समझौता – खुशी

विकास और पूनम की शादी को पंद्रह साल हो चुके थे।

पंद्रह साल…

इतना लंबा समय कि इंसान किसी रिश्ते को निभाते-निभाते खुद को भूल जाए।

पूनम ने भी खुद को भुला दिया था।

शादी के शुरुआती दिनों में उसे लगता था कि विकास एक दिन समझ जाएगा। वह जिम्मेदार बनेगा, नौकरी करेगा, परिवार की जिम्मेदारी उठाएगा।

लेकिन विकास कभी नहीं बदला।

वह घर में रहता था, लेकिन पूनम के जीवन में नहीं।

पति-पत्नी एक ही छत के नीचे रहते थे, लेकिन उनके बीच पति-पत्नी जैसा कोई रिश्ता नहीं बचा था।

उनकी जिंदगी बस एक बच्चे के इर्द-गिर्द सिमट गई थी—उनकी बेटी मीरा।

मीरा के लिए दोनों माता-पिता थे।

लेकिन एक-दूसरे के लिए वे धीरे-धीरे अजनबी बन चुके थे।

पूनम ने बहुत कुछ सहा।

सास-ससुर के ताने।

विकास की बेरुखी।

उसकी बेरोजगारी।

उसका गुस्सा।

उसकी उपेक्षा।

और सबसे ज्यादा—उसका यह एहसास कि उसका पति उसके साथ होते हुए भी उसका नहीं है।

फिर भी वह चुप रही।

क्यों?

क्योंकि उसकी गोद में मीरा थी।

उसे लगता था—

“मैं चली गई तो मेरी बेटी का क्या होगा?”

“उसकी पढ़ाई?”

“उसका भविष्य?”

“लोग क्या कहेंगे?”

और हर बार वह अपने मन को समझा देती—

“थोड़ा और समझौता कर लेती हूँ।”

मीरा बड़ी हो रही थी।

वह अपनी माँ को देखती थी।

माँ सुबह से रात तक घर संभालती।

पिता घर में होते हुए भी घर की जिम्मेदारियों से दूर रहते।

मीरा ने बचपन में कई बार अपनी माँ की आँखों में आँसू देखे थे।

लेकिन वह कारण नहीं समझती थी।

एक दिन वह समझ गई।

उस दिन विकास ने खुद पूनम के सामने अपने जीवन का सबसे बड़ा सच रख दिया।

“हाँ, मैं किसी और के साथ इन्वॉल्व हूँ।”

पूनम जैसे पत्थर की हो गई।

उसने विकास को देखा।

“क्या कहा तुमने?”

विकास ने बिना किसी शर्म या अपराधबोध के कहा—

“मैं किसी और से प्यार करता हूँ। मैं उसी के साथ रहना चाहता हूँ।”

पूनम की दुनिया जैसे वहीं रुक गई।

“और मैं?”

विकास ने कंधे उचका दिए।

“तुम रहना चाहती हो तो रहो। जाना चाहती हो तो चली जाओ।”

इतनी आसानी से?

पंद्रह साल का रिश्ता…

एक बेटी…

एक परिवार…

सब कुछ सिर्फ तीन शब्दों में—

“चली जाओ।”

पूनम के माता-पिता को जब यह बात पता चली तो वे गुस्से से भर गए।

उन्होंने विकास और उसके माता-पिता से बात की।

शोर हुआ।

बहस हुई।

सवाल उठे।

लेकिन विकास पर कोई असर नहीं हुआ।

उसके माता-पिता भी बेटे के सामने कमजोर पड़ गए।

आखिर वह उनका बेटा था।

पूनम अकेली खड़ी थी।

लेकिन उस दिन पहली बार मीरा अपनी माँ के सामने आकर खड़ी हुई।

वह तब बहुत बड़ी नहीं थी, लेकिन इतनी समझदार जरूर हो चुकी थी कि अपनी माँ का दर्द समझ सके।

मीरा ने पूनम का हाथ पकड़ा और कहा—

“माँ… आप कहीं मत जाइए।”

पूनम ने बेटी की तरफ देखा।

“मीरा, मैं तुम्हें इस माहौल में नहीं रखना चाहती।”

मीरा ने आँसू रोकते हुए कहा—

“आपको कहीं जाने की जरूरत नहीं है।”

फिर उसने माँ से कहा—

“आप तब तक इस घर में रहिए, जब तक मेरी पढ़ाई पूरी नहीं हो जाती।”

पूनम चुप रही।

मीरा ने आगे कहा—

“जैसे ही मेरी पढ़ाई पूरी होगी, मैं कुछ न कुछ करूँगी। फिर हम दोनों अलग हो जाएँगे।”

पूनम की आँखों से आँसू बहने लगे।

उस दिन माँ-बेटी ने एक ऐसा समझौता किया, जो किसी बेटी को अपनी माँ के साथ नहीं करना चाहिए था।

लेकिन जिंदगी ने उन्हें मजबूर किया था।

मीरा चुप हो गई।

पूनम भी चुप हो गई।

दोनों ने अपनी-अपनी जिंदगी रोक दी।

विकास अपनी जिंदगी में आगे बढ़ता रहा।

जिस औरत के साथ उसका रिश्ता था, उसके साथ उसका जीवन चलता रहा।

और इस घर में पूनम और मीरा सिर्फ इसलिए रहती रहीं क्योंकि मीरा की पढ़ाई पूरी नहीं हुई थी।

साल बीतते गए।

मीरा ने पढ़ाई पूरी की।

उसने कानून को अपना पेशा बनाया।

शायद इसलिए नहीं कि उसे सिर्फ वकील बनना था।

बल्कि इसलिए कि उसने अपनी माँ को वर्षों तक न्याय के इंतजार में देखा था।

मीरा ने कानून पढ़ा।

कड़ी मेहनत की।

अच्छी वकील बनी।

और एक दिन उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा दिन आया।

उसने अपनी माँ के सामने अपनी काली कोट पहनी।

पूनम उसे देखती रह गई।

मीरा मुस्कुराई।

“माँ… याद है, मैंने आपसे क्या कहा था?”

पूनम की आँखें भर आईं।

“हाँ।”

“मैंने कहा था ना, आपकी पढ़ाई पूरी होने तक आप रुकिए। अब मेरी पढ़ाई पूरी हो चुकी है।”

पूनम ने धीरे से कहा—

“मीरा, अब रहने दो। इतनी उम्र निकल गई है। क्या फर्क पड़ेगा?”

मीरा ने अपनी माँ का हाथ पकड़ लिया।

“फर्क पड़ेगा, माँ।”

“बहुत फर्क पड़ेगा।”

“अब और समझौता नहीं।”

पूनम ने कुछ कहना चाहा।

मीरा ने उसे रोक दिया।

“माँ, आपने मुझे जन्म दिया है। आपने मुझे पाला है। आपने मेरी हर जरूरत पूरी की है।”

“आप ही मेरी माँ हैं…”

मीरा कुछ पल रुकी।

फिर उसकी आवाज भर्रा गई।

“और सच कहूँ माँ, आप ही मेरे पिता भी हैं।”

पूनम ने बेटी को गले लगा लिया।

मीरा ने कहा—

“जिस आदमी ने आपको पत्नी का सम्मान नहीं दिया, जिसने आपके साथ रिश्ता निभाया ही नहीं, जिसने आपको पंद्रह साल तक अकेलेपन में रखा और फिर खुलेआम कहा कि वह किसी और के साथ रहना चाहता है… उसके साथ सिर्फ समाज के डर से क्यों रहना?”

“अब आपकी बारी है, माँ।”

“अब आप मेरे लिए नहीं, अपने लिए जिएँगी।”

और फिर मीरा ने अपने जीवन का पहला केस लिया।

अपने ही माता-पिता का तलाक।

कोर्ट में खड़ी मीरा के लिए वह सिर्फ एक केस नहीं था।

वह उसकी माँ के पंद्रह वर्षों का दर्द था।

हर वह रात थी जब पूनम अकेली रोई थी।

हर वह दिन था जब उसने समाज के डर से खुद को समझाया था।

हर वह पल था जब उसने अपनी बेटी के भविष्य के लिए अपनी इच्छाओं को दबा दिया था।

मीरा ने कानून के सामने अपनी माँ का पक्ष रखा।

इस बार पूनम किसी के सामने हाथ जोड़कर नहीं खड़ी थी।

वह अपनी बेटी के साथ खड़ी थी।

मीरा ने आखिरी बार अपनी माँ की तरफ देखा।

पूनम की आँखों में डर नहीं था।

सिर्फ एक सवाल था—

“क्या अब सच में मैं आज़ाद हो जाऊँगी?”

मीरा ने मुस्कुराकर सिर हिलाया।

“हाँ माँ।”

“अब कोई समझौता नहीं।”

और उस दिन पूनम ने पहली बार महसूस किया कि पंद्रह साल पहले जिस शादी में उसने अपनी जिंदगी समझौते के नाम कर दी थी, आज उसी जिंदगी को उसकी बेटी वापस लेने आई है।

विकास से रिश्ता खत्म हो रहा था।

लेकिन पूनम की जिंदगी खत्म नहीं हो रही थी।

बल्कि पहली बार…

उसकी जिंदगी शुरू हो रही थी।

और मीरा?

वह अपनी माँ का केस जीतने के बाद अपने चैंबर में वापस गई।

उसने अपनी फाइल बंद की।

फाइल के ऊपर लिखा था—

“पूनम बनाम विकास”

मीरा कुछ पल उस नाम को देखती रही।

फिर उसने फाइल पर हाथ रखा और मन ही मन कहा—

“माँ, यह मेरा पहला केस था।

लेकिन मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी जीत।”

क्योंकि कभी-कभी एक बेटी सिर्फ माँ की बेटी नहीं होती…

वह उसकी आवाज़ बन जाती है।

स्वरचित कहानी

आपकी सखी

खुशी

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