शान

“नसीब आपने लिखा था उसका, भगवान नहीं!” श्रुति ने भी उसी तेज़ आवाज़ में जवाब दिया। “लेकिन मैं अपना नसीब आपको नहीं लिखने दूंगी। मैं आज अपना इंटरव्यू देकर आ रही हूँ। मुझे नौकरी मिल गई है। कल से मैं अपनी ज़िंदगी अपने हिसाब से जिऊंगी। अगर इस घर में मुझे मेरी शर्तों पर, एक आज़ाद इंसान की तरह रहने की इजाज़त नहीं है, तो मैं कल ही इस घर को छोड़ दूंगी।”

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चुइंगम चबाते हुए और उसे एक गुब्बारे की तरह फुलाकर फोड़ते हुए श्रुति ने झल्लाहट में कहा, “यार, दीनानाथ शर्मा का तो रोज़ का यही नाटक है। इसमें नया क्या है? तू तो ऐसे घबरा रही है जैसे वो आज पहली बार हम पर बरसने वाले हों।”

सोनिया ने अपने दुपट्टे को ठीक करते हुए डरी हुई आवाज़ में कहा, “तो गुस्सा तो करेंगे ही ना। हम ही तो उन्हें मौका देते हैं। छह बजे घर पहुँचने का नियम है और साढ़े छह हो रहे हैं।”

श्रुति ने मुँह बनाते हुए कहा, “बस कर यार! तू तो दीनानाथ की बिल्कुल परछाई बनकर रह गई है। उनकी तरह जिएं ना, तो इस घर में सिर्फ सांस लेने की इजाज़त मिलेगी, वो भी गिनकर। मेरा तो दम घुटता है उनके इस तथाकथित उसूलों वाले घर में। बस एक अच्छी नौकरी मिलने की देर है, फिर मैं दीनानाथ शर्मा को हमेशा के लिए अलविदा कहकर उनकी इस जेल से आज़ाद हो जाऊंगी।”

सोनिया ने श्रुति को घूरते हुए टोका, “तू बाबूजी का नाम ऐसे क्यों लेती है? कितनी बार समझाया है कि उन्हें आदर से बाबूजी कहा कर। लेकिन तेरे तो कान पर जूं तक नहीं रेंगती। हमेशा बस यहाँ से उड़ने के ही ख्वाब देखती रहती है।”

श्रुति ने एक तिरछी और तीखी नज़र सोनिया पर डाली, “तू तो उनकी जी-हुज़ूरी करके ‘आदर्श बेटी’ का मेडल पहन रही है ना, तो पहन। मुझे ये फालतू के लेक्चर मत दिया कर। उन्होंने जो ‘आदर्श’ फैसले लिए थे, उसका नतीजा देखा है ना? जो उन्होंने काव्या दी के साथ किया… और तू भी तो उसी रास्ते पर…”

‘काव्या दी’ का नाम सुनते ही दोनों बहनों के कदम ठिठक गए और ज़ुबान पर जैसे ताला लग गया। दोनों चुपचाप सिर झुकाकर घर की तरफ बढ़ने लगीं। रोज़ किसी न किसी बात पर काव्या दी का नाम उनके बीच आ ही जाता था, और उसके बाद पसरने वाला सन्नाटा उनके घर की सबसे डरावनी सच्चाई होती थी।

काव्या … दीनानाथ शर्मा की सबसे बड़ी बेटी। एक ऐसी लड़की जो पढ़ने में अव्वल थी, जिसके सपनों में आसमान छूने की उड़ान थी। लेकिन दीनानाथ शर्मा के झूठे रुतबे और खानदानी शान ने उस उड़ान को बीच में ही काट दिया था। काव्या  को उनके सपनों से खींचकर एक ऐसे अमीर और रसूखदार परिवार में ब्याह दिया गया, जहाँ औरत की हैसियत महज़ एक सजावट के सामान से ज्यादा कुछ नहीं थी। बाबूजी का कहना था कि लड़कियां ज्यादा पढ़-लिखकर क्या करेंगी, उन्हें तो चूल्हा ही संभालना है। शादी के बाद काव्या   पर जो अत्याचार हुए, दीनानाथ शर्मा ने उसे ‘ससुराल की बातें’ कहकर हमेशा नज़रअंदाज़ कर दिया। नतीजा यह हुआ कि आज काव्या   डिप्रेशन का शिकार होकर एक मानसिक शरणालय में अपनी ज़िंदगी के दिन गिन रही थीं। उनकी वो हंसती-खेलती आँखें अब शून्य में घूरती रहती थीं।

यही वजह थी कि श्रुति ने अपने मन में बगावत के बीज बो लिए थे। वह जानती थी कि अगर उसने अपनी आज़ादी के लिए आवाज़ नहीं उठाई, तो उसका हश्र भी काव्या   जैसा ही होगा।

घर का लोहे का भारी दरवाज़ा खुला। सामने दालान में दीनानाथ शर्मा अपनी पुरानी आरामकुर्सी पर बैठे थे। उनकी निगाहें दीवार घड़ी पर टिकी थीं। उनके चेहरे का कठोर भाव देखकर सोनिया के पसीने छूटने लगे।

“वक़्त देखा है तुम दोनों ने?” दीनानाथ की गरजती हुई आवाज़ ने पूरे घर में खौफ पैदा कर दिया।

सोनिया ने कांपते हुए कहा, “बाबूजी… वो बस स्टैंड पर बस लेट आई थी, इसलिए…”

“चुप रहो!” दीनानाथ ने डपटते हुए कहा। “लड़कियों का इतनी शाम गए सड़कों पर घूमना हमारे खानदान की इज़्ज़त के खिलाफ है। अगर कल से छह बजे तक घर के अंदर कदम नहीं रखा, तो दोनों का कॉलेज जाना बंद करवा दूंगा। मैं अपने घर में कोई बगावत बर्दाश्त नहीं करूंगा।”

सोनिया तो सहम कर एक किनारे खड़ी हो गई, लेकिन आज श्रुति के अंदर का गुबार फूट पड़ा। उसने अपनी किताबें मेज़ पर पटकीं और सीधे दीनानाथ शर्मा की आँखों में देखते हुए बोली, “बंद करवा दीजिए! वैसे भी आपके इस घर और जेल में कोई खास फर्क नहीं है। यहाँ इज़्ज़त के नाम पर सिर्फ हमारी सांसें गिरवी रखी जाती हैं।”

दीनानाथ अपनी कुर्सी से एकदम खड़े हो गए। उनका चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। “ये क्या बदतमीज़ी है श्रुति? एक बाप के सामने ज़बान लड़ा रही है?”

“बाप होने का मतलब सिर्फ हुक्म चलाना और बच्चों की खुशियों का गला घोंटना नहीं होता, मिस्टर दीनानाथ शर्मा!” श्रुति की आँखों से आंसुओं के साथ-साथ सालों की दबी हुई भड़ास भी निकल रही थी। “आपने अपनी शान के लिए काव्या दी की बलि चढ़ा दी। आज वो वहां पागलों की तरह जी रही है, और आपको सिर्फ इस बात की फिक्र है कि समाज क्या कहेगा! आप चाहते हैं कि सोनिया और मैं भी उसी तरह घुट-घुट कर मरें?”

“काव्या के नसीब में जो था, वो उसे मिला। इसमें मेरी क्या गलती?” दीनानाथ ने अपनी गलती छुपाते हुए चिल्लाकर कहा।

“नसीब आपने लिखा था उसका, भगवान नहीं!” श्रुति ने भी उसी तेज़ आवाज़ में जवाब दिया। “लेकिन मैं अपना नसीब आपको नहीं लिखने दूंगी। मैं आज अपना इंटरव्यू देकर आ रही हूँ। मुझे नौकरी मिल गई है। कल से मैं अपनी ज़िंदगी अपने हिसाब से जिऊंगी। अगर इस घर में मुझे मेरी शर्तों पर, एक आज़ाद इंसान की तरह रहने की इजाज़त नहीं है, तो मैं कल ही इस घर को छोड़ दूंगी।”

कमरे में एक भयानक सन्नाटा छा गया। सोनिया रोते हुए श्रुति का हाथ पकड़ रही थी, उसे चुप कराने की कोशिश कर रही थी। लेकिन आज श्रुति रुकने वाली नहीं थी।

दीनानाथ शर्मा का उठा हुआ हाथ हवा में ही रुक गया। उनकी आँखों में पल भर के लिए एक अजीब सा खालीपन आ गया। वह उस बेटी को देख रहे थे जो उनकी सत्ता को चुनौती दे रही थी। श्रुति ने अपनी बात पूरी की और बिना पीछे मुड़े अपने कमरे की तरफ चली गई। सोनिया भी रोती हुई उसके पीछे भागी।

दालान में अकेले खड़े दीनानाथ शर्मा अचानक बहुत बूढ़े और कमज़ोर लगने लगे। उनका कठोर अनुशासन, उनकी झूठी शान, आज सब कुछ भरभरा कर गिर पड़ा था। उन्हें पहली बार अहसास हो रहा था कि काव्या की ज़िंदगी तबाह करने का अपराधबोध, जिसे वो हमेशा अपने गुस्से के पीछे छुपाते आए थे, आज श्रुति ने सबके सामने नंगा कर दिया था। घर की चारदीवारी आज उन्हें भी काटने को दौड़ रही थी। क्या एक पिता की जीत इसी में है कि वो अपनी ही बेटियों की खुशियों को हराकर अपना रुतबा बनाए रखे? आज दीनानाथ शर्मा के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था।

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