सच्चा दांपत्य जीवन

शाम के करीब चार बज रहे थे। गुलमोहर एन्क्लेव के सेंट्रल पार्क में सुहागिन महिलाओं की चहल-पहल शुरू हो चुकी थी। लाल और गुलाबी जोड़ों में सजी धजी महिलाएं करवा चौथ की कथा सुनने के लिए इकट्ठा हो रही थीं। इसी सोसाइटी में पिछले महीने ही शिफ्ट हुई राधिका भी अपनी पूजा की थाली लिए वहां पहुंची। उसकी शादी को अभी महज़ दो साल ही हुए थे। पार्क में उसकी मुलाकात अपनी पड़ोसन वैशाली से हुई। वैशाली एक बेहद शांत, सौम्य और समझदार महिला थी। राधिका ने सुबह से कुछ अजीब सी चीज़ें नोटिस की थीं, जो उसके मन में लगातार कौतूहल पैदा कर रही थीं।

कथा समाप्त होने के बाद, जब सभी महिलाएं चाँद के इंतज़ार में आपस में हंसी-ठिठोली कर रही थीं, तब राधिका से रहा नहीं गया। वह वैशाली के पास खिसक कर आई और थोड़ी झिझक के साथ बोली, “वैशाली दीदी, अगर आप बुरा न मानें तो एक बात पूछूं? आज सुबह मैंने अपनी बालकनी से देखा था कि आपके पति, विवेक जी, सुबह चार बजे उठकर किचन में आपके साथ सरगी बना रहे थे। और दोपहर में जब कथा से पहले मैं आपके घर आई, तो मैंने देखा कि आपने अपनी सासू माँ को एक बहुत सुंदर साड़ी भेंट की और उनके चरण स्पर्श करके उनसे कोई खास आशीर्वाद ले रही थीं। आमतौर पर तो सास अपनी बहू को सरगी और कपड़े देती है, पर आपके घर का रिवाज़ कुछ उल्टा नहीं लगा?”

वैशाली ने राधिका की इस बात पर एक बहुत ही प्यारी और सुकून भरी मुस्कान दी। उसने अपने दुपट्टे को थोड़ा सही किया और राधिका का हाथ अपने हाथों में लेकर बोली, “राधिका, तुम इस सोसाइटी में नई आई हो और हमारी पारिवारिक परंपराओं से अनजान हो, इसलिए तुम्हारा हैरान होना बिल्कुल लाज़मी है। तुम्हें लग रहा होगा कि मैं कुछ अलग कर रही हूँ, लेकिन सच कहूं तो मैं हर साल अपना करवा चौथ बिल्कुल ऐसे ही मनाती हूँ।”

राधिका ने अपनी आँखें बड़ी करते हुए पूछा, “ऐसे ही का क्या मतलब दीदी? क्या विवेक जी भी व्रत रखते हैं?”

वैशाली ने गहराई से सांस ली और बताना शुरू किया, “हाँ राधिका। करवा चौथ वाले दिन विवेक हमेशा अपने ऑफिस से छुट्टी ले लेते हैं। उनका मानना है कि जो पत्नी उनकी लंबी उम्र और सलामती के लिए पूरे दिन भूखी-प्यासी रह सकती है, क्या वो उसके लिए अपनी भागदौड़ भरी ज़िंदगी से एक दिन भी नहीं निकाल सकते? सुबह वो अलार्म बजते ही मेरे साथ उठते हैं। हम दोनों मिलकर किचन में सरगी तैयार करते हैं और एक साथ बैठकर खाते हैं। पूरे दिन वो मेरा पूरा ख्याल रखते हैं, घर के कामों में हाथ बंटाते हैं ताकि मुझे थकान न हो। सुबह नहा-धोकर हम दोनों साथ में मंदिर जाते हैं। मैं शिव-पार्वती जी के सामने अपने सुहाग की लंबी उम्र की प्रार्थना करती हूँ और वो मेरी सलामती की।”

राधिका यह सुनकर मंत्रमुग्ध रह गई। उसने अपने पति को देखा जो दूर खड़े अपने दोस्तों के साथ गपशप लड़ा रहे थे और उन्हें इस बात से कोई खास फर्क नहीं पड़ रहा था कि राधिका सुबह से भूखी-प्यासी है।

राधिका ने एक गहरी सांस ली और फिर अपना दूसरा सवाल पूछा, “वो तो ठीक है दीदी, यह तो बहुत अच्छी बात है कि वो आपका इतना साथ देते हैं। लेकिन आपने अपनी सासू माँ को जो इतने आदर के साथ तोहफा दिया और उनके पैर छूकर आशीर्वाद लिया, उसका क्या कारण था? सासू माँ के पैर तो हम वैसे भी रोज़ सुबह छूकर आशीर्वाद लेते ही हैं, फिर आज के दिन ऐसा क्या खास था?”

वैशाली की आँखों में अब एक अजीब सी चमक और कृतज्ञता के भाव आ गए थे। उसने राधिका की आँखों में देखते हुए एक ऐसी बात कही जिसने राधिका के दिल के तार झंकृत कर दिए।

“राधिका, रोज़ जो हम आशीर्वाद लेते हैं, वो हमारा सम्मान और दिनचर्या है। लेकिन आज का आशीर्वाद मेरे लिए बहुत खास होता है,” वैशाली ने भारी और भावुक आवाज़ में कहा। “ज़रा सोचो राधिका, आज हम जिस सुहाग के लिए निर्जला व्रत रखती हैं, जिस पति के माथे पर तिलक लगाकर उसकी लंबी उम्र की मन्नतें मांगती हैं, आख़िर उस इंसान को इस दुनिया में किसने लाया? मेरी सासू माँ ने। उन्होंने अपने खून-पसीने से सींचकर, अपना पेट काटकर उसे बड़ा किया है। उसे अच्छे संस्कार दिए, औरतों का सम्मान करना सिखाया और फिर एक दिन अपना वही कलेजे का टुकड़ा, अपनी ज़िंदगी भर की पूंजी, पूरी आत्मीयता के साथ मेरे हाथों में सौंप दी। अगर आज विवेक एक इतने अच्छे पति हैं जो मेरी हर छोटी-बड़ी खुशी का ध्यान रखते हैं, तो यह उस माँ की परवरिश का ही तो नतीजा है।”

वैशाली रुकी और राधिका के चेहरे के भाव पढ़ने लगी। राधिका अवाक होकर सुन रही थी।

वैशाली ने अपनी बात पूरी करते हुए कहा, “इसलिए राधिका, जब मैं मंदिर से लौटती हूँ, तो सबसे पहले अपनी सासू माँ की पसंद का नाश्ता अपने हाथों से बनाती हूँ। उन्हें वो नाश्ता परोसने के बाद, मैं उन्हें एक उपहार देती हूँ और उनके पैर छूकर ये खास आशीर्वाद लेती हूँ। मैं उन्हें मन ही मन धन्यवाद कहती हूँ कि ‘माँ जी, आपने मुझे इस दुनिया का सबसे अनमोल तोहफा अपने बेटे के रूप में दिया है। आपकी इस धरोहर की मैं जीवन भर रक्षा करूँगी।’ मेरा ये व्रत भगवान से ज्यादा उस माँ के प्रति मेरा आभार है, जिसने मेरे सिंदूर को जन्म दिया है।”

राधिका की आँखों से कब आंसू छलक आए, उसे खुद भी पता नहीं चला। आज तक उसने करवा चौथ को सिर्फ भूखे रहने, नए कपड़े पहनने और चाँद देखने का एक रिवाज़ भर माना था। लेकिन वैशाली ने उसे रिश्तों की एक नई और बेहद पवित्र गहराई से वाकिफ करा दिया था। राधिका ने महसूस किया कि सच्चा दांपत्य जीवन सिर्फ पति-पत्नी के बीच सीमित नहीं होता, बल्कि वह उस नींव पर खड़ा होता है जो परिवार के बड़े-बुज़ुर्ग रखते हैं।

तभी आसमान में चाँद निकल आया। सभी महिलाएं अपनी छलनी लेकर चाँद की तरफ दौड़ीं। राधिका ने जब छलनी से अपने पति को देखा, तो उसके दिल में अपने सुहाग के साथ-साथ अपनी सासू माँ के लिए भी एक अथाह प्रेम और सम्मान जाग उठा। उसने मन ही मन तय कर लिया कि अगली सुबह वह सबसे पहले अपनी सासू माँ के पास जाएगी और उन्हें उसी तरह धन्यवाद देगी, जैसे वैशाली ने दिया था। आज राधिका ने सिर्फ चाँद नहीं देखा था, बल्कि रिश्तों के आसमान में एक नया और उजला सितारा ढूंढ लिया था।

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