छोटे बेटे मयंक की शादी तय हो चुकी थी और पूरा परिवार तैयारियों में जुटा था। बैठक में गहनों के कैटलॉग, साड़ियों के डब्बे और शादी के निमंत्रण पत्रों की सूचियां फैली पड़ी थीं। परिवार में वर्षों बाद कोई बड़ा उत्सव आया था, इसलिए हर कोई अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभाने में लगा था।
कमलेश जी अपने चश्मे को नाक पर टिकाए खर्चों की एक लंबी सूची का हिसाब लगा रहे थे। तभी उनकी पत्नी मालती देवी हाथ में दो बड़े-बड़े मखमली डिब्बे लेकर उनके पास आकर बैठ गईं। उनके चेहरे पर एक अजीब सी चमक थी, जैसे उन्होंने कोई बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण काम पूरा कर लिया हो।
“अरे सुनिए जी, जरा हिसाब-किताब बाद में देखिएगा। पहले यह देखिए, मैं आज जौहरी के यहाँ से जो गहने लेकर आई हूँ, उन्हें तो देखिए।” मालती देवी ने उत्साह से दोनों डिब्बे मेज पर रख दिए।
कमलेश जी ने कलम मेज पर रखी, चश्मा ठीक किया और मुस्कुराते हुए बोले, “हाँ भाई, दिखाओ। आखिर शादी के घर में जब तक गहनों की खनक न गूंजे, तब तक रौनक कैसी!”
मालती देवी ने पहला लाल मखमली डिब्बा खोला। उसके अंदर कुंदन और शुद्ध सोने से जड़ा हुआ एक बेहद खूबसूरत, भारी और चमकदार हार रखा था। उसकी कारीगरी देखते ही बनती थी। उसके साथ मैचिंग झुमके और मांगटीका भी था।
“वाह! यह तो सचमुच बहुत सुंदर है। काम भी बहुत बारीक और शानदार है,” कमलेश जी ने तारीफ करते हुए कहा।
“हाँ, यह पूरा ढाई तोले का है। इसे मैंने अपनी रोहिणी के लिए चुना है। आखिर अपने छोटे भाई की शादी में जब वह ससुराल से आएगी, तो सबको दिखना चाहिए कि मायके वालों ने बेटी को क्या दिया है!” मालती देवी के चेहरे पर गर्व का भाव साफ झलक रहा था।
इसके बाद मालती देवी ने दूसरा डिब्बा खोला। उसमें सोने की एक पतली सी चेन और उसके साथ छोटे-छोटे टॉप्स रखे हुए थे। डिजाइन तो सादा और शालीन था, लेकिन पहले वाले सेट की तुलना में वह बेहद हल्का और साधारण नजर आ रहा था।
“और यह… यह मैंने अपनी बड़ी बहू वंदना के लिए लिया है,” मालती देवी ने सहज भाव से कहा।
कमलेश जी ने दोनों डिब्बों को ध्यान से देखा। फिर उन्होंने अपनी पत्नी के चेहरे की ओर देखा, जो पूरी तरह निश्चिंत नजर आ रही थीं। कमलेश जी के चेहरे की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई और उनकी जगह एक गंभीर सोच ने ले ली।
“मालती, एक बात बताओ… रोहिणी के लिए इतना भारी और कीमती सेट, और वंदना के लिए इतनी हल्की चेन? ऐसा फर्क क्यों?” कमलेश जी ने शांत लेकिन गहरे स्वर में पूछा।
मालती देवी थोड़ा झेंप गईं, लेकिन तुरंत अपनी बात के समर्थन में दलील देते हुए बोलीं, “अरे जी, आप भी ना पुरुषों वाली बात कर रहे हैं। रोहिणी हमारी इकलौती बेटी है। ब्याह कर दूसरे घर चली गई है। साल-छह महीने में किसी खास मौके पर ही मायके आती है। अब अपने इकलौते छोटे भाई के ब्याह में वह ससुराल से आएगी, तो उसके ससुराल वाले भी तो देखेंगे कि मायके से क्या मिला। बेटी को अच्छा भारी सेट नहीं देंगे तो हमारी नाक नहीं कटेगी? और रही बात वंदना की, तो वंदना तो घर की बहू है। रोजमर्रा में इतना भारी सेट पहनकर वह कहाँ जाएगी? उसके लिए यह हल्की चेन ही ठीक है, रोज पहन भी सकेगी और खर्च भी काबू में रहेगा।”
कमलेश जी ने एक गहरी सांस ली। उन्होंने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और पत्नी का हाथ अपने हाथों में ले लिया।
“मालती, तुमने कभी सोचा है कि रिश्ते किस चीज से बनते हैं? खून से या फिर दिल की भावना और बराबरी से?”
मालती देवी चुप रहीं। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि उनके पति इस छोटी सी बात को इतना तूल क्यों दे रहे हैं।
कमलेश जी ने बहुत प्यार और आत्मीयता से समझाते हुए कहा, “मालती, रोहिणी हमारी बेटी है, यह सच है। उसे हमने जन्म दिया, उंगली पकड़कर चलना सिखाया और विदा किया। लेकिन वंदना कौन है? वह किसी और के घर में पली-बढ़ी, किसी और माँ-बाप की लाडली थी। वह अपने उन सारे रिश्तों को, अपने उस मायके को पीछे छोड़कर हमारे घर आई। उसने इस घर को अपना माना, हमारे तौर-तरीकों को अपनाया, तुम्हारी हर बात का मान रखा और आज इस पूरे घर की धुरी बनी हुई है। जब से मयंक की शादी पक्की हुई है, वंदना ने एक दिन भी चैन से बैठकर खाना नहीं खाया है। कौन सा मेहमान कहाँ रुकेगा, नाश्ते में क्या बनेगा, शादी की खरीदारी कैसे होगी—सबकी चिंता उसे तुमसे भी ज्यादा है।”
मालती देवी ने नजरें झुका लीं, लेकिन उनके मन का द्वंद्व पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था। वे धीरे से बोलीं, “मैं वंदना की मेहनत को नकार थोड़े ही रही हूँ जी। लेकिन बेटी तो बेटी होती है ना… बहू कभी बेटी की जगह ले सकती है क्या?”
“बहू बेटी की जगह ले या न ले, लेकिन अगर हम ही बहू को पराया समझेंगे, तो वह इस घर को अपना कैसे मानेगी?” कमलेश जी का स्वर और अधिक भावुक हो गया। “मालती, अगर रोहिणी के लिए यह उसके छोटे भाई की शादी है, तो वंदना के लिए भी यह उसके इकलौते देवर की शादी है। वह घर की बड़ी बहू है। शादी के दिन मेहमान सबसे पहले बड़ी बहू को देखेंगे कि उसने क्या पहना है। जब रोहिणी भारी सेट पहनकर सबके सामने आएगी और वंदना सिर्फ एक पतली सी चेन पहनकर मेहमानों की खातिरदारी करेगी, तो क्या लोगों की नजरों में यह फर्क नहीं खटकेगा? और सबसे बड़ी बात, वंदना के दिल पर क्या बीतेगी?”
कमलेश जी आगे बोले, “वह भले ही अपने बड़प्पन और संस्कारों के चलते जुबान से कुछ न कहे, एक शिकन भी चेहरे पर न लाए, लेकिन क्या उसके मन में यह टीस नहीं उठेगी कि दिन-रात इस घर के लिए पसीना बहाने के बाद भी वह इस परिवार में ‘पराई’ ही रही? क्या उसकी आँखों में वह उदासी हम देखना चाहते हैं? किसी का दिल दुखाकर हम अपनी बेटी को खुश कैसे देख सकते हैं? हमारे लिए दोनों का मान बराबर होना चाहिए। अगर एक पलड़ा भारी और दूसरा हल्का होगा, तो घर के संतुलन की तराजू डगमगा जाएगी।”
मालती देवी के हाथ अनजाने में ही उस हल्के सेट के डिब्बे को छू रहे थे। उनके जेहन में पिछले कुछ हफ्तों की तस्वीरें तैरने लगीं। जब मयंक की शादी की बात चल रही थी, तो वंदना ने अपनी माँ के दिए हुए संदूक से पुरानी साड़ियाँ निकाल-निकालकर सबको दिखाई थीं ताकि पैसों की बचत हो सके। जब भी मालती देवी के घुटनों में दर्द होता, वंदना बिना कहे रात को तेल की मालिश करने आ जाती। कभी किसी बात पर उसने कोई फरमाइश नहीं रखी थी।
कमलेश जी ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, “मालती, हमारी खुशी तब पूरी होगी जब हमारे घर के हर सदस्य के चेहरे पर सच्ची मुस्कान हो। बेटी और बहू हमारे दो हाथ हैं। अगर एक हाथ में हम सोना पहनाएं और दूसरे को खाली रखें, तो तकलीफ शरीर को ही होगी। रोहिणी हमारी बेटी है, तो वंदना भी तो किसी की बेटी है। जिस तरह हम चाहते हैं कि रोहिणी के ससुराल वाले उसे अपनी बेटी जैसा प्यार दें, उसी तरह हमें भी तो वंदना को अपनी बेटी जैसा दर्जा देना होगा। जो हम दूसरों से उम्मीद करते हैं, पहले उसकी शुरुआत हमें अपने घर से करनी होगी।”
मालती देवी की आँखें भर आईं। उन्हें अपनी सोच पर गहरा पछतावा होने लगा। वे समझ गईं कि ममता के अतिरेक में वे अनजाने में ही एक बहुत बड़ा अन्याय करने जा रही थीं। एक माँ होकर वे दूसरी माँ की बेटी के आत्मसम्मान और भावनाओं की अनदेखी कर रही थीं।
उन्होंने तुरंत दोनों डिब्बे बंद किए और कमलेश जी की ओर नम आँखों से देखते हुए मुस्कुराईं।
“आप बिल्कुल सच कह रहे हैं जी। ममता के मोह में मेरी आँखों पर पर्दा पड़ गया था। मैं भूल गई थी कि वंदना ने इस घर को मंदिर बनाने में अपनी कोई कसर नहीं छोड़ी। अगर आज मैं उसके साथ यह भेदभाव करती, तो शायद वह कभी कुछ न कहती, लेकिन अंदर ही अंदर उसका दिल टूट जाता। मैं अभी जौहरी को फोन करती हूँ। जैसा भारी और सुंदर सेट रोहिणी के लिए बना है, ठीक वैसा ही एक और सेट वंदना के लिए भी बनेगा। दोनों इस घर की शान हैं, दोनों के चेहरों पर एक जैसी खुशी होनी चाहिए।”
कमलेश जी के चेहरे पर एक संतोषजनक मुस्कान खिल उठी। उन्होंने मालती देवी के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “यही एक समझदार माँ और सास की पहचान है। घर ईंट-पत्थरों से नहीं, ऐसे ही बड़े और खुले दिल से बनता है।”
तभी दरवाजे पर दस्तक हुई और वंदना हाथ में गर्म चाय और नाश्ते की ट्रे लिए मुस्कुराते हुए कमरे में दाखिल हुई। “बाबूजी, माँ जी… आप लोग इतनी देर से हिसाब में लगे हैं, चाय ठंडी हो रही थी इसलिए मैं ले आई।”
मालती देवी ने वंदना को देखा। उसके माथे पर पसीने की नन्हीं बूंदें थीं, लेकिन होठों पर वही सहज, निश्छल मुस्कान। मालती देवी आगे बढ़ीं और उन्होंने वंदना के हाथ से ट्रे लेकर मेज पर रख दी और उसे अपने गले से लगा लिया।
वंदना चौंक गई, “क्या हुआ माँ जी? सब ठीक तो है ना?”
मालती देवी की आँखों से खुशी का एक आंसू फिसल गया। उन्होंने वंदना का माथा चूमते हुए कहा, “हाँ मेरी बच्ची, सब बहुत अच्छा है। बस आज मुझे समझ आया कि भगवान ने मुझे सिर्फ एक बेटी नहीं दी, बल्कि तेरे रूप में दूसरी बेटी भी देकर मेरा घर खुशियों से भर दिया है। चल, कल सुबह मेरे साथ बाजार चलना, तेरे देवर की शादी के लिए तेरे लिए एक बहुत सुंदर सा गहनों का सेट पसंद करना है।”
वंदना ने संकोच से कहा, “माँ जी, मेरे पास तो पहले के गहने हैं, नए की क्या जरूरत है…”
“जरूरत है बहू, क्योंकि तुम्हारी खुशी में ही इस पूरे परिवार की खुशी है,” कमलेश जी ने मुस्कुराते हुए कहा।
कमरे का वातावरण एक असीम शांति, प्रेम और मिठास से भर गया था। जहाँ थोड़ी देर पहले भेदभाव की एक अनकही लकीर खिंचने वाली थी, वहीं अब आपसी सम्मान और बराबरी की खुशबू महक रही थी। सच ही तो है, घर तभी स्वर्ग बनता है जब बेटी और बहू के बीच का अंतर मिट जाए और दोनों को तराजू के दोनों पलड़ों की तरह एक समान मान-सम्मान मिले।
क्या आपको भी लगता है कि जब ससुराल में बहू को बेटी जैसा ही समान मान-सम्मान और बराबरी का दर्जा दिया जाए, तभी कोई परिवार सही मायनों में खुशहाल बन सकता है? अपनी राय हमें नीचे लिखकर जरूर बताएं।
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मूल लेखिका : सुभद्रा प्रसाद