अंजलि के पैर कांप रहे थे। आलोक ने उसका हाथ कसकर थाम रखा था। जैसे ही वे केबिन में दाखिल हुए, डॉ. सीमा के चेहरे पर एक चौड़ी और आत्मीय मुस्कान खिली हुई थी। उन्होंने रिपोर्ट की फाइल आगे बढ़ाते हुए कहा, “बधाई हो अंजलि जी, बधाई हो आलोक जी! बीटा एचसीजी का स्तर बहुत बेहतरीन है। आप मां बनने वाली हैं!”
उन शब्दों का कानों में पड़ना था कि अंजलि की आंखों से आंसुओं का सैलाब बह निकला। पर आज ये आंसू किसी मलाल, किसी दर्द या किसी ताने के नहीं थे; ये आंसू थे उस परम आनंद के, जिसे केवल एक मां महसूस कर सकती है।
जिंदगी जब इम्तिहान लेने पर उतरती है, तो इंसान के हौसलों की आखिरी हद तक परख करती है। बचपन में जब हम स्कूल की किताबों में संघर्ष की कहानियां पढ़ते थे, तो लगता था कि यह सिर्फ पन्नों पर सजी बातें हैं। पर जब हकीकत की तपती धूप सीधे चेहरे पर पड़ती है, तब पता चलता है कि नंगे पांव अंगारों पर चलने का दर्द क्या होता है। अंजलि की जिंदगी भी कुछ ऐसी ही उबड़-खाबड़ पगडंडी पर शुरू हुई थी, जहां हर कदम पर ठोकरें थीं और संभालने वाला कोई नहीं था।
अंजलि मुश्किल से बारह बरस की रही होगी जब पिता का साया अचानक सिर से उठ गया। दिल का दौरा पड़ा और हंसता-खेलता परिवार एक पल में बिखर गया। पिता सरकारी दफ्तर में छोटे बाबू थे, उनके जाने के बाद जमा-पूंजी कुछ ही महीनों में खत्म हो गई। जयपुर के एक तंग किराये के मकान में मां कल्याणी अपने तीन मासूम बच्चों—अंजलि और उसके दो छोटे भाइयों, वरुण और सुमित—को लेकर बेबस खड़ी थीं। मां ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने पास के एक प्राथमिक विद्यालय में शिक्षिका की नौकरी कर ली। सुबह सूरज निकलने से पहले उठना, चूल्हा फूंकना, बच्चों का टिफिन तैयार करना और फिर पूरे दिन बच्चों को पढ़ाकर शाम को घर-घर जाकर सिलाई-कढ़ाई करना, यही मां की दिनचर्या बन गई थी।
पर बढ़ते शहर के खर्च और बच्चों की स्कूल की फीस मां की उस छोटी सी तनख्वाह से पूरी नहीं पड़ पा रही थी। अंजलि ने अपनी मां की आंखों के नीचे गहराते काले घेरे और फटी हुई साड़ियों के पल्लू में छिपे आंसुओं को देखा। उसी दिन उसने तय कर लिया कि वह सिर्फ पढ़ाई के सहारे बैठी नहीं रहेगी। दसवीं की परीक्षा पास करते ही अंजलि ने अपनी पढ़ाई के साथ-साथ मोहल्ले के छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया। सुबह जल्दी उठकर कॉलेज जाना, दोपहर में लाइब्रेरी में बैठकर नोट्स बनाना, शाम को चार घंटे बच्चों को पढ़ाना और रात को देर तक जागकर खुद की पढ़ाई करना।
अंजलि के भीतर की लड़की कब बड़ी हो गई, उसे खुद पता नहीं चला। जब सहेलियां नए कपड़ों, फिल्मों और त्योहारों की बातें करतीं, अंजलि अपने भाइयों की किताबों और स्कूल के जूतों का हिसाब जोड़ रही होती थी। उसने अपने सपनों को ताक पर रख दिया था। जैसे-जैसे साल बीते, अंजलि ने कॉमर्स से पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा किया और एक निजी कंपनी में अकाउंटेंट की नौकरी हासिल कर ली।
जिंदगी थोड़ी पटरी पर लौटने ही लगी थी कि विधाता ने एक और गहरा घाव दे दिया। वर्षों की अथक मेहनत और शरीर को निचोड़ देने वाली भागदौड़ ने मां कल्याणी को भीतर से खोखला कर दिया था। उन्हें फेफड़ों की गंभीर बीमारी ने घेर लिया। अंजलि ने रात-दिन एक कर दिया, डॉक्टरों की चौखटें छानीं, अपनी सारी जमा-पूंजी मां के इलाज में लगा दी, पर होनी को कुछ और ही मंजूर था। मां अपनी बेटी का हाथ थामे हुए हमेशा के लिए सो गईं। जाते-जाते उनकी आंखें सिर्फ यही कह रही थीं कि भाइयों का ख्याल रखना।
मां के जाने के बाद अंजलि घर की रीढ़ बन गई। उसने वरुण और सुमित की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी। वरुण ने इंजीनियरिंग की और सुमित ने मैनेजमेंट। अंजलि ने अपनी शादी की उम्र निकल जाने की परवाह किए बिना दोनों भाइयों को अपने पैरों पर खड़ा किया। उनके रिश्ते तय कराए, धूमधाम से शादियां कीं। पर इंसान का स्वभाव भी अजीब होता है। जैसे ही दोनों भाइयों की गृहस्थी बसी, उनके अपने-अपने दायरे खिंच गए।
वरुण को अपनी पत्नी के साथ पुणे की एक आईटी कंपनी में शिफ्ट होना पड़ा, जबकि सुमित ने पत्नी के कहने पर शहर के पॉश इलाके में अलग फ्लैट ले लिया। जिस घर को अंजलि ने अपने खून-पसीने से सींचा था, वह घर अचानक खाली हो गया। दोनों भाई अपनी नई दुनिया में मग्न हो गए, कभी त्योहारों पर एक फोन आ जाता या औपचारिक हालचाल पूछ लिया जाता। बत्तीस साल की उम्र में अंजलि उस बड़े से खाली मकान में बिल्कुल अकेली रह गई। रात के सन्नाटे में जब दीवार घड़ी की टिक-टिक गूंजती, तो अंजलि की आंखों से बरबस आंसू बह निकलते। क्या यही जिंदगी थी? क्या जिम्मेदारियां निभाते-निभाते इंसान का अपना कोई वजूद नहीं रह जाता?
पर कहते हैं न कि अंधेरी रात के बाद ही सवेरा होता है। जब इंसान पूरी तरह टूट जाता है, तब ईश्वर किसी न किसी रूप में संबल बनकर आता है। अंजलि की जिंदगी में वह संबल बनकर आए आलोक।
आलोक उसी कंपनी में सीनियर मैनेजर थे, जहां अंजलि काम करती थी। शांत, गंभीर और बेहद सुलझे हुए इंसान। आलोक अंजलि के काम के प्रति समर्पण और उसके स्वाभिमानी स्वभाव से भली-भांति परिचित थे। जब उन्हें अंजलि के अतीत और उसके त्याग के बारे में पता चला, तो उनके मन में अंजलि के लिए गहरा सम्मान पैदा हो गया। एक दिन आलोक ने बेहद शालीनता से अंजलि के सामने विवाह का प्रस्ताव रख दिया। अंजलि पहले तो सहम गई, उसे लगा कि शायद अब उसकी उम्र और जिंदगी में इन सब बातों की कोई जगह नहीं बची है। पर आलोक की सादगी और उनकी सच्ची भावनाओं ने अंजलि के मन की जमी हुई बर्फ को पिघला दिया।
दोनों परिवारों की सहमति से, बिना किसी दिखावे के, एक सादे समारोह में अंजलि और आलोक का विवाह हो गया। शादी के बाद अंजलि की शुष्क और बेजान जिंदगी में मानो बहार आ गई। आलोक ने उसे वह मान-सम्मान और प्यार दिया, जिसकी वह हमेशा से हकदार थी। अंजलि को पहली बार महसूस हुआ कि किसी के साथ होने का अहसास कितना सुकूनदेह होता है। शुरुआती दो साल तो इतनी खूबसूरती से बीते कि वक्त का पता ही नहीं चला। दोनों ने साथ में घूमना-फिरना, एक-दूसरे की पसंद-नापसंद को समझना और गृहस्थी को सजाना शुरू किया। अंजलि के चेहरे पर बरसों बाद एक सहज और निश्चल मुस्कान लौट आई थी।
पर जब दांपत्य जीवन थोड़ा स्थिर हुआ, तो दोनों के मन में एक खालीपन का अहसास दस्तक देने लगा। घर तो सुंदर था, पर उसमें बच्चों की किलकारियां नहीं थीं। शाम को जब दोनों काम से लौटते, तो घर की खामोशी उन्हें सालने लगती। अंजलि अब पैंतीस की हो चुकी थी और आलोक अड़तीस के। उम्र का यह पड़ाव गर्भधारण के लिए आसान नहीं माना जाता था।
उन्होंने परिवार बढ़ाने की कोशिशें शुरू कीं। महीने बीते, फिर साल बीतने लगे, पर हर महीने की उम्मीद अंत में मायूसी में बदल जाती। जब भी अंजलि को लगता कि शायद इस बार कोई खुशखबरी होगी, अगले ही पल उसकी उम्मीदें बिखर जातीं। समाज और रिश्तेदारों की नजरें भी अब चुभने लगी थीं। किसी पारिवारिक समारोह में जाते, तो लोग दबी जुबान से फुसफुसाते, “इतनी देर से शादी की, अब तो औलाद का सुख मिलना मुश्किल ही लगता है।” ऐसी बातें अंजलि के कलेजे को छलनी कर देती थीं।
अंजलि के भीतर नकारात्मकता घर करने लगी। रात-रात भर वह जागती रहती। वह सोचने लगी कि शायद विधाता ने उसकी तकदीर में सिर्फ खालीपन ही लिखा है। आलोक उसे समझाते, उसका ढांढस बंधाते, पर एक औरत के भीतर जो मां बनने की तड़प होती है, उसे केवल वही समझ सकती थी।
एक दिन दोनों ने बैठकर लंबी बात की। आलोक ने कहा, “अंजलि, अगर ईश्वर को हमारी कोख से ही औलाद देना मंजूर नहीं है, तो क्या हुआ? दुनिया में कितने अनाथ बच्चे हैं जो मां-बाप के प्यार को तरसते हैं। क्यों न हम किसी बच्चे को गोद ले लें? उसे एक घर मिल जाएगा और हमें एक औलाद।”
अंजलि को आलोक की बात में सच्चाई लगी। दोनों ने एक अनाथालय जाने का मन बनाया। रविवार की सुबह वे शहर के एक जाने-माने शिशु गृह पहुंचे। वहां छोटे-छोटे बच्चे खेल रहे थे, कोई पालने में लेटा था, कोई एक-दूसरे की उंगली पकड़े घूम रहा था। अंजलि एक झूले के पास जाकर खड़ी हो गई, जिसमें छह महीने का एक बच्चा खेल रहा था। अंजलि ने बच्चे की ओर देखा, उसे अपनी गोद में उठाने की कोशिश भी की, पर उसके भीतर वह अलौकिक खिंचाव, वह मातृत्व का अहसास नहीं जागा, जिसकी उसने कल्पना की थी। उसे अजीब सा अपराधबोध हुआ। वह बच्चे को वापस लिटाकर बाहर आ गई।
गाड़ी में बैठते ही अंजलि फूट-फूट कर रो पड़ी। “आलोक, मैं कैसी औरत हूँ? उस बच्चे में कोई कमी नहीं थी, पर मेरे मन में उसके लिए ममता क्यों नहीं जागी? क्या मेरे भीतर की औरत मर चुकी है? मैं किसी बच्चे के साथ अन्याय नहीं करना चाहती। अगर मैं उसे पूरे दिल से अपना नहीं पाई, तो यह उस मासूम के साथ धोखा होगा।” आलोक ने अंजलि के सिर पर हाथ फेरा और कहा, “शांत हो जाओ अंजलि। हर किसी की भावनाएं अलग होती हैं। इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है। ईश्वर ने अगर यह रास्ता नहीं दिखाया, तो कोई और रास्ता जरूर होगा।”
उस दिन के बाद दोनों कई मंदिरों में गए, मन्नतें मांगीं, चौखटों पर माथा टेका। अंजलि हर बार हाथ जोड़कर बस यही प्रार्थना करती, “हे प्रभु! अगर जिंदगी में इतनी परीक्षाएं ली हैं, तो अब एक इशारा दे दो। मैं बस एक बार अपने कलेजे से अपने अंश को लगाना चाहती हूँ।”
एक दिन अंजलि की पुरानी कॉलेज की सहेली नीरजा उससे मिलने घर आई। बातों-बातों में जब अंजलि का दर्द छलक पड़ा, तो नीरजा ने बड़े ध्यान से उसकी बात सुनी। नीरजा ने कहा, “अंजलि, तू आज के दौर में जी रही है। जब ईश्वर ने इंसान को बुद्धि दी है, तो उसने विज्ञान के रास्ते भी खोले हैं। आज चिकित्सा विज्ञान इतना आगे बढ़ चुका है कि जो बातें कल तक नामुमकिन लगती थीं, वे आज संभव हैं। तू आईवीएफ (IVF – इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) तकनीक के बारे में क्यों नहीं सोचती? मेरी अपनी भाभी को शादी के दस साल बाद इसी तकनीक से जुड़वां बच्चे हुए हैं। तू एक बार किसी अच्छे फर्टिलिटी सेंटर जाकर सलाह तो ले।”
नीरजा की बातों ने अंजलि के बुझते हुए दिल में एक नई उम्मीद की लौ जला दी। शाम को जब उसने आलोक से इस बारे में बात की, तो आलोक भी तुरंत तैयार हो गए। उन्होंने कहा, “अगर विज्ञान हमें यह मौका दे रहा है, तो हमें पूरी शिद्दत से प्रयास करना चाहिए। हार मानने से पहले हर संभव कोशिश करना जरूरी है।”
अगले ही हफ्ते दोनों शहर के एक प्रतिष्ठित फर्टिलिटी एंड टेस्ट ट्यूब बेबी सेंटर पहुंचे। वहां का माहौल किसी आम अस्पताल जैसा डरावना या तनावपूर्ण नहीं था। वहां आशा की एक भीनी-भीनी सुगंध थी। दीवारों पर लगे मुस्कुराते हुए बच्चों के चित्र और सफल हो चुके दंपतियों के अनुभव मन को संबल दे रहे थे।
वहां की मुख्य डॉक्टर, डॉ. सीमा से जब उनकी मुलाकात हुई, तो अंजलि के आधे डर उनकी बातों से ही खत्म हो गए। डॉ. सीमा ने उनकी मेडिकल हिस्ट्री देखी, अंजलि की उम्र और शारीरिक स्थिति का विश्लेषण किया और बड़े ही धैर्य से समझाया, “देखिए अंजलि जी, बढ़ती उम्र निश्चित रूप से कुछ चुनौतियां लाती है, लेकिन यह कोई ऐसी दीवार नहीं है जिसे पार न किया जा सके। आईवीएफ तकनीक आज लाखों सूनी गोदों को भर चुकी है। बस जरूरत है आपके सकारात्मक नजरिए की, धैर्य की और थोड़ा सा शारीरिक व मानसिक संतुलन बनाए रखने की। बाकी काम विज्ञान और प्रकृति मिलकर कर लेंगे।”
डॉक्टर के उन शब्दों ने अंजलि के मन से बरसों पुराना भय निकाल फेंका। उपचार की प्रक्रिया शुरू हुई। यह सफर आसान नहीं था। रोजाना हार्मोनल इंजेक्शन, बार-बार के ब्लड टेस्ट, अल्ट्रासाउंड और दवाइयों का भारी दौर। कभी-कभी दवाइयों के असर से अंजलि का जी मिचलाता, सिर में तेज दर्द होता और मूड स्विंग्स होते। पर इस पूरे दौर में आलोक एक साए की तरह उसके साथ खड़े रहे। वे समय पर उसे दवाएं देते, उसका मन बहलाने के लिए अच्छी किताबें लाते, हल्की सैर पर ले जाते और हर पल यह अहसास कराते कि वे दोनों इस लड़ाई में अकेले नहीं, बल्कि एक साथ हैं।
अंडों के निर्माण की प्रक्रिया सफल रही और लैब में भ्रूण तैयार किए गए। वह दिन भी आया जब भ्रूण को अंजलि के गर्भ में प्रत्यारोपित (एंब्रियो ट्रांसफर) किया जाना था। प्रक्रिया बहुत नाजुक थी। जब प्रक्रिया पूरी हुई, तो डॉक्टर ने मुस्कुराते हुए कहा, “अब अगले चौदह दिन आपके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण दिन हैं। आपको पूरी तरह तनावमुक्त रहना है और सकारात्मक सोचना है।”
वे चौदह दिन किसी तपस्या से कम नहीं थे। अंजलि का एक-एक पल सांस रोककर बीत रहा था। वह मन ही मन ईश्वर का स्मरण करती और अपने गर्भ पर हाथ रखकर अपने होने वाले बच्चे से बातें करती।
चौदहवें दिन सुबह जब ब्लड टेस्ट का सैंपल दिया गया, तो रिपोर्ट आने में चार घंटे का समय था। वे चार घंटे अंजलि और आलोक के लिए सदियों जैसे लंबे लग रहे थे। दोपहर को क्लिनिक से फोन आया। डॉक्टर ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से केबिन में बुलाया था।
अंजलि के पैर कांप रहे थे। आलोक ने उसका हाथ कसकर थाम रखा था। जैसे ही वे केबिन में दाखिल हुए, डॉ. सीमा के चेहरे पर एक चौड़ी और आत्मीय मुस्कान खिली हुई थी। उन्होंने रिपोर्ट की फाइल आगे बढ़ाते हुए कहा, “बधाई हो अंजलि जी, बधाई हो आलोक जी! बीटा एचसीजी का स्तर बहुत बेहतरीन है। आप मां बनने वाली हैं!”
उन शब्दों का कानों में पड़ना था कि अंजलि की आंखों से आंसुओं का सैलाब बह निकला। पर आज ये आंसू किसी मलाल, किसी दर्द या किसी ताने के नहीं थे; ये आंसू थे उस परम आनंद के, जिसे केवल एक मां महसूस कर सकती है। आलोक ने अंजलि को बाहों में भर लिया, उनकी अपनी आंखें भी खुशी से भीगी हुई थीं। बरसों का सूखा, बरसों की तड़प, समाज के तानों का दंश—सब कुछ उस एक पल में धुलकर साफ हो गया।
गर्भावस्था के नौ महीने अंजलि ने किसी अनमोल धरोहर की तरह बिताए। आलोक ने उसकी हर छोटी-बड़ी जरूरत का ध्यान रखा। और फिर एक सुनहरी सुबह, ऑपरेशन थिएटर के बाहर जब नन्हीं सी किलकारी गूंजी, तो कायनात का हर कोना रोशन हो गया।
डॉक्टर ने जब एक गुलाबी, सुंदर सी नन्हीं बच्ची को कपड़े में लपेटकर अंजलि की छाती पर रखा, तो अंजलि को लगा जैसे ईश्वर ने साक्षात उतरकर उसकी गोद में अपना सारा आशीर्वाद रख दिया हो। नन्हीं सी जान ने जब अपनी नन्हीं उंगलियों से अंजलि के पल्लू को छुआ, तो अंजलि के रोम-रोम में ममता की अमृत धारा बह निकली। उन्होंने अपनी उस नन्हीं परी का नाम रखा—’अन्वेषा’, जिसका अर्थ था एक नई खोज, एक नई आशा।
अन्वेषा के आने से उस सूने घर में जैसे प्राण प्रतिष्ठा हो गई थी। वह घर, जो कभी सन्नाटे में डूबा रहता था, अब खिलौनों, लोरी और बच्चों की हंसी से महक उठा था। अंजलि जब भी अन्वेषा को दूध पिलाती या उसे सीने से लगाकर सुलाती, तो उसका सिर अनायास ही उस विज्ञान और उन डॉक्टरों के प्रति कृतज्ञता से झुक जाता, जिन्होंने असंभव को संभव बना दिया था।
अंजलि की यह कहानी केवल एक स्त्री के मां बनने की दास्तान नहीं है, बल्कि यह उन तमाम अंधेरों के खिलाफ एक रौशनी है जो अक्सर इंसान को निराशा के गर्त में धकेल देते हैं। विज्ञान वास्तव में ईश्वर का ही दिया हुआ वह ज्ञान है, जो टूटी हुई उम्मीदों को फिर से जोड़ता है और सूखी डालियों पर नई कोपलें खिलाता है। जिंदगी में कैसी भी परिस्थिति क्यों न हो, जब तक विश्वास का एक तिनका बाकी है, तब तक उम्मीद का दामन कभी नहीं छोड़ना चाहिए।
जीवन में कई बार ऐसे मोड़ आते हैं जहां समाज और परिस्थितियां हमें यह मानने पर मजबूर कर देती हैं कि अब रास्ते बंद हो चुके हैं। पर क्या आधुनिक विज्ञान और अटूट विश्वास मिलकर हमारे भाग्य की लकीरों को नहीं बदल सकते? आपके विचार में ऐसे कठिन दौर में एक जीवनसाथी का संबल कितना मायने रखता है? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट में जरूर साझा करें।
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लेखिका : नम्रता अरोड़ा