“पापा, अब न ही कुछ बोलिए, जो भी गलती है, वह मेरी गलती है। सोफिया का हाथ पकड़ लेने के बाद मुझे लगा कि आप लोग मुझसे बहुत ही नाराज हैं। इसी डर के नाते मैं आ नहीं रहा था, जबकि सोफिया बार-बार आप लोगों से मिलने की जिद करती रहती थी। वही जिद करके आप लोगों से मिलने के लिए लेकर आई है। मुझे तो फिर भी डर लग रहा था कि आप कुछ उसके सामने उसको लेकर अपनी नाराजगी न प्रकट करें।”
अभी दोनों लोगों के बीच ये आपस के गिले-शिकवे की वार्ता हो ही रही थी कि सोफिया अपने दोनों बच्चों के साथ आगे बढ़ी और अपने फादर-इन-ला (ससुर) का चरण स्पर्श करने हेतु आगे झुकी ही थी कि अखंड बाबू बहू से दूर हटते हुए बोले—
मनुष्य इस संसार में अपने औलाद से कितने अरमान पाले रहता है, इसको स्वयं मनुष्य का मन ही जानता है और यह किसी को बताने की आवश्यकता नहीं है। यह लगभग हर मनुष्य के लिए एक सामान्य बात है। ऐसे ही ढेर सारे अरमानों को अखंड बाबू, अपने बेटे अमर से पाल रखे थे। वह जब से स्कूल जाना शुरू किया, तब से एक तरह से वह उसकी ही नींद सोते थे और उसकी नींद उठते थे। वह अपने खर्च में कटौती कर लेते थे, किंतु अमर की पढ़ाई में किसी भी तरह की कटौती नहीं करते थे।
इस तरह अमर एक-एक दर्जे की पढ़ाई करते हुए, देश के प्रतिष्ठित इंस्टीट्यूट से कंप्यूटर साइंस में इंजीनियरिंग करने के साथ अमेरिका की एक कंपनी में नौकरी करने लगा। अखंड बाबू के मन में अब एक अरमान था कि अमर की शादी सुशील लड़की से हो जाय, जो उनकी बेटी की ही तरह सुशील हो। वह हमेशा इसी उधेड़बुन में लगे रहते थे कि कोई उनकी बेटी जैसी सुशील लड़की नजर आ जाए, जिससे कि अमर की शादी की जा सके।
इधर अमर जब से अमेरिका गया था, तब से उसको फुर्सत ही नहीं मिल पा रहा था कि अपने माता-पिता से मिलने अपने घर आ सके। फोन ही एक सहारा था, जिससे माता-पिता से हाल-चाल व समाचार मिलता रहता था। उसके ज्ञान और कार्य की लगनशीलता को देखते हुए कंपनी उसको एक से एक ऊँचे पद देती जा रही थी। वह जब भी छुट्टी की बात करता, कंपनी नए-नए प्रोजेक्ट का हवाला देकर अगले आने वाले समय में छुट्टी देने की बात करती।
इस तरह दिन बीतता रहा और अमर का वहाँ के कई भारतीय परिवारों से आना-जाना, मेल-मिलाप व सामाजिक संपर्क होता जा रहा था। इन भारतीय परिवारों के वहाँ पड़ने वाले सामाजिक कार्यक्रमों, तीज-त्योहारों व वैवाहिक कार्यक्रमों में अमर का अक्सर जाना होता रहता था।
इसी तरह एक वैवाहिक कार्यक्रम में अमर की मुलाकात एक अमेरिकन लड़की से हुई और कुछ ऐसा संयोग हुआ या कहिए कि परिस्थितियाँ बनीं कि अमर ने उस अमेरिकन लड़की के साथ अपना घर बसा लिया।
जब ये बात अखंड बाबू और उनकी पत्नी को पता चला, तो उनको लगा कि जैसे उन लोगों के पैरों के नीचे से जमीन ही खिसक गई है। उन लोगों के अरमानों पर पानी फिर गया था। शायद उन लोगों का अरमान था कि बेटे की शादी अपनी बेटी की तरह ही किसी सुशील लड़की से करेंगे, जो आकर इस घर को मंदिर में बदल दे और अमर के जीवन में खुशियाँ भर दे और अमर को खुशहाल रखे।
लेकिन, अमेरिकी लड़की से विवाह की खबर ने जैसे दोनों की खुशियों पर पानी फेर दिया था। अमर भी अपने माता-पिता की इच्छा के अनुसार भारतीय लड़की से अपनी शादी करना चाहता था। किंतु, कुछ ऐसी परिस्थितियाँ बनीं, अमर को उस अमेरिकन लड़की से शादी करनी पड़ी।
इस तरह पहले ऑफिस के कार्य के कारण और अब माता-पिता के द्वारा इस शादी को पसंद न किए जाने के कारण अमर अपने माता-पिता से मिलने नहीं जा पा रहा था। किंतु अमर की पत्नी सोफिया बार-बार अमर से जिद करती रहती थी अपने सास और ससुर से मिलने के लिए।
एक बार सोफिया के बहुत जिद करने पर अमर हिम्मत करके अपने घर दीपावली पर आया, वह भी बिना अपने माता-पिता को बताए।
अमर को पहले से ही पता था कि माँ और पिता जी दोनों ही उससे नाराज हैं। इस कारण से वह अपनी पत्नी को घर के गेट पर ही रोककर घर के अंदर दाखिल हुआ और जैसे ही कॉल बेल बजाया, तो उनकी माता जी ने दरवाजा खोला तो एकाएक अमर को देखकर वह अवाक-सी हो गई और पता नहीं उनको ये याद था कि नहीं कि अमर ने एक गोरी लड़की से विवाह कर लिया है जो उनके नाराजगी का मूल कारण था अमर से।
जैसे ही अमर अपनी माता जी का पैर छूने के लिए झुका, उसको उसकी माता जी ने गले लगा लिया और भावनाओं का ऐसा बहाव चला कि माँ का कंठ भीग गया, तो अमर का शर्ट। शायद यह एक-दूसरे से गिले-शिकवे दूर होने की निशानी थी या एक माँ का अपने बेटे से और एक बेटे का अपनी माँ से इतने सालों के बाद मिलने के कारण भावनाओं का अतिरेक था।
जब दोनों ने अपने को कुछ संभाला, तो एकाएक उसकी माँ को अमर की पत्नी की याद आई। उसने अमर की ओर देखते हुए पूछा कि बहू कहाँ है, बहू साथ नहीं आई है क्या?
“माँ, वह भी साथ आई है, लेकिन वह गेट पर ही रुकी हुई है।”
“अरे बेटा! तू बहू को गेट पर खड़ा किया हुआ है, तुझे शर्म नहीं आ रही है। घर की बहू गेट पर खड़ी हुई है।”
“नहीं माँ, वह खुद ही घर में आने से डर रही थी।”
“अरे वह इस घर की बहू है, इस घर की इज्जत है और तू उसे गेट पर खड़ा करके चला आया है। कुछ दिनों पहले तक या यूँ कहें कि अमर का अपने मन के मुताबिक गोरी मेम से शादी कर लेने के कारण माँ और बाप के मन में उसके प्रति जो नफरत की ज्वाला पैदा हो गई थी, वह उसके एक मुलाकात के साथ ही प्रेम में बदल गई थी।
हमारे जीवन में ऐसे ही बहुत समय होता रहता है जब अपने बहुत ही नजदीकी व्यक्ति से किसी बात पर विवाद हो जाए या कभी किसी बात पर विभेद हो जाए, तो बिल्कुल ही उधर से मुँह मोड़ लेते हैं। लेकिन जैसे ही हम अपने मन में प्रेम का भाव भरकर उनसे मिलते हैं, तो सारे गिले-शिकवे दूर हो जाते हैं। इस बात का एहसास लगभग सभी व्यक्तियों में है, लेकिन अपना अहम पहले कौन तोड़े, इस भाव ने आज तक कितने रिश्तों को तोड़कर रख दिया है।
इधर, अमर अपनी पत्नी को गेट पर खड़ा करके घर के अंदर जैसे ही दाखिल हुआ, उसकी पत्नी उछलकर घर के अंदर वहीं खड़े-खड़े झाँककर देखने लगी कि देखें किससे मिलते हैं और इनका स्वागत कैसे किया जाता है या अभी भी मेरे कारण माँ और पिता जी नाराज हैं।
उसने देखा कि अमर के द्वारा कॉल बेल दबाने पर जैसे ही किसी महिला (शायद वह माता जी ही थीं) ने दरवाजा खोला और जैसे ही झुककर उस महिला का पैर छूने को हुआ, तो उस महिला ने अमर को अपने गले से लगा लिया। यह उसके लिए एक आश्चर्य मिश्रित घटना थी जिसमें औपचारिकता का कोई स्थान नहीं था। लगता था कि जैसे माँ और बेटे में प्रेम की वर्षा हो रही थी।
आज तक उसने अमेरिका में औपचारिकता को ही संबंधों में महसूस किया था जहाँ संबंधों में मधुरता व प्रेम न होकर प्रेम प्रदर्शन ही ज्यादा होता है।
अब, अमर की पत्नी सोफिया को विश्वास हो गया था कि माँ की नाराजगी हम लोगों से दूर हो गई है।
इस तरह के कुछ और तरह-तरह के विचार सोफिया के मन में चल रहे थे कि इतने में क्या देखती है कि माँ और अमर की छोटी बहन दो थाली में थोड़ा पानी और फूल डालकर सोफिया के सामने उपस्थित हुए। अभी सोफिया कुछ समझ पाती कि अमर की बहन माधवी ने अपनी भाभी को गले लगा लिया।
माधवी के द्वारा अपनी भाभी को इस तरह से गले लगाने पर सोफिया दूसरा हाथ अपने बच्चे से छुड़ाकर माधवी से कुछ इस तरह से आलिंगनबद्ध हुई कि जैसे लग रहा था मानो वह इस छड़ के लिए प्यासी थी।
माधवी का एक तरफ का कंधा भीग गया, तो सोफिया का दूसरे तरफ का कंधा भीग गया। थोड़ी देर बाद वह दोनों कुछ संयत हुईं, तो सोफिया अपने को संभालते हुए माँ का पैर छूने के लिए आगे बढ़ी तो माँ ने अपनी बहू को गले से लगा लिया और बोलने लगी, “यह दिन देखने के लिए आँखें तरस रही थीं।”
और दोनों ने एक-दूसरे ऐसे पकड़कर गले लगा लिया जैसे कोई माँ और बेटी बहुत दिनों के बाद मिले हों।
इधर अमर की बहन माधवी अमर के छोटे बेटे को गोद में लेकर बड़े बेटे के बालों व गालों पर हाथ फेरते हुए उससे पूछ रही थी कि अपने बाबा, दादी व बुआ से मिलने का मन नहीं हो रहा था क्या?
इधर दोनों बेटे के लिए यह कौतूहल भरा दृश्य था। इतनी आत्मीयता और इतना प्रेम किसी बाहरी व्यक्ति या सगे संबंधियों द्वारा पहली बार महसूस हो रहा था। बच्चे भी प्यार को बहुत ही अच्छी तरह महसूस करते हैं और ये इन बच्चों के द्वारा महसूस किया जा रहा था।
उधर अमर खड़ा-खड़ा अपने को कोस रहा था कि मैं क्यों नहीं पहले मिलने यहाँ से आ सका? क्या होता, बहुत होता माता जी और पिता जी थोड़ा नाराज ही न होते।
फिर नाराजगी अपने आप ही धीरे-धीरे मेरे और सोफिया के अच्छे व्यवहार से दूर हो जाता।
माता-पिता अपने बच्चे को तो वैसे ही खुश देखना चाहते हैं। उनकी नाराजगी तुरंत दूर हो जाती है जैसे उनसे उनके बच्चे हँसकर दो शब्द बात दें। उनकी नाराजगी तुरंत दूर हो जाती है।
इधर अमर के मन में तरह-तरह के विचार आ रहे थे कि अभी पिता जी से मिलेंगे तो उनका सामना किस तरह से करेंगे?
उधर, अमर की माँ और उसकी बहू कुछ संयत हुईं, तो माधवी बोली—”आओ भाभी, चलो घर में चलें। अपना पैर इन दोनों थाली में रखकर चलना। ससुराल में पहली बार बहू का पैर जमीन पर नहीं पड़ना चाहिए इसलिए अपना पैर इन थालियों में ही रखकर चलना।”
इस तरह थाली में पैर रखते हुए बहू घर के अंदर दाखिल हुई।
माँ ने अमर और बहू से बोला कि जल्दी से स्नान इत्यादि करके तैयार हो जाओ। अभी तुम्हारे पिता जी भी आ रहे होंगे।
इधर बेटे और बहू, ईशान और शशांक को लेकर स्नान इत्यादि करने चल दिए और उधर थोड़ी ही देर में अमर के पिता जी ने दरवाजे पर दस्तक दी।
जैसे ही अमर की माता जी ने दरवाजा खोला, अमर के पिता जी ने प्रश्नभरी नजरों से देखकर पूछा कि कोई आया है क्या?
“हाँ, लेकिन मैं अभी नहीं बताऊँगी, पहले आप अनुमान लगाइए और बताइए कौन है?”
“मैं ऐसे कैसे अनुमान लगा सकता हूँ? लेकिन एक बात मैं तुमसे सच में बोलता हूँ, आज…”
ही भोर में मैंने सपना देखा है कि अचानक अमर घर पर बिन बताए ही आया है और तुम्हारे गले मिलकर तो मेरे चरणों पर गिर कर क्षमा प्रार्थी के भाव से बोल रहा है कि आप दोनों लोग मुझे क्षमा करिये, मैं बस इसी कारण से घर पर नहीं आ रहा था कि आप लोग मुझसे बहुत ही नाराज हैं, तो मैं उससे गले लगा कर बोल रहा हूँ कि कैसी नाराजगी बरखुरदार, यह मेरे लिए कितने गर्व की बात है? तूने जिसका एक बार हाथ पकड़ा, कितनी भी विकट परिस्थिति आई, तूने उसका हाथ नहीं छोड़ा।
तुम तो उसकी बहू को देखकर फूले नहीं समा रही हो। पता नहीं यह बात कितना सत्य है या होगा? मैं नहीं जानता।
उन्होंने अपनी पत्नी से कहा—”यह लो श्यामा, उधर से आ रहा था, तो गणेश मिष्ठान भंडार से थोड़ा मीठा लेते आया था।”
“आपका सपना बिल्कुल ही सत्य है। अमर और उसकी पत्नी तथा दोनों हमारे फूल से पोते भी आए हैं। अपने पोतों को देखकर मेरी आत्मा गौरवान्वित हो रही थी, सही बता रही हूँ कि मैं अपनी गोद से उनको छोड़ना नहीं चाह रही थी।”
अभी इस तरह की वार्ता हो रही थी कि इसी बीच अमर और उसकी पत्नी बच्चों के साथ बैठक कक्ष में प्रवेश करते हैं।
जैसे ही अमर ने अपने पिता जी को कुछ संकोच, किंतु सम्मान भरी नजरों से देखा, अपने पिता की ओर बढ़ा और अपने पिता जी का चरण छूने के लिए आगे झुका ही था कि पिता जी ने अमर को उठाकर गले लगा लिया और पीठ पर थपकी देते हुए तथा अमर का मुख अपने मुख के सामने करते हुए बोले कि याद नहीं आ रही थी क्या? चलो मेरी याद नहीं तो अपने माँ की तो याद आती रहती होगी।
“पापा, अब न ही कुछ बोलिए, जो भी गलती है, वह मेरी गलती है। सोफिया का हाथ पकड़ लेने के बाद मुझे लगा कि आप लोग मुझसे बहुत ही नाराज हैं। इसी डर के नाते मैं आ नहीं रहा था, जबकि सोफिया बार-बार आप लोगों से मिलने की जिद करती रहती थी। वही जिद करके आप लोगों से मिलने के लिए लेकर आई है। मुझे तो फिर भी डर लग रहा था कि आप कुछ उसके सामने उसको लेकर अपनी नाराजगी न प्रकट करें।”
अभी दोनों लोगों के बीच ये आपस के गिले-शिकवे की वार्ता हो ही रही थी कि सोफिया अपने दोनों बच्चों के साथ आगे बढ़ी और अपने फादर-इन-ला (ससुर) का चरण स्पर्श करने हेतु आगे झुकी ही थी कि अखंड बाबू बहू से दूर हटते हुए बोले—
“नहीं बेटा, ऐसा नहीं, तुम लोगों को देखने के लिए ये आँखें तरस रही थीं। ये पता नहीं किस पुण्य का प्रताप है कि बहू तुम लोगों के कदम बिना किसी आशा के अचानक ही इस घर में पड़े।”
इधर अखंड बाबू भावनाओं का अतिरेक अपनी बातों से प्रकट कर रहे थे, उधर उनके पोते अपने बाबा का चरण स्पर्श करने के लिए आगे बढ़े, तो अखंड बाबू ने झुककर दोनों को गले लगा लिया, जैसे कि उनके जिगर का टुकड़ा मिल गया और ऐसे ही कुछ देर तक सीने से चिपकाए रखा, जैसे लगता था कि जिस सुख से आज तक वंचित रह गए थे, उसको छोड़ना नहीं चाहते थे।
यह सारा दृश्य सोफिया को हैरानी में डालने वाला था, क्योंकि अभी तक उसने जिस प्रेम को देखा था, अनुभव किया था, उसमें दिखावटीपन और बुद्धिगत प्रेम ज्यादा था, उसमें इस तरह के आत्मीय प्रेम का कोई दर्शन न था।
वह बार-बार अपने को कोस रही थी—”मैं क्यों नहीं अमर को लेकर यहाँ मिलने आ सकी? मैं इतने दिनों तक इस आत्मीय सुख से वंचित रही और मम्मी-पापा को भी इस आत्मीय सुख से वंचित रखा।”
इस तरह के तमाम भाव सोफिया के मन में चल रहे थे।
वह वहीं एक किनारे खड़े होकर अपने मन की इन भावनाओं से ओतप्रोत-सी हो गई थी। अब उसकी स्थिति ऐसी हो गई थी कि उसके कंठ और आँखों में एक संग्राम-सा हो चला था कि कौन पहले एक दूसरे पर विजय पाता है।
अन्त में आँसुओं ने विजय पाई। कुछ देर तक सोफिया ऐसे ही अपना अश्रुबुँद खोकर यूँ ही खड़ी थी कि माधवी कमरे में प्रवेश कर बोली कि आइए खाना तैयार है।
और जब वह अपनी भाभी की तरफ मुखातिब हुई, तो देखती है कि भाभी की आँखों से आँसू निकल रहे हैं। वह अपनी भाभी के पास जाकर इन खुशी के आँसुओं को पोंछकर भाभी को उसने गले लगाया, तो भाभी उससे बोल पड़ी कि क्या बताऊँ जिस सुख का मैं यहाँ आकर आनंद ले सकती थी और आप लोगों को आनंद दे सकती, उस सुख से कितने सालों तक मैं वंचित रही और आप लोग भी वंचित रहे, वह भी केवल एक काल्पनिक डर के कारण।
“अच्छा भाभी, अब चलिए डाइनिंग टेबल पर बैठकर खाना खाते हैं।”
जब सभी लोग डाइनिंग टेबल पर बैठकर खाना खाने लगे, तो अमर के पापा ने बहू की तरफ मुखातिब होते हुए बोला कि बहू काल्पनिक भय ने इस दुनिया में रिश्तों के बीच में जो नुकसान पहुँचाया है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। ठीक यही बात अमर और तुम्हारे साथ भी हुआ।
“हाँ, जरूर शुरू में मैं अमर से नाराज था, किंतु नाराजगी के बावजूद जब मैंने देखा कि अमर ने तुम्हारे हाथ को नहीं छोड़ा, तो मैं अंदर ही अंदर इतना खुश हुआ कि उसको मैं शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता हूँ। इसका कारण केवल एक था कि सनातन संस्कृति में यदि आप एक बार जिसका हाथ पकड़ लें जीवनसाथी बनाने के लिए तो उसका हाथ कितना भी विकट परिस्थिति आये छोड़ना नहीं है।
इस बात को मैंने अमर में देखा कि यह मेरे लिए एक गौरवान्वित करने वाली बात थी। बहू इस बात को सनातनी शादी विवाह में भी देखा जा सकता है। जब शादी के मंडप में दूल्हा और दुल्हन की शादी की रस्में पूरी हो रही होती हैं तो वहाँ पर थाल में धान का भूना हुआ लावा रखा हुआ होता है जो इस बात को दर्शाता है कि कितनी भी विकट परिस्थिति आ जाए, किंतु जिसका आप ने हाथ थामा है, उसको छोड़ना नहीं है, क्योंकि धान अर्थात पैडी को भूनने पर भी उसका छिलका लावे को छोड़ता नहीं है। वह उसको पकड़े ही रहता है। वैसे भी सनातनियों में विवाह एक संस्कार है न कि एक समझौता है।”
अमर की बहन ने अपने पिता की बात को बीच में काटते हुए बोला—”पापा! आप भी न? भाभी को आज पूरे सनातन धर्म का पाठ पढ़ा देंगे। हमें भी भाभी से बात करने का समय दीजिए न।”
“अरे क्यों नहीं और मैं कोई पाठ नहीं पढ़ा रहा हूँ, बस एक तक की बात आई, तो मैं अपने मन के भावों को व्यक्त कर दिया और कोई बात नहीं थी। अच्छा ठीक है, अब तुम अपनी भाभी से बात करो।”
जैसे ही खाना खाकर डाइनिंग टेबल से उठे माधवी अपनी भाभी को लेकर अपने कमरे में चली गई और दोनों आपस में एक से एक बात करने में मशगूल हो गईं, जैसे लगता था कि अरसे बाद दो सहेलियाँ मिली हों और उनकी बातों का ही अंत न हो।
“अच्छा भाभी, ये बताओ कि भैया से आप कैसे मिलीं? मैं नहीं बताऊँगी। नहीं, आपको बताना पड़ेगा, नहीं तो मैं आपको छोड़ूँगी नहीं। अच्छा छोटी, चलो जिद कर रही हो तो बताए देती हूँ।
मेरे घर के बगल में एक भारतीय परिवार रहता था। उनके घर मेरा आना-जाना था। उनके पारिवारिक कार्यक्रमों में मेरा आना-जाना रहता था। उन कार्यक्रमों और तीज-त्योहारों को मैं दिल से इतना पसंद करती थी कि उनको मैं अपने शब्दों में या फिर अपनी भावनाओं के द्वारा भी नहीं व्यक्त कर पाऊँगी।
पता नहीं वे तीज-त्योहार, वे पारिवारिक प्यार, परिवार का एक-दूसरे के प्रति समर्पण ने क्या जादू कर रखा था कि मैं अनायास ही उन तीज-त्योहारों के प्रति दीवानी-सी रहती थी कि उनमें शामिल होने के लिए व्याकुल-सी रहती थी और जब तक मैं उसमें शामिल नहीं हो जाती थी, तो मन में एक अजीब-सी बेचैनी बनी रहती थी। उसे मैं शब्दों में नहीं व्यक्त कर सकती।
होली, दीपावली और रक्षाबंधन की तो बात ही न पूछो। होली की हुड़दंग, दीपावली की जगमगाहट और खुशियों ने मुझको सम्मोहित कर रखा था, तो रक्षाबंधन का मुझे जैसे इंतजार-सा रहता था। रक्षाबंधन वाले दिन मैं भी अपने भाई को राखी बाँधती थी और अभी भी बाँधती हूँ और खूब ढेर सारे गिफ्ट लेती हूँ और साल भर के लिए बहुत सारे गिफ्ट का वादा भी करवा लेती हूँ।”
“नहीं भाभी, तुम मुझे बातों में उलझाओ नहीं, अपनी बातों को लंबा करके मुझे छोटे बच्चों जैसे भुलवाने का प्रयास न करो। बस तुम मुझे ये बताओ कि तुम भैया से कैसे मिलीं?”
“छोटी, थोड़ा धैर्य रखो, अभी बताती हूँ।”
“नहीं, आपको अभी बताना होगा। आप सोच रही होंगी कि छोटी को धर्म की अच्छी-अच्छी बातें बता कर बातों को लंबा चौड़ा करते जाऊँगी और इसको नींद आ जाएगी, तो इसके द्वारा पूछी गई बातें इधर से उधर हो गईं, ऐसा न होने पाएगा।”
“छोटी, मैं तुझे पलझा या भुलवा नहीं रही हूँ। वह धर्म और दर्शन की बहुत-सी बातें करती गई।”
“भाभी, तुम ठीक बोल रही हो, यहाँ पर अभी भी जात-पाँत का कुछ भेदभाव है, लेकिन धीरे-धीरे पहले से बहुत ही कम हुआ है। मुझे अभी भी लगता है कि इसको दूर करने के लिए हिन्दू समाज के प्रबुद्ध लोगों को काफी काम करने की आवश्यकता है। कुछ धर्म सुधारक, समाजसेवी व्यक्ति और संगठन इसको हटाने के प्रयास में जुटे हुए हैं। आज नहीं तो कल सफलता अवश्य मिलेगी, समाज में बचाखुचा जातीय भेदभाव समाप्त हो जाएगा। फिर देखना भाभी, जाति नहीं मानवता का बोलबाला होगा। चलो छोटी, तुम्हारी कही हुई बातें सत्य हों, ऐसी मैं आशा करती हूँ और विश्व का कल्याण हो।”
“चलो भाभी, अब तो बताओ मेरी पूछी बातों का जवाब?”
“हाँ-हाँ जवाब देती हूँ, लेकिन सही बात बताऊँ, मुझे बताने में शर्म सी आ रही है।”
“नहीं भाभी, आपको बताना ही पड़ेगा।”
“छोटी, चलो सोते हैं, नींद आ रही है।”
“नहीं भाभी, आपको बताना ही पड़ेगा।”
“नहीं, अब सो जाओ। मुझे नींद आ रही है।”
“नहीं भाभी, आपको बताना ही पड़ेगा।”
“अच्छा तो सुनो, बात ऐसी है कि एक बार मेरे घर के बगल के घर में मैरिज का कार्यक्रम था। उसमें हमारा परिवार भी आमंत्रित था। शायद यह ईश्वर का लिखित विधान था कि उसी मैरिज सेरेमनी में तुम्हारे भैया अमर भी आए थे।
जब जयमाल की सेरेमनी हो रही थी, तो मेरे फ्रेंड ने अमर से परिचय कराया, तो मैं अमर से शेक हैंड करते हुए उसे एक बुत की तरह निहारे जा रही थी।
कुछ क्षणों के पश्चात जब मैं इस अवस्था से बाहर निकली, तो अपने ऊपर लज्जा का भाव अनुभव करते हुए कुछ औपचारिक बातें करते हुए हम दोनों शादी में हो रहे तमाम रिचुअल्स को साथ-साथ देखने में मशगूल हो गए।
इसके साथ ही, मैं अमर से वहाँ हो रहे रिचुअल्स के बारे में कुछ पूछती, तो अमर रिचुअल्स के महत्व और उनकी प्रासंगिकता का समय-समय पर वर्णन करते जाते थे।
मैं उनकी बातों को सुनकर इतना मुग्ध थी कि मैं उसका वर्णन न कर पाऊँगी। इसके पश्चात हम दोनों ने एक साथ डिनर किया। फिर काफी रात को अपने-अपने घर को लौट आए।
किंतु, इस दिन के पश्चात मुझे लगा जैसे अमर के व्यक्तित्व ने मुझे सम्मोहित-सा कर लिया है। मैं उससे बात किए बिना रह नहीं पा रही थी, जैसे लगता था मेरा चैन कहीं खो गया है, मेरे मन की शांति उसके साँसों में बसती है, उसके दिल में बसती है।
मुझे लगता था मैं उसके बिना रह नहीं पाऊँगी। किंतु, मैं ऐसा महसूस करती थी कि अमर मुझसे बात करने में झिझक महसूस करता है। वह जल्दी से मुझसे बात करके छुट्टी पा लेना चाहता था।
उसका यह शर्मीला व झिझक भरा व्यवहार मुझे और उसकी तरफ आकर्षित करने का कार्य करता था। वह मुझसे जितना दूर जाने का प्रयास करता था, मैं उसकी ओर उतनी ही बढ़ती जाती थी, आकर्षित होती जाती थी।
यह इत्तेफाक था या यूँ कहिए कि यह ईश्वर का एक विधान था कि मेरा और अमर का घर एक ही रास्ते पर था तथा ऑफिस भी उसके ऑफिस के बगल में ही था।
अब मेरा मन बातचीत से ही न भरता था, अब मुझे उससे मिले बिना चैन भी नहीं मिलता था। अब मैं ऑफिस से जल्दी से निकलकर उस बस स्टॉप पर पहुँच जाया करती थी, जहाँ से अमर भी घर लौटने के लिए बस पकड़ते थे।
हालाँकि हमारा अमर के साथ इस तरह साथ आना-जाना, उसका शर्माना, झिझकना, नजरों का झुका होना मैं स्पष्ट रूप से महसूस करती थी और यह व्यवहार मुझे और भी रिझाती थी।
इस तरह कुछ दिनों के बाद मैं ऐसा महसूस करने लगी कि मैं अमर के बिना रह नहीं पाऊँगी, उनके बिना जीवन की कल्पना करना, किसी मछली को पानी से निकाल लेने के समान था।
इस तरह मैंने अपने मन को मजबूत करके एक दिन अपने मन की बात को अमर के सामने रखा कि अमर क्या मुझे अब भी अपनी बातों को और ज्यादा खुलकर के रखनी पड़ेगी, क्यों मेरे तरफ से इतना मुँह मोड़े रहते हो, क्यों मेरे प्रति इतना उदासीन रहते हो?
मुझे कई बार ऐसा महसूस होता है कि मैं अंग्रेजिन हूँ, क्रिश्चियन हूँ, इस कारण से भी तुम मुझसे मुँह मोड़े रहते हो।
हाँ, मैं मानती हूँ कि मैं जन्म से क्रिश्चियन हूँ, अंग्रेजिन हूँ और यह सही भी है, लेकिन यह भी जान लो कि मेरे मन में अपनत्व और मानवता में कहीं कोई कमी नहीं आयेगी।
अब तुम चाहे जो कुछ भी समझो, अब मैं तुम्हारे बिना एक पल की भी कल्पना नहीं कर सकती, मेरा एक-एक पल एक-एक युग के समान बीत रहा है और तुम्हें क्या बताऊँ। अब तुमने मुझे सम्मोहित-सा कर दिया है।
अब इस जीवन में मैं तुम्हारे सिवाय और किसी की कल्पना भी नहीं कर सकती हूँ। नहीं तो यह जीवन ऐसे ही अकेलेपन में कटेगा।
अमर, तुम कुछ बोलते क्यों नहीं, कुछ तो बोलो…?”
अमर ने बीच में बात काटते हुए बोला—”सोफिया, तुम समझ रही हो कि क्या बोल रही हो? मेरे यहाँ विवाह मन से स्वीकारा हुआ जीवनभर का साथ है। हम लोगों का ऐसा विश्वास है कि जोड़ी ईश्वर के द्वारा बनाया गया है। यहाँ पर विवाह हम लोगों को मिलाने का एक माध्यम है।
अमर तुम्हारे कहने का आशय क्या है, मैं समझी नहीं।”
“मेरे कहने का आशय तुम भी खूब समझ रही हो। अमर, तुम्हें जो कुछ भी बोलना हो, उसे स्पष्ट बोलो। उसे फ्रेजल वाक्य (मुहावरे युक्त वाक्य) के रूप में न बोलो।
मेरे कहने का आशय तुम खूब समझ रही हो, तुम देखती नहीं हो कि यहाँ पर आज जो भी मैरिज होता है, पता नहीं है कितने दिन के लिए हो रहा है। पता नहीं यहाँ के लोग किसी के साथ स्वार्थवश मैरिज करते हैं या फिर शारीरिक आकर्षण से, यह तो वही लोग जानते होंगे।
कारण जो कुछ भी हो, लेकिन यहाँ के मैरिड लाइफ में बहुत ही अस्थिरता देखता हूँ, तो इस कारण से तुम मेरे प्रति इतना उदासीन रहते हो।
आज मुझे समझ आया। नहीं, यह बात नहीं है। जो बात मेरे मन में थी, वह मैंने तुम्हारे सामने रखा। इसको अपने संदर्भ में न लो, जो यहाँ के समाज में मैं देखता हूँ, वही बात मैंने तुम्हारे सामने रखी है और इसको रखने का उद्देश्य किसी को नीचा दिखाना या किसी समाज को किसी समाज से उच्च बताना नहीं है।
रही तुम्हारे साथ शादी की बात, तो मैं अपने मन की बात तुमसे साझा करना चाहता हूँ कि जब तुम मुझसे पहली बार मिली तो मुझे लगा कि ईश्वर ने मुझे उस लड़की से मिलवाया जिसका मुझे आज तक इंतजार था, लेकिन संकोचवश मैं तुमसे अपनी इस बात को प्रकट न कर सका, मेरे फादर की यह इच्छा है कि मेरी शादी उस लड़की से करेंगे जो व्यवहार में मेरी बहन माधवी की तरह होगी और मैं अपनी बहन का दर्शन तुममें करता हूँ।
भाभी तुम भी न, मुझे बनाओ नहीं…, छोटी मैं तुम्हें…
“बना नहीं रही हूँ, अमर के द्वारा कहे गए शब्दों को अक्षरशः तुम्हारे सामने बोल रही हूँ।”
“अच्छा ठीक है भाभी, और आगे बताओ?”
“और आगे क्या बताना है? इसके बाद तुम सारी घटनाक्रमों को जानती ही हो। मेरे फादर-मदर तथा ब्रदर जैक के द्वारा मेरी अमर से शादी के लिए बार-बार आग्रह करने पर भी मम्मी व पापा के द्वारा बार-बार इंकार करने पर तथा कई बार अमर के द्वारा भी पापा व मम्मी से आग्रह करने पर भी मम्मी व पापा के द्वारा इंकार कर देने पर तथा मेरे द्वारा अमर से तथा अपने फैमिली में यह स्पष्ट बता देने पर कि मैं जब भी मैरिज करूँगी अमर के साथ, नहीं तो बिना मैरिज के ही लाइफ गुजारूँगी।
इस कारण से अमर भी मजबूर होकर मेरे साथ शादी के बंधन में बंधने को बाध्य हो गया। इस प्रकार एक बहुत ही साधारण से समारोह में हम दोनों शादी के बंधन में बंध गए।
बहन, देखना इस घर की किसी परंपराओं का यदि मेरे द्वारा अनजाने में कोई उल्लंघन होता हो, तो तुम मुझे वहीं टोक देना, मैं सोचती हूँ कि मुझसे अनजाने में कोई गलती न हो जाए और मम्मी-पापा के भावनाओं को कोई ठेस लग जाए। मम्मी-पापा मेरे में ठीक तुम्हारी ही छवि का दर्शन करें और अमर के चुनाव पर गर्व कर सकें।”
“ठीक है भाभी, तुम डरो नहीं, तुमसे कोई गलती नहीं होगा, तुम देवी हो, पूजनीय हो। मैं तुम्हारी बातों से, तुम्हारे अभी तक किए गए व्यवहारों से समझ गई हूँ और मम्मी-पापा भी इन बातों को अच्छी तरह समझ गए हैं।”
“अच्छा चलो, अब सोते हैं।”
इसी तरह कुछ दीपावली की तैयारी में तो कुछ आपसी बातचीत, हँसी-मनोरण्जन में दस दिन का समय कब बीत गया कुछ पता ही नहीं चला।
ग्यारहवें दिन दीपावली का त्योहार था। सुबह से घर पर एक से एक अधिकारी, इंजीनियर, डॉक्टर व विभिन्न क्षेत्रों के गणमान्य व्यक्तियों के साथ मेहनतकश मजदूरों, कामगारों का जैसे ताँता लग गया था। कोई भी आता, पहले अखंड बाबू का चरण स्पर्श करता और कुछ न कुछ उपहार स्वरूप मीठा इत्यादि भेंट भी करता जाता था।
अखंड बाबू इधर मीठा लेते और उधर मजदूरों, कामगारों, मेहनतकशों को उपहार स्वरूप मीठा देकर विदा करते जाते थे। यह लोग बाबू के द्वार पर हर तीज-त्योहार पर बाबू से मिलने अवश्य ही आते थे।
वे किसी आशा या लालच में बाबू से मिलने नहीं आते थे, बल्कि बाबू का निश्छल प्रेम, बाबू के द्वारा समय-समय पर उनकी सहायता करना, उनके बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का प्रबंध करना इत्यादि कार्यों के कारण उनका बाबू से ऐसा भावनात्मक लगाव हो गया था कि वे अपने को तीज-त्योहार व सामान्य अवसरों पर बिना बाबू से मिले रह न पाते थे।
अखंड बाबू आने-जाने वाले गणमान्य व सामान्य व्यक्तियों से अमर का परिचय करवाते जाते थे। इन लोगों से बातों-बातों में अमर अब जान चुका था कि उसके पिताजी ने इन लोगों के लिए कितना त्याग भरा कार्य किया है, जहाँ समाज में एक से एक अच्छे लोग किसी गरीब गुरबा के लिए एक पैसा न खर्च करते हों। वहाँ इतने परिवार के बच्चों को न केवल पढ़ाना-लिखाना, बल्कि समय-समय पर उनकी सहायता करना एक संत सरीखे, निस्वार्थ कार्य उनके पिता के द्वारा किया जाने से अमर अपने पिता के प्रति जिस गर्व का अनुभव कर रहे थे, इसको जुबान से वर्णन करना जुबान को लज्जित करने के समान था।
दीपावली के अगले दिन जब सोफिया और अमर सबके साथ नाश्ते कर रहे थे, तो सोफिया ने अपने सास-ससुर की तरफ मुखातिब होते हुए बोली कि—
“मम्मी-पापा, मुझे गर्व है कि मैं इस परिवार की बहू हूँ। ढेर सारी सुखद यादों को लेकर कल अमेरिका चली जाऊँगी। ये सुखद यादें मुझे वहाँ भी गौरवान्वित करती रहेंगी। मैं इसे ईश्वर का आशीर्वाद समझती हूँ कि मुझे उसने आप लोगों की बहू बनाया।”
“नहीं बहू, ऐसे न बोलो, पता नहीं किस अच्छे कार्य या पुण्य का फल है कि हम लोगों की तुम बहू बनी।”
जिस दिन अमर, बहू व बच्चों के साथ वापस अमेरिका जाने के लिए निकल रहे थे, केवल परिवार के लोगों की ही आँखों में आँसू न था, लग रहा था जैसे घर भी रो रहा था और पूछ रहा था—
“भैया, अब कब आओगे?”
जब अमर परिवार सहित हवाई अड्डे पर पहुँचे तो उन लोगों को वहाँ पर विदा करने के लिए पहले से ही सैकड़ों शुभचिंतक मौजूद थे। यह सारे लोग शायद अखंड बाबू व अमर को सस्नेह देकर विदा करने के लिए एकत्रित थे।
अमर सबसे हाथ मिलाते हुए और सोफिया हाथ जोड़कर और आँखों में खुशी व कृतज्ञता के आँसू लेकर तथा हाथ हिलाकर विदाई का संकेत देते हुए एयरपोर्ट के अंदर चले गये।
अखंड बाबू की सहज बुद्धि उनको बता रही थी कि यह सबकुछ केवल और केवल मानव-मानव एक समान के भाव से समाज के गरीब एवं दबे-कुचलों की सेवा का प्रतिफल है।
लेखक: गोविंद प्रसाद कुशवाहा
—संरक्षा सलाहकार (इंजी०)
वरिष्ठ मंडल संरक्षा अधिकारी कार्यालय,
पूर्वोत्तर रेलवे, लखनऊ।
समाप्त।