नैना के मुँह से कोई शब्द नहीं फूटा। उसने काँपते हाथों को आगे बढ़ाया, जैसे यह तस्दीक करना चाहती हो कि सामने खड़ा इंसान हाड़-मांस का सच है या कोई छलावा। जैसे ही उसकी उंगलियों ने अनिरुद्ध के खुरदुरे कोट को छुआ, अनिरुद्ध ने एक झटके में उसका हाथ पकड़ा और उसे खींचकर अपने सीने से चिपका लिया।
उस बड़े से बैग का सारा बोझ भूलकर उसने नैना को अपनी बाहों के मजबूत घेरे में कैद कर लिया।
आँगन के कोने में रखे तुलसी के चौरे पर जल रहा मिट्टी का दीया अचानक हवा के हल्के झोंके से फड़फड़ाया और उसकी लौ एक पल के लिए तेजी से भड़की। नैना की पलकें उसी रौशनी के साथ काँप उठीं। उसने दोनों हथेलियों को ओट बनाकर उस थरथराती लौ को बुझने से बचा लिया, लेकिन सीने के भीतर जो बेचैनी सुलग रही थी, उसे थामने का कोई जरिया नजर नहीं आ रहा था। छत पर टंगे आकाश की ओर देखते हुए उसने एक लंबी, ठंडी साँस भरी। आसमान में बादलों की एक पतली चादर फैली थी और चाँद कहीं गहरे अंधियारे में छिपा हुआ था। क्या इस साल भी उसका चाँद बादलों की ओट में ही गुम रहेगा? क्या पिछली बार की तरह इस बार भी उसकी थाली में रखी छलनी सिर्फ खाली आसमान को देखकर भीग जाएगी?
पूरे चार साल बीत चुके थे। इन चार बरसों का एक-एक दिन नैना ने कैलेंडर की तारीखों को गिनते हुए नहीं, बल्कि दिल पर पत्थर रखकर काटा था। उसकी आँखों से गर्म आँसुओं की दो बूँदें ढुलककर गालों पर फिसलती हुई सीधे सूती दुपट्टे के पल्लू में समा गईं। उसने अपने काँपते होंठों को भींच लिया ताकि सिसकी बाहर न निकल सके। ससुराल का बड़ा सा घर, जहाँ कभी हँसी-ठहाकों की गूँज हुआ करती थी, अब एक अजीब से सन्नाटे में डूबा रहता था। वो चुपचाप उठी और पूजाघर से सटी अपनी छोटी सी बैठक की तरफ बढ़ गई।
कमरे में मद्धिम पीली रोशनी फैली हुई थी। दीवार पर टंगी शादी की पुरानी तस्वीर पर उसकी नजर गई, जिसे देखकर दिल में टीस सी उठी। उसने बिस्तर पर बेतरतीब पड़ा अपना फोन उठाया। जिंदगी कितनी अजीब हो गई थी; जिस इंसान के साथ सात फेरे लेकर पूरी जिंदगी बिताने की कसमें खाई थीं, उससे जुड़े होने का इकलौता सबूत बस उस फोन की गैलरी में कैद एक धुंधली सी तस्वीर थी। मर्चेंट नेवी के एक प्राइवेट कार्गो शिप पर नौकरी करने गए अनिरुद्ध की आखिरी तस्वीर। जब भी दिल बहुत भारी होता, वो उस तस्वीर को जूम करके घंटों देखा करती थी, मानो स्क्रीन के कांच को छूकर वो अनिरुद्ध की मौजूदगी को महसूस कर लेगी।
नैना ने काँपती उंगलियों से स्क्रीन को अनलॉक किया और सीधे गैलरी वाले फोल्डर पर टैप किया। लेकिन स्क्रीन खुलते ही जैसे उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। वो फोल्डर पूरी तरह खाली दिख रहा था। अनिरुद्ध की वो मुस्कुराती हुई तस्वीर, जिसमें उसने नेवी की सफेद वर्दी पहन रखी थी, वहाँ नहीं थी।
“ये कैसे हो सकता है? यहीं तो थी… मैंने कल रात ही तो उसे देखा था!” नैना पागलों की तरह स्क्रीन पर उंगलियाँ चलाने लगी। उसने रीसायकल बिन देखा, व्हाट्सएप मीडिया खंगाला, डाउनलोड्स के सारे फोल्डर उलट-पुलट डाले, लेकिन तस्वीर का कोई नामोनिशान नहीं था। अचानक फोन में हजारों अनचाहे मैसेज और गैर-जरूरी फॉरवर्डेड फाइलों का ढेर नजर आने लगा। किसी तकनीकी गड़बड़ी या ऑटो-क्लीनर ऐप ने शायद उस इकलौती अनमोल याद को भी मिटा दिया था।
नैना का सिर चकराने लगा। कनपटियों पर नसों का दर्द उभर आया। उसे लगा जैसे किसी ने उसके हाथों से उसका आखिरी सहारा भी छीन लिया हो। वह बदहवास होकर बिस्तर पर बैठ गई और दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ लिया। उसी पल, हाथ में थमा फोन अचानक थरथराया और एक तेज रिंगटोन के साथ स्क्रीन पर किसी अनजान नंबर की कॉल चमकने लगी।
नैना चौंक गई। स्क्रीन पर कोई नाम नहीं था, बस एक अजीब सा लंबा नंबर उभर रहा था।
“इतनी रात को कौन हो सकता है?” उसने सोचा।
उसने काँपते हुए अंगूठे से कॉल उठाने के लिए स्वाइप किया ही था कि स्क्रीन पर ‘कॉल एंडेड’ लिखा आ गया। फोन कट चुका था।
कमरे में फिर से वही भयानक सन्नाटा पसर गया। नैना ने फोन को छाती से चिपका लिया। दो साल से अनिरुद्ध से कोई सीधी बातचीत नहीं हुई थी। शिपिंग कंपनी के दफ्तर से बस इतना ही संदेश आया था कि जहाज गहरे समुद्री रास्ते में फँस गया था, जहाँ संपर्क के सारे साधन ठप थे और क्रू मेंबर्स की सुरक्षा के लिए राहत कार्य जारी है। दो साल से वो कंपनी के झूठे-सच्चे आश्वासनों और अपने मन के विश्वास के सहारे जी रही थी। और आज, वो तस्वीर भी हाथ से छूट गई थी।
उसने दुपट्टे के छोर से अपनी भीगी आँखें पोंछीं और बिस्तर पर बेजान होकर लेट गई। आँखें बंद करते ही पलकों के पीछे अंधेरे में एक परछाई सी तैरने लगी।
“नैना…”
एक बहुत जानी-पहचानी, भारी और अपनत्व से भरी आवाज उसके कानों में फुसफुसाई।
नैना ने जैसे खुद को चार साल पहले के उसी कमरे में खड़ा पाया। कमरे के बड़े से शीशे के सामने अनिरुद्ध खड़ा था, अपने उलझे हुए बालों में उंगलियाँ फेरते हुए खुद को निहार रहा था। नैना दरवाजे की चौखट का सहारा लिए बस उसे एकटक देखे जा रही थी, जैसे उसकी हर हरकत को अपनी यादों की तिजोरी में हमेशा के लिए ताला लगाकर बंद कर लेना चाहती हो।
“क्या हुआ? ऐसे घूर क्यों रही हो, जैसे पहली बार देख रही हो?” अनिरुद्ध ने शीशे में ही उसकी आँखों से नजरें मिलाते हुए शरारत भरी मुस्कान के साथ पूछा था।
“कुछ नहीं…” नैना ने नजरें झुका ली थीं। दिल की बात जुबां पर आते-आते रुक गई थी।
अनिरुद्ध पलटा, मुस्कुराते हुए उसने नैना की तरफ अपना हाथ बढ़ाया, फिर जैसे उसे चिढ़ाने के लिए हाथ पीछे खींच लिया। नैना के गालों पर हल्की सी लाली दौड़ गई थी। अनिरुद्ध पलंग के किनारे बैठ गया और अपने चमड़े के बूट्स के फीते बाँधने लगा। पर नैना की आँखें अभी भी उसी पर टिकी थीं।
“वहाँ खंभे की तरह क्यों खड़ी हो? यहाँ आओ ना पास,” अनिरुद्ध ने तिरछी नजरों से देखते हुए कहा था।
“नहीं, मैं वहीं ठीक हूँ। आपको देर हो रही है, तैयार हो जाइए,” नैना ने खुद को संयत करते हुए कहा।
“अच्छा जी! तो हुक्म ये है कि मुझे ही आना पड़ेगा,” कहकर अनिरुद्ध उठा, दो कदम में उसके पास पहुँचा और उसका हाथ थामकर हल्के से अपनी ओर खींच लिया।
नैना का सिर सीधे उसके सीने से जा टकराया था। अनिरुद्ध के कोट की ऊनी खुशबू और उसके दिल की नियमित धड़कनें नैना की साँसों में उतरने लगी थीं।
“नैना…” अनिरुद्ध ने बहुत नरमी से पुकारा था।
“हूँ…” नैना ने सिर्फ एक धीमी सी आवाज निकाली थी।
“एक बात सच-सच बताओगी?”
नैना ने उसकी आँखों में झाँकते हुए धीरे से सिर हिलाया था।
“तुम मुझे इतनी गहराई से क्यों देखती हो? ऐसा लगता है जैसे तुम मुझे आँखों से ही बाँध लेना चाहती हो।”
“तो क्या अपनी ही चीज को देखने के लिए भी इजाजत लेनी पड़ेगी?” नैना ने रूठने का नाटक किया था।
“अरे नहीं बाबा, हक है तुम्हारा, पूरा हक है। पर तुम्हारी आँखों में एक अजीब सा डर दिखता है मुझे। क्यों?” अनिरुद्ध की आवाज अचानक गंभीर हो गई थी।
नैना की आँखों के कोर गीले हो गए थे। “पता नहीं क्यों अनिरुद्ध… जब भी आप जाने की बात करते हैं, मुझे लगता है आप बहुत दूर चले जाएँगे। समंदर इतना बड़ा है और मैं यहाँ इतनी अकेली… मुझे डर लगता है कि कहीं आप मुझसे खो न जाएँ।”
अनिरुद्ध ने अपनी हथेलियों में उसका चेहरा थाम लिया था और उसके गालों को हल्के से सहलाया था, “पागल लड़की! ऐसा कभी हो सकता है क्या? समंदर चाहे जितना भी गहरा हो, मेरी कश्ती का किनारा तो तुम ही हो। मैं जहाँ भी जाऊँगा, लौटकर यहीं आऊँगा। अच्छा सुनो, इस बार लंबा सफर है। मेरे आने तक करवाचौथ आ जाएगा। तुम्हारे लिए क्या लेकर आऊँ?”
नैना के काँपते होंठों से बस इतना निकला था, “कुछ नहीं… बस चाँदी की वो पायल, जिसकी रुनझुन सुनकर आप कहते थे कि पूरे घर में रौनक आ जाती है।”
“बस इतनी सी बात? मुझे लगा इस बार सोने का कोई बड़ा हार माँगोगी,” अनिरुद्ध खिलखिलाकर हँसा था।
“माँगूँगी ना,” नैना ने उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा था, “हर मुश्किल से पार निकलकर, वक्त के थपेड़ों से लड़कर, मेरे पास सही-सलामत लौट आने का पक्का वादा।”
“पक्का वादा नैना। सात जन्मों तक इस बंधन को निभाने का वादा। जब तक तुम खुद मुझे अपने दिल से निकाल बाहर नहीं करोगी, मैं तुमसे दूर नहीं जा सकता।”
“और मैं आपको अपने दिल से निकालूँगी? कभी नहीं… इस जिंदगी में तो मुमकिन ही नहीं।”
अचानक एक तीखी, तेज आवाज से नैना की तंद्रा टूटी। यादों का सुंदर महल भरभराकर ढह गया।
सामने वही वीरान कमरा था और तकिए पर पड़ा मोबाइल बेतहाशा बज रहा था।
नैना ने झटके से उठकर फोन देखा। स्क्रीन पर वही अनजान नंबर फिर से चमक रहा था। दिल में अजीब सी हलचल मच गई। एक तरफ गुस्सा था कि इस बेवकूफ को आधी रात में परेशान करने की क्या सूझी है, और दूसरी तरफ एक अनजाना सा खौफ। उसने गुस्से में कॉल रिसीव करने के लिए उंगली बढ़ाई, पर इससे पहले कि वो बात कर पाती, फोन फिर से कट गया।
“क्या तमाशा है ये! कोई चैन से रो भी नहीं सकता यहाँ,” उसने झुँझलाकर फोन बिस्तर पर फेंक दिया।
लेकिन अब उसका दिमाग उसी नंबर पर अटक गया था। भीतर बैठी एक स्त्री की छठी इंद्री अचानक जाग उठी थी। उसने फोन उठाया और उस नंबर को ध्यान से देखा। नंबर की शुरुआत में लगे कोड घरेलू नहीं थे; वो किसी सुदूर देश का इंटरनेशनल डायलिंग कोड था।
उसके रोंगटे खड़े हो गए। क्या ये अनिरुद्ध हो सकते हैं? क्या वो किसी बंदरगाह पर पहुँचे हैं? उसने बिना एक पल गँवाए उसी नंबर पर वापस कॉल मिलाया।
कुछ सेकंड की खामोशी के बाद एक कंप्यूटराइज्ड अंग्रेजी आवाज गूँजी, “जिस नंबर पर आप संपर्क करना चाहते हैं, वह फिलहाल सेवा में नहीं है…”
नैना का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उम्मीद और निराशा के इस भँवर में वो पूरी रात करवटें बदलती रही। नींद कोसों दूर थी। सुबह जब सूरज की पहली किरण खिड़की से छनकर आई, तब जाकर उसकी थकी हुई आँखों को थोड़ी राहत मिली और भारी सिर के साथ वो बेसुध होकर सो गई।
जब उसकी आँख खुली, तो घड़ी की सुइयाँ दोपहर के दो बजा रही थीं। शरीर में जैसे जान ही नहीं बची थी। सिर भारी था और करवाचौथ के निर्जला व्रत के कारण हलक सूख रहा था। घर में काम करने वाली शांति चाची रसोई में बर्तनों को धोने में लगी थीं। उनके बर्तनों के टकराने की आवाजें आ रही थीं।
नैना उठकर सीधे बाथरूम गई और चेहरे पर ठंडा पानी छिड़का। आज के दिन सुहागिनें सजती हैं, नए कपड़े पहनती हैं, सोलह श्रृंगार करती हैं। पर उसका मन किसी चीज में नहीं लग रहा था। उसने सादा सा पीला सूट पहना और बालों को ढीला सा बाँध लिया।
तभी बाहर मुख्य दरवाजे की घंटी बजी। ट्रिन-ट्रिन…
नैना के कदम वहीं रुक गए। इतनी दोपहर में कौन आ गया? शायद पड़ोस की कोई महिला पूजा की थाली या छलनी की तैयारी के बारे में पूछने आई होगी। उसका बिल्कुल मन नहीं था किसी से मिलने का।
“नैना बिटिया! जरा दरवाजा देख लेना, मेरे हाथ साबुन से सने हैं,” रसोई से शांति चाची की आवाज आई।
नैना ने अनमने मन से अपनी चप्पलें पहनीं और भारी कदमों से मुख्य दरवाजे की ओर बढ़ गई। उसने लकड़ी के बड़े पल्ले की सिटकनी धीरे से नीचे की और दरवाजा आधा खोला।
दरवाजे के उस पार जो शख्स खड़ा था, उसे देखते ही नैना की साँसें वहीं थम गईं।
सामने एक लंबा, चौड़े कंधों वाला नौजवान खड़ा था। उसका चेहरा धूप और समंदर की खारी हवाओं से थोड़ा साँवला पड़ गया था, दाढ़ी बढ़ी हुई थी और आँखों के नीचे गहरी थकान की लकीरें थीं। उसकी पीठ पर एक बड़ा सा नेवी का रकसैक बैग टंगा हुआ था।
नैना की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसे लगा कि शायद नींद का खुमार अभी उतरा नहीं है या फिर वो दिन के उजाले में भी कोई ख्वाब देख रही है। उसने अपनी दोनों आँखों को हथेलियों से जोर-जोर से मसला और फिर सामने देखा।
वो शख्स वहीं खड़ा था। उसके थके हुए चेहरे पर वही पुरानी, चिर-परिचित, शरारत भरी मुस्कान तैर गई।
“ऐसे ही देखती रहोगी या घर के भीतर भी आने दोगी?”
वो आवाज… वही आवाज थी, जिसने कल रात उसकी बंद आँखों में हलचल मचाई थी।
नैना के मुँह से कोई शब्द नहीं फूटा। उसने काँपते हाथों को आगे बढ़ाया, जैसे यह तस्दीक करना चाहती हो कि सामने खड़ा इंसान हाड़-मांस का सच है या कोई छलावा। जैसे ही उसकी उंगलियों ने अनिरुद्ध के खुरदुरे कोट को छुआ, अनिरुद्ध ने एक झटके में उसका हाथ पकड़ा और उसे खींचकर अपने सीने से चिपका लिया।
उस बड़े से बैग का सारा बोझ भूलकर उसने नैना को अपनी बाहों के मजबूत घेरे में कैद कर लिया।
नैना का सारा सब्र, चार साल का सारा दर्द, वो सूनी रातें और दिल का सारा डर आंसुओं का सैलाब बनकर अनिरुद्ध के सीने पर बह निकला। वो फूट-फूट कर रोने लगी। अनिरुद्ध ने उसके सिर पर अपना चेहरा टिका दिया और उसकी भीगी आँखों से भी दो बूँदें गिरकर नैना के बालों में खो गईं।
काफी देर बाद जब नैना की हिचकियाँ थोड़ी थमीं, तो उसने अनिरुद्ध के सीने से अपना सिर उठाया और उसकी आँखों में देखते हुए रूंधे गले से शिकायत की, “कहाँ चले गए थे आप? जानते हैं मैंने ये चार साल कैसे काटे हैं? एक फोन तक नहीं… उस तस्वीर के सहारे जी रही थी, वो भी आज सुबह मुझसे छिन गई थी।”
अनिरुद्ध ने अपनी जेब से एक छोटा सा मखमली लाल डिब्बा निकाला और नैना की हथेलियों पर रख दिया।
“हमारा जहाज अंतरराष्ट्रीय समुद्री संकट में फँस गया था नैना। संचार के सारे साधन बंद थे। महीनों हम एक टापू पर राहत टीम के इंतजार में रहे। कल जब किसी तरह बेस कैंप पहुँचे, तो एक लोकल सैटेलाइट फोन से मैंने कॉल मिलाने की कोशिश की थी, पर नेटवर्क बार-बार ड्रॉप हो रहा था। फिर मुझे लगा कि फोन पर क्या बात करूँ, जब मैं खुद अपनी मंजिल के इतने करीब हूँ।”
उसने मुस्कुराते हुए डिब्बा खोला। भीतर चाँदी की खूबसूरत नक्काशीदार पायल रखी थी, जिसमें छोटे-छोटे घुँघरू सजे थे।
“मैंने समंदर के पार से तुम्हारे लिए ये नूपुर लाने का वादा किया था ना? बस वही वादा निभाने में थोड़ी देर हो गई।”
नैना ने आँसुओं के बीच मुस्कुराते हुए उस डिब्बे को अपने सीने से लगा लिया। “पर मैंने आपसे अकेले जाने को कभी नहीं कहा था। अब अगर कभी गए, तो मुझे भी साथ लेकर जाना होगा।”
अनिरुद्ध ने दोनों हाथों से उसके आँसू पोंछे और बहुत गंभीरता से कहा, “अब कभी नहीं जाऊँगा। कंपनी को अपना इस्तीफा सौंपकर आया हूँ। अब जो भी करूँगा, अपने देश में, तुम्हारे पास रहकर करूँगा। इस जन्म का पक्का वादा।”
घर का आँगन अचानक जैसे रौशनी से भर उठा। रसोई से निकली शांति चाची की आँखें भी इस मिलन को देखकर छलक आईं। नैना ने अनिरुद्ध का हाथ अपने दोनों हाथों में कसकर थाम लिया और उसे अंदर ले आई। शाम ढलने को थी, और इस बार छत पर चढ़कर छलनी से चाँद को देखने के लिए नैना की थाली में सिर्फ दीप ही नहीं, उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी दुआ साक्षात मौजूद थी।
यह कहानी हमें यह सुंदर संदेश देती है कि सच्चा प्रेम और अटूट विश्वास हर कठिन परीक्षा को पार कर लेता है। जब जिंदगी हमें दूरियों और अनिश्चितताओं के भँवर में धकेल देती है, तब धैर्य और उम्मीद ही वो रोशनी बनते हैं जो हमें टूटने नहीं देते। परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, अपने रिश्तों पर भरोसा बनाए रखना ही हर रिश्ते की सबसे बड़ी ताकत होती है।
आपको नैना के चार साल लंबे इंतजार और अनिरुद्ध के इस अप्रत्याशित आगमन ने किस तरह भावुक किया? क्या आपको भी लगता है कि सच्चा प्यार हर फासले को मिटा देता है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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