“अबे ओ देवदास! चाय पिएगा या इसमें डुबकी लगाने का इरादा है?” उसके जिगरी दोस्त और चचेरे भाई शौर्य ने टेबल पर जोर से हाथ पटकते हुए कहा।
आरुष ने चौंकते हुए शौर्य को देखा और फिर एक गहरी सांस लेकर मुस्कुराते हुए बोला, “यार शौर्य… क्या आंखें थीं वो! कसम से, ऐसा लगा जैसे झील के शांत पानी में किसी ने अचानक कोई कंकड़ फेंक दिया हो। मैं रात भर सो नहीं पाया यार, जब भी आंखें बंद करता हूं, बस वही दो बड़ी-बड़ी, काजल से सजी, बोलती हुई आंखें मेरे सामने आ जाती हैं। मुझे तो लगता है मैं गया काम से!”
शौर्य ने अपना माथा पीट लिया और अपनी कुर्सी आरुष के करीब खींचते हुए बोला, “भाई मेरे, सुबह-सुबह कौन सा सस्ता नशा कर लिया है तूने? किसकी आंखों की बात कर रहा है? कौन है वो? किस डिपार्टमेंट की है? नाम क्या है उसका?”
आरुष ने अपनी ठोड़ी हाथ पर टिकाई और हवा में देखते हुए बड़े ही रूमानी अंदाज़ में कहा, “यही तो सबसे बड़ा रहस्य है मेरे भाई! न मुझे उसका नाम पता है, न उसका ठिकाना, और सच कहूं तो मैंने अब तक उसका पूरा चेहरा भी नहीं देखा है। कल शाम जब मैं लाइब्रेरी से पुरानी किताबें लेकर निकल रहा था, तो बारिश शुरू हो गई थी। कॉरिडोर के कोने में वो खड़ी थी—चेहरे पर बांधनी प्रिंट का दुपट्टा बंधा हुआ था, सिर्फ उसकी आंखें दिख रही थीं। मेरे हाथ से किताबें फिसलीं, उसने झुककर उठाईं और बिना एक शब्द बोले मेरी तरफ देखा। बस उस एक पल की नज़र ने मेरा सारा सुकून छीन लिया।”
“हद है यार आरुष!” शौर्य ने उसके कंधे पर एक हल्का मुक्का मारते हुए कहा, “तू क्या अठारहवीं सदी का शायर बन रहा है? बिना चेहरा देखे, बिना बात किए किसी से प्यार कैसे हो सकता है? तुझे प्यार-व्यार नहीं हुआ है, तुझे बस मौसम का असर हुआ है। घर पर तेरे पापा और दादी तेरे करियर को लेकर इतने सीरियस हैं और तू यहां सिर्फ दो आंखों के पीछे अपना चैन लुटाए बैठा है। चल उठ, क्लास का टाइम हो रहा है।”
“तू मुझे पागल कह ले, दीवाना कह ले या सरफिरा समझ ले शौर्य, लेकिन मेरा दिल कहता है कि उन आंखों में जो सच्चाई और सादगी मैंने देखी है, वो किसी आम इंसान में नहीं हो सकती। और रही बात ढूंढने की, तो अगर मेरी भावनाएं सच्ची हैं, तो किस्मत खुद-ब-खुद उसे मेरे सामने ले आएगी,” आरुष ने पूरे विश्वास के साथ कहा।
शौर्य अभी उस पर हंस ही रहा था कि तभी टी-स्टॉल के बगल वाली बुकशॉप पर एक नीले रंग की स्कूटी आकर रुकी। उस पर वही लड़की बैठी थी, जिसके चेहरे पर आज भी वही बांधनी दुपट्टा बंधा था, और उसके साथ एक बारह-तेरह साल का छोटा लड़का भी था। लड़की ने स्कूटी खड़ी की और अपनी सहेली के साथ टी-स्टॉल के ही एक कोने की टेबल पर आकर बैठ गई।
आरुष के हाथ से कुल्हड़ छूटते-छूटते बचा। उसने टेबल के नीचे से शौर्य का हाथ कसकर दबाया और फुसफुसाते हुए कहा, “शौर्य… शौर्य उधर देख! कोने वाली टेबल पर! वही हैं वो आंखें, जिनकी मैं सुबह से माला जप रहा हूं!”
शौर्य ने नज़र घुमाकर देखा। तभी उस लड़की ने पानी पीने के लिए अपने चेहरे से दुपट्टा हटाया। जैसे ही दुपट्टा हटा, आरुष की सांसें मानो वहीं थम गईं। वह कोई फिल्मी हीरोइन की तरह गोरी-चिट्टी या बनावटी सुंदरता वाली लड़की नहीं थी। उसका रंग गेहुंआ था, चेहरे पर किसी भी तरह का मेकअप नहीं था, लेकिन उसके नैन-नक्श इतने सजीव, सौम्य और आकर्षक थे कि कोई भी देखता रह जाए। पर सबसे अलग बात यह थी कि उसके बाएं गाल पर नीचे की तरफ जलने का एक पुराना, हल्का सा निशान था, जिसे शायद वह दुनिया की चुभती नज़रों से बचाने के लिए दुपट्टे से ढककर रखती थी। लेकिन उस निशान के बावजूद उसकी मुस्कान में एक ऐसी पवित्रता थी, जिसने आरुष के दिल में उसके लिए सम्मान और प्यार को सौ गुना बढ़ा दिया।
आरुष तो अपलक उसे निहारने में इस कदर डूब गया कि उसे होश ही नहीं रहा। उधर उस लड़की की सहेली ने आरुष को घूरते हुए देख लिया और अपनी भौंहे तान लीं। इससे पहले कि बात बिगड़ती और उस स्वाभिमानी लड़की का ध्यान आरुष की तरफ जाता, शौर्य ने टेबल के नीचे से आरुष के जूते पर जोर से अपना पैर दे मारा।
“आह!” आरुष की तंद्रा टूटी और उसने तुरंत अपनी नज़रें झुका लीं।
“मरवाएगा क्या भाई?” शौर्य ने दांत पीसते हुए कहा, “ऐसे टकटकी लगाकर देखेगा तो अभी चप्पलें पड़ जाएंगी और तेरा सारा इश्क हवा हो जाएगा। शरीफ घर की लड़की लग रही है, और देख उसके चेहरे पर शायद किसी हादसे का निशान है, इसीलिए वो दुपट्टा बांधती है। अब चुपचाप यहां से चल।”
“नहीं शौर्य, तूने देखा न? वो निशान तो उसके हौसले की निशानी लग रहा है। प्लीज यार, तू तो कॉलेज के कल्चरल ग्रुप का हेड है, किसी तरह पता कर न कि वो कौन है। मैं उससे कोई टाइमपास वाली दोस्ती नहीं करना चाहता, मुझे सच में वो बहुत खास लगी है,” आरुष की आवाज़ में पहली बार शौर्य को मजाक के बजाय एक गहरी संजीदगी दिखाई दी।
शौर्य ने जब अपने दोस्त की आंखों में इतनी सच्चाई देखी, तो उसने थोड़ा पता लगाया। शाम तक जानकारी मिली कि उस लड़की का नाम ‘मृणालिनी’ है और वह इसी कॉलेज में फाइन आर्ट्स (चित्रकला) के अंतिम वर्ष की छात्रा है। उसके साथ जो छोटा लड़का था, वह उसका छोटा भाई चिंटू है। मृणालिनी के पिता का दो साल पहले देहांत हो चुका था। तीन साल पहले दिवाली के दौरान अपने छोटे भाई को पटाखों की आग से बचाते हुए उसके चेहरे का एक हिस्सा झुलस गया था। घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण वह कॉलेज के बाद छोटे बच्चों को पेंटिंग सिखाती थी और अपनी मां श्रीमती शारदा के साथ मिलकर घर की जिम्मेदारी उठाती थी। चेहरे के उस निशान की वजह से कई बार लोगों ने उस पर ताने कसे थे, इसलिए वह अजनबियों से थोड़ा कतराती थी।
यह सब जानकर आरुष के मन में मृणालिनी के लिए जो आकर्षण था, वह अब एक गहरे आदर और समर्पण में बदल गया। आरुष खुद देहरादून के एक बेहद संपन्न और प्रतिष्ठित परिवार से था। उसके पिता श्री राजवर्धन शहर के जाने-माने आर्किटेक्ट थे और उनकी संयुक्त परिवार की परंपरा बहुत मजबूत थी। आरुष ने तय किया कि वह सीधे जाकर मृणालिनी को अपनी अमीरी या प्यार का इजहार करके असहज नहीं करेगा, बल्कि पहले उसके काम और उसके व्यक्तित्व का सम्मान करते हुए उसका विश्वास जीतेगा।
अगले हफ्ते कॉलेज में वार्षिक कला प्रदर्शनी (आर्ट एग्जीबिशन) का आयोजन होना था। शौर्य की मदद से आरुष ने इस इवेंट के मैनेजमेंट में अपना नाम लिखवा लिया। प्रदर्शनी की तैयारियों के दौरान जब मृणालिनी अपनी पेंटिंग्स लगा रही थी, तब आरुष ने बिना किसी दिखावे के उसकी मदद की। एक दिन जब मृणालिनी ऊंचे स्टूल पर चढ़कर अपनी सबसे बड़ी कैनवास पेंटिंग टांग रही थी, तभी उसका संतुलन बिगड़ा। आरुष ने फुर्ती से आगे बढ़कर कैनवास को गिरने से बचाया और मृणालिनी को भी संभाल लिया।
मृणालिनी ने घबराकर अपना दुपट्टा ठीक करना चाहा ताकि उसके गाल का निशान छिप जाए, तभी आरुष ने बड़ी ही शालीनता और कोमलता से कहा, “मृणालिनी जी, अपनी कला और अपने साहस को कभी पर्दे में मत रखिए। मैंने सुना है कि यह निशान आपने अपने छोटे भाई की जान बचाते हुए पाया था। यह तो किसी मेडल से कम नहीं है, इसे छिपाने की जरूरत आपको नहीं, बल्कि उन लोगों को अपनी सोच बदलने की जरूरत है जो सुंदरता को सिर्फ बेदाग त्वचा में तलाशते हैं।”
आरुष के इन शब्दों ने मृणालिनी के दिल के उस कोने को छू लिया, जहां सालों से समाज के तानों का दर्द जमा था। उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में नमी तैर गई। उसने पहली बार किसी लड़के के सामने बिना दुपट्टे की ओट लिए पूरे आत्मविश्वास से मुस्कुराकर कहा, “शुक्रिया आरुष जी। आपकी सोच आपकी बातों जितनी ही खूबसूरत है।”
यहीं से दोनों के बीच बातचीत का एक पवित्र सिलसिला शुरू हुआ। आरुष अक्सर उसकी पेंटिंग क्लास के बाहर इंतजार करता, उसके छोटे भाई चिंटू को गणित के सवाल समझाता और कभी-कभी मृणालिनी की मां के हाथ की बनी अदरक वाली चाय पीने उनके छोटे से पर साफ-सुथरे घर भी जाने लगा। मृणालिनी की मां शारदा जी को भी आरुष का संस्कारी स्वभाव और बड़ों के प्रति आदर भाव बहुत पसंद आया। उन्हें पता ही नहीं था कि आरुष इतने बड़े खानदान का इकलौता वारिस है, क्योंकि आरुष हमेशा एक बेहद साधारण छात्र बनकर ही उनके घर जाता था।
छह महीने बीत गए। अब कॉलेज खत्म होने वाला था। एक तरफ दोनों के दिल एक-दूसरे के लिए धड़कने लगे थे, वहीं दूसरी तरफ आरुष के घर में उसकी शादी की चर्चाएं शुरू हो गई थीं। आरुष की दादी और पिता राजवर्धन जी चाहते थे कि आरुष अब पारिवारिक बिजनेस संभाले और उनके मित्र की बेटी से शादी कर ले, जो लंदन से पढ़कर लौटी थी।
आरुष ने शौर्य से कहा, “अब वक्त आ गया है शौर्य कि मैं अपने परिवार को मृणालिनी के बारे में बताऊं। मैं चोरी-छिपे या घरवालों के खिलाफ जाकर कोई रिश्ता नहीं जोड़ना चाहता। मृणालिनी जैसी स्वाभिमानी लड़की को मैं पूरे परिवार के आशीर्वाद और सम्मान के साथ अपने घर लाना चाहता हूं।”
रविवार की शाम जब पूरा परिवार आंगन में बैठा था, आरुष ने बड़ी विनम्रता से अपने पिता और दादी को मृणालिनी के बारे में सब कुछ सच-सच बता दिया—उसकी सादगी, उसके पिता के जाने के बाद उसका संघर्ष, और उसके चेहरे के उस निशान की कहानी भी।
बात सुनकर कमरे में सन्नाटा छा गया। आरुष की दादी ने थोड़ी चिंता जताते हुए कहा, “बेटा आरुष, लड़की गुणी है यह तो अच्छी बात है, पर हमारा समाज बड़ा निष्ठुर है। कल को जब चार लोग मुंह दिखाई में उसके चेहरे का निशान देखेंगे या उसके मायके की गरीबी पर बातें बनाएंगे, तो क्या तुम और हम वो ताने सुन पाएंगे?”
आरुष ने दादी के घुटनों के पास बैठकर उनका हाथ अपने हाथों में लिया और बोला, “दादी, आपने ही तो मुझे बचपन से सिखाया है कि इंसान की पहचान उसके कुल या रूप से नहीं, बल्कि उसके गुणों और संस्कारों से होती है। आज अगर मैं सिर्फ समाज के डर से उस लड़की का साथ छोड़ दूं, जिसने अपने परिवार के लिए अपना सब कुछ झोंक दिया, तो आपकी दी हुई परवरिश पर सवाल उठ जाएगा। आप बस एक बार उससे मिल लीजिए, अगर फिर भी आपका मन न माने, तो आपका जो फैसला होगा, मैं सिर झुकाकर मान लूंगा।”
आरुष के पिता राजवर्धन जी अपने बेटे की परिपक्वता देखकर मन ही मन गर्व महसूस कर रहे थे। उन्होंने कहा, “मां जी, आरुष ठीक कह रहा है। हमें अपने बेटे की पसंद को एक बार परखना जरूर चाहिए।”
ठीक चार दिन बाद शहर के टाउन हॉल में एक बड़ी चैरिटी आर्ट एग्जीबिशन थी, जहां मृणालिनी की पेंटिंग्स भी लगी थीं। आरुष अपने माता-पिता और दादी को बिना बताए कि मृणालिनी कौन है, वहां एक सामान्य दर्शक की तरह ले गया।
हॉल के बीचों-बीच एक विशाल पेंटिंग लगी थी, जिसके सामने लोगों की भीड़ जमा थी। उस पेंटिंग में एक संयुक्त परिवार को दिखाया गया था, जहां एक बूढ़ी दादी अपने पोते-पोतियों को कहानी सुना रही थीं और आंगन में तुलसी के चौरे के पास एक दीया जल रहा था। उस पेंटिंग में रंगों का ऐसा जादू और पारिवारिक मूल्यों की ऐसी जीवंतता थी कि आरुष की दादी की आंखें भर आईं।
दादी ने पास खड़ी लड़की से पूछा, “बिटिया, यह तस्वीर किसने बनाई है? आज के ज़माने में जब बच्चे बुजुर्गों के पास बैठना पसंद नहीं करते, इतनी गहरी भावनाएं कैनवास पर किसने उतारी हैं?”
तभी मृणालिनी ने आगे बढ़कर दादी के पैर छुए और बड़ी ही मीठी आवाज़ में कहा, “अम्मा जी, यह मैंने बनाई है। मेरे दादा-दादी तो अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन मेरा हमेशा से मानना है कि जिस घर के आंगन में बुजुर्गों की छांव और उनके अनुभवों की कहानियां होती हैं, उस घर में कभी कोई दुख टिक नहीं सकता।”
मृणालिनी के संस्कार, उसकी वाणी की मिठास और उसकी उन बड़ी-बड़ी आंखों में झलकती पवित्रता देखकर दादी और राजवर्धन जी मंत्रमुग्ध रह गए। जब आरुष ने मुस्कुराते हुए आगे बढ़कर कहा, “दादी, यही हैं मृणालिनी,” तो दादी को उसके चेहरे का वह छोटा सा निशान नज़र ही नहीं आया—उन्हें तो बस एक ऐसी लक्ष्मी दिखाई दी, जो किसी भी घर को स्वर्ग बना सकती थी।
दादी ने तुरंत अपने गले से सोने की चेन उतारी और मृणालिनी के हाथों में रखते हुए उसके सिर पर हाथ फेरा, “जुग-जुग जियो मेरी बच्ची! मेरे पोते की आंखें वाकई हीरे की परख रखती हैं। रूप तो ढल जाता है बिटिया, पर जो उजाला तेरे मन में और तेरी कला में है, वह हमारे पूरे परिवार को रोशन कर देगा।”
राजवर्धन जी ने भी आगे बढ़कर मृणालिनी की मां शारदा जी को प्रणाम किया और कहा, “बहन जी, आपने अपनी बेटी को जो संस्कार दिए हैं, उसके आगे हमारी सारी दौलत फीकी है। हम चाहते हैं कि आप अपनी इस अनमोल धरोहर को हमारे घर की बहू बनने का आशीर्वाद दें, और चिंटू की आगे की पढ़ाई की जिम्मेदारी अब से अपने इस बड़े भाई यानी आरुष की होगी।”
शारदा जी की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। उधर पास खड़े शौर्य ने आरुष के कंधे पर हाथ रखा और धीरे से मुस्कुराते हुए कहा, “मान गए मेरे भाई! तेरी उन ‘दो आंखों’ वाली कहानी ने तो आज पूरे परिवार को एक नया आईना दिखा दिया।”
मृणालिनी ने शर्म और सम्मान से अपनी पलकें झुका लीं, और जब उसने दोबारा नज़रें उठाकर आरुष की तरफ देखा, तो उन मृगनयनी आंखों में अब कोई डर या झिझक नहीं थी, बल्कि एक नए, खुशहाल और सम्मानजनक भविष्य की सुनहरी चमक थी। आरुष के सच्चे प्रेम ने यह साबित कर दिया था कि जब रिश्ता बाहरी दिखावे से उठकर आत्मा और संस्कारों से जुड़ता है, तो वह न केवल दो दिलों को, बल्कि दो परिवारों को भी हमेशा के लिए एक कर देता है।
सच्चा प्रेम वही होता है जो किसी इंसान की कमियों या उसके अतीत के घावों को देखकर पीछे न हटे, बल्कि उसका संबल बनकर उसे दुनिया के सामने सिर उठाकर जीने का हौसला दे। क्या आपको भी लगता है कि आज के दौर में जीवनसाथी चुनते समय बाहरी रंग-रूप से ज्यादा इंसान के संस्कारों और उसके संघर्ष को महत्व दिया जाना चाहिए? आरुष और उसके परिवार के इस फैसले के बारे में आपकी क्या राय है? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें!
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