घुटन भरे रिश्ते से आजादी – डॉ आभा माहेश्वरी

शहर की भीड़ में रहने वाली मान्या बाहर से जितनी खुश दिखाई देती थी, भीतर से उतनी ही अकेली थी। उसका विवाह हुए आठ वर्ष हो चुके थे। घर सुंदर था, सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी,

लेकिन उस घर की दीवारों के भीतर उसका अपना कोई कोना नहीं था। उसकी हर पसंद पर सवाल उठता, हर निर्णय पर रोक लगती और उसकी हर बात को गलत साबित कर दिया जाता।

वह सुबह से रात तक परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाती, फिर भी उसे सुनना पड़ता—“तुम करती ही क्या हो?” धीरे-धीरे मान्या ने अपनी इच्छाओं को बोलना छोड़ दिया। उसकी हँसी कम हो गई, सपने मानों धुँधले पड़ गए हो और आईने में दिखाई देने वाली स्त्री भी उसे अपनी-सी नहीं लगती थी।

एक दिन उसकी बेटी ने स्कूल से लौटकर पूछा, “माँ, आप हमेशा चुप क्यों रहती हैं? पहले तो आप बहुत हँसती थीं।”

यह छोटा-सा प्रश्न मान्या के भीतर कहीं गहराई तक उतर गया। उस रात वह देर तक जागती रही।उसे पूरी रात नींद नही आई। उसने सोचा—क्या रिश्ता वही होता है जिसमें इंसान अपने अस्तित्व को ही खो दे? क्या साथ रहने का अर्थ अपने सपनों और आत्मसम्मान को छोड़ देना है?

अगली सुबह उसने वर्षों बाद उसने अपनी पुरानी डायरी खोली। पहले पन्ने पर लिखा था—“मैं भी कुछ बनना चाहती हूँ।” उसकी आँखें नम हो गईं। उसने उस अधूरे वाक्य को आगे बढ़ाया—“और अब मैं भी अपने लिए जीना सीखूँगी।”

मान्या ने धीरे-धीरे अपने पुराने हुनर को फिर से अपनाया।उसे पढ़ाने का बहुत शौक था और वो एक टीचर बनना चाहती थी लेकिन बन नही पाई। अब उसने घर से ही बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। धीरे धीरे उसके अंच्छे पढ़ाने के कारण काफी बच्चे उसके पास आने लगे।अपनी छोटी-सी आमदनी से उसे केवल पैसे नहीं मिले,

बल्कि उसका खोया हुआ आत्मविश्वास भी वापिस मिला। अब वह हर निर्णय में अपनी राय रखने लगी।घर-परिवार में उसका विरोध हुआ, ताने मिले, रिश्ते में तनाव भी आया, लेकिन इस बार वह चुप नहीं हुई।उसने अपना शौक छोड़ा नही।उसका बड़ा कोचिंग सेंटर होगया।

और एक दिन उसने दृढ़ स्वर में कहा, “रिश्ता मुझे बाँधने के लिए नहीं, समझने और सम्मान देने के लिए होता है। मैं किसी से अपना अधिकार नहीं माँग रही, केवल अपना अस्तित्व बचा रही हूँ।”

कुछ समय बाद परिस्थितियाँ धीरे धीरे बदलने लगीं। जहाँ संवाद की गुंजाइश थी, वहाँ बातचीत हुई; जहाँ सम्मान संभव नहीं था, वहाँ मान्या ने दूरी बनाना स्वीकार किया। उसने समझ लिया कि आज़ादी हमेशा घर छोड़ने का नाम नहीं होती कि आपने घर छोड़ दिया और आजाद होगए, कभी-कभी आज़ादी अपने भीतर खोई हुई आवाज़ को वापस पाने का नाम होती है।

अब मान्या की बेटी उसे मुस्कुराते हुए देखती थी। एक दिन उसने कहा, “माँ, अब आप फिर से पहले जैसी लगती हैं,खूब हँसती,खिलखिलाती हो– बहुत अच्छा लगता है माँ–“

मान्या मुस्कुराई। उसने अपनी बेटी को गले लगाया और खिड़की खोल दी। बाहर हल्की बारिश हो रही थी। ठंडी हवा कमरे में आई तो उसे लगा जैसे वर्षों से बंद कोई दरवाज़ा आज सचमुच खुल गया हो।

उसने मन ही मन कहा—“जिस रिश्ते में साँस लेना कठिन हो जाए, वहाँ प्रेम से पहले आत्मसम्मान को बचाना जरूरी है। क्योंकि जीवन किसी की परछाईं बनकर जीने में नहीं, अपने अस्तित्व के साथ जीने का नाम है।”

लेखिका:

डॉ आभा माहेश्वरी अलीगढ 

बेटियाँ-in

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