समर्पण – खुशी

राधा एक गरीब घर की बच्ची थी। मां लोगों के घरों में बर्तन मांजती थी और पिताजी रिक्शा चलाते थे।राधा मां के साथ लोगो के घर जाती थी। यूही कोई 5 साल की होगी वो लोग भी उसे मां के साथ कोई छोटा मोटा काम बता देते। पर राधा पढ़ना चाहती थीं जब वो बच्चों को स्कूल जाता देखती तो उसका भी मन करता की मै भी जाऊँ मां को बोलती तो मां कहती बेटी इतना पैसा कहा है।फिर एक दिन शीला जी उस मोहल्ले में आई जो शिक्षिका थी उनके यहां बच्चे भी आते थे पढ़ने ।राधा घंटों खड़ी हो उन बच्चों को देखती उसकी इस लगन को शीला जी ने पहचाना और बिना पैसों के उसे पढ़।ना शुरू कर दिया उसका अपने ही स्कूल में दाखिला करवा दिया।धीरे धीरे राधा की लगन और शिक्षा के प्रति समर्पण ने उसे आज कलेक्टर बना दिया।जो लोग राधा के मा बाप का मजाक बनाते थे।पास खड़ा नहीं करते थे वो भी उनके आगे पीछे दौड़ रहे थे।गाडिया आई उस में से राधा उतरी अपने माता पिता के पैर छू ।वो शीला जी के घर गई उनके पैर छू आशीर्वाद लिया और बोली आपका मुझ पर विश्वास और आपकी सलाह ने मेरा जीवन बदल दिया।मीडिया के सामने यह सब हो रहा था।पर शीला जी बोली बेटा ये पढ़ाई के प्रति तुम्हारा समर्पण था और बच्चे एक घंटे में ऊब जाते परंतु तुम घंटों लगी रहती अपने लक्ष्य पर तुम्हारी निगाहें थी ये तुम्हारी जिद और समर्पण का फल है।आज सब खुश है और सबसे ज्यादा राधा एक छोटे तबके से आते हुए भी शिक्षा ने उसे उच्च स्थान दिलवा दिया।

स्वरचित कहानी 

आपकी सखी 

खुशी

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