मंजरी ने व्यंग्य से हंसते हुए कहा, “यही तो सबसे बड़ी कमी है भाई साहब! आपके पास करोड़ों की जायदाद है, लेकिन आपके बेटे के पास अपनी कोई औकात नहीं है! यह लड़का जो सत्ताईस साल की उम्र में भी अपने बाप की जेब पर पलता है, जो अपनी जिंदगी में एक रुपया खुद कमाने की काबिलियत नहीं रखता, वह मेरी तन्वी की क्या कद्र करेगा? मेरी बेटी ने दिन-रात एक करके अपनी डिग्रियां हासिल की हैं। वह हर महीने अपनी मेहनत से लाखों कमाती है। वह अपने आत्मसम्मान से जीती है। वह ऐसे किसी निकम्मे, परजीवी लड़के की दासी बनकर नहीं रह सकती जिसे अपनी जिंदगी का कोई मकसद ही नहीं पता!”
“मेरी तन्वी इस झूठे मान-सम्मान की खातिर अपनी जिंदगी का सौदा नहीं करेगी! चाहे जो हो जाए, यह शादी नहीं होगी!”
मंजरी देवी की आवाज में ऐसी गरज और चट्टान जैसी दृढ़ता थी कि दीवारों पर टंगे पुराने खानदानी चित्र भी जैसे थरथरा उठे। उनकी सास, अस्सी साल की विद्यावती जी के हाथ से चाय की प्याली छूटते-छूटते बची। पूरे पैंतीस साल के वैवाहिक जीवन में मंजरी ने कभी अपनी सास के आगे ‘ना’ शब्द नहीं बोला था। घूंघट की ओट में रहकर परिवार की हर अच्छी-बुरी बात को अपनी तकदीर मान लेने वाली मंजरी आज साक्षात चंडी का रूप धारण किए खड़ी थी।
विद्यावती जी की तरह ही मंजरी के पति, महेंद्र जी भी हक्के-बक्के रह गए थे। शहर के जाने-माने चावल व्यापारी महेंद्र जी के एक इशारे पर पूरा घर हिलता था। उनकी कही बात घर का कानून होती थी। परिवार का कोई भी सदस्य, चाहे वह उनके छोटे भाई हों या बच्चे, कभी उनके फैसलों पर सवाल उठाने की हिम्मत नहीं कर पाता था। पर आज, उसी घर के आंगन में, उनकी अपनी पत्नी उनकी आंखों में आंखें डालकर उनके फैसले को खुलेआम चुनौती दे रही थी।
यह विरोध किसी क्षणिक गुस्से का नतीजा नहीं था, बल्कि यह उस दर्द का ज्वालामुखी था जो मंजरी के सीने में पैंतीस सालों से सुलग रहा था। वह नहीं चाहती थी कि जिस घुटन, उपेक्षा और लाचारी में उसने अपनी पूरी जवानी काट दी, उसी अंधेरे कुएं में उसकी होनहार और स्वाभिमानी बेटी तन्वी को भी धकेल दिया जाए।
तन्वी, जो घर की सबसे छोटी और लाडली बेटी थी, बचपन से ही पढ़ाई में अव्वल रही थी। उसने दिल्ली से एमबीए की पढ़ाई पूरी की थी और अब चंडीगढ़ की एक प्रतिष्ठित वित्तीय कंपनी में सीनियर कंसलटेंट के पद पर काम कर रही थी। वह आत्मनिर्भर थी, विचारों से सुलझी हुई थी और अपने आत्मसम्मान से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करने वाली लड़की थी।
लेकिन महेंद्र जी की सोच आज भी वहीं अटकी थी जहां औरत की पहचान सिर्फ उसके पति के नाम और ससुराल की चौखट से होती है। उन्होंने अपनी झूठी शान और दोस्ती निभाने के चक्कर में तन्वी का रिश्ता अपने पुराने लंगोटिया यार हरबंस लाल के बेटे रोहन से तय कर दिया था। हरबंस लाल का रियल एस्टेट और ईंट-भट्ठों का बहुत बड़ा कारोबार था। दौलत की कोई कमी नहीं थी, कोठी में चार-चार विदेशी गाड़ियां खड़ी थीं और बैंक बैलेंस इतना कि सात पीढ़ियां बैठकर खा लें।
घर-परिवार सब कुछ अव्वल था, लेकिन उस रिश्ते में सिर्फ एक ही सबसे बड़ी खामी थी—लड़का कुछ नहीं करता था। सत्ताईस साल का रोहन दिन भर अपने अमीर बाप के पैसों पर ऐश करता, देर रात तक दोस्तों के साथ पब और पार्टियों में उड़ाता और दिन चढ़े तक सोता रहता था। न उसके पास कोई डिग्री थी, न कोई हुनर और न ही जीवन में कोई जिम्मेदारी उठाने की समझ। वह अपनी मां का ऐसा लाडला था जिसे आज तक पानी का गिलास उठाने की भी जहमत नहीं उठानी पड़ी थी।
जब तन्वी को इस रिश्ते के बारे में पता चला, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने पिता से बात करने की कोशिश की, “पापा, मैं उस लड़के से मिली हूं। उसके पास जिंदगी का कोई विजन नहीं है। वह आज भी अपने पिता की पॉकेट मनी पर जीता है। मैं एक पढ़ी-लिखी, कमाऊ लड़की हूं, मैं किसी ऐसे इंसान के साथ अपनी जिंदगी कैसे बांट सकती हूं जिसके पास खुद की कोई पहचान ही नहीं है?”
महेंद्र जी ने हमेशा की तरह अपनी मूंछों पर ताव देते हुए तन्वी की बात को हवा में उड़ा दिया था, “तुम लड़कियों को ज्यादा पढ़ने-लिखने के बाद हवा लग जाती है। अरे, हरबंस के पास इतनी दौलत है कि तेरी जैसी दस बहुएं भी बैठकर खाएंगी तो कभी खत्म नहीं होगी। तुझे नौकरी करने की जरूरत ही क्या है? शादी के बाद नौकरी छोड़ देना और आराम से महारानी बनकर रहना। मेरा फैसला अंतिम है, शादी रोहन से ही होगी।”
पिता की इस हठधर्मिता के आगे तन्वी टूट गई। उसने अपने भाइयों से मदद की गुहार लगाई, लेकिन पिता के रसूख के आगे किसी की बोलने की हिम्मत नहीं थी। तब रोती-बिलखती तन्वी अपनी मां मंजरी के पास पहुंची थी।
मंजरी ने अपनी बेटी को सीने से लगाया जरूर था, लेकिन शुरुआत में उसने भी वही पारंपरिक, घिसी-पिटी सलाह दी जो इस समाज में हर बेबस मां अपनी बेटी को देती आई है। मंजरी ने तन्वी के आंसू पोंछते हुए कहा था, “धीरज रख बेटी। मर्द शादी के बाद सुधर जाते हैं। जब सिर पर बीवी-बच्चों की जिम्मेदारी आती है, तो सब काम करना सीख जाते हैं। इतना बड़ा घर है, तुझे किसी चीज की कमी नहीं होगी। तू हां कर दे, तेरे पापा की समाज में बड़ी नाक है, उनकी पगड़ी मत उछाल।”
उस दिन तन्वी अपनी मां की लाचारी देखकर भीतर तक सिहर उठी थी। उसकी आंखों में आंसुओं की जगह एक गहरा आक्रोश और विराग उतर आया था। उसने अपनी मां का हाथ अपने सिर से हटाया और कांपती आवाज में कहा था, “मां, आप भी वही कह रही हैं जो इस दुनिया की हर कमजोर औरत कहती है? आपने पूरी जिंदगी पापा के गुस्से, उनकी पाबंदियों और उनके हुक्म के आगे खुद को मिटा दिया। क्या मिला आपको? कभी किसी ने पूछा कि आपकी क्या इच्छा है? आज आप मुझे भी उसी दलदल में धकेलना चाहती हैं?”
तन्वी की सांसें फूल रही थीं, वह सिसकते हुए आगे बोली, “ठीक है मां! अगर आपकी और पापा की झूठी प्रतिष्ठा ही सब कुछ है, तो मैं यह शादी कर लूंगी। जैसा आप लोग कहेंगे, वैसा ही करूंगी। लेकिन याद रखना मां, उस मंडप से फेरे लेने के बाद आपकी यह बेटी आपको कभी जिंदा नहीं मिलेगी। मैं भी आपकी तरह रोज घुट-घुट कर, अपनी आत्मा को मारकर समझौता करना सीख जाऊंगी। ज्यादा से ज्यादा क्या होगा? एक दिन पंखे से लटकी मिलूंगी या दिल का दौरा पड़ जाएगा और यह किस्सा ही खत्म हो जाएगा! फिर ढोते रहना अपनी इज्जत की लाश!”
इतना कहकर तन्वी बदहवास होकर अपने कमरे में भागी थी और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया था।
तन्वी के वे आखिरी शब्द मंजरी के कानों में पिघले हुए शीशे की तरह उतर गए थे। उस पूरी रात मंजरी एक पल के लिए भी अपनी पलकें नहीं झपका सकी। वह छत के पंखे को घूमते हुए देखती रही और उसके कानों में तन्वी की चीख गूंजती रही—”घुट-घुट कर एक दिन मर जाऊंगी… फिर ढोते रहना अपनी इज्जत की लाश!”
मंजरी ने अपने अतीत के पन्नों को पलटा। पैंतीस साल पहले वह भी तो ऐसी ही थी—सपनों से भरी, चित्रकला में माहिर और अपनी पहचान बनाने की तमन्ना रखने वाली। लेकिन शादी के बाद उसके सारे रंग, उसकी सारी तूलिकाएं मायके के संदूक में ही बंद रह गईं। यहां उसे सिर्फ एक आज्ञाकारी बहू, एक मौन पत्नी और एक दासी की तरह जीना सिखाया गया। उसने हर दिन समझौता किया था। कभी पति की मर्जी के लिए अपनी खुशियों की बलि दी, तो कभी ससुराल की शांति के लिए अपनी आवाज को दबाया। आज जब उसने अपनी कोख से जन्मी उस पंछी को देखा, तो उसे समझ आ गया कि अगर आज वह नहीं बोली, तो वह केवल एक बेटी की शादी नहीं करेगी, बल्कि अपनी आंखों के सामने अपनी ही बेटी की हत्या की मूक गवाह बनेगी।
अगली सुबह ही हरबंस लाल अपने परिवार और बेटे रोहन के साथ शादी की तारीख पक्की करने और शगुन का नारियल लेकर ‘आनंद कुंज’ पहुंचे थे। बैठक में मेवे, मिठाइयां और कहवे के दौर चल रहे थे। हंसी-मजाक का माहौल था। महेंद्र जी अपनी दोस्ती की कसमें खा रहे थे और रोहन सोफे पर टांग पर टांग चढ़ाए बेपरवाह अंदाज में अपने नए आईफोन में कोई गेम खेल रहा था।
तभी महेंद्र जी ने अंदर आवाज लगाई, “मंजरी, तन्वी को शगुन का जोड़ा पहनाने के लिए बाहर लाओ और पंडित जी को बुलाओ।”
लेकिन दरवाजे से तन्वी नहीं, बल्कि मंजरी देवी अकेले बाहर निकलीं। उनके हाथों में न कोई शगुन की थाली थी और न ही चेहरे पर कोई बनावटी मुस्कान। उनका चेहरा तांबे की तरह तप रहा था और चाल में एक ऐसा सम्मोहन था जिसने सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया।
और तभी मंजरी ने वह धमाका किया जिसने पूरे घर को हिलाकर रख दिया।
“मेरी तन्वी इस झूठे मान-सम्मान की खातिर अपनी जिंदगी का सौदा नहीं करेगी! चाहे जो हो जाए, यह शादी नहीं होगी!”
बैठक में ऐसा सन्नाटा छा गया कि सुई भी गिरे तो आवाज हो जाए। हरबंस लाल के हाथ से काजू का टुकड़ा छूट गया। रोहन ने चौंककर फोन से नजरें हटाईं।
महेंद्र जी का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। उनके माथे की नसें तन गईं। वे सोफे से झटके से उठे और अपनी पत्नी की ओर डपटते हुए बोले, “मंजरी! होश में तो हो तुम? यह क्या बकवास कर रही हो? दिमाग खराब हो गया है क्या तुम्हारा? मेहमानों के सामने यह कैसा पागलपन है? अंदर जाओ फौरन!”
“मैं पूरे होश में हूं महेंद्र जी!” मंजरी एक इंच भी पीछे नहीं हटी। उसकी आवाज में कोई थरथराहट नहीं थी, “पैंतीस साल से मैं बेहोशी में जी रही थी, लेकिन आज मेरी ममता ने मुझे जगा दिया है। आज तक आपके हर सही-गलत फैसले को मैंने सिर झुकाकर माना क्योंकि बात सिर्फ मेरी थी। पर आज मेरी बेटी की जिंदगी का सवाल है। मैं अपनी बेटी को उस आग में नहीं झोंकने दूंगी जिसमें मैं अपनी पूरी उम्र जलती रही हूं।”
विद्यावती जी अपनी छड़ी टेकते हुए आगे बढ़ीं, “बहू! कुल की मर्यादा भूल गई क्या? मर्दों के फैसलों के बीच में बोलने की तेरी हिम्मत कैसे हुई? खानदान की नाक कटवाएगी क्या?”
मंजरी ने अपनी सास की ओर देखा, उसकी आंखों में कोई अनादर नहीं था, पर सच्चाई की वह चमक थी जो किसी भी पाखंड को चीर सकती थी।
“मां जी, कुल की मर्यादा सिर्फ बेटियों और बहुओं के आंसुओं पर ही क्यों टिकी होती है? जिस कुल में एक जीती-जागती, स्वाभिमानी बेटी को जिंदा लाश बनने के लिए मजबूर किया जाए, उस कुल की मर्यादा को आग लग जानी चाहिए! आपने मुझे हमेशा यही सिखाया कि औरत का गहना समझौता होता है। लेकिन मैं पूछती हूं, किस बात का समझौता? और किसके साथ समझौता?”
मंजरी ने अपनी उंगली रोहन की तरफ उठा दी।
रोहन सकपका गया। हरबंस लाल गुस्से से लाल-पीले होकर बोले, “भाभी जी, यह क्या बदतमीजी है? हमारे लड़के में क्या कमी है? करोड़ों की जायदाद है हमारी!”
मंजरी ने व्यंग्य से हंसते हुए कहा, “यही तो सबसे बड़ी कमी है भाई साहब! आपके पास करोड़ों की जायदाद है, लेकिन आपके बेटे के पास अपनी कोई औकात नहीं है! यह लड़का जो सत्ताईस साल की उम्र में भी अपने बाप की जेब पर पलता है, जो अपनी जिंदगी में एक रुपया खुद कमाने की काबिलियत नहीं रखता, वह मेरी तन्वी की क्या कद्र करेगा? मेरी बेटी ने दिन-रात एक करके अपनी डिग्रियां हासिल की हैं। वह हर महीने अपनी मेहनत से लाखों कमाती है। वह अपने आत्मसम्मान से जीती है। वह ऐसे किसी निकम्मे, परजीवी लड़के की दासी बनकर नहीं रह सकती जिसे अपनी जिंदगी का कोई मकसद ही नहीं पता!”
हरबंस लाल अपमान से तिलमिला उठे। उन्होंने महेंद्र जी की तरफ देखा, “महेंद्र, यह तेरी बीवी हमारा और हमारे बेटे का अपमान कर रही है और तू चुपचाप खड़ा देख रहा है? अगर यही तमाशा होना था तो हमें बुलाया क्यों? हम खुद ऐसी लड़की से अपने बेटे का ब्याह नहीं करेंगे जिसकी मां का दिमाग ही खराब हो गया हो!”
महेंद्र जी ने हाथ जोड़कर अपने दोस्त को शांत करने की कोशिश की, “हरबंस, तू बैठ… मैं अभी सब ठीक करता हूं…”
“कोई कुछ ठीक नहीं करेगा!” मंजरी ने कड़क आवाज में कहा, “भाई साहब, आप अपनी यह शगुन की थाली और अपनी यह करोड़ों की दौलत समेटिए और अपने इस लाडले को लेकर जाइए। मेरी बेटी के लिए ऐसा जीवनसाथी चाहिए जो उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल सके, न कि उसके कंधों पर बोझ बनकर अपनी जिंदगी काटे। यह रिश्ता इस पल यहीं खत्म होता है!”
हरबंस लाल अपने बेटे का हाथ पकड़कर पैर पटकते हुए बैठक से बाहर निकल गए। उनके जाते ही घर का मुख्य दरवाजा जोर से बंद हुआ।
घर में अब सिर्फ परिवार के लोग बचे थे।
महेंद्र जी का पारा सातवें आसमान पर था। वे मंजरी की तरफ बढ़े, उनका हाथ गुस्से में कांप रहा था, “मंजरी! तूने आज भरी महफिल में मेरी पगड़ी उछाल दी! मेरे पैंतीस साल के मान-सम्मान को एक झटके में मिट्टी में मिला दिया! तू जानती है तूने क्या किया है? अब कौन करेगा इस लड़की से शादी? समाज में क्या मुंह दिखाऊंगा मैं?”
कमरे के दरवाजे की ओट में खड़ी तन्वी यह सब देख रही थी। वह भागती हुई बाहर आई और अपनी मां के आगे खड़ी हो गई। उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे, लेकिन इस बार वे बेबसी के आंसू नहीं थे, बल्कि अपनी मां के इस अदम्य साहस को देखकर उपजे गर्व के आंसू थे।
“पापा!” तन्वी ने रुंधे गले से कहा, “मां ने आपकी पगड़ी नहीं उछाली, बल्कि आपको उस पाप का भागीदार बनने से बचा लिया जो आप अनजाने में करने जा रहे थे। क्या समाज की झूठी वाहवाही के लिए अपनी बेटी की जिंदगी बर्बाद करना ही आपका सम्मान था? अगर सम्मान की कीमत मेरी बलि है, तो मुझे ऐसे समाज की कोई परवाह नहीं है!”
मंजरी ने तन्वी को अपने आंचल में समेट लिया और महेंद्र जी की आंखों में देखते हुए बेहद शांत, लेकिन भेद देने वाले स्वर में कहा, “महेंद्र जी, शादी कोई व्यापार नहीं है जहां आप अपनी दोस्ती निभाने के लिए अपनी औलाद को गिरवी रख दें। शादी दो बराबर के इंसानों का मिलन है। लड़का कितना भी अमीर क्यों न हो, अगर उसके भीतर मेहनत करने का जज्बा नहीं है, अपने पैरों पर खड़े होने का स्वाभिमान नहीं है, तो वह घर कभी खुशहाल नहीं हो सकता। तन्वी को किसी की परजीवी बनने की जरूरत नहीं है। वह सक्षम है, समर्थ है। और अगर उसे अपनी जिंदगी अकेले भी बितानी पड़े, तो वह इस समझौते की जिंदगी से लाख गुना बेहतर होगी।”
महेंद्र जी जैसे किसी गहरे सदमे में थे। वे सोफे पर धप से बैठ गए। उन्होंने अपने दोनों हाथों में अपना सिर थाम लिया। मंजरी की बातें उनके कानों में गूंज रही थीं। उन्होंने पहली बार मुड़कर अपनी बेटी के चेहरे को देखा। उस चेहरे पर डर नहीं था, बल्कि एक ऐसी चमक थी जो केवल सच और स्वाभिमान के रास्ते पर चलने वालों के चेहरे पर होती है। फिर उन्होंने अपनी पत्नी को देखा—वही मंजरी जो कभी तेज धूप में भी बिना पूछे छाता नहीं खोलती थी, आज अपनी बेटी की ढाल बनकर दुनिया से टकरा गई थी।
महेंद्र जी का दिल भीतर से पिघलने लगा। उनका सारा अहंकार, उनका सारा पुरुषवादी दंभ उस मां की ममता के आगे रेत की दीवार की तरह ढह गया। उन्होंने महसूस किया कि अगर आज मंजरी ने यह कदम न उठाया होता, तो वे सचमुच अपनी लाडली को एक ऐसे नर्क में धकेल देते जहां से कभी कोई वापसी नहीं होती। वे खुद एक पिता के तौर पर कितने अंधे हो गए थे कि उन्हें लड़के की कमियां दिखाई ही नहीं दे रही थीं, सिर्फ उसका बैंक बैलेंस दिख रहा था।
काफी देर तक कमरे में गहरा सन्नाटा छाया रहा। फिर महेंद्र जी धीरे से उठे। उनके चेहरे का गुस्सा गायब हो चुका था, वहां केवल एक गहरी शर्मिंदगी और पश्चाताप था।
वे तन्वी के पास आए। कांपते हाथों से उन्होंने तन्वी के सिर पर हाथ रखा।
“मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची…” महेंद्र जी की आवाज भर्रा गई। उनकी आंखों से दो बूंद आंसू निकलकर उनके गालों पर ढुलक गए, “तेरा बाप अपनी झूठी शान के नशे में इतना अंधा हो गया था कि मुझे तेरी खुशियां दिखाई ही नहीं दीं। मैं भूल गया था कि तू कोई बेजान गुड़िया नहीं है जिसका फैसला मैं अपनी मर्जी से कर दूं।”
फिर महेंद्र जी मंजरी की तरफ मुड़े। उन्होंने हाथ जोड़ लिए, “मंजरी, आज तुमने मुझे एक बहुत बड़े गुनाह से बचा लिया। आज मुझे समझ आया कि परिवार का मुखिया होना सिर्फ अपने हुक्म चलाना नहीं होता, बल्कि अपनों के सही-गलत को समझना भी होता है। तुमने आज एक मां होने का सच्चा फर्ज निभाया है। मुझे गर्व है तुम पर।”
विद्यावती जी भी अपनी लाठी थामे हुए आगे आईं और उन्होंने मंजरी के कंधे पर हाथ रख दिया। उनकी आंखों में भी नमी थी, “बहू, तूने आज साबित कर दिया कि घर की असली मर्यादा दीवारों में नहीं, घर की बेटियों के आत्मसम्मान में बसती है। तूने जो किया, बिल्कुल सही किया।”
उस दिन ‘आनंद कुंज’ में बरसों से जमी परंपराओं की धूल साफ हो गई थी। घर की फिजाओं में एक नई ताजगी, एक नया सवेरा उतर आया था। समझौते की उस पुरानी चौखट को लांघकर परिवार ने आज स्वाभिमान की एक नई नींव रखी थी।
कुछ महीनों बाद, तन्वी के लिए एक नया रिश्ता आया। लड़का उसी की कंपनी में साथ काम करने वाला एक साधारण, लेकिन बेहद कर्मठ और स्वाभिमानी इंजीनियर था। न उसके पास कोई पुश्तैनी हवेली थी, न बाप के अरबों रुपये; पर उसके पास अपनी मेहनत से कमाया हुआ नाम था, तन्वी के लिए असीम सम्मान था और उसके सपनों को पंख देने की नीयत थी। इस बार शादी का फैसला किसी के दबाव में नहीं, बल्कि तन्वी की अपनी सहमति और दोनों परिवारों के खुले दिल से हुआ।
विदाई के वक्त जब तन्वी अपनी मां के गले लगी, तो उसने कान में धीरे से कहा, “मां, अगर उस दिन आप न लड़ी होतीं, तो आज मेरी यह मुस्कान कभी लौटकर नहीं आती। आपने मुझे सिर्फ जन्म नहीं दिया मां, आपने मुझे जीना सिखाया है।”
मंजरी ने मुस्कुराते हुए अपनी बेटी का माथा चूम लिया। बाहर सूरज अपनी पूरी रोशनी के साथ चमक रहा था—यह रोशनी समझौते के अंधकार को मिटाकर, एक नए और सशक्त जीवन के आगाज की गवाह बन रही थी।
आपके विचार: क्या आपको भी लगता है कि हमारे समाज में आज भी कई परिवारों में बेटियों की शादी सिर्फ लड़के की खानदानी रईसी देखकर कर दी जाती है, भले ही लड़का निठल्ला और गैर-जिम्मेदार हो? क्या मंजरी की तरह हर मां को अपनी बेटी के स्वाभिमान के लिए समाज और परिवार के खिलाफ खड़े होने का साहस दिखाना चाहिए? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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