राधिका के मुंह से ‘हिस्से’ का नाम सुनते ही घर का माहौल एकदम से बदल गया। जो पिता कुछ देर पहले बेटी के आंसुओं पर पिघल रहा था, उसकी आंखें अचानक कठोर हो गईं। भाई विकास, जो बचपन में राधिका के लिए किसी से भी लड़ जाता था, आज उसी राधिका पर गरजने लगा। उसने कहा कि बेशर्म हो गई हो तुम! पति अस्पताल में है और तुम्हें संपत्ति में हिस्सा चाहिए?
शहर के एक पुराने मोहल्ले में रहने वाले सेठ दीनानाथ की इकलौती बेटी थी राधिका। घर में एक बड़ा भाई था, विकास। राधिका जब छोटी थी, तो घर के पूरे आंगन में उसकी ही पायल की छमछम गूंजती थी। दीनानाथ अपनी बेटी को ‘घर की लक्ष्मी’ कहते नहीं थकते थे। विकास भी अपनी छोटी बहन पर जान छिड़कता था।
राधिका ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि जिन लोगों के प्यार के साये में वह बड़ी हो रही है, एक दिन उसी प्यार की कीमत उसे अपने आत्मसम्मान और अधिकारों की बलि देकर चुकानी पड़ेगी। समय अपनी चाल चलता रहा और राधिका के हाथ पीले करने का वक्त आ गया।
बहुत ही धूमधाम से दीनानाथ ने अपनी लाडली का विवाह शहर के ही एक होनहार युवक शेखर के साथ कर दिया। विदाई के वक्त दीनानाथ फूट-फूट कर रोए थे
और उन्होंने शेखर के हाथ में राधिका का हाथ देते हुए कहा था कि आज से मेरी जान तुम्हारे हवाले है। राधिका को भी यही लगता था कि भले ही उसका शरीर दूसरे घर जा रहा है, लेकिन मायके में उसकी जड़ें हमेशा वैसी ही हरी-भरी रहेंगी।
शादी के शुरुआती पांच साल बहुत ही सुखद बीते। राधिका और शेखर एक खुशहाल जीवन जी रहे थे। लेकिन नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था। एक शाम शेखर जब अपनी फैक्ट्री से लौट रहा था, तो उसकी कार का एक भयानक एक्सीडेंट हो गया। शेखर को गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया।
डॉक्टरों ने साफ कह दिया कि शेखर की जान बचाने के लिए कई बड़ी सर्जरी करनी पड़ेंगी और इसमें लाखों रुपये का खर्च आएगा। राधिका के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने अपनी सारी जमा-पूंजी और गहने अस्पताल के बिलों में लगा दिए, लेकिन फिर भी एक बहुत बड़ी रकम की कमी थी।
अपने पति की जान बचाने के लिए राधिका हर दरवाजा खटखटा रही थी। जब उसे कहीं से कोई उम्मीद नहीं दिखी, तो उसने अपने मायके की तरफ रुख किया। आखिर बचपन से उसने यही तो सुना था कि बेटियां जब भी संकट में होती हैं, मायका उनके लिए सबसे बड़ा संबल होता है।
राधिका रोती-बिलखती अपने पिता दीनानाथ और भाई विकास के पास पहुंची। उसने शेखर की हालत और पैसों की जरूरत के बारे में बताया। दीनानाथ और विकास ने सांत्वना तो बहुत दी, लेकिन जब पैसों की बात आई, तो विकास ने बड़ी ही चतुराई से कह दिया कि व्यापार में इन दिनों बहुत मंदी है और उनके पास इतनी बड़ी
नकद रकम नहीं है। राधिका जानती थी कि यह सच नहीं है। हाल ही में दीनानाथ ने अपने पुश्तैनी गांव की एक बहुत बड़ी जमीन करोड़ों में बेची थी। राधिका ने अपने आंसुओं को पोंछते हुए अपने पिता से कहा कि बाबूजी, गांव वाली जमीन तो हम सबकी पुश्तैनी थी ना, उसमें तो कानूनन मेरा भी हिस्सा बनता है। आप मुझे मेरा वो हिस्सा दे दीजिए, मैं जीवन भर आपसे कुछ नहीं मांगूंगी। बस मुझे मेरे सुहाग को बचा लेने दीजिए।
राधिका के मुंह से ‘हिस्से’ का नाम सुनते ही घर का माहौल एकदम से बदल गया। जो पिता कुछ देर पहले बेटी के आंसुओं पर पिघल रहा था, उसकी आंखें अचानक कठोर हो गईं। भाई विकास, जो बचपन में राधिका के लिए किसी से भी लड़ जाता था, आज उसी राधिका पर गरजने लगा। उसने कहा कि बेशर्म हो गई हो तुम! पति अस्पताल में है और तुम्हें संपत्ति में हिस्सा चाहिए? बेटियों का हिस्सा तो उसी दिन खत्म हो जाता है, जिस दिन उनकी डोली उठती है। हम तो तुम्हें दान कर चुके हैं। अब इस घर की संपत्ति पर सिर्फ मेरा हक है। राधिका की मां भी, जो अब तक खामोश खड़ी थी, अपने बेटे का ही पक्ष लेने लगी। उन्होंने कहा कि बेटी, दामाद जी का इलाज किसी सरकारी अस्पताल में करा लो। मायके की संपत्ति पर नजर रखना बेटियों को शोभा नहीं देता। समाज में हमारी क्या नाक रह जाएगी कि बेटी ने बाप की संपत्ति में हिस्सा मांग लिया?
राधिका सन्न रह गई। उसे अपनी आंखों और कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। यह वही आंगन था जहां उसने चलना सीखा था। यह वही पिता था जिसने उसे अपनी जान कहा था। आज जब वह सचमुच जिंदगी और मौत के चौराहे पर खड़ी थी, तो उसके अपनों ने ही उसे ‘पराया’ और ‘लालची’ करार दे दिया था। राधिका समझ गई कि मायके का वह आंगन, जो बचपन में एक विशाल आसमान जैसा लगता था, आज इतना संकुचित हो चुका है कि वहां सिर्फ पैसे की गूंज है, रिश्तों की कोई जगह नहीं। वहां बेटी का स्वागत तब तक है, जब तक वह खाली हाथ मुस्कुराती हुई आती है और शगुन के दो सौ रुपये लेकर वापस चली जाती है। लेकिन अगर वह अपने हक की बात कर दे, तो वह उसी क्षण पराई और स्वार्थी हो जाती है।
राधिका ने तय किया कि वह अपने पति को यूं ही मरने नहीं देगी। उसने अपने आंसुओं को अपनी ताकत बनाया। जब प्यार से बात नहीं बनी, तो उसने अदालत का दरवाजा खटखटाया। पुश्तैनी संपत्ति होने के कारण कानून ने राधिका का साथ दिया और उसे उसका पूरा हिस्सा मिला। उस पैसे से राधिका ने शेखर का बेहतरीन इलाज करवाया और महीनों की जद्दोजहद के बाद शेखर मौत के मुंह से वापस लौट आया। राधिका का घर उजड़ने से बच गया।
लेकिन इस जीत की जो कीमत राधिका ने चुकाई, वह बहुत भारी थी। पैसे मिलते ही दीनानाथ ने राधिका से सारे रिश्ते तोड़ लिए। विकास ने साफ कह दिया कि राधिका अब उसके लिए मर चुकी है। अगली रक्षाबंधन पर जब राधिका भाई के लिए राखी लेकर गई, तो उसे दरवाजे से ही यह कहकर लौटा दिया गया कि जिस बहन ने मायके की संपत्ति बंटवा दी, उसके लिए इस घर के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हैं। राधिका उस बंद दरवाजे को देर तक देखती रही। उसे एहसास हुआ कि उसने अपने पति की जान तो बचा ली, लेकिन अपने मायके के उस ‘प्यार’ को हमेशा के लिए खो दिया, जो शायद था ही नहीं, सिर्फ एक भ्रम था। आज भी समाज में जब बेटियां अपने मायके की खुशहाली के लिए अपना सब कुछ त्याग देती हैं, तो उन्हें देवी का दर्जा दिया जाता है, लेकिन अपनी मुसीबत में अगर वे अपना कानूनी और मानवीय हक मांग लें, तो उन्हें कुलकलंकिनी कह दिया जाता है। राधिका अब खुश है, लेकिन उसके दिल के एक कोने में मायके के उस आंगन की यादें आज भी एक कसक बनकर चुभती हैं, जहां प्यार और पैसे में से, पैसे ने जीत हासिल की थी।
दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या राधिका ने अपने पति की जान बचाने के लिए मायके से अपना हक मांग कर कोई गलती की? क्या बेटियों का मायके पर सिर्फ तब तक हक होता है जब तक वे कुछ मांगती नहीं? अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
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