सुरमयी आंगन

 जानकी जी मंत्रमुग्ध होकर अपनी बेटी की बातें सुन रही थीं। उनके चेहरे पर एक असीम संतोष और गर्व का भाव था। उन्होंने ईशानी का सिर अपनी गोद में रख लिया और बोलीं, “बेटी, तू सचमुच बहुत भाग्यशाली है। जिस घर के बुजुर्ग जिंदगी को इस तरह जिंदादिली से गले लगाते हैं, उस घर में कभी कोई नकारात्मकता टिक ही नहीं सकती। आज के दौर में जहां लोग छोटी-छोटी बातों पर तनाव में आ जाते हैं, परिवारों में कलह मच जाती है, वहां तेरे ससुराल के बुजुर्गों ने पूरे परिवार को प्रेम और सुरों के सूत्र में बांध रखा है। यह उन बुजुर्गों की ही तपस्या है कि इतना बड़ा संयुक्त परिवार आज भी एक छत के नीचे हंसता-खेलता रह रहा है।”

  आज उनकी लाडली बेटी ईशानी शादी के बाद पहली बार विदाई के रीति-रिवाजों के तहत फेरे की रस्म पूरी करने मायके लौट रही थी। घड़ी की टिक-टिक जैसे जानकी जी के दिल की धड़कनों से होड़ ले रही थी। शादी को गुजरे यूं तो महज दस ही दिन हुए थे, लेकिन जानकी जी के लिए यह दस दिन दस सदियों के बराबर लंबे और भारी जान पड़ रहे थे। जिस बेटी की हंसी से यह पूरा आशियाना गूंजता था, उसके जाने के बाद सन्नाटा हर कोने में पसर गया था।

सुबह के सात बजे से ही जानकी जी रसोई में जुटी हुई थीं। गैस के एक चूल्हे पर ईशानी की सबसे पसंदीदा मूंग दाल का हलवा धीमी आंच पर सिक रहा था, जिसकी भीनी-भीनी सौंधी खुशबू पूरे घर में महक रही थी। दूसरे चूल्हे पर कद्दू की खट्टी-मीठी सब्जी और गरमा-गर्म पूरियों की तैयारी चल रही थी। ईशानी के पिता, रमेश जी, बाहर लिविंग रूम में कभी घड़ी देखते तो कभी दरवाजे की ओर ताकते। हर पिता की तरह वे भी अपनी बेटी की पहली ससुराल यात्रा की खुशहाली जानने को बेचैन थे, मगर मां का दिल तो बस यही दुआ मांग रहा था कि उनकी फूल जैसी बच्ची नए माहौल में खुश और महफूज रहे।

तभी दरवाजे की घंटी बजी और कार के रुकने की आवाज आई। जानकी जी अपने हाथ कपड़े से पोंछते हुए तेजी से दरवाजे की ओर भागीं। जैसे ही दरवाजा खुला, सामने लाल रंग के सलवार-सूट में सजी-धजी, मांग में सिंदूर और हाथों में चूड़ियां खनकाती ईशानी खड़ी थी। अपनी मां को देखते ही ईशानी की आंखें छलक आईं और वह दौड़कर जानकी जी के गले से लिपट गई।

“मां… मेरी प्यारी मां!” ईशानी ने मां के सीने में अपना चेहरा छुपाते हुए सिसकारी भरी।

जानकी जी ने अपनी बेटी की पीठ को सहलाया, उसके माथे को चूमा और फिर उसके चेहरे को दोनों हाथों के प्याले में भरकर बड़ी गहराई से देखा। ईशानी की आंखों में कोई थकान या उदासी का साया नहीं था, बल्कि उसका चेहरा सावन की पहली फुहार के बाद खिले गुलाब की तरह चमक रहा था। उस चेहरे के नूर को देखते ही जानकी जी के मन की सारी आशंकाएं, जो पिछले दस दिनों से उन्हें सोने नहीं दे रही थीं, कपूर की तरह उड़ गईं। एक मां अपनी संतान की आंखों की भाषा बिना बोले ही पढ़ लेती है। जानकी जी को तसल्ली हो गई कि उनकी बेटी ससुराल में न केवल सुरक्षित है, बल्कि बहुत खुश और संतुष्ट है।

घर में खुशी की लहर दौड़ गई। रमेश जी ने बेटी के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया, दामाद रोहन का आदर-सत्कार हुआ और सभी ने मिलकर भोजन किया। शाम ढलते-ढलते रोहन को किसी जरूरी काम से अपने एक रिश्तेदार के यहां जाना पड़ा और यह तय हुआ कि वह कल दोपहर ईशानी को दोबारा विदा कराकर ले जाएगा।

सूरज ढलने के बाद, घर के सभी काम निपटाकर जानकी जी और ईशानी बालकनी में रखी बेंत की कुर्सियों पर चाय के कप लेकर बैठ गईं। शाम की ठंडी हवा चल रही थी और मां-बेटी के बीच एक आत्मीय शांति छाई हुई थी। आखिरकार, एक मां के दिल का कौतूहल शब्दों में ढल ही गया। जानकी जी ने चाय की चुस्की लेते हुए ईशानी की हथेली अपने हाथ में ली और बड़े अपनत्व से पूछा, “और बता मेरी गुड़िया… ससुराल में सब ठीक-ठाक है ना? सब लोगों का व्यवहार कैसा है तेरे प्रति? रोहन तो खैर बहुत सुलझा हुआ लड़का है, पर नया परिवार, नए नियम… कोई परेशानी तो नहीं हुई?”

ईशानी मुस्कुराई और उसकी आंखों में एक अनोखी चमक तैर गई। वह अपनी मां के कंधे पर सिर टिकाते हुए बोली, “मां, सच कहूं तो शादी से पहले मेरे मन में कितने ही डर थे। मैं सोचती थी कि इतने बड़े संयुक्त परिवार में कैसे तालमेल बिठा पाऊंगी। ताऊ जी, चाचा जी, उनके बच्चे, सास-ससुर और सबसे ऊपर दादा ससुर और दादी सास… मुझे लगता था कि शायद वहां कड़े अनुशासन और पुरानी बंदिशों का पहरा होगा। लेकिन मां, वहां जाकर मुझे लगा ही नहीं कि मैं किसी अजनबी दुनिया में आई हूं। सब इतने प्यारे और सहज हैं। और सबसे खूबसूरत बात पता है मां वहां की क्या है? मेरे दादा ससुर भानुप्रताप जी और दादी सास मनोरमा जी की इस उम्र में भी वो अनोखी जिंदादिली और संगीत का शौक!”

यह कहते-कहते ईशानी की नजरें जैसे बीते दिनों की यादों में खो गईं। वह अपनी मां को उस पहले दिन का वाकया सुनाने लगी।

विदाई के अगले दिन, जब शादी की सारी रस्में, मुंह दिखाई और मेहमानों का आना-जाना समाप्त हुआ, तो ईशानी बुरी तरह थक चुकी थी। उसकी सासु मां, यशोदा जी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बड़े प्यार से कहा था, “ईशानी बेटा, तुम बहुत थक गई होगी। जाओ, अपने कमरे में जाकर दो घंटे आराम कर लो। लेकिन हां, ठीक शाम को सवा छह बजे तैयार होकर नीचे बड़े हॉल में आ जाना।”

ईशानी ने संकोचवश पूछा था, “जी मम्मी जी, कोई खास रस्म है क्या शाम को?”

यशोदा जी ने हंसते हुए जवाब दिया था, “रस्म नहीं बेटा, हमारे घर की सबसे पुरानी और प्यारी परंपरा है। शाम को तुम्हारे दादा जी और दादी जी पूरे परिवार को इकट्ठा करके भजन संध्या करते हैं, उसके बाद ही संध्या आरती होती है।”

ईशानी ने बड़ी हैरानी से पूछा था, “मम्मी जी, दादा जी की उम्र तो शायद अस्सी के करीब होगी और दादी जी भी पचहत्तर की होंगी… क्या वे इस उम्र में भी गा-बजा लेते हैं?”

यशोदा जी ने बस इतना ही कहा था, “बेटा, शाम को अपनी आंखों से देखना और कानों से सुनना, खुद समझ जाओगी।”

ईशानी शाम को ठीक सवा छह बजे हल्के गुलाबी रंग की साड़ी पहनकर जब नीचे बड़े हॉल में उतरी, तो वहां का नजारा देखकर उसके कदम वहीं चौखट पर ठिठक गए। हॉल के बीचों-बीच एक बड़ा सा कालीन बिछा हुआ था। फर्श पर अस्सी वर्षीय भानुप्रताप जी सफेद खादी का कुर्ता-पायजामा पहने पूरी शान से बैठे थे और उनके सामने एक पुराना, नक्काशीदार हारमोनियम रखा हुआ था। उनके ठीक बगल में पचहत्तर साल की दादी सास मनोरमा जी सूती साड़ी का पल्लू कमर में खोंसे, पूरे अधिकार से तबले की जोड़ी के सामने बैठी थीं।

हॉल में परिवार के बाकी सभी सदस्य—ताऊ जी, ताई जी, चाचा, चाची, रोहन और घर के छोटे-बड़े बच्चे—सब एक घेरा बनाकर नीचे बैठे थे। किसी के हाथ में पीतल की खड़ताल थी, किसी के हाथ में मंजीरा, तो किसी के पास घुंघरू लगे करताल थे। पूरे घर में कपूर और चंदन की महक तैर रही थी। किसी के चेहरे पर दिनभर की थकान का कोई नामोनिशान नहीं था।

ईशानी चुपचाप जाकर अपनी सास के पास बैठ गई। तभी भानुप्रताप जी ने अपनी कांपती हुई उंगलियों को हारमोनियम की काली-सफेद पट्टियों पर रखा। जैसे ही उनकी उंगलियों ने सुर छेड़े, हॉल में एक दिव्य गूंज फैल गई। उन्होंने अपनी गंभीर और खनकती आवाज में कबीर का एक पद गाना शुरू किया—”मन लागो मेरो यार फकीरी में…”

और उसी पल, दादी मनोरमा जी ने तबले पर जो ‘धा-धिन-धिन-धा’ की थाप दी, ईशानी का दिल खुशी से झूम उठा। उनकी उम्र की झुर्रियां उनके हाथों में थीं, लेकिन तबले पर पड़ते उनके हाथ इतने सधे हुए और लयबद्ध थे कि बड़े-बड़े उस्ताद भी दंग रह जाएं। जैसे ही दादा जी के सुर ऊंचे होते, दादी जी के तबले की गति भी बढ़ जाती। दोनों एक-दूसरे की आंखों में देखकर मुस्कुराते और सुर से सुर मिलाते। परिवार के बाकी सदस्य ताली बजाते हुए, मंजीरे की झनकार के साथ संवेद स्वर में गा रहे थे।

ईशानी उस दृश्य को देखकर अपनी सुध-बुध खो बैठी थी। उसने अपने आसपास देखा था कि आम तौर पर अस्सी साल की उम्र में बुजुर्ग खाट पकड़ लेते हैं, दिन-रात अपनी बीमारियों, जोड़ों के दर्द, दवाइयों की पर्चियों और दुनिया की बुराइयों की ही चर्चा करते रहते हैं। अकेलापन और निराशा उन्हें घेर लेती है। लेकिन यहां तो नजारा ही बिल्कुल उलट था। इस आंगन में ढलती उम्र का कोई रोना नहीं था, बल्कि वहां जिंदगी को हर सांस के साथ पूरी उमंग, भक्ति और उल्लास से जिया जा रहा था। संगीत ने उस पूरे परिवार को एक ऐसे अदृश्य धागे में पिरो रखा था जहां न कोई पीढ़ी का अंतर था, न कोई वैचारिक टकराव।

भजन खत्म होने के बाद जब संध्या आरती हुई, तो दादा जी ने खुद ईशानी को अपने पास बुलाया था। कांपते हाथों से उसके सिर पर हाथ रखकर उन्होंने कहा था, “बहू, यह संगीत सिर्फ भगवान की वंदना नहीं है, यह हमारे इस परिवार की सांसें हैं। जब तक घर में सुर और ताल बने रहते हैं, तब तक रिश्तों में कभी बेसुरापन नहीं आता।”

ईशानी अपनी मां को यह सब बताते-बताते इतनी भावुक हो गई कि उसकी आंखों से खुशी के दो आंसू फिसलकर गालों पर आ गए।

जानकी जी मंत्रमुग्ध होकर अपनी बेटी की बातें सुन रही थीं। उनके चेहरे पर एक असीम संतोष और गर्व का भाव था। उन्होंने ईशानी का सिर अपनी गोद में रख लिया और बोलीं, “बेटी, तू सचमुच बहुत भाग्यशाली है। जिस घर के बुजुर्ग जिंदगी को इस तरह जिंदादिली से गले लगाते हैं, उस घर में कभी कोई नकारात्मकता टिक ही नहीं सकती। आज के दौर में जहां लोग छोटी-छोटी बातों पर तनाव में आ जाते हैं, परिवारों में कलह मच जाती है, वहां तेरे ससुराल के बुजुर्गों ने पूरे परिवार को प्रेम और सुरों के सूत्र में बांध रखा है। यह उन बुजुर्गों की ही तपस्या है कि इतना बड़ा संयुक्त परिवार आज भी एक छत के नीचे हंसता-खेलता रह रहा है।”

ईशानी ने सिर उठाकर मां की ओर देखा और बोली, “हां मां, मैंने तय किया है कि मैं भी दादी जी से तबले की थाप और ताल सीखूंगी। मैंने रोहन से कहा है कि हम इस परंपरा को कभी टूटने नहीं देंगे। चाहे जिंदगी में कितनी भी जिम्मेदारियां आ जाएं, शाम का वो एक घंटा हम हमेशा अपने परिवार और उस संगीत के नाम करेंगे।”

रात गहराने लगी थी। दूर आसमान में तारे चमक रहे थे। जानकी जी ने मन ही मन ईश्वर का धन्यवाद किया कि उनकी बेटी को एक ऐसा परिवार मिला है जहां उम्र का मतलब लाचारी नहीं, बल्कि प्रेम और उल्लास की मिसाल है। उस रात जब पूरा घर नींद की आगोश में समाया, तो ईशानी के कानों में अब भी वह हारमोनियम की धुन और तबले की मीठी थाप गूंज रही थी—एक ऐसा संगीत जो केवल वाद्य यंत्रों से नहीं, बल्कि दिल के रिश्तों से बजता था।

दोस्तों, आज के समय में जब परिवार बिखर रहे हैं और बुजुर्ग अपने ही घरों में अकेलेपन और बीमारियों की उदासी में घिर जाते हैं, ऐसे में यह कहानी हमें सिखाती है कि अगर मन में उमंग, कोई सुंदर शौक और अपनों का साथ हो, तो उम्र की कोई भी सीमा इंसान की खुशियों को बांध नहीं सकती। संगीत और सकारात्मकता सचमुच बिखरे हुए रिश्तों को भी एक डोर में बांधने की ताकत रखते हैं।

क्या आपके घर या पड़ोस में भी कोई ऐसे बुजुर्ग हैं जिनकी जिंदादिली आज की युवा पीढ़ी के लिए एक प्रेरणा है? अपनी राय और अनुभव हमें कमेंट करके जरूर बताएं।

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