जानकी ने हाथ जोड़कर अत्यंत संयत स्वर में कहा, “अम्माँ जी, आप मेरी सास नहीं, मेरी माँ हैं। बापूजी मेरे पिता हैं। पिछले बारह वर्षों में मैंने इस घर की हर मर्यादा को सिर माथे रखा। पर आज आप मुझसे वह माँग रही हैं जो मेरे पास बचा ही नहीं है। जब इन्होंने एक रात चुपचाप उठकर घर छोड़ दिया था, तब इन्होंने यह नहीं सोचा था कि पीछे छूट गई औरत समाज के भेड़ियों से कैसे लड़ेगी? अपने दूधमुंहे बच्चों की भूख कैसे मिटाएगी? आपके बूढ़े जोड़ों के दर्द की दवा कहाँ से लाएगी? मैंने अपने आंसुओं को पीकर, अपने मान-सम्मान को दांव पर लगाकर दिन-रात मेहनत की। मैंने खुद को तोड़कर इस घर को जोड़ा है। आज जब बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो गए, जब जीवन का सबसे भयानक तूफ़ान गुजर गया, तब ये अपनी शांति और मुक्ति ढूँढ़ते हुए यहाँ लौट आए?”
फाल्गुन की गुनगुनी दुपहरी में कस्बे की तंग गलियों से होकर गुजरती ठंडी हवा धूल की नन्हीं परतें उड़ा रही थी। पुराने मोहल्ले के मकानों की बालकनियों से लटकती सूखती साड़ियों के बीच एक अजीब सी हलचल मची थी। उस संकरी गली में जहाँ अमूमन दोपहर के सन्नाटे में केवल फेरीवालों की सुस्त आवाजें गूँजती थीं, आज एक अजीबोगरीब शख्स के कदमों की थाप सुनाई दे रही थी। वह आदमी लगभग पचास की उम्र के पड़ाव पर दिख रहा था। बदन पर गहरा केसरिया कुरता और नीचे सादी धोती, कंधे पर एक पुराना चमड़े का झोला, और पैरों में मजबूत भूरे जूते। उसकी घनी, आधी पक चुकी दाढ़ी और सिर पर बंधा एक हल्का खादी का साफा उसे किसी भटके हुए मुसाफिर जैसा रूप दे रहे थे। उसके हाथ में पीतल के छल्लेदार पोरों वाली एक छड़ी थी, जिसे वह जमीन पर टिकाते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था।
आसपास के चबूतरों पर खेल रहे बच्चे अचानक अपने खेल छोड़कर उस अजनबी को हैरत से देखने लगे। कुछ औरतों ने खिड़कियों के परदे जरा से सरकाए। मोहल्ले के मर्द अपने-अपने कामों पर जा चुके थे और घर-आँगन में सिर्फ बुजुर्ग और औरतें ही मौजूद थीं। वह आदमी किसी अनजान पते की तलाश में नहीं था; उसकी निगाहें एक-एक ईंट, एक-एक मुंडेर को ऐसे पहचान रही थीं जैसे बरसों का भूला हुआ कोई गीत याद आ रहा हो।
चलते-चलते उसके कदम एक दोमंजिला पुराने मकान के सामने अचानक थम गए। मकान का बाहरी रंग थोड़ा उड़ चुका था, मगर लोहे के मुख्य दरवाजे पर लगी पीतल की घंटी और नेमप्लेट पर चमक अब भी बाकी थी। उस आदमी के काँपते हाथों ने लोहे की सांकल उठाई और भारी मन से दो बार खटखटाया।
चंद लम्हों बाद अंदर से चप्पलों की घिसटने की आवाज आई। दरवाजा थोड़ा सा खुला और एक कमजोर, सफेद बालों वाली बूढ़ी काया चौखट पर आकर ठिठक गई। आँखों पर मोटा चश्मा चढ़ाए उस वृद्धा ने माथे पर हाथ की छांव बनाकर अजनबी को देखा और झिझकते हुए पूछा, “कौन हो भाई? किसे ढूँढ़ रहे हो?”
उस आदमी के गले से एक रुंधी हुई, भीगी आवाज निकली, “माई… मैं हूँ… तुम्हारा माधव।”
यह नाम सुनते ही बूढ़ी यशोदा के कानों में मानो सैकड़ों घंटियाँ एक साथ बज उठीं। उनकी काँपती हथेलियाँ उस आदमी के चेहरे की झुर्रियों और दाढ़ी पर फिरने लगीं। कुछ पल का अविश्वास आंसुओं के समंदर में बह गया। यशोदा दहाड़ मारकर रो पड़ीं और उस अधेड़ बेटे को अपने कमजोर सीने से चिपटा लिया, “हाय रे मेरे बच्चे! माधव! तू कहाँ खो गया था रे? कोई अपनी जननी को, अपने दूधमुंहे बच्चों और भरी जवानी में ब्याही घरवाली को इस तरह बेसहारा छोड़कर जाता है क्या? पूरे बारह साल… बारह साल हमने कैसे तिल-तिल कर काटे, यह सिर्फ भगवान जानता है। मैंने तो सोच लिया था कि अब इस देह से प्राण छूटने पर ही तेरा मुखड़ा देख पाऊँगी।”
माधव माँ के पैरों पर गिर पड़ा। उसकी आँखों से गिरते आँसू यशोदा की साड़ी का पल्ला भिगोने लगे, “माई, मुझे क्षमा कर दे। मैं किसी ढोंगी टोली के बहकावे में आ गया था। उस वक्त दिमाग पर ऐसा परदा पड़ा कि मुझे लगा दुनिया का सब कुछ झूठ है और वैराग्य ही सच है। पर जब तक आँखें खुलीं, मैं एक मठ की चारदीवारी और झूठे नियमों के जाल में जकड़ चुका था। चाहकर भी वहाँ से निकल नहीं पाया। अब जब वह सब बिखर गया, तो मैं अपने गुनाहों का बोझ लिए तुम्हारी चौखट पर आ गिरा हूँ। मुझे धिक्कार लो, पर घर से मत निकालो।”
यशोदा ने बेटे का माथा चूमते हुए उसे सहारा देकर उठाया, “चल पगले, बेटा चाहे कितना भी रूठ जाए, माँ का आँचल कभी छोटा नहीं पड़ता। तू आ गया, मेरे लिए यही बहुत है। अब इस बुढ़ापे में तेरे ही हाथों मुक्ति मिलेगी। तेरे बापू अब खाट से लग चुके हैं, शरीर एकदम शिथिल पड़ गया है। यह तो कहो कि बहु जानकी देवी जैसी निकली। अगर उसने स्कूल की मास्टरी न संभाली होती और दिन-रात एक करके दोनों बच्चों को न पढ़ाया होता, तो आज हम सब दाने-दाने को मोहताज हो जाते। चल, अंदर चल। मुँह-हाथ धो, मैं तेरे लिए कुछ बनाती हूँ।”
आँगन के कोने में लगे चापाकल से माधव ने ठंडे पानी से मुँह-हाथ धोया। जब वह बैठक में लौटा, तो यशोदा एक थाली में गुड़, ताजी रोटियाँ और कटोरे में छाछ लेकर बैठ चुकी थीं। तभी अंदर के कमरे से खाँसने की आवाज आई और लाठी के सहारे धीरे-धीरे चलते हुए दीनदयाल जी बाहर आए। उनकी कमर झुक चुकी थी और आँखों की रोशनी मद्धिम पड़ चुकी थी। जब उन्होंने सामने केसरिया लिबास में बैठे अपने बेटे को देखा, तो उनके चेहरे का रंग बदल गया। विस्मय, क्रोध और पीड़ा की लहरें एक साथ उनके चेहरे पर तैर गईं।
माधव ने लपककर पिता के पाँव छुए, “बापू, आपका यह अपराधी बेटा वापस आ गया है।”
दीनदयाल जी ने लाठी को फर्श पर पटका और भारी आवाज में बोले, “अपराधी? अपराध बहुत छोटा शब्द है माधव। तूने कोई चोरी या डकैती नहीं की, तूने उस भरोसे का कत्ल किया था जिसकी बुनियाद पर एक परिवार खड़ा होता है। जब घर में चूल्हा जलना मुश्किल था, जब बच्चे कॉपी-किताबों के लिए तरसते थे, तब तू ईश्वर की खोज में भाग गया था? क्या परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ निभाना ईश्वर की पूजा नहीं थी?”
माधव सिर झुकाए आँसू बहाता रहा, “बापू, मैं अपनी किसी गलती पर पर्दा नहीं डाल रहा। मैं जानता हूँ कि मेरे पाप बहुत बड़े हैं। बस जिंदगी के इस ढलान पर आपके कदमों में थोड़ी सी जगह चाहता हूँ।”
दीनदयाल जी की आँखें भी भीग आईं। आखिरकार वह उनका खून था। उन्होंने भारी मन से उसके कंधे पर हाथ रखा और खाट पर बैठ गए।
कुछ ही देर बाद घर का मुख्य द्वार फिर खुला। माधव का बेटा चिराग, जो अब बाईस वर्ष का नौजवान हो चुका था और एक बैंक में क्लर्क था, अपनी छोटी बहन नव्या के साथ भीतर आया। नव्या कॉलेज से लौटी थी। दोनों भाई-बहन के चेहरों पर दिनभर की थकान थी, पर घर में एक अजीब सी खामोशी और अजनबी चेहरे को देखकर वे चौंक गए।
यशोदा ने उत्साह में आगे बढ़कर दोनों के हाथ थामे, “चिराग, नव्या… इधर आओ बच्चों। देखो कौन आया है! तुम्हारे बापू लौट आए हैं। चलो, दोनों मिलकर उनके पाँव छुओ।”
माधव की आँखें ममता से छलक उठीं। उसने अपनी बाँहें दोनों की तरफ फैलाईं, “चिराग… बेटा! नव्या… मेरी गुड़िया!”
पर वे दोनों कदम आगे बढ़ाने के बजाय दो कदम पीछे हट गए। चिराग की आँखों में कोई भावुकता नहीं थी, केवल एक सर्द अजनबीपन और वर्षों की जमी हुई कड़वाहट थी। नव्या ने अपनी नजरें फेर लीं। चिराग ने शांत लेकिन कठोर स्वर में कहा, “दादी, हमारे पिता बारह साल पहले ही हमें छोड़कर चले गए थे। जिस इंसान को हमने कभी अपनी खुशियों या तकलीफों में साथ नहीं देखा, जिसने कभी यह नहीं पूछा कि हम भूखे सोए या पेट भरकर, वे अचानक हमारे पूज्य कैसे हो सकते हैं? हमारे लिए केवल हमारी माँ ही पिता और माता दोनों हैं।”
इतना कहकर दोनों भाई-बहन बिना दूसरा शब्द कहे अंदर अपने कमरे में चले गए और दरवाजा बंद कर लिया। माधव के हाथ हवा में ही लटके रह गए। उसका सीना छलनी हो गया था।
यशोदा ने बेटे को सांत्वना देते हुए कहा, “धीरज रख बेटा। बच्चे हैं, अभी नादान हैं। जब तू गया था, तब नव्या सिर्फ छह साल की थी और चिराग दस का। उन्होंने तुझे देखा ही कहाँ है? अभी उनकी माँ आएगी, वह सब संभाल लेगी। तू खाना खा ले।”
शाम के करीब पाँच बजे, बाहर साइकिल की घंटी बजी और कुछ पलों बाद जानकी ने आँगन में कदम रखा। बदन पर सूती सादी साड़ी, चेहरे पर धूप और मेहनत की गहरी लकीरें, हाथ में किताबों का थैला और आँखों में गजब का ठहराव। जानकी ने जैसे ही बैठक में बैठे उस गेरुए वस्त्रधारी पुरुष को देखा, उसके कदम चौखट पर ही जम गए।
पूरे घर में सन्नाटा पसर गया। केवल दीवार घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी। यशोदा आगे बढ़ीं और जानकी का हाथ पकड़कर भरभराई आवाज में बोलीं, “बहू, देख तेरा सुहाग लौट आया है। भगवान ने हमारी सुन ली। माधव अपनी गलतियों पर बहुत पछता रहा है। तू तो जानती ही है कि सुबह का भटका अगर शाम को लौट आए तो उसे भटका नहीं कहते। पुरानी बातों को गंगा में बहा दे और अपने सिंदूर का मान रखकर इसका स्वागत कर।”
जानकी ने धीरे से अपनी सास के हाथों से अपना हाथ छुड़ाया। उसने अपने पल्लू को ठीक किया और माधव की तरफ देखा। उसकी आँखों में न तो आँसू थे, न नफरत, और न ही कोई खुशी। वहाँ सिर्फ एक लंबा, गहरा शून्य था।
जानकी ने हाथ जोड़कर अत्यंत संयत स्वर में कहा, “अम्माँ जी, आप मेरी सास नहीं, मेरी माँ हैं। बापूजी मेरे पिता हैं। पिछले बारह वर्षों में मैंने इस घर की हर मर्यादा को सिर माथे रखा। पर आज आप मुझसे वह माँग रही हैं जो मेरे पास बचा ही नहीं है। जब इन्होंने एक रात चुपचाप उठकर घर छोड़ दिया था, तब इन्होंने यह नहीं सोचा था कि पीछे छूट गई औरत समाज के भेड़ियों से कैसे लड़ेगी? अपने दूधमुंहे बच्चों की भूख कैसे मिटाएगी? आपके बूढ़े जोड़ों के दर्द की दवा कहाँ से लाएगी? मैंने अपने आंसुओं को पीकर, अपने मान-सम्मान को दांव पर लगाकर दिन-रात मेहनत की। मैंने खुद को तोड़कर इस घर को जोड़ा है। आज जब बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो गए, जब जीवन का सबसे भयानक तूफ़ान गुजर गया, तब ये अपनी शांति और मुक्ति ढूँढ़ते हुए यहाँ लौट आए?”
माधव घुटनों के बल बैठ गया और हाथ जोड़कर रोने लगा, “जानकी, मुझे सजा दे दो। तुम जो कहोगी मैं करूँगा, पर मुझे इस तरह पराया मत करो। मैं तुम्हारे हर त्याग का ऋणी हूँ।”
जानकी ने अपनी आँखें बंद कीं और एक गहरी साँस ली। जब उसने आँखें खोलीं, तो उसकी आवाज में एक अजीब सा ठहराव था, “माधव जी, मैं कोई देवी नहीं हूँ, न ही कोई पाषाण की मूरत। मैं एक साधारण स्त्री हूँ जिसने दर्द के अंगारों पर चलकर अपनी राह बनाई है। मैं आपके लौटने से न तो दुखी हूँ और न ही आपसे कोई बदला लेना चाहती हूँ। अम्माँ जी और बापूजी ने आपको जन्म दिया है, उनका आप पर पहला अधिकार है। यह घर बापूजी का है, इसलिए आपको यहाँ रहने का पूरा हक है। आप इस घर में अपने माता-पिता के बेटे बनकर रहिए, उनकी सेवा कीजिए। बच्चों को भी मैं कभी आपके खिलाफ नहीं भड़काऊँगी; वे चाहें तो धीरे-धीरे आपको एक पिता के रूप में स्वीकार कर सकते हैं। परंतु मेरे और आपके बीच जो पति-पत्नी का पवित्र रिश्ता था, वह उस रात ही भस्म हो गया था जब आप हमें बेसहारा छोड़कर गए थे। मैं अब उस रिश्ते के बंधन में दोबारा नहीं बँध सकती। हम इस छत के नीचे एक-दूसरे के प्रति आदर भाव रखते हुए अजनबियों की तरह रह सकते हैं, उससे अधिक की उम्मीद मुझसे मत कीजिएगा।”
इतना कहकर जानकी ने दीनदयाल जी और यशोदा के चरण छुए और कमरे के अंदर चली गई। बैठक में सन्नाटा छा गया।
दिन बीतने लगे। माधव ने अपने गेरुए वस्त्र उतारकर सादे सफेद कुर्ते-पाजामे पहनने शुरू कर दिए। उसने घर में किसी पर अपना अधिकार जमाने की कोई कोशिश नहीं की। वह चुपचाप सुबह उठता, पूरे घर में झाड़ू लगाता, बापूजी के पैरों की मालिश करता, अम्माँ जी के लिए समय पर दवाइयाँ और तुलसी का काढ़ा तैयार करता। दोपहर में जब जानकी स्कूल में होती, तो वह चुपचाप रसोई का सारा बिखरा काम समेट देता और बाजार से हरी सब्जियाँ ले आता।
शुरुआती महीनों में चिराग और नव्या उससे कतराते रहे। जब माधव सामने आता, तो दोनों कमरे का रुख बदल लेते। पर माधव ने कभी इसका बुरा नहीं माना। वह चुपचाप एक कोने में बैठकर अपनी डायरी लिखता या बापूजी को गीता पढ़कर सुनाता।
एक दिन अचानक मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। रात के ग्यारह बज रहे थे और चिराग को अचानक तेज ठंड के साथ भयानक बुखार चढ़ गया। उसका बदन तवे की तरह तप रहा था और वह बेहोशी में बड़बड़ाने लगा। शहर के सरकारी अस्पताल की दूरी तीन किलोमीटर थी और उस तूफानी रात में कोई ऑटो या रिक्शा मिलने की उम्मीद नहीं थी। जानकी और नव्या घबराकर रोने लगीं।
तभी कमरे का दरवाजा खुला। माधव अंदर आया। उसने बिना एक पल गँवाए चिराग को अपनी पीठ पर लाद लिया।
“माधव जी, यह क्या कर रहे हैं? बाहर बहुत पानी भरा है!” जानकी बदहवास होकर चिल्लाई।
“जानकी, आज मुझे मत रोको। बारह साल पहले मैं अपनी जिम्मेदारी से भागा था, आज अगर इस बच्चे को कुछ हो गया तो मैं जीते जी मर जाऊँगा,” माधव ने कहा और बिना छाते के, नंगे पाँव उस मूसलाधार बारिश और घुटनों तक भरे पानी में चिराग को पीठ पर उठाए अस्पताल की ओर दौड़ पड़ा।
पीछे-पीछे छाता लिए नव्या और जानकी भी बदहवास दौड़ीं। माधव के पाँव में कई जगह नुकीले पत्थर और काँच चुभे, खून बहने लगा, पर उसकी गति धीमी नहीं हुई। उसके मुँह से केवल एक ही प्रार्थना निकल रही थी—”हे ईश्वर, मेरे बच्चे को बचा ले, चाहे मेरी साँसें ले ले।”
अस्पताल पहुँचकर जब डॉक्टरों ने चिराग को तुरंत आईसीयू में भर्ती किया, तब जाकर माधव फर्श पर बैठ गया। डॉक्टर ने बाहर आकर कहा, “अगर पंद्रह मिनट की भी देर हो जाती तो इन्फेक्शन दिमाग तक पहुँच जाता। गनीमत रही कि पिता समय पर अपने बच्चे को ले आए।”
सुबह जब चिराग की आँखें खुलीं, तो उसने देखा कि उसके बिस्तर के पास फर्श पर उसके पिता सिर टिकाए बैठे थे। उनके दोनों पैरों में पट्टियाँ बंधी थीं और उनका बदन थकान तथा ठंड से काँप रहा था। चिराग की आँखों से आँसू छलक पड़े। उसने धीरे से अपना काँपता हाथ बढ़ाया और अपने पिता के सिर पर रख दिया।
माधव की आँख खुली। उसने बेटे को होश में देखा तो उसके चेहरे पर एक अलौकिक संतोष तैर गया। चिराग ने फफकते हुए कहा, “बापू… मुझे माफ कर दीजिए।”
माधव ने बेटे को सीने से लगा लिया। बारह साल का सूखा उस एक पल में दोनों के आंसुओं से धुल गया। दरवाजे पर खड़ी नव्या और यशोदा की आँखें भी भीगी हुई थीं।
इस घटना के बाद घर की हवा बदलने लगी। चिराग और नव्या अब अपने पिता से खुलकर बातें करने लगे थे। चिराग शाम को लौटते वक्त अपने पिता के लिए उनकी पसंद की मिठाई लाता, तो नव्या अपने कॉलेज के किस्से सुनाती। घर में अब बिखराव की जगह एक नई आत्मीयता ने ले ली थी।
पर जानकी और माधव के बीच अब भी एक अदृश्य, सम्मानजनक दूरी कायम थी। माधव ने कभी उस दूरी को लांघने की जिद नहीं की। वह जानकी के हर फैसले का आदर करता था।
छह महीने बाद, दीपावली की पावन शाम थी। पूरा घर दीपों की रोशनी से जगमगा रहा था। आँगन में सुंदर रंगोली सजी थी। पूजा समाप्त होने के बाद, जानकी थाली में प्रसाद और एक नया सफेद खादी का कुरता लेकर माधव के छोटे से कमरे में आई।
माधव खाट पर बैठा रामायण पढ़ रहा था। जानकी को देखकर वह अदब से उठ खड़ा हुआ।
जानकी ने थाली मेज पर रखी और पहली बार माधव की आँखों में सीधे देखते हुए मंद मुस्कान के साथ कहा, “माधव जी, घाव कितने भी गहरे हों, अगर उन पर सच्चे पश्चाताप का मरहम लगाया जाए, तो वे धीरे-धीरे भर ही जाते हैं। आपने इन छह महीनों में जिस निस्वार्थ भाव से इस परिवार की सेवा की है, उसने मेरे मन की सारी कड़वाहट को धो दिया है। मैं अपनी जिद पर अड़कर उस इंसान को नजरअंदाज नहीं कर सकती जिसने अपनी जान जोखिम में डालकर मेरे बेटे की साँसें लौटाई हों।”
माधव की आँखें भर आईं, “जानकी, क्या तुम सच कह रही हो? क्या मैं सचमुच इस घर का हिस्सा बनने लायक हूँ?”
जानकी ने आगे बढ़कर माधव के पाँव छूने के लिए हाथ बढ़ाए, पर माधव ने तुरंत उसके हाथ थाम लिए और खुद उसके सामने हाथ जोड़ दिए, “नहीं जानकी, इस घर की असली नींव तुम हो। पूजा तुम्हारी होनी चाहिए।”
तभी दरवाजे की ओट से चिराग, नव्या, यशोदा और दीनदयाल जी मुस्कुराते हुए भीतर आ गए। दीनदयाल जी ने अपनी लाठी एक तरफ रखी और दोनों के सिर पर हाथ रखते हुए कहा, “आज हमारे घर में सच मायने में दीपावली आई है। जहाँ क्षमा, पश्चाताप और कर्तव्य एक साथ मिल जाएँ, वहाँ ईश्वर का वास खुद-ब-खुद हो जाता है।”
उस रात आँगन में जलता हर दीया एक नई शुरुआत की गवाही दे रहा था। परिवार सिर्फ खून के रिश्तों से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति त्याग, सम्मान और गलतियों को माफ करने के बड़े दिल से बनता है।
जीवन में गलतियाँ हर इंसान से होती हैं, पर क्या हर गलती को सुधरने का दूसरा मौका मिलना चाहिए? क्या एक स्त्री का अपने आत्मसम्मान के लिए खड़ा होना सही था, या फिर अंत में उसका अपने परिवार के भले के लिए क्षमा कर देना ही उसकी सबसे बड़ी महानता थी? आप जानकी के इस निर्णय के बारे में क्या सोचते हैं? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें, धन्यवाद।
मूल लेखिका : कुमुद चतुर्वेदी