कल्याणी जी ने प्रज्ञा के आंसुओं को अपने हाथों से पोंछा और उसके माथे को चूमते हुए कहा, “अब कभी मत रोना। तेरी माँ तुझे छोड़कर कहीं नहीं गई थी, शायद वह मेरे ही रूप में तुझ तक पहुँचना चाहती थी। पर मेरी मूर्खता ने तुझे बहुत सताया। अब यह घर, यह परिवार और यह माँ सिर्फ तेरी है।”
वार्ड में खड़े अनिरुद्ध और परिवार के अन्य सदस्यों की आँखें भी इस दृश्य को देखकर छलक उठीं। नफ़रत की दीवारें प्रेम और त्याग की एक बूँद के आगे ढह चुकी थीं।
भोपाल की पुरानी गलियों में स्थित ‘अन्नपूर्णा भवन’ की अपनी ही एक रवायत थी। उस दोमंजिला पुराने मकान में कल्याणी देवी का हुक्म पत्थर की लकीर माना जाता था। कल्याणी जी अपने कुलीन ब्राह्मण परिवार की मर्यादा, खान-पान और संस्कारों को लेकर बेहद सख्त थीं। उनके बड़े बेटे अनिरुद्ध का कद-काठी देखकर पूरा मोहल्ला दाँतों तले उँगली दबाता था—गौर वर्ण, चेहरे पर एक खास तेज और शांत स्वभाव। कल्याणी जी का सपना था कि उनके बेटे के लिए घर की देहरी पर ऐसी बहू कदम रखे जो उनके ही कुल, रीति-रिवाजों और रूप-रंग के सांचे में ढली हो।
पर तकदीर की लकीरें इंसान की ख्वाहिशों की मोहताज कहाँ होती हैं।
इंदौर में एक मल्टीनेशनल कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर के पद पर काम करते हुए अनिरुद्ध की मुलाकात प्रज्ञा से हुई। प्रज्ञा असम के एक साधारण मध्यवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखती थी। सांवला सलोना रंग, बड़ी-बड़ी कजरारी आँखें, चेहरे पर सौम्यता और स्वभाव में गजब का धीरज। प्रज्ञा जब महज छह वर्ष की थी, तब एक गंभीर बीमारी ने उसकी माँ को हमेशा के लिए छीन लिया था। पिता ने बड़े लाड़-प्यार से पाला, मगर एक बेटी के सीने में जो माँ के आंचल की खाली जगह रह जाती है, वह उम्र बढ़ने के साथ एक गहरी टीस बन चुकी थी।
अनिरुद्ध को प्रज्ञा के इसी सादेपन और सुलझे हुए व्यक्तित्व से प्रेम हो गया। दोनों ने जब जीवन भर साथ निभाने का वादा किया, तो अनिरुद्ध ने पूरे यकीन के साथ अपनी माँ को इस रिश्ते के बारे में बताया। मगर कल्याणी देवी के लिए यह किसी वज्रपात से कम नहीं था।
कल्याणी जी ने तस्वीर देखते ही उसे मेज पर पटक दिया था। “कहाँ हमारा खानदान, कहाँ हमारे ऊंचे संस्कार और कहाँ वह सुदूर पूर्व की लड़की! न हमारी भाषा, न हमारा रहन-सहन, न खान-पान और न ही रूप-रंग का कोई मेल। लोग क्या कहेंगे अनिरुद्ध? कि कल्याणी का बेटा समाज की नाक कटवा कर ऐसी बहू ले आया जो हमारे रीति-रिवाजों का ‘क’ भी नहीं जानती? मैं जीते-जी इस लड़की को अपनी चौखट लांघने नहीं दूँगी।”
अनिरुद्ध ने माँ के पैर पकड़े, उन्हें समझाने की हर मुमकिन कोशिश की। उसने कहा कि प्रज्ञा बहुत संस्कारी और संवेदनशील है, वह पूरे घर को जोड़कर रखेगी। मगर कल्याणी देवी की जिद के आगे सारे तर्क बेअसर साबित हुए। जब कल्याणी जी ने अपनी झूठी सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर अनिरुद्ध को प्रज्ञा को छोड़ देने का अंतिम फरमान सुना दिया, तब अनिरुद्ध के सामने कोई रास्ता नहीं बचा। वह अपनी माँ से बेहद प्यार करता था, मगर प्रज्ञा जैसी निश्छल लड़की के साथ विश्वासघात करना उसके संस्कारों में नहीं था।
आखिरकार, दोनों ने कोर्ट में जाकर सादे तरीके से विवाह कर लिया।
शादी के दिन प्रज्ञा लाल बनारसी साड़ी में बेहद खूबसूरत लग रही थी, मगर उसकी आँखों के कोनों में एक नमी ठहरी हुई थी। उसने अपनी माँ को खोया था और शादी से पहले उसने यह ख़्वाब संजोया था कि ससुराल जाकर वह अपनी सास की सेवा करेगी, उनसे लाड़ जताएगी और उस खाली आंचल को अपनी खुशियों से भर लेगी। मगर अनिरुद्ध की माँ ने कसम खा ली थी कि वह कभी उस लड़की का मुंह नहीं देखेंगी। प्रज्ञा के अरमानों का संसार उस दिन पहली बार दरक गया।
शादी के बाद अनिरुद्ध और प्रज्ञा ने इंदौर में ही एक छोटा सा आशियाना बसाया। घर की हर दीवार को प्रज्ञा ने सुरुचिपूर्ण तरीके से सजाया, पर घर के मंदिर में उसने एक ऐसी तस्वीर रखी जिसके आगे वह हर रोज़ धूपबत्ती दिखाती थी—वह तस्वीर अनिरुद्ध के माता-पिता की थी।
शुरुआती महीनों में कल्याणी देवी ने अनिरुद्ध से सारे नाते तोड़ लिए। बेटा फोन करता तो काट देतीं। घर के अन्य सदस्यों को भी सख्त हिदायत थी कि कोई अनिरुद्ध से संपर्क नहीं रखेगा। अनिरुद्ध अंदर ही अंदर टूट रहा था, मगर वह प्रज्ञा के सामने हमेशा मुस्कुराता रहता। प्रज्ञा अपने पति के इस मौन दर्द को भली-भांति समझती थी। वह हर रोज़ ईश्वर से प्रार्थना करती कि किसी तरह माँ जी का दिल पिघल जाए।
करीब एक साल बीतने के बाद, कल्याणी देवी के भीतर का मातृ-हृदय थोड़ा पिघला। अनिरुद्ध के बार-बार पत्र भेजने और फोन करने के बाद उन्होंने फोन उठाना शुरू किया। बातचीत बेहद औपचारिक होती थी। “खाना खाया कि नहीं?”, “तबीयत कैसी है?”—बस इतने ही सवाल।
एक दिन अनिरुद्ध फोन पर माँ से बात कर रहा था। कल्याणी जी ने पूछा, “घर में सब ठीक है ना? वह… वह लड़की ठीक है?”
पास खड़ी प्रज्ञा की धड़कनें तेज हो गईं। उसने इशारे से अनिरुद्ध से कहा कि फोन उसे दे दे। अनिरुद्ध ने मुस्कुराते हुए कहा, “माँ, प्रज्ञा बात करना चाहती है आपसे। बहुत याद करती है आपको।”
लेकिन जैसे ही यह बात कल्याणी देवी के कानों में पड़ी, दूसरी तरफ से एक ठंडी और कठोर आवाज़ आई, “मुझे किसी से कोई बात नहीं करनी। अपना ध्यान रखना।” और फोन कट गया।
प्रज्ञा का हाथ हवा में ही रह गया। उसकी आँखें आंसुओं से भर आईं। वह चुपचाप बालकनी में जाकर खड़ी हो गई और सिसकने लगी। अनिरुद्ध पीछे से आया और उसने प्रज्ञा को अपने सीने से लगा लिया। उसके बालों को सहलाते हुए उसने भरे गले से कहा, “प्रज्ञा, खुद को संभालो। मैं जानता हूँ तुम पर क्या बीत रही है। पर यकीन मानो, मेरी माँ बुरी नहीं हैं। उनका गुस्सा सिर्फ उनके अहंकार और समाज के डर की वजह से है। वह ममता से भरी हुई हैं। देखना, एक दिन वह खुद तुम्हें अपनी बाहों में समेट लेंगी।”
प्रज्ञा ने आंसुओं को पोंछते हुए कहा, “अनिरुद्ध, मुझे उनके गुस्से से कोई शिकायत नहीं है। पर काश मैं उन्हें समझा पाती कि मुझे सिर्फ उनका प्यार चाहिए। मैंने अपनी माँ का चेहरा तक ठीक से नहीं देखा। जब भी किसी माँ को अपनी बेटी के सिर पर हाथ फेरते देखती हूँ, तो कलेजा मुंह को आता है। मैं बस उनकी बेटी बनना चाहती हूँ, क्या यह गुनाह है?”
अनिरुद्ध के पास कोई जवाब नहीं था, सिवाय अपनी पत्नी के माथे को चूमने के।
समय अपनी गति से बहता रहा। दो साल बीत गए। प्रज्ञा ने कभी भी कल्याणी देवी के प्रति अपने मन में कोई कड़वाहट नहीं आने दी। जब भी अनिरुद्ध घर के लिए कपड़े या मिठाइयां भेजता, प्रज्ञा खुद बाज़ार जाकर अपनी सास की पसंद का ख्याल रखती। वह जानती थी कि कल्याणी जी को हल्के बादामी और सफेद रंग की सूती साड़ियाँ पसंद हैं। वह चुन-चुनकर साड़ियाँ पैक करती, कल्याणी जी के घुटनों के दर्द के लिए आयुर्वेदिक तेल भेजती, पर अपना नाम कभी सामने नहीं आने देती थी। कल्याणी जी सब समझती थीं, पर उनका स्वाभिमान उन्हें झुकने नहीं देता था।
फिर एक दिन अचानक नियति ने एक ऐसी करवट ली जिसने सब कुछ बदल कर रख दिया।
भोपाल से अनिरुद्ध के चाचा का घबराया हुआ फोन आया। कल्याणी देवी सीढ़ियों से फिसलकर गिर गई थीं। उनके कूल्हे की हड्डी में गहरा फ्रैक्चर हो गया था और सिर पर भी गंभीर चोट आई थी। उन्हें तुरंत एक बड़े अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराया गया था।
समाचार सुनते ही अनिरुद्ध के हाथ से फोन छूट गया। वह बदहवास सा हो गया। प्रज्ञा ने बिना एक पल गंवाए अनिरुद्ध को संभाला, तुरंत बैग पैक किया और दोनों उसी रात पहली ट्रेन पकड़कर भोपाल के लिए रवाना हो गए।
अस्पताल पहुँचते ही अनिरुद्ध आईसीयू के बाहर खड़े अपने रिश्तेदारों से लिपटकर रो पड़ा। कल्याणी जी की हालत नाजुक थी। डॉक्टरों ने आपातकालीन सर्जरी की बात कही, जिसके लिए रक्त की सख्त जरूरत थी। उनका ब्लड ग्रुप ‘ओ नेगेटिव’ था, जो बेहद दुर्लभ माना जाता है। अस्पताल के ब्लड बैंक में उस वक्त वह ग्रुप उपलब्ध नहीं था। शहर के तमाम ब्लड बैंकों में फोन किए गए, पर कहीं बात नहीं बन रही थी। अनिरुद्ध पागलों की तरह इधर-उधर दौड़ रहा था।
तभी प्रज्ञा ने डॉक्टर के कमरे में कदम रखा। उसका चेहरा शांत मगर दृढ़ था। उसने डॉक्टर से कहा, “डॉक्टर साहब, मेरा ब्लड ग्रुप ओ नेगेटिव है। आप जितनी जरूरत हो, मेरा खून ले लीजिए, बस माँ जी को कुछ नहीं होना चाहिए।”
डॉक्टरों ने तुरंत प्रक्रिया शुरू की। प्रज्ञा ने बिना हिचकिचाए रक्तदान किया। कमजोरी के कारण उसका अपना सिर चकरा रहा था, मगर उसके चेहरे पर एक अजीब सा संतोष था। सर्जरी कई घंटों तक चली और आखिरकार डॉक्टर बाहर आए। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “ऑपरेशन सफल रहा। मरीज अब खतरे से बाहर हैं। सही समय पर खून मिल जाना किसी चमत्कार से कम नहीं था।”
अनिरुद्ध ने राहत की सांस ली और प्रज्ञा के हाथों को चूम लिया।
अगले दिन कल्याणी देवी को होश आया। उन्हें प्राइवेट वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया। जब उन्होंने अपनी आँखें खोलीं, तो कमरा शांत था। उनके सिरहाने अनिरुद्ध बैठा था, जिसकी आँखें रात भर जागने के कारण लाल थीं। कल्याणी जी ने कमजोर आवाज़ में बेटे का नाम पुकारा। अनिरुद्ध ने माँ का हाथ थाम लिया।
“बेटा… मैं बच कैसे गई? डॉक्टर कह रहे थे खून नहीं मिल रहा था…” कल्याणी जी ने धीमी आवाज़ में पूछा।
अनिरुद्ध की आँखों से आंसू बह निकले। उसने कमरे के कोने की तरफ इशारा किया, जहाँ प्रज्ञा एक कुर्सी पर बैठी थकान से आंखें मूंदे हुए थी, उसके हाथ पर अब भी पट्टी बंधी हुई थी।
“माँ, जिस रिश्ते को आपने अपनी चौखट पर ठुकरा दिया था, उसी ने आज आपकी सांसों को टूटने से बचाया है। यह खून प्रज्ञा का है। जब सब रास्ते बंद हो गए थे, तब उसने एक पल भी नहीं सोचा कि आपने उससे कभी बात तक नहीं की। उसने तो बस अपनी माँ को बचाने की ज़िद ठान ली थी।” अनिरुद्ध का गला रुंध गया।
कल्याणी देवी सन्न रह गईं। उनके अंतर्मन में जैसे कोई बहुत बड़ा तूफान उठ खड़ा हुआ। सालों से संजोया हुआ सामाजिक दंभ, जाति और रंग-रूप का झूठा अहंकार एक ही झटके में भरभरा कर गिर गया। जिसे वह कुल की मर्यादा के खिलाफ मानती थीं, उसी ने अपनी मर्यादा और त्याग से उनके प्राणों की रक्षा की थी।
कल्याणी जी की आँखों से पश्चाताप के आंसू बहकर तकिए में समाने लगे। उन्होंने कांपते हाथों से प्रज्ञा की ओर देखा और बेहद धीमी आवाज़ में पुकारा, “बहू… प्रज्ञा…”
उस आवाज़ में कोई सख्ती नहीं थी, केवल एक माँ की पुकार थी।
प्रज्ञा ने हड़बड़ा कर आँखें खोलीं। उसने देखा कि माँ जी उसकी तरफ देखकर रो रही हैं। प्रज्ञा तेजी से उठकर उनके बिस्तर के पास पहुँची। उसने घबराकर पूछा, “माँ जी, क्या हुआ? दर्द हो रहा है क्या? मैं डॉक्टर को बुलाऊं?”
कल्याणी जी ने अपने दोनों कांपते हाथ उठाए और प्रज्ञा का हाथ थाम लिया। उन्होंने प्रज्ञा को खींचकर अपने सीने से लगा लिया।
“मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची… मुझे माफ कर दे,” कल्याणी जी फफक-फफक कर रो पड़ीं। “मैं कितनी अंधी थी जो चमड़ी के रंग और झूठी जाति के फेर में एक साक्षात देवी को नहीं पहचान पाई। तूने मुझे नया जीवन दिया है, और मैं इतने सालों तक तुझे सिर्फ दर्द देती रही।”
प्रज्ञा के सब्र का बांध टूट गया। जिस ममता की छाँव के लिए वह बचपन से तरसी थी, जिस माँ के स्पर्श को उसने कभी महसूस नहीं किया था, आज वह आंचल उसके सिर पर था। वह कल्याणी देवी की छाती से लगकर बच्चों की तरह रोने लगी। वह रोना बरसों के खालीपन और आज मिले उस असीम वात्सल्य का संगम था।
कल्याणी जी ने प्रज्ञा के आंसुओं को अपने हाथों से पोंछा और उसके माथे को चूमते हुए कहा, “अब कभी मत रोना। तेरी माँ तुझे छोड़कर कहीं नहीं गई थी, शायद वह मेरे ही रूप में तुझ तक पहुँचना चाहती थी। पर मेरी मूर्खता ने तुझे बहुत सताया। अब यह घर, यह परिवार और यह माँ सिर्फ तेरी है।”
वार्ड में खड़े अनिरुद्ध और परिवार के अन्य सदस्यों की आँखें भी इस दृश्य को देखकर छलक उठीं। नफ़रत की दीवारें प्रेम और त्याग की एक बूँद के आगे ढह चुकी थीं।
कुछ हफ्तों बाद, जब कल्याणी देवी स्वस्थ होकर घर लौटीं, तो उन्होंने अन्नपूर्णा भवन की चौखट पर कदम रखने से पहले गाड़ी रुकवाई। उन्होंने पूरे मोहल्ले और रिश्तेदारों के सामने प्रज्ञा की आरती उतारी और अपने हाथों से खानदानी सोने के कंगन उसकी कलाइयों में पहना दिए।
कल्याणी जी ने गर्व से सबके सामने कहा, “यह सिर्फ मेरे बेटे की पत्नी नहीं, यह इस घर की लक्ष्मी और मेरी वह बेटी है जो मेरे ही संस्कारों को पूरा करती है।”
प्रज्ञा ने झुककर अपनी सास के पैर छुए, और जब कल्याणी जी ने उसे उठाकर अपने गले से लगाया, तो प्रज्ञा को लगा कि उसकी ज़िंदगी की अधूरी प्रार्थना आज पूरी हो चुकी है। घर के आंगन में तुलसी के पौधे के पास जलता हुआ दीया हवा के झोंकों के बावजूद पूरी रोशनी के साथ जगमगा रहा था—बिल्कुल उस प्रेम की तरह, जो हर परीक्षा से गुजर कर अमर हो जाता है।
जीवन में अक्सर हम झूठे अहंकार, रंग-रूप और सामाजिक बंधनों के पीछे इतने अंधे हो जाते हैं कि रिश्तों की असली सुंदरता और निस्वार्थ प्रेम को पहचान ही नहीं पाते। प्रज्ञा ने नफ़रत का जवाब नफ़रत से नहीं, बल्कि अपने समर्पण, सेवा और धैर्य से दिया।
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