वक्त का इंतजार करेगी और इस पाखंड का मुखौटा सबके सामने उतारेगी।

अवसर जल्द ही सामने आ गया। अनघा के ससुर विशंभर जी की शादी की पैंतीसवीं सालगिरह का दिन था। घर में पूजा-पाठ के बाद शाम को रिश्तेदारों का जमघट लगा था। संगीत बज रहा था, सब लोग खुश थे। यशवंत जी हमेशा की तरह महफिल के केंद्र में थे। वे सोफे पर शान से बैठे थे और विशंभर जी समेत मयंक और पंकज उनकी हर बात पर जी-हजूरी कर रहे थे। दोनों छोटी बहनें अपने पतियों के साथ एक कोने में बैठी थीं।

रात के खाने का समय हुआ। बड़ा सा डाइनिंग टेबल सजाया गया था। सभी पुरुष और बड़े बुजुर्ग टेबल के आसपास बैठे थे। अनघा और विदुषी खाना परोस रही थीं। यशवंत जी की प्लेट में अनघा ने पुलाव परोसा। यशवंत जी ने माहौल का फायदा उठाने की सोची। सब लोग अपनी-अपनी बातचीत में व्यस्त थे, हंसी-मजाक चल रहा था।

जैसे ही अनघा कटोरी में दाल रखने के लिए आगे झुकी, यशवंत जी ने बड़ी धृष्टता के साथ टेबल के नीचे से अपना हाथ बढ़ाया और अनघा की कमर को कसकर पकड़ते हुए अपनी उंगलियों से नोच लिया। उनका यह दुस्साहस अब सारी सीमाएं लांघ चुका था। उन्हें लगा कि हर बार की तरह अनघा डर जाएगी, नजरें नीची कर लेगी और बदनामी के डर से चुपचाप वहां से चली जाएगी।

मगर इस बार उनका पाला किसी सहमी हुई अबला से नहीं, बल्कि अपने आत्मसम्मान के लिए दहकती हुई अंगार से पड़ा था।

अनघा ने एक पल की भी देरी नहीं की। उसने अपने हाथ में पकड़ी हुई कटोरी को जोर से टेबल पर पटका। दाल छलक कर टेबल और यशवंत जी के कुर्ते पर जा गिरी। पूरा कमरा सन्नाटे में डूब गया।

इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, अनघा ने पूरी ताकत और कड़क आवाज में कहा, “अपनी घिनौनी उंगलियां पीछे खींचिए यशवंत जी! यह हाथ जो आप बार-बार मर्यादा की सीमा लांघकर मेरे बदन पर फेरते हैं, इसे अपनी हद में रखना सीखिए!”

कमरे में मानो सन्नाटा जम गया। पंखे की सरसराहट तक सुनाई देने लगी। सबके मुंह खुले के खुले रह गए। मयंक हड़बड़ाकर खड़ा हो गया, “अनघा! यह तुम क्या बकवास कर रही हो? होश में तो हो?”

“मैं पूरी तरह होश में हूं मयंक!” अनघा की आवाज में गजब का ठहराव और बिजली जैसी चमक थी। उसकी आंखों में आंसू नहीं, बल्कि सत्य का अखंड तेज था। उसने अपनी उंगली सीधे यशवंत जी की तरफ तान दी, जिनका चेहरा शर्म और डर से फक पड़ चुका था।

अनघा ने सबके सामने गरजते हुए कहा, “पिछले कई हफ्तों से यह इंसान दामाद होने का और बड़ा होने का ढोंग करके मुझे जब-तब गलत तरीके से छूने की कोशिश कर रहा है। कभी रसोई में, कभी सीढ़ियों पर, और आज तो भरी महफिल में टेबल के नीचे इन्होंने मुझे नोचने की हिम्मत की! क्या यही आपकी खानदानी इज्जत है? क्या यही बड़ा दामाद होने का रुतबा है कि घर की बहुओं को अपनी जागीर समझ लिया जाए?”

विशंभर जी कांपती आवाज में बोले, “बहू… होश में बोलो… दामाद जी हमारे घर की पगड़ी हैं…”

“पगड़ी सिर पर अच्छी लगती है बाबूजी, पैरों में नहीं और किसी की छाती पर चढ़कर तो बिल्कुल नहीं!” अनघा ने दृढ़ता से जवाब दिया। “जो इंसान घर की बहुओं की अस्मिता का सम्मान नहीं कर सकता, वह किसी सम्मान का हकदार नहीं है। आज तक आप सबने अपनी बेटियों के घर बसने के नाम पर इस आदमी के अहंकार को पाला-पोसा है, जिससे इसका हौसला इतना बढ़ गया कि यह खुलेआम बदतमीजी पर उतर आया।”

यशवंत जी ने हकलाते हुए संभलने की कोशिश की, “बाबूजी… यह झूठ बोल रही है… यह मुझ पर लांछन लगा रही है… मैं तो बस…”

“बस बहुत हुआ यशवंत जी!” अचानक एक कांपती हुई मगर मजबूत आवाज गूंजी।

सबने मुड़कर देखा। यह आवाज विदुषी भाभी की थी। आज तक सिर झुकाकर चलने वाली, सिसकियों को अपने आंचल में दबाने वाली विदुषी आगे आई। उसकी आंखों में बरसों से जमा आंसुओं का सैलाब था, पर अब उनमें डर नहीं था।

विदुषी ने ससुर विशंभर जी और सास जानकी देवी की तरफ देखा और रोते हुए कहा, “अनघा सच कह रही है बाबूजी। बिल्कुल सच कह रही है। पिछले पांच सालों से जब भी यह इंसान इस घर में आता है, मेरी सांसें सूख जाती हैं। इन्होंने कितनी बार मेरे साथ भी यही घिनौनी हरकतें की हैं, यह मैं ही जानती हूं। मैंने सिर्फ इसलिए मुंह बंद रखा कि कहीं मेरी वजह से इस घर की शांति न छिन जाए, कहीं दीदी का घर न टूट जाए। मगर आज अनघा की हिम्मत देखकर मुझे अपनी कायरता पर शर्म आ रही है। अगर आज भी हम चुप रहे, तो इस घर में कोई भी बहू या बेटी सुरक्षित नहीं रहेगी।”

विदुषी की बात सुनते ही पूरे हॉल में जैसे वज्रपात हो गया। सास जानकी देवी ने अपने सीने पर हाथ रख लिया। मयंक और पंकज के पैरों तले से जमीन खिसक गई। जिस इंसान को वे अपना आदर्श मानते थे, वह भीतर से कितना घिनौना और पतित निकला, यह सच्चाई उनके सामने नंगी हो चुकी थी। मयंक की आंखें शर्म से झुक गईं। उसे याद आया कि कैसे उसने अपनी पत्नी की सच्ची शिकायत को बकवास कहकर खारिज कर दिया था।

सुहासिनी दीदी, जो अब तक अपने पति के रसूख पर इतराती थीं, सन्न रह गईं। उन्होंने जब अपने पति का झुका हुआ, अपराधी चेहरा देखा, तो उनका सारा भ्रम चकनाचूर हो गया। उन्होंने आगे बढ़कर यशवंत से कहा, “तुम इतने गिरे हुए इंसान हो? मुझे ससुराल में सिर उठाकर जीने लायक नहीं छोड़ा तुमने!”

ससुर विशंभर जी का सिर लज्जा से झुक गया। उन्होंने आगे बढ़कर यशवंत की तरफ देखा और बेहद भारी मन से कहा, “यशवंत, हमने तुम्हें दामाद नहीं, अपने सिर का ताज माना था। मगर तुमने हमारी ही बेटियों और बहुओं की इज्जत पर हाथ डाला। इस घर के दरवाजे तुम्हारे लिए आज और इसी वक्त हमेशा के लिए बंद होते हैं। निकल जाओ यहां से!”

यशवंत जी बिना एक शब्द कहे, अपमान का घूंट पीकर सिर झुकाए उल्टे पैरों घर से बाहर निकल गए। घर का माहौल गमगीन था, मगर उसमें एक अजीब सी शुद्धता और हल्कापन घुल चुका था, जैसे किसी पुराने सड़े हुए जख्म की सफाई हो गई हो।

उस रात के बाद घर की आबोहवा पूरी तरह बदल गई। मयंक अनघा के पास आए, उनकी आंखों में पश्चाताप के आंसू थे। उन्होंने अनघा के हाथ थामे और कहा, “मुझे माफ कर दो अनघा। मैंने तुम्हारी बात पर भरोसा न करके बहुत बड़ा पाप किया। आज तुम्हारी हिम्मत ने इस पूरे घर को एक भयानक दलदल से बाहर निकाल लिया।”

विदुषी ने अनघा को गले से लगा लिया और फफक कर रो पड़ीं, “अनघा, अगर आज तू अपनी आवाज नहीं उठाती, तो मैं शायद अपनी पूरी जिंदगी इस घुटन में ही गुजार देती। तूने मुझे सिखाया कि अन्याय सहना भी अन्याय करने जितना ही बड़ा अपराध है।”

सास जानकी देवी और ससुर विशंभर जी ने दोनों बहुओं के सिर पर हाथ रखा और माना कि परिवार की असली इज्जत झूठे मान-सम्मान के खोखले दिखावे में नहीं, बल्कि घर की स्त्रियों के सम्मान और उनकी सुरक्षा में होती है। दोनों छोटी बहनों के पतियों को भी अब वह उचित मान-सम्मान मिलने लगा जिसके वे हकदार थे।

अनघा की एक आवाज ने पूरे परिवार की सोच की दिशा बदल दी थी। उस घर की दहलीज अब किसी झूठी मर्यादा की बंदी नहीं थी, बल्कि आत्मसम्मान और सच की मजबूत नींव पर खड़ी थी।

क्या परिवारों में दामाद या रसूखदार रिश्तेदारों के डर से स्त्रियों को अपनी गरिमा से समझौता करना चाहिए? आपकी नज़र में अनघा का यह कदम परिवार के हित में कितना सही था? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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 मूल लेखिका : रीता मक्कड़

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