“शकुंतला, इंसान अपने जन्म से नहीं, बल्कि अपने कर्मों और संस्कारों से ऊंचा या नीचा होता है। भैरवी के पिता ने भले ही सड़क के किनारे बैठकर लोगों के फटे जूते सिले हों, लेकिन उन्होंने अपनी बेटी को जो शिक्षा और उच्च संस्कार दिए हैं, उनके सामने हमारी यह करोड़ों की दौलत भी बौनी है। और रही बात उम्र में दो साल बड़े होने की, तो अक्ल और समझदारी उम्र की मोहताज नहीं होती। कार्तिक को जीवन में और व्यापार में संभालने के लिए भैरवी जैसी परिपक्व हमसफर की ही जरूरत है।”
तभी कार्तिक कमरे के अंदर आया और उसने अपनी मां के घुटनों के पास बैठते हुए उनका हाथ पकड़ लिया। “मां, पापा बिल्कुल सच कह रहे हैं। मैंने पिछले एक साल में भैरवी दीदी… नहीं, भैरवी को बहुत करीब से देखा है। अगर वे मेरे साथ खड़ी न होतीं, तो मैं कभी फैक्ट्री का बोझ नहीं उठा पाता। मुझे समाज की झूठी शान नहीं, बल्कि भैरवी का साथ चाहिए। मैं उनसे ही विवाह करना चाहता हूं, बशर्ते उन्हें इस रिश्ते से कोई आपत्ति न हो।”
लुधियाना की सर्द शाम में सिंघानिया मेंशन के भीतर एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था। कभी जिस घर के आंगन में रौनक और खुशियों के ठहाके गूंजते थे, आज वहां बैंक के कुर्की के नोटिस और अस्पताल के भारी-भरकम बिलों का खौफ मंडरा रहा था। शहर के जाने-माने ‘सिंघानिया निटवियर एंड टेक्सटाइल्स’ के मालिक राजेंद्र सिंघानिया पिछले दस दिनों से शहर के एक बड़े निजी अस्पताल के आईसीयू में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे थे। उनके सबसे भरोसेमंद मैनेजर ने कंपनी के खातों में करोड़ों रुपये का ऐसा हेर-फेर किया था कि पूरी गारमेंट फैक्ट्री दिवालिया होने की कगार पर पहुंच गई थी। इस विश्वासघात और अपमान के सदमे को राजेंद्र जी बर्दाश्त नहीं कर पाए और उन्हें दिल का एक गंभीर दौरा पड़ गया।
घर के ड्राइंग रूम के एक कोने में सोफे पर बैठी उनकी बड़ी बेटी सलोनी अपने दोनों हाथों में चेहरा छिपाए सिसक रही थी। पास ही छोटी बहन प्रिया और मां शकुंतला देवी की आंखें भी रो-रोकर सूज चुकी थीं। सबसे छोटा भाई कार्तिक, जिसने अभी कुछ महीनों पहले ही कॉलेज की पढ़ाई पूरी की थी, सिर झुकाए फर्श को घूर रहा था। अचानक आई इस मुसीबत ने पूरे परिवार की कमर तोड़ दी थी।
तभी सलोनी के कंधे पर एक मजबूत और स्नेहिल हाथ ने स्पर्श किया। सलोनी ने भीगी पलकें उठाकर देखा, तो सामने उसकी बचपन की सबसे पक्की सहेली भैरवी खड़ी थी। भैरवी एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर अकाउंटेंट के पद पर काम करती थी।
भैरवी ने सलोनी के पास बैठते हुए अपने बैग से पानी की बोतल निकाली और उसे पिलाते हुए बेहद शांत किंतु दृढ़ स्वर में कहा, “देख यार सलोनी, अब रोने-धोने का वक्त खत्म हो गया है। अगर हम ही हिम्मत हार जाएंगे, तो अंकल को इस मुसीबत से बाहर कौन निकालेगा? तेरे और राजेंद्र अंकल के मेरे ऊपर अनगिनत एहसान हैं। मुझे आज भी याद है, जब मेरे बापू की छोटी सी मोची की दुकान में आग लग गई थी और मेरी स्कूल की फीस भरने तक के पैसे नहीं थे, तब तूने अपनी पॉकेट मनी से और अंकल ने बिना किसी को बताए मेरी कॉलेज तक की पूरी पढ़ाई और किताबों का खर्च उठाया था। आज वक्त आया है कि मैं उस कर्ज का एक छोटा सा हिस्सा अदा कर सकूं।”
सलोनी ने कांपती आवाज में कहा, “पर भैरवी, हालात बहुत बिगड़ चुके हैं। बैंक वाले अगले हफ्ते फैक्ट्री पर ताला लगाने वाले हैं, कारीगरों ने काम बंद कर दिया है और पापा के ऑपरेशन के लिए भी तुरंत पैसों का इंतजाम करना है। हमारे पास तो सारे रास्ते बंद हो चुके हैं।”
भैरवी ने अपने हैंडबैग की चेन खोली और उसमें से एक मोटी फाइल और मखमली डिब्बियां बाहर मेज पर रख दीं। उसने सलोनी का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा, “रास्ते कभी बंद नहीं होते सलोनी, बस उन्हें ढूंढने का हौसला चाहिए। सुन, मेरे बैंक खाते में मेरी पिछले पांच सालों की नौकरी की बचत के नौ लाख रुपये पड़े हैं, जो मैंने कल ही एफडी तुड़वाकर निकाल लिए हैं। इसके अलावा, ये मेरे कुछ सोने के गहने हैं जो मैंने पिछले साल अपनी मां के कहने पर बनवाए थे। मैंने जौहरी से बात कर ली है, इन्हें गिरवी रखने या बेचने पर हमें आराम से आठ-नौ लाख रुपये मिल जाएंगे। कुल मिलाकर हमारे पास सत्रह से अठारह लाख रुपये की रकम तैयार है।”
यह सुनते ही सलोनी, प्रिया और कार्तिक की आंखें फटी की फटी रह गईं। शकुंतला देवी भी हैरानी से भैरवी का चेहरा देखने लगीं।
सलोनी ने तुरंत ना में सिर हिलाते हुए कहा, “नहीं भैरवी! यह तेरी खून-पसीने की कमाई है, तेरी शादी के लिए जोड़े गए गहने हैं। मैं यह सब नहीं ले सकती!”
“चुप कर पगली!” भैरवी ने उसे प्यार से डांटते हुए कहा, “यह पैसा मेरा नहीं, तेरा ही है। अगर तूने मुझे पढ़ाया न होता, तो आज मैं इस काबिल ही न बनती कि यह पैसा कमा पाती। इसलिए इसे कभी वापस करने के बारे में सोचना भी मत। अब मेरी बात ध्यान से सुन, मैंने कल रात भर जागकर फैक्ट्री की बैलेंस शीट और बैंक के कागजों का पूरा अध्ययन किया है। हमारे पास एक सटीक योजना है।”
भैरवी ने मेज पर कागज फैलाते हुए समझाना शुरू किया, “इस अठारह लाख की राशि में से अगले सोमवार को हम सबसे पहले छह लाख रुपये बैंक में जमा करेंगे, जिससे हमारी रुकी हुई किस्त और ओवरड्यू ब्याज चुकता हो जाएगा और बैंक की नीलामी की प्रक्रिया रुक जाएगी। इसके बाद तीन लाख रुपये से हम फैक्ट्री के मजदूरों और कारीगरों का रुका हुआ आधा वेतन दे देंगे, ताकि उनका भरोसा वापस लौटे और वे काम पर लौट आएं। बचे हुए चार लाख रुपये हम अंकल के अस्पताल और आगे के इलाज के लिए अलग रखेंगे।”
कार्तिक ने उत्सुकता से पूछा, “लेकिन भैरवी दीदी, फैक्ट्री चलाने के लिए कच्चा माल यानी धागा और कपड़ा कहां से आएगा? सप्लायर्स ने तो उधार देना बंद कर दिया है।”
भैरवी मुस्कुराई और बोली, “यहीं तो असली गणित है कार्तिक। बचे हुए पांच लाख रुपये और बैंक की किस्त भरने के बाद हमें जो क्रेडिट लिमिट वापस मिलेगी, उसे हम ‘टोकन मनी’ की तरह इस्तेमाल करेंगे। हम सप्लायर्स को थोड़ा नकद पैसा देकर तुरंत कच्चा माल खरीदेंगे और रात-दिन दो शिफ्ट में प्रोडक्शन चालू करवा देंगे। मैंने दिल्ली और मुंबई के कुछ पुराने खरीदारों से बात की है, अगर हम उन्हें समय से पहले माल की डिलीवरी देंगे और दो प्रतिशत की छूट देंगे, तो वे हमें तुरंत नकद भुगतान करने को तैयार हैं। खरीदारों से जल्दी पैसा लेकर और सप्लायर्स से तीस दिन की मोहलत मांगकर, हम बीच के इस अंतराल में उसी पांच लाख को दोबारा घुमाकर और कच्चा माल खरीद लेंगे। एक बार पैसे का यह चक्र घूमना शुरू हो गया, तो फैक्ट्री के सारे पहिए अपने आप दौड़ने लगेंगे। तुम बस चिंता छोड़ दो, देखना सब बिल्कुल ठीक हो जाएगा।”
भैरवी की आंखों में गजब का आत्मविश्वास था। एक साधारण सी दिखने वाली लड़की ने जिस तरह मिनटों में करोड़ों के उलझे हुए व्यापार की गुत्थी सुलझा दी थी, उसे देखकर पूरा परिवार दंग रह गया।
सलोनी की आंखों से आंसू छलक पड़े। उसने दोनों हाथ जोड़कर भैरवी के सामने माथा नवाते हुए कहा, “भैरवी, तू मेरी सहेली ही नहीं, बल्कि इस संकट की घड़ी में साक्षात देवी बनकर हमारे घर आई है। किसी बड़े कॉलेज से एमबीए की डिग्री लिए बिना ही तेरे पास जो सूझबूझ और बड़ी से बड़ी मुसीबत का डटकर सामना करने की विलक्षण प्रतिभा है, वह किसी चमत्कार से कम नहीं है। वाह मेरी दोस्त, तेरी जय हो!”
अगले ही दिन से भैरवी की योजना पर अमल शुरू हो गया। एक तरफ सलोनी, प्रिया और शकुंतला देवी ने अस्पताल में राजेंद्र जी की देखभाल और दवाइयों की जिम्मेदारी संभाली, तो दूसरी तरफ कार्तिक ने फैक्ट्री की कमान अपने हाथों में ले ली। कार्तिक अभी नया था, उसे व्यापार की बारीकियां और बाजार के दांव-पेंच समझ नहीं आते थे। लेकिन भैरवी ने उसका पूरा साथ दिया।
सोमवार से शुक्रवार तक भैरवी अपनी कंपनी की नौकरी करती और शुक्रवार की शाम होते ही सीधा सिंघानिया फैक्ट्री पहुंच जाती। शनिवार और रविवार के पूरे दो दिन वह फैक्ट्री के ऑफिस में बैठकर एक-एक पैसे का हिसाब-किताब देखती, कार्तिक को जीएसटी, लेजर, कच्चे माल की खपत और सप्लायर्स से मोलभाव करने के गुर सिखाती। जहां कहीं भी पैसों की कमी पड़ती या किस्त अटकती, भैरवी बड़ी कुशलता से फंड को इधर से उधर एडजस्ट करके गाड़ी को रुकने नहीं देती। कार्तिक भी भैरवी की मेहनत और समर्पण को देखकर दोगुने उत्साह से काम करने लगा था। वह भैरवी की हर बात को किसी आज्ञाकारी छात्र की तरह सुनता और समझता।
महीने दर महीने बीतने लगे। घर की महिलाओं की सेवा और फैक्ट्री के सुधरते हालातों की खबर ने राजेंद्र जी की सेहत पर जादुई असर दिखाया। वे पूरी तरह स्वस्थ होकर अस्पताल से घर लौट आए। उधर फैक्ट्री में भी रौनक वापस लौट आई थी। मशीनों की खड़खड़ाहट फिर से गूंजने लगी थी।
देखते ही देखते एक साल के भीतर भैरवी की रणनीति रंग ले आई। बैंक की मासिक किस्त और ब्याज समय पर जाने लगा। खरीदारों से जो एडवांस लिया गया था, माल की समय पर सप्लाई देकर वह भी पूरा चुकता कर दिया गया और बाजार के सप्लायर्स का भुगतान भी तय तारीख से पहले होने लगा। यहां तक कि जो अतिरिक्त पांच लाख रुपये का ओवरड्राफ्ट लिया गया था, वह भी बैंक को वापस कर दिया गया। हां, पूर्व मैनेजर द्वारा किए गए बड़े गबन के कारण बैंक का जो मुख्य टर्म लोन इस साल खत्म होना था, उसकी अवधि जरूर बैंक से बात करके तीन साल आगे बढ़वा दी गई थी, लेकिन अब उसकी किस्तें भरने में कोई परेशानी नहीं थी।
जब दिवाली का त्योहार आया, तो सिंघानिया टेक्सटाइल्स ने अपने सभी मजदूरों और कर्मचारियों के वेतन में दस प्रतिशत की स्थायी बढ़ोतरी के साथ-साथ चालीस प्रतिशत का दिवाली बोनस घोषित किया। जिस फैक्ट्री के बंद होने की खबरें उड़ रही थीं, वहां बोनस बंटता देख पूरे बाजार में राजेंद्र सिंघानिया और उनके परिवार की साख पहले से भी ज्यादा मजबूत हो गई।
सिंघानिया परिवार के भीतर अब भैरवी का स्थान किसी बाहरी इंसान या सिर्फ सलोनी की सहेली भर का नहीं रह गया था। राजेंद्र जी तो उसे अपनी तीसरी बेटी ही मानते थे। घर के हर छोटे-बड़े फैसले में भैरवी की राय ली जाने लगी थी। कार्तिक के मन में भी भैरवी के प्रति सम्मान के साथ-साथ एक गहरा और पवित्र प्रेम पनप चुका था। वह भैरवी की सादगी, उसकी बुद्धिमत्ता और उसके निस्वार्थ स्वभाव का कायल हो चुका था। राजेंद्र जी की अनुभवी आंखों से भी अपने बेटे के मन का यह भाव छिपा नहीं रह सका।
दिवाली के कुछ दिनों बाद, एक रात जब राजेंद्र जी अपने कमरे में आराम कर रहे थे और उनकी पत्नी शकुंतला देवी उन्हें दूध का गिलास दे रही थीं, तब राजेंद्र जी ने बड़े ही शांत और गंभीर स्वर में अपनी बात रखी।
“शकुंतला, अब सलोनी के रिश्ते की बात तो पक्की हो ही गई है। मैं सोच रहा हूं कि क्यों न हम इसी साल कार्तिक के हाथ भी पीले कर दें? और मेरे विचार से हमारे कार्तिक के लिए भैरवी से योग्य, संस्कारी और सुलझी हुई जीवनसंगिनी पूरी दुनिया में ढूंढने से भी नहीं मिलेगी। जिस लड़की ने पराई होकर भी हमारे कुल की लाज बचाई, अगर वह इस घर की बहू बनकर आ जाए, तो हमारा घर स्वर्ग बन जाएगा। तुम्हारा क्या विचार है?”
पति की बात सुनकर शकुंतला देवी के हाथ अचानक रुक गए। उनके चेहरे पर एक अजीब सी झिझक और असमंजस के भाव उभर आए। वे पलंग के किनारे बैठते हुए दबी जुबान में बोलीं, “जी… आपकी बात तो बिल्कुल सही है। भैरवी ने हमारे लिए जो किया है, उसका एहसान हम जन्मों तक नहीं उतार सकते। लड़की में कोई बुराई नहीं है, लाखों में एक है… सिवाय इसके कि वह हमारे कार्तिक से उम्र में लगभग दो साल बड़ी है। और फिर… आप तो जानते ही हैं कि वह अनुसूचित जाति से आती है, उसके पिता बाजार में जूते गांठने का काम करते थे। हमारी बिरादरी और यह ऊंचा समाज क्या कहेगा? लोग तरह-तरह की बातें बनाएंगे कि सिंघानिया साहब ने एहसान चुकाने के लिए अपने बेटे का रिश्ता एक निचली जाति की बड़ी उम्र की लड़की से कर दिया।”
शकुंतला देवी की बात सुनकर राजेंद्र जी के चेहरे पर क्रोध नहीं, बल्कि एक गहरी पीड़ा और करुणा की मुस्कान तैर गई। उन्होंने दूध का गिलास साइड टेबल पर रखा और अपनी पत्नी की आंखों में झांकते हुए बड़े ही सधे हुए शब्दों में कहा, “शकुंतला, जिस ‘समाज’ और ‘बिरादरी’ की तुम आज दुहाई दे रही हो ना, मुझे जरा यह बताओ कि जब मैं अस्पताल के बिस्तर पर बेहोश पड़ा था और बैंक वाले हमारे घर की नीलामी का ढोल पीटने वाले थे, तब तुम्हारा यह ऊंचा समाज कहां था? तब हमारे किसी अमीर रिश्तेदार या बिरादरी के ठेकेदार ने आगे बढ़कर यह क्यों नहीं कहा कि सिंघानिया जी की इज्जत हमारी इज्जत है?”
शकुंतला देवी ने नजरें झुका लीं, उनके पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था।
राजेंद्र जी ने आगे कहा, “तब यही भैरवी आगे आई थी शकुंतला। उस वक्त तुमने यह क्यों नहीं देखा कि जो नौ लाख रुपये और सोने के गहने वह तुम्हारे चरणों में रख रही है, वे किस जाति के हैं? जब उसके दिए पैसों से मेरे सीने में स्टेंट डाला जा रहा था और मेरी सांसें बचाई जा रही थीं, तब किसी ने यह क्यों नहीं पूछा कि इस पैसे की उम्र क्या है और इसकी जाति क्या है? संकट के समय तो वह हमें साक्षात देवी नजर आ रही थी, और आज जब उसे अपने परिवार का हिस्सा बनाने और सम्मान देने की बारी आई, तो हमें उसकी जाति और दो साल की उम्र दिखने लगी?”
कमरे के दरवाजे के बाहर से गुजर रहे कार्तिक, सलोनी और प्रिया के कदम भी पिता की आवाज सुनकर वहीं ठिठक गए। वे तीनों भी चुपचाप दरवाजे के पास आकर खड़े हो गए।
राजेंद्र जी की आवाज में अब एक दृढ़ता थी, “शकुंतला, इंसान अपने जन्म से नहीं, बल्कि अपने कर्मों और संस्कारों से ऊंचा या नीचा होता है। भैरवी के पिता ने भले ही सड़क के किनारे बैठकर लोगों के फटे जूते सिले हों, लेकिन उन्होंने अपनी बेटी को जो शिक्षा और उच्च संस्कार दिए हैं, उनके सामने हमारी यह करोड़ों की दौलत भी बौनी है। और रही बात उम्र में दो साल बड़े होने की, तो अक्ल और समझदारी उम्र की मोहताज नहीं होती। कार्तिक को जीवन में और व्यापार में संभालने के लिए भैरवी जैसी परिपक्व हमसफर की ही जरूरत है।”
तभी कार्तिक कमरे के अंदर आया और उसने अपनी मां के घुटनों के पास बैठते हुए उनका हाथ पकड़ लिया। “मां, पापा बिल्कुल सच कह रहे हैं। मैंने पिछले एक साल में भैरवी दीदी… नहीं, भैरवी को बहुत करीब से देखा है। अगर वे मेरे साथ खड़ी न होतीं, तो मैं कभी फैक्ट्री का बोझ नहीं उठा पाता। मुझे समाज की झूठी शान नहीं, बल्कि भैरवी का साथ चाहिए। मैं उनसे ही विवाह करना चाहता हूं, बशर्ते उन्हें इस रिश्ते से कोई आपत्ति न हो।”
सलोनी और प्रिया ने भी अंदर आकर अपनी मां को गले लगा लिया और कहा, “हां मां, भैरवी जैसी भाभी मिलना तो हमारे पूरे परिवार का सौभाग्य होगा। आप समाज की चिंता छोड़ दीजिए, जब हम सब एक साथ खड़े होंगे, तो यही समाज कल हमारी मिसाल देगा।”
पति और बच्चों की तार्किक और भावनात्मक बातों ने शकुंतला देवी की आंखों पर पड़ा सदियों पुरानी रूढ़िवादिता का पर्दा एक झटके में हटा दिया। उन्हें अपनी छोटी सोच पर गहरा पछतावा हुआ। उनकी आंखों से पश्चाताप के आंसू बह निकले। उन्होंने अपने आंचल से आंखें पोंछते हुए कहा, “मुझे माफ कर दीजिए आप सब। मैं ही दुनियादारी के झूठे दिखावे में अंधी हो गई थी और हीरे की परख करने में चूक गई। कल सुबह ही हम सब खुद भैरवी के घर जाएंगे और उसके माता-पिता से हाथ जोड़कर अपने कार्तिक के लिए भैरवी का हाथ मांगेंगे।”
अगली सुबह सिंघानिया परिवार की बड़ी सी कार जब शहर की एक साधारण सी बस्ती में भैरवी के छोटे से घर के सामने रुकी, तो पूरा मोहल्ला देखता रह गया। शकुंतला देवी ने खुद आगे बढ़कर भैरवी को अपने गले से लगा लिया और उसके माथे को चूमते हुए अपने घर की लक्ष्मी बनने का आशीर्वाद मांगा। भैरवी की आंखों में आंसू थे, लेकिन ये आंसू दुख के नहीं, बल्कि उस सम्मान और प्रेम के थे जो उसने अपनी सच्ची दोस्ती और काबिलियत के दम पर कमाया था।
कुछ ही महीनों बाद, लुधियाना के सबसे बड़े मैरिज पैलेस में कार्तिक और भैरवी का विवाह बड़ी धूमधाम से संपन्न हुआ। जिस समाज के ताने मारने का डर शकुंतला देवी को सता रहा था, आज वही समाज मंच पर खड़ी इस आदर्श जोड़ी पर फूल बरसा रहा था और राजेंद्र सिंघानिया के इस ऐतिहासिक फैसले की मुक्त कंठ से प्रशंसा कर रहा था।
दोस्तों, क्या आपको भी लगता है कि आज के आधुनिक युग में भी जब शादी-ब्याह की बात आती है, तो लोग इंसान के गुणों और संस्कारों से ज्यादा उसकी जाति और उम्र को महत्व देते हैं? राजेंद्र सिंघानिया जी के इस फैसले के बारे में आपकी क्या राय है, हमें नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें, धन्यवाद।
लेखिका : अपर्णा शुक्ला