साँझ का सवेरा

 मयंक ने सीधे स्वाति की आँखों में देखते हुए कहा, “स्वाति, मुझे आज तुम दोनों की सोच पर बहुत तरस आ रहा है। तुम पूछ रही हो कि इसमें गलत क्या है? मैं तुमसे पूछता हूँ कि इसमें गलत क्या था? मम्मी और पापा केवल इस घर के बुजुर्ग नहीं हैं, वे पति-पत्नी हैं! क्या शादी का मतलब सिर्फ यह होता है कि जब तक बच्चे छोटे हैं तब तक साथ रहो और जब बच्चे बड़े हो जाएं तो अपनी सारी भावनाएं, अपनी खुशियाँ और अपना अस्तित्व एक कोने में फेंक दो?”

  बहत्तर साल के आनंद जी और अड़सठ साल की उनकी जीवनसंगिनी देवकी जी इस घर की मजबूत नींव थे। उनके दो बेटे थे—बड़ा बेटा मयंक, जो एक प्रतिष्ठित ऑटोमोबाइल कंपनी में सीनियर इंजीनियर था, और छोटा बेटा नमन, जो अपना आर्किटेक्चर का काम संभालता था।

घर में दोनों बेटों की बहुएं भी थीं। मयंक की पत्नी स्वाति, जो स्वभाव से थोड़ी तेज-तर्रार, बात-बात पर दूसरों के तौर-तरीकों को तौलने वाली और खुद को आधुनिक विचारों की मानने वाली महिला थी। वहीं नमन की पत्नी पल्लवी थोड़ी शांत जरूर थी, पर जेठानी की हर हाँ में हाँ मिलाने में कभी पीछे नहीं रहती थी। घर में दोनों के दो-दो बच्चे भी थे, जिनमें से मयंक की बड़ी बेटी अब कॉलेज के अंतिम वर्ष में पहुँच चुकी थी। कुल मिलाकर घर में भरा-पूरा संसार था।

लेकिन उस दिन सुबह का माहौल कुछ अलग ही था। दालान में खड़े होकर देवकी जी अपने बाल सँवार रही थीं। उनके चेहरे पर एक हल्की सी चमक थी, जैसे कई दशकों पुरानी कोई दबी हुई उमंग अचानक बाहर निकल आई हो। देवकी जी ने अलमारी से अपना पुराना पर्स निकाला और बाहर जाने की तैयारी करने लगीं।

तभी बैठक के सोफे पर बैठकर चाय की चुस्कियाँ ले रही स्वाति की नजर अपनी सास पर पड़ी। स्वाति ने अपनी भवें सिकोड़ते हुए पल्लवी की तरफ देखा और धीमी आवाज़ में फुसफुसाई, “ज़रा देखो तो पल्लवी, सुबह-सुबह सासू माँ कहाँ की तैयारी कर रही हैं? चाल-ढाल तो देखो, जैसे कॉलेज की कोई नई-नवेली लड़की हो!”

पल्लवी ने मुँह पर हाथ रखकर हँसी दबाई और बोली, “दीदी, शायद मंदिर जा रही होंगी।”

“अरे नहीं, मंदिर जाने के लिए कोई इतना चहकता है क्या? कहीं कुछ और ही खिचड़ी पक रही है।” स्वाति ने व्यंग्य से कहा।

तभी देवकी जी अपनी चप्पल पहनते हुए मुख्य दरवाजे की ओर बढ़ीं। स्वाति ने जानबूझकर थोड़ी ऊँची आवाज़ में कहा, “हे भगवान, आजकल के जमाने में बुढ़ापे की मर्यादा भी लोग भूल जाते हैं। बाल सफेद हो गए, पर शौक अभी तक सोलह बरस वाले ही हैं!”

देवकी जी की चौखट पर जाती हुई देह एकदम ठिठक गई। उनके कदम वहीं रुक गए। उन्होंने धीरे से पलटकर अपनी दोनों बहुओं की तरफ देखा। देवकी जी की आँखों में कोई क्रोध नहीं था, केवल एक शांत, सधी हुई गंभीरता थी। उन्होंने सीधे स्वाति की आँखों में देखते हुए पूछा, “कुछ कहा तुमने बड़ी बहू?”

स्वाति का चेहरा एक पल के लिए सफेद पड़ गया। उसने अपनी साड़ी का पल्लू सँभालते हुए नज़रें चुराईं और झेंप मिटाकर बोली, “न… नहीं तो मम्मी जी, मैंने तो कुछ भी नहीं कहा। मैं तो बस पल्लवी से बच्चों के स्कूल की बात कर रही थी।”

“हाँ मम्मी जी, सच में भाभी तो बच्चों के टिफिन की बात कर रही थीं,” पल्लवी ने घबराते हुए बीच में सफाई दी।

देवकी जी ने दोनों को सिर से पैर तक एक बार देखा और बहुत ही सहज लहजे में बोलीं, “अच्छा है कि तुमने कुछ नहीं कहा। क्योंकि अगर कुछ कहा होता, तो शायद जवाब भी वैसा ही मिल जाता जो तुम्हें सुनने में बिल्कुल अच्छा नहीं लगता।”

इतना कहकर देवकी जी ने अपने कदम बाहर बढ़ा दिए और दरवाजा बंद कर लिया।

जैसे ही दरवाजे की कुंडी लगी, स्वाति का चेहरा तमतमा उठा। उसने सोफे पर अपना तकिया पटका और बड़बड़ाने लगी, “देखा पल्लवी? उल्टे चोर कोतवाल को डांटे! क्या गलत कहा मैंने? मुझे तो आँखें दिखाकर चुप करा दिया, पर मोहल्ले की औरतों की जुबान कैसे बंद करेंगी? कल को जब बाहर की चार औरतें पार्क में बैठकर थू-थू करेंगी, तब क्या मुँह दिखाएंगी?”

“बिल्कुल सही कह रही हैं भाभी,” पल्लवी ने आग में घी डालते हुए कहा, “मैंने तो सुना है कि मम्मी जी पास वाले उस बड़े यूनिसेक्स ब्यूटी सैलून में गई हैं। भला सोचिए, इस उम्र में फेशियल और हेयर स्पा कराने की क्या तुक है? पोती की शादी का समय आ गया है और दादी चली हैं ब्यूटी पार्लर!”

स्वाति ने ज़ोर का ठहाका लगाया, “अरे पल्लवी, जब उम्र ढलती है ना, तो इंसान के सोचने-समझने की शक्ति कम हो जाती है। इसे ही कहते हैं बुढ़ापे में सठिया जाना। बाहर वाले जब पीठ पीछे मजाक उड़ाएंगे, तब समझ में आएगा। फिर रोती हुई घर बैठेंगी कि ज़माने को क्या हो गया है।”

“और नहीं तो क्या भाभी! हमें क्या लेना-देना? अपनी इज्जत का फलूदा खुद बनाना चाहती हैं तो बनाएं। वैसे भी पापा जी तो कभी कुछ बोलते नहीं। बेचारे दिन भर अखबार में मुँह छिपाए बैठे रहते हैं। अब इस उम्र में कौन सा पापा जी इन्हें बैठकर निहारने वाले हैं, जो इतना सजने-संवरने का भूत सवार हुआ है!”

“यही तो बात है पल्लवी। तुमने वो कहावत सुनी है ना? बुझने से पहले चिराग एक बार बहुत ज़ोर से भड़कता है। बस वही हाल हमारे सास-ससुर का हो गया है। जीने की ख्वाहिशें अब जाग रही हैं जब हड्डियाँ जवाब देने लगी हैं।”

दोनों बहुएं एक-दूसरे की बात पर देर तक हँसती रहीं, यह सोचे बिना कि वे जिस स्त्री का उपहास उड़ा रही थीं, उसी ने अपनी पूरी जवानी इन दोनों के पतियों को पालने-पोसने और इस घर की एक-एक ईंट को संवारने में खपा दी थी।

दरअसल, उस दिन घर में एक बहुत ही खास मौका था, जिसे दोनों बहुएं अपनी ही दुनिया में मस्त रहने के कारण भूल चुकी थीं। आज आनंद जी और देवकी जी के विवाह की पैंतालीसवीं वर्षगांठ थी। आनंद जी चाहते थे कि इस बार कोई बड़ा जलसा या दिखावा न हो। उन्होंने अपनी ज़िंदगी के पैंतालीस साल अपनी पत्नी के साथ हर सुख-दुख को सहते हुए बिताए थे। वे चाहते थे कि आज का पूरा दिन वे केवल और केवल अपनी देवकी के साथ बिताएं। उन्होंने शहर के एक हेरिटेज होटल में एक शांत कोने में लंच की टेबल बुक की थी और उसके बाद एक पुराना नाटक देखने का विचार बनाया था।

देवकी जी ने जब सुबह आनंद जी की आँखों में वह पुराना, किशोरवय प्रेम देखा, तो उनका मन भी भीग गया। उन्होंने सोचा कि पिछले कई सालों से उन्होंने सिर्फ रसोई, बच्चों की परवरिश, बहुओं के मिजाज और पोते-पोतियों की फरमाइशों में खुद को भुला दिया था। आज अगर उनके पति उनके साथ कुछ पल जीना चाहते हैं, तो क्यों न वे भी थोड़ा खुद को संवार लें ताकि आनंद जी के चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान खिल सके। इसी इरादे से वे सैलून गई थीं।

दोपहर के करीब एक बज रहे थे। घर की बैठक में दोनों बहुएं और उनके बच्चे बैठे हुए थे। तभी अंदर के कमरे का दरवाजा खुला और आनंद जी बाहर निकले।

उन्हें देखते ही पूरा कमरा एक पल के लिए हक्का-बक्का रह गया। मयंक और नमन भी उसी समय अपने कमरे से बाहर आए थे और वे भी अपने पिता को देखकर ठिठक गए। हमेशा सफेद खादी का ढीला कुर्ता-पजामा पहनने वाले, चप्पल घसीटकर चलने वाले आनंद जी आज पूरी तरह बदले हुए लग रहे थे। उन्होंने गहरे नीले रंग का ब्लेज़र, सलीके से इस्त्री की हुई कमीज और ट्राउज़र पहन रखा था। उनके सफेद बाल करीने से संवरे हुए थे और कलाई पर वह पुरानी घंटी वाली टाइटन घड़ी बंधी थी जो उन्हें अपनी शादी में मिली थी। आनंद जी के चेहरे पर एक गजब का आत्मविश्वास और गरिमा झलक रही थी।

आनंद जी ने अपनी कलाई की घड़ी देखी और फिर बड़े बेटे मयंक की तरफ देखकर पूछा, “मयंक, तुम्हारी मम्मी का कोई फोन आया क्या? अभी तक लौटी नहीं।”

मयंक अपने पिता को मुस्कुराते हुए देख रहा था, “नहीं पापा, बस आती ही होंगी। आप तो आज बहुत हैंडसम लग रहे हैं!”

आनंद जी हल्का सा झेंप गए और मुस्कुरा दिए।

ठीक उसी पल घर की डोरबेल बजी। स्वाति तुनकते हुए उठी और उसने मुख्य दरवाजा खोला। दरवाजा खुलते ही जो दृश्य उसके सामने था, उसने स्वाति के पैरों तले से ज़मीन खींच ली।

दरवाजे पर देवकी जी खड़ी थीं। उन्होंने गहरे जामुनी रंग की बनारसी चंदेरी साड़ी पहन रखी थी, जिसका पल्लू उनके कंधे पर बेहद नफासत से टिका हुआ था। उनके चेहरे पर हल्का, प्राकृतिक सा मेकअप था जिसने उनकी झुर्रियों को छिपाया नहीं, बल्कि एक गरिमामय आभा से भर दिया था। बालों का एक सुंदर जूड़ा बना था जिसमें मोगरे के ताजे गजरों की भीनी-भीनी खुशबू महक रही थी। माथे पर एक छोटी सी महरून बिंदी और होंठों पर हल्की सी लाली थी।

देवकी जी सचमुच सादगी और सुंदरता की एक जीती-जागती मूरत लग रही थीं। स्वाति एकटक अपनी सास को देखती ही रह गई, उसकी जबान जैसे तालू से चिपक गई थी।

आनंद जी आगे बढ़े। जब उनकी नजरें देवकी जी पर पड़ीं, तो वे अपनी सुध-बुध खो बैठे। उनकी आँखों में वही पैंतालीस साल पुराना प्रेम, वही श्रद्धा और वही समर्पण तैर गया। कुछ पलों के लिए उस कमरे में केवल एक पवित्र सन्नाटा था।

तभी नमन और मयंक एक साथ ताली बजाते हुए बोल पड़े, “अरे वाह मम्मी! क्या बात है! आज तो आपने हम सबकी छुट्टी कर दी। आप सचमुच बहुत सुंदर लग रही हैं।”

बच्चों ने भी अपनी दादी को घेर लिया, “दादी, आप तो किसी रानी जैसी लग रही हो!”

देवकी जी ने अपनी पलकें झुका लीं और उनके गालों पर गुलाबी रंगत तैर गई। आनंद जी ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और बेहद नजाकत से पूछा, “तो देवकी जी, क्या हम चल सकते हैं? हमारी गाड़ी बाहर तैयार है।”

देवकी जी ने मुस्कुराते हुए अपना हाथ अपने पति के हाथ में रख दिया, “जी, बिल्कुल।”

दोनों बुजुर्ग दंपत्ति एक-दूसरे का हाथ थामे, एक-दूसरे का सहारा बनते हुए घर की चौखट से बाहर निकल गए। बाहर खड़ी कार में बैठकर वे अपनी दुनिया में रवाना हो गए।

पर जैसे ही कार के जाने की आवाज़ आई, घर के भीतर का सन्नाटा फिर से कड़वाहट में बदल गया। स्वाति और पल्लवी का गुस्सा अब अपनी हदें पार कर चुका था। उन्हें लगा कि दोनों बुजुर्गों ने आज पूरे परिवार की मर्यादा को ताक पर रख दिया है।

स्वाति अपने पति मयंक के सामने जाकर खड़ी हो गई और हाथ नचाते हुए बोली, “देखा तुम दोनों ने? यह क्या तमाशा था? इस उम्र में एक-दूसरे का हाथ पकड़कर, इस तरह बन-ठन कर बाहर घूमना क्या शोभा देता है? मोहल्ले के लोग देखेंगे तो क्या सोचेंगे कि घर के बुजुर्ग अब इस उम्र में आशिकी लड़ा रहे हैं? और तुम दोनों भाई चुपचाप खड़े होकर उनकी तारीफों के पुल बांध रहे थे!”

पल्लवी ने भी अपने पति नमन को घेरते हुए कहा, “बिल्कुल सही कह रही हैं भाभी। हमारी बेटी अब ब्याहने लायक हो रही है। कल को समधी वाले घर आएंगे और देखेंगे कि सास-ससुर इस तरह हाथ में हाथ डालकर पिक्चर देखने जा रहे हैं, तो क्या इज्जत रह जाएगी इस खानदान की? कम से कम जाने से पहले हमसे एक बार पूछ तो लेते! घर में हम भी रहते हैं, हमारी भी कोई राय है या नहीं?”

मयंक और नमन ने एक-दूसरे की तरफ देखा। उनके चेहरों पर अब तक जो मुस्कान थी, वह धीरे-धीरे एक बेहद गंभीर और आहत भाव में बदल गई। दोनों भाई अपनी पत्नियों के इस संकीर्ण नजरिए से भीतर तक स्तब्ध थे।

मयंक एक कदम आगे बढ़ा। उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था, लेकिन एक ऐसी भारी और चुभने वाली सच्चाई थी जिसने कमरे की हवा को भारी कर दिया।

मयंक ने सीधे स्वाति की आँखों में देखते हुए कहा, “स्वाति, मुझे आज तुम दोनों की सोच पर बहुत तरस आ रहा है। तुम पूछ रही हो कि इसमें गलत क्या है? मैं तुमसे पूछता हूँ कि इसमें गलत क्या था? मम्मी और पापा केवल इस घर के बुजुर्ग नहीं हैं, वे पति-पत्नी हैं! क्या शादी का मतलब सिर्फ यह होता है कि जब तक बच्चे छोटे हैं तब तक साथ रहो और जब बच्चे बड़े हो जाएं तो अपनी सारी भावनाएं, अपनी खुशियाँ और अपना अस्तित्व एक कोने में फेंक दो?”

नमन भी आगे आया और उसने पल्लवी से कहा, “पल्लवी, तुम कह रही हो कि उन्होंने तुमसे पूछा क्यों नहीं? अपनी ही पत्नी के साथ अपने विवाह के पैंतालीस साल पूरे होने पर बाहर जाने के लिए एक सत्तर साल के बाप को अपने बच्चों से इजाजत लेनी पड़ेगी? क्या तुम कल को अपने बेटे-बहू से यह पूछकर बाहर जाओगी कि मैं अपने पति के साथ कॉफी पीने जा सकती हूँ या नहीं?”

कमरे में सन्नाटा छा गया। स्वाति ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, “पर उम्र का भी तो एक तक़ाज़ा होता है…”

“उम्र का क्या तक़ाज़ा होता है स्वाति?” मयंक ने तीखे स्वर में उसे टोका। “उम्र तो सिर्फ एक संख्या है, कैलेंडर की तारीखें हैं जो हर साल बदल जाती हैं। क्या उम्र बढ़ने से इंसान का दिल धड़कना बंद कर देता है? क्या उम्र के साथ प्यार, आदर और एक-दूसरे के साथ वक्त बिताने की जरूरत खत्म हो जाती है? तुमने कभी सोचा है कि पिछले चालीस सालों में मम्मी ने अपनी कितनी ख्वाहिशों का गला घोंटा होगा ताकि हम दोनों भाई अच्छे स्कूलों में पढ़ सकें? पापा ने अपने कितने शौक मारे होंगे ताकि इस घर की छत पक्की हो सके? जब वे जवान थे, तब उन्होंने अपने लिए एक दिन भी नहीं जिया। और आज जब हम सब अपने पैरों पर खड़े हैं, जब उनका हक बनता है कि वे अपनी बाकी बची ज़िंदगी को खुलकर जी सकें, तब तुम दोनों उनकी खुशियों को बुढ़ापे की बदनामी का नाम दे रही हो?”

नमन की आवाज़ भर्रा गई, “तुम दोनों के हिसाब से तो कुछ सालों बाद हम दोनों भी पति-पत्नी नहीं रहेंगे। जब हमारे बाल सफेद हो जाएंगे, तो तुम दोनों भी मुझसे बात करना छोड़ देना, मेरे साथ बैठना छोड़ देना। क्योंकि तुम्हारे बनाए नियमों के मुताबिक तो बुढ़ापे में प्यार करना पाप है! तब हमारे बच्चे आकर हमें डांटेंगे कि कोने में बैठो, तुम दोनों बुड्ढे हो चुके हो। क्या यही चाहती हो तुम अपने भविष्य के लिए?”

दोनों भाइयों की एक-एक बात किसी तीर की तरह स्वाति और पल्लवी के सीने में चुभ रही थी। जब बात उनके अपने भविष्य पर आई, जब उन्होंने खुद को उस आईने में देखा जहाँ वे खुद तीस साल बाद खड़ी हो सकती थीं, तो उनके पैरों तले से ज़मीन खिसक गई।

स्वाति की नजरें अपने आप झुक गईं। उसे अपनी कही हुई हर बात, हर ताना और हर हंसी याद आने लगी। उसे याद आया कि कैसे वह सुबह अपनी सास का मजाक उड़ा रही थी कि बुझने से पहले चिराग फड़फड़ाता है। आज उसे समझ आया कि वह चिराग बुझ नहीं रहा था, बल्कि वह तो प्रेम का वह अखंड दीपक था जो पैंतालीस सालों की आंधियों को झेलकर आज भी पूरी रोशनी के साथ जल रहा था।

पल्लवी की आँखों में शर्म के आँसू छलक आए। उसने धीरे से अपने पति नमन का हाथ पकड़ा और रुंधे गले से कहा, “हमें माफ कर दीजिए। हम… हम वाकई बहुत गलत सोच रहे थे। हमने कभी इस रिश्ते को इस नजरिए से देखा ही नहीं था।”

स्वाति भी सोफे पर बैठ गई। उसका अहंकार पूरी तरह टूट चुका था। उसने अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया। उसने महसूस किया कि जिस आधुनिकता का वह ढोंग करती थी, वह तो केवल बाहरी कपड़ों और दिखावे तक सीमित थी; उसकी सोच तो सदियों पुरानी उस रूढ़िवादिता से भी ज्यादा सड़ी-गली थी जो बुजुर्गों को केवल घर की पहरेदारी करने वाली बेजान वस्तु समझती है।

शाम ढल चुकी थी। घर में पूरी तरह शांति थी। स्वाति और पल्लवी ने मिलकर रसोई में वो सारे पकवान बनाए जो उनके सास-ससुर को सबसे ज्यादा पसंद थे। उन्होंने पूरे डाइनिंग टेबल को फूलों और मोमबत्तियों से सजाया। दोनों बहुएं दरवाजे की तरफ टकटकी लगाए अपने सास-ससुर के लौटने का इंतज़ार कर रही थीं, ताकि वे अपने किए का प्रायश्चित कर सकें।

रात के करीब आठ बजे कार के रुकने की आवाज़ आई।

कुछ ही पलों में आनंद जी और देवकी जी घर के अंदर दाखिल हुए। दोनों के चेहरों पर एक अद्भुत तृप्ति, शांति और खुशी झलक रही थी। वे बातें करते हुए, मुस्कुराते हुए अंदर आ रहे थे।

जैसे ही वे बैठक में पहुँचे, स्वाति और पल्लवी तुरंत आगे बढ़ीं। इससे पहले कि देवकी जी कुछ समझ पातीं, स्वाति ने आगे बढ़कर अपनी सास के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। स्वाति की आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे।

“मम्मी जी…” स्वाति की आवाज़ काँप रही थी, “हमें माफ कर दीजिए। हमने सुबह आपकी पीठ पीछे बहुत गलत बातें कहीं। हमने आपकी खुशियों का, आपके इस पवित्र रिश्ते का मजाक उड़ाया। हम भूल गए थे कि पति-पत्नी का रिश्ता उम्र की सीमाओं में नहीं बंधा होता। वह तो उम्र के साथ और भी गहरा, और भी पवित्र हो जाता है। आप दोनों ने आज हमें सिखाया है कि असली जीवन किसे कहते हैं।”

पल्लवी ने भी झुककर अपने ससुर और सास के चरण स्पर्श किए, “पापा जी, मम्मी जी, आज अगर आप दोनों हमें माफ नहीं करेंगे, तो हम कभी खुद से नजरें नहीं मिला पाएंगे। शादी की सालगिरह बहुत-बहुत मुबारक हो आप दोनों को।”

आनंद जी और देवकी जी एक पल के लिए हैरान रह गए। देवकी जी ने अपने दोनों बेटों की ओर देखा, जिनके चेहरों पर एक शांत संतोष था। देवकी जी सब समझ गईं।

उनकी आँखों में ममता के आँसू भर आए। उन्होंने अपनी दोनों बहुओं को अपने सीने से लगा लिया।

“पगली हो तुम दोनों,” देवकी जी ने स्वाति के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “माँ कभी अपने बच्चों की नादानियों को दिल से नहीं लगाती। तुम दोनों ने अपनी गलती समझ ली, हमारे लिए इससे बड़ा कोई तोहफा नहीं हो सकता।”

आनंद जी ने मुस्कुराते हुए अपनी जेब से एक डिब्बी निकाली और उसमें से दो सुंदर सोने की चूड़ियाँ निकालकर अपनी दोनों बहुओं के हाथों में पहना दीं। वे बोले, “यह तुम्हारे लिए है। जब तक तुम दोनों इस घर को जोड़कर रखोगी, तब तक यह घर ऐसा ही महकता रहेगा।”

उस रात ‘स्नेह-कुंज’ के डाइनिंग टेबल पर केवल भोजन नहीं परोसा गया था, बल्कि वहाँ सम्मान, प्रेम और नई सोच की एक नई शुरुआत हुई थी। उस घर में यह बात हमेशा के लिए साबित हो चुकी थी कि प्रेम किसी उम्र का मोहताज नहीं होता, वह तो आत्मा का वह संगीत है जो साँसों के अंतिम पड़ाव तक बजता रहता है।

हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि हमारे माता-पिता भी हाड़-मांस के बने इंसान हैं, जिनकी अपनी भावनाएं, अपने अरमान और एक-दूसरे के प्रति प्रेम की वही चाहत होती है जो किसी युवा में होती है। समाज और परिवार के नाम पर उनके इस स्वाभाविक प्रेम को उम्र की बेड़ियों में जकड़ना कहाँ तक उचित है? क्या बुजुर्गों को भी अपनी ज़िंदगी अपने हिसाब से जीने और अपने जीवनसाथी के साथ खुलकर खुश रहने की पूरी आज़ादी नहीं मिलनी चाहिए? इस विषय पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट करके ज़रूर बताएं।

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