“नहीं बेटी, आज मुझे बोलने दे,” मनोरमा जी ने रुंधे गले से कहा। “तूने भूखे-प्यासे रहकर, अपनी दूधमुँही बच्ची को पीठ पर बाँधकर मेरी सेवा की, अस्पताल के चक्कर काटे, इस घर को मंदिर बनाया… और मैंने? मैंने अपने अहंकार में चूर होकर सिर्फ चार लड्डुओं और मठरियों के लिए तेरे आत्मसम्मान को पैरों तले रौंद दिया। मैंने तुझे कभी पराई बेटी से अपनी बेटी समझा ही नहीं। लेकिन आज मुझे समझ आया है गरिमा कि बेटी तो सिर्फ कोख से जन्म लेती है, पर बहू वो पावन गंगा है जो अपने सारे सुख-दुख भूलकर एक अनजान परिवार को अपनी साँसों से सींचती है।”
मनोरमा जी लगभग पैर पटकते हुए घर के भीतर दाखिल हुईं। उनका गोरा चेहरा गुस्से और उत्तेजना की वजह से सुर्ख लाल हो रहा था। हाथ में पकड़े थैले को उन्होंने बैठक की मेज़ पर इतनी ज़ोर से पटका कि उस पर रखा काँच का फूलदान थरथरा उठा।
रसोई में रात के खाने की तैयारी कर रही उनकी बहू गरिमा उस आवाज़ को सुनकर चौंक गई। गरिमा स्वभाव से अत्यंत शांत, धैर्यवान और घर-परिवार को अपनी पलकों पर सजाकर रखने वाली स्त्री थी। उसने तुरंत गैस की आंच धीमी की, अपने सूती दुपट्टे से हाथ पोंछे और तांबे के लोटे में ठंडा पानी भरकर बाहर बैठक में आई।
“मम्मी जी, पानी लीजिए… क्या हुआ? आप इतनी बदहवास क्यों लग रही हैं? बाहर किसी से कुछ कहा-सुनी हो गई क्या?” गरिमा ने अत्यंत आदर और सहज चिंता के साथ लोटा उनकी ओर बढ़ाते हुए पूछा।
मनोरमा जी ने लोटा तो हाथ में थाम लिया, लेकिन उनका गुस्सा शांत होने के बजाय और भड़क उठा। उन्होंने एक ही घूंट में आधा पानी पिया और सोफे पर बैठते हुए तल्खी से बोलीं, “कहा-सुनी क्या होगी किसी से! मैं तो अपनी रागिनी के घर से आ रही हूँ। कलेजा छलनी हो गया मेरी बच्ची की हालत देखकर! उस घर के लोग इंसान हैं या पत्थर? कोई दया-धरम नाम की चीज़ ही नहीं बची उन लोगों में!”
रागिनी, मनोरमा जी की इकलौती लाडली बेटी थी और गरिमा की ननद। पिछले साल ही उसका विवाह अंबाला के एक प्रतिष्ठित और संपन्न परिवार में हुआ था। अभी छह महीने पहले ही उसने एक प्यारे से बेटे को जन्म दिया था।
गरिमा ने चिंता भरे स्वर में पूछा, “रागिनी दीदी? उनकी तो तबीयत ठीक है ना मम्मी जी? क्या हुआ वहाँ?”
मनोरमा जी की आँखें गुस्से से उबल पड़ीं, “तबीयत खाक ठीक रहेगी उसकी! उसकी सास और ननद दोनों की दोनों मिलकर तीर्थ यात्रा के बहाने हरिद्वार निकल गईं, वो भी पूरे चार-पाँच दिनों के लिए! घर में इतने कमरे, इतना बड़ा आँगन, सुबह से शाम तक खटने वाला काम और ऊपर से मेरी फूल जैसी बच्ची का छह महीने का दूधमुंहा बच्चा! रागिनी बेचारी अकेले उस मासूम को संभाले, सबके कपड़े धोए, घर की सफाई करे या रसोई का चूल्हा फूंके? उस जालिम सास को ज़रा भी तरस नहीं आया कि इतनी सी बच्ची कैसे ये सब अकेले झेलेगी? एक बार भी नहीं सोचा कि अपनी बेटी को साथ ले जाते वक्त कम से कम बहू पर तो रहम खाएँ! आने दो ज़रा उन महारानी को लौटकर, मैं खुद फोन करके उनकी खबर लूँगी। मेरी फूल जैसी बेटी को नौकरानी समझ रखा है क्या!”
मनोरमा जी बड़बड़ाती हुई, गुस्से में अपनी साड़ी का पल्लू झटककर अपने शयनकक्ष की ओर बढ़ गईं और दरवाज़ा भीतर से बंद कर लिया।
बैठक में अकेली खड़ी गरिमा के हाथ में बचा हुआ पानी का लोटा कांप गया। उसके पैरों तले की ज़मीन जैसे अचानक खिसक गई हो। मनोरमा जी के एक-एक शब्द उसके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रहे थे। रागिनी के लिए सास का यह दर्द, यह ममता, यह उबलता हुआ गुस्सा… गरिमा को पल भर में समय के पहिए को तीन साल पीछे घुमाकर अतीत के उस अंधेरे कोने में ले गया, जिसे वह भूलने की लाख कोशिशों के बाद भी कभी भुला नहीं पाई थी।
वह गरिमा के विवाह के बाद की दूसरी दीपावली का समय था। घर में नई नवेली गृहस्थी की महक थी। पूरे परिवार में त्योहार का उल्लास था। लेकिन दीपावली से ठीक पंद्रह दिन पहले मनोरमा जी की तबीयत अचानक बिगड़ गई। तेज बुखार और छाती में गंभीर संक्रमण के चलते उन्हें शहर के निजी अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराना पड़ा था। डॉक्टरों ने कह दिया था कि स्थिति बेहद नाज़ुक है और चौबीसों घंटे किसी न किसी को अस्पताल में रहना होगा।
उस नाज़ुक घड़ी में गरिमा के पति प्रखर दिन-रात अपने दफ्तर और अस्पताल के बीच दौड़ते रहते थे। घर की पूरी ज़िम्मेदारी, अस्पताल की व्यवस्था और उस पर गरिमा की नौ महीने की छोटी सी बेटी, अनन्या की देखरेख—सब कुछ अकेले गरिमा के कोमल कंधों पर आ टिका था।
गरिमा ने उस कठिन समय में अपनी सुध-बुध बिसार दी थी। वह सुबह चार बजे उठती, बिना गर्म पानी का इंतज़ार किए ठंडे पानी से स्नान करती ताकि समय बच सके। सबसे पहले अपनी नौ माह की बच्ची को दूध पिलाकर सुलाती। फिर अस्पताल के नियमों के अनुसार बिना तेल-मसाले का सुपाच्य दलिया, लौकी का उबला हुआ सूप और ताज़ा फलों का रस तैयार करती। अनन्या को गोद में लिए, एक हाथ में भारी टिफिन का थैला संभाले वह रोज़ सुबह आठ बजे अस्पताल पहुँचती। सास के माथे को सहलाती, स्पंज से उनका बदन पोंछती, उन्हें अपने हाथों से खाना खिलाती और दवाइयाँ देती।
अस्पताल से दोपहर बारह बजे लौटकर वह घर के काम में जुट जाती। दीपावली का पावन पर्व सिर पर था। गरिमा के मन में एक ही पवित्र विचार बार-बार कौंधता था—”मम्मी जी जब अस्पताल से ठीक होकर घर लौटेंगी, तो उन्हें बीमारी और गंदगी का कोई अहसास नहीं होना चाहिए। घर अगर दीपों की तरह चमकेगा, तो मम्मी जी का मन खुश हो जाएगा और वे जल्दी स्वस्थ होंगी।”
इसी सोच के साथ, गरिमा अपनी पीठ पर दुपट्टे से नन्ही अनन्या को बाँध लेती और खुद स्टूल पर चढ़कर पंखों की धूल झाड़ती। दीवारों के जाले साफ करती, पीतल के दीयों और पूजा के बर्तनों को नींबू और राख से रगड़-रगड़ कर चमकाती। रात को जब बच्ची सो जाती, तो वह दो बजे तक खिड़कियों के पर्दे बदलती और आंगन की धुलाई करती। उसकी कमर दर्द से टूटने लगती थी, पैरों की पिंडलियों में भयंकर ऐंठन होती थी, लेकिन उसके चेहरे पर केवल एक आस थी—अपनी सास की एक संतुष्ट मुस्कान और उनका ज़रा सा आशीर्वाद।
दीपावली से ठीक दो दिन पहले मनोरमा जी को अस्पताल से छुट्टी मिल गई। प्रखर जब अपनी माँ को सहारा देकर कार से घर लेकर आए, तो गरिमा की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। उसने मुख्य द्वार पर घी का पहला दीपक जलाकर रखा था, फूलों की ताज़ा रंगोली बनाई थी और पूरे आदर के साथ सास की आरती उतारकर उनका गृह प्रवेश कराया था। घर का कोना-कोना शीशे की तरह चमक रहा था। बैठक से लेकर शयनकक्ष तक, सब कुछ अत्यंत सुव्यवस्थित और सुगंधित था।
गरिमा ने अत्यंत संकोच और अपनेपन से मनोरमा जी के पैर छुए और कहा, “मम्मी जी, आप सकुशल लौट आईं, हमारे लिए यही सबसे बड़ा धनतेरस है। आप आराम कीजिए, मैं आपके लिए तुलसी और अदरक की गर्म चाय बनाकर लाती हूँ।”
लेकिन मनोरमा जी ने न तो उस चमकते हुए घर को देखा, न अपनी बहू की सूजी हुई, लाल आँखों को देखा और न ही उस नन्ही बच्ची को देखा जो माँ की गोद के लिए तरस रही थी। मनोरमा जी की नज़र सीधे रसोई के उस कोने पर गई जहाँ त्योहार के लिए पीतल के बड़े-बड़े डिब्बे खाली रखे थे।
मनोरमा जी के चेहरे की त्योरियाँ चढ़ गईं। वे बिना किसी संकोच के, भरी आवाज़ में गरिमा पर बरस पड़ीं, “यह क्या तमाशा है गरिमा? आज छोटी दिवाली आ गई और घर में अब तक बेसन के लड्डू, मठरी और गुझिया का एक दाना भी नहीं बना? पूरा घर सूना पड़ा है! जब हम तुम्हारी उम्र के थे ना, तो पूरा कुनबा संभालते थे। अपनी सास की सेवा भी करते थे, बच्चों को भी पालते थे और त्योहार पर इतनी मिठाइयाँ और नमकीन बनाते थे कि पूरा मोहल्ला खाकर वाह-वाह करता था! तुम आज के ज़माने की पढ़ी-लिखी लड़कियों से ज़रा सा घर नहीं संभलता। बहाने बनाने में तो तुम लोगों का कोई सानी नहीं है!”
गरिमा स्तब्ध रह गई थी। उसके हाथ में पकड़ा चाय का कप थरथरा गया था। उसने भर्राए हुए गले से समझाने की कोशिश की थी, “मम्मी जी… आप अस्पताल में थीं। रोज़ दो बार अस्पताल का टिफिन लेकर जाना, दवाइयों का ध्यान रखना, घर की साफ-सफाई और उस पर यह नन्ही सी अनन्या… मैं बिल्कुल अकेली थी मम्मी जी। दिन-रात का होश नहीं था। बस मिठाई बनाने का ही समय नहीं मिल पाया, बाकी मैंने सब…”
“बस-बस, अपनी सफाई अपने पास रखो!” मनोरमा जी ने हाथ झटकते हुए बात काट दी थी। “कामचोरों के पास सौ दलीलें होती हैं। तुम्हारी माँ ने तुम्हें यही सिखाया है कि सास के बीमार होते ही घर को धर्मशाला बना दो? जिसे काम करना होता है, वह रात जागकर भी कर लेता है।”
उस दिन गरिमा रसोई के कोने में बैठकर घंटों सिसकती रही थी। उसका रोम-रोम अपमान की आग में झुलस गया था। जिस सास को उसने अपनी सगी माँ से बढ़कर समझा था, जिसके स्वास्थ्य के लिए उसने मन्नतें माँगी थीं, उसी सास ने उसकी पंद्रह दिनों की तपस्या को एक ही झटके में ‘कामचोरी’ का नाम दे दिया था।
और आज…
आज जब वही स्थिति, बल्कि उससे बहुत कम कठिन परिस्थिति, उनकी अपनी सगी बेटी रागिनी पर आई थी, तो मनोरमा जी का कलेजा फटा जा रहा था! रागिनी के ससुराल वालों ने यदि चार दिनों के लिए बाहर जाकर अपनी बहू पर घर और बच्चे की ज़िम्मेदारी छोड़ दी, तो वे ‘जालिम’ और ‘निर्दयी’ बन गए थे! और जब गरिमा ने नौ महीने के बच्चे के साथ, सास की बीमारी, अस्पताल की दौड़-धूप और पूरे घर की सफाई को अकेले अपने सिर पर उठाया था, तब उसे सिर्फ और सिर्फ ताने मिले थे!
यह दोहरा मापदंड… यह दोहरा चरित्र! क्या किसी की बेटी ही इंसान होती है और किसी दूसरे की कोख से जन्मी बहू केवल एक मशीन? क्या बहू के सीने में दिल, उसके शरीर में हड्डियाँ और उसकी आँखों में आँसू नहीं होते?
गरिमा की पलकों से आंसुओं की दो मोटी बूँदें ढुलक कर उसके गालों पर बह निकलीं। वह जड़वत खड़ी थी, तभी मुख्य दरवाज़े से प्रखर ने घर में प्रवेश किया। दफ्तर से लौटकर प्रखर थका हुआ था, लेकिन जैसे ही उसकी नज़र बैठक में गुमसुम और रोती हुई गरिमा पर पड़ी, उसके कदम तेज़ हो गए।
“गरिमा? क्या हुआ? तुम रो क्यों रही हो?” प्रखर ने पास आकर बड़े स्नेह से उसके कंधे पर हाथ रखा।
गरिमा ने तुरंत अपने पल्लू से आँसू पोंछने की कोशिश की, “कुछ नहीं… बस ऐसे ही आँख में कुछ चला गया था।”
“मुझसे झूठ मत बोलो गरिमा। पिछले पाँच सालों में मैंने तुम्हारी आँखों की हर नमी को पढ़ना सीखा है। बताओ, माँ ने फिर कुछ कह दिया क्या? अभी बाहर से उनके बड़बड़ाने की आवाज़ आ रही थी।” प्रखर ने आग्रहपूर्वक पूछा।
गरिमा के भीतर का दर्द अब और संभल नहीं सका। उसने सिसकते हुए प्रखर को पूरी बात बता दी—मनोरमा जी का रागिनी के घर से गुस्से में लौटना, समधनों को कोसना, बेटी के छह महीने के बच्चे और घर के काम को लेकर उनका विलाप करना… और फिर गरिमा ने अपनी रुंधती हुई आवाज़ में उस दूसरी दीपावली की याद भी प्रखर के सामने रख दी।
“प्रखर जी, मैं कोई शिकायत नहीं कर रही हूँ,” गरिमा ने रोते हुए कहा। “रागिनी मेरी भी बहन जैसी है। मुझे भी उसके लिए बुरा लग रहा है कि उसे अकेले सब संभालना पड़ रहा है। लेकिन मेरा दिल इस बात से छलनी हो जाता है कि वही माँ जी, जिन्होंने आज अपनी बेटी के लिए पूरा आसमान सिर पर उठा लिया, उस दिन मेरे पसीने और मेरे समर्पण को देखकर भी इतना कठोर कैसे बोल गई थीं? क्या सास की ममता सिर्फ अपनी बेटी के लिए आरक्षित होती है? क्या बहू चाहे अपना खून भी निचोड़कर दे दे, तब भी वह उस ममता की एक बूँद पाने की हकदार नहीं बन सकती?”
प्रखर ने एक गहरी सांस ली। उसने गरिमा के कांपते हाथों को अपनी हथेलियों में थाम लिया। उसकी आँखों में अपनी पत्नी के प्रति असीम सम्मान और अपनी माँ के इस रवैये के प्रति एक गहरी पीड़ा थी।
प्रखर ने बहुत ही शांत, लेकिन गंभीर स्वर में कहा, “गरिमा, तुम्हारी हर एक बात सच है। तुम्हारे उस त्याग का गवाह मैं हूँ। तुमने उस दीपावली पर जो किया था, वह कोई सगी बेटी भी शायद न कर पाती। लेकिन गरिमा, तुम्हें एक कड़वा सच स्वीकार करना होगा। समाज की यह विडंबना सदियों पुरानी है। एक माँ के लिए उसकी बेटी का दर्द हमेशा पहाड़ जैसा दिखता है और बहू का त्याग उसे एक साधारण कर्तव्य नज़र आता है। बेटी बेटी होती है गरिमा, और बहू चाहे अपना कलेजा निकाल कर रख दे, इस संकीर्ण मानसिकता में वह कभी सगी औलाद का दर्ज़ा नहीं पा पाती। माँ गलत हैं, पूरी तरह गलत हैं, लेकिन मैं लाचार हूँ कि मैं उनके भीतर के इस दोहरे नज़रिए को कैसे बदलूँ।”
प्रखर और गरिमा इस बात से पूरी तरह अनजान थे कि कमरे के ठीक बाहर, परदे की ओट में मनोरमा जी खड़ी थीं।
वे दरअसल पानी का खाली लोटा देने और गरिमा से चाय माँगने बाहर आई थीं, लेकिन प्रखर की गंभीर आवाज़ सुनकर उनके कदम वहीं ठिठक गए थे। उन्होंने गरिमा की एक-एक सिसकी, उसका एक-एक शब्द और अपने बेटे प्रखर की वह कड़वी सच्चाई पूरी तरह सुन ली थी।
‘बेटी बेटी होती है और बहू चाहे अपना कलेजा निकाल कर रख दे, वह कभी बेटी नहीं बन सकती…’
प्रखर का यह वाक्य मनोरमा जी के कानों में किसी भयानक बिजली की तरह कौंधा। उनके पैरों के नीचे की ज़मीन जैसे धंस गई हो। उनके हाथ कांपने लगे।
एक ही पल में, मनोरमा जी की अंतरात्मा के सामने उनकी पूरी ज़िंदगी का आईना घूम गया। उन्हें वह दीपावली का दृश्य अपनी बंद आँखों के सामने साक्षात दिखाई देने लगा। वह नन्ही सी अनन्या जो फर्श पर बिलख रही थी, वह गरिमा जो पसीने से तर-बतर होकर उनके पैरों को दबा रही थी, अस्पताल के वो दिन जब गरिमा अपने सूखे होंठों के साथ उनके लिए गर्म दलिया लेकर आती थी… और बदले में उन्होंने क्या दिया था? केवल ताने! केवल उपेक्षा!
और आज? आज जब उनकी अपनी बेटी रागिनी को सिर्फ चार दिन अपनी ही गृहस्थी का सामान्य काम संभालना पड़ा, तो उनका कलेजा फटा जा रहा था! वे समधनों को कोसने चली थीं, जबकि असलियत में वे खुद अपनी बहू के लिए उससे भी कहीं ज्यादा कठोर और अन्यायी सास साबित हुई थीं!
मनोरमा जी का सारा अहंकार, उनकी सारी ठसक और सास होने का झूठा दंभ उस एक क्षण में पिघलकर पश्चाताप की राख बन गया। उन्हें खुद से घिन आने लगी। उन्होंने सोचा कि अगर आज गरिमा की जगह उनकी बेटी रागिनी के साथ उसकी सास ने ऐसा व्यवहार किया होता जैसा उन्होंने गरिमा के साथ किया था, तो क्या वे उसे कभी क्षमा कर पातीं? नहीं! तो फिर गरिमा की माँ के दिल पर क्या बीती होगी?
मनोरमा जी की आँखों से पश्चाताप के मोटे-मोटे आँसू बह निकले। वे अपने कांपते कदमों से परदा हटाकर बैठक के भीतर आ गईं।
माँ को अचानक सामने खड़ा देखकर प्रखर और गरिमा दोनों घबरा गए। गरिमा ने तुरंत अपने आँसू पोंछे और सहमकर खड़ी हो गई कि कहीं माँ जी ने उनकी बातें सुनकर कोई नया बखेड़ा न खड़ा कर दिया हो।
“मम्मी जी… आप? मैं… मैं बस अभी आपके लिए चाय लेकर आ रही थी,” गरिमा ने नज़रें झुकाते हुए अत्यंत धीमे स्वर में कहा।
लेकिन मनोरमा जी ने कुछ नहीं कहा। उनके होंठ कांप रहे थे। वे धीरे-धीरे आगे बढ़ीं और उन्होंने बिना एक पल गँवाए गरिमा के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए।
गरिमा अवाक रह गई। इससे पहले कि वह कुछ समझ पाती, मनोरमा जी ने गरिमा को अपनी छाती से लगा लिया।
एक सास का अपनी बहू को इस तरह सीने से भींच लेना… गरिमा का पूरा शरीर सुन्न पड़ गया।
“मुझे माफ़ कर दे गरिमा… मुझे माफ़ कर दे मेरी बच्ची,” मनोरमा जी की हिचकियाँ बंध गईं। वे फूट-फूट कर रो पड़ीं।
प्रखर अपनी जगह जड़वत खड़ा अपनी माँ के इस अप्रत्याशित रूप को देख रहा था।
मनोरमा जी ने गरिमा का चेहरा अपनी हथेलियों में उठाया। उनकी आँखों से बहते आँसू गरिमा के गालों को भिगो रहे थे। “गरिमा, आज तूने और प्रखर ने अनजाने में ही मेरी उन अंधी आँखों से अज्ञान का वो पर्दा खींचकर उतार दिया है, जो जाने कब से मेरी ममता पर पड़ा हुआ था। मैं कितनी अंधी, कितनी स्वार्थी और कितनी कठोर थी! आज जब मेरी रागिनी पर ज़रा सी मुसीबत आई, तो मुझे उस घर के लोग जालिम नज़र आने लगे। लेकिन मैंने कभी पलटकर यह नहीं देखा कि तीन साल पहले इसी छत के नीचे, इसी चौखट पर, मैं खुद तेरे साथ कितनी बड़ी जालिम बनी हुई थी!”
गरिमा की आँखें भी छलक आईं, “नहीं मम्मी जी, आप ऐसा मत कहिए…”
“नहीं बेटी, आज मुझे बोलने दे,” मनोरमा जी ने रुंधे गले से कहा। “तूने भूखे-प्यासे रहकर, अपनी दूधमुँही बच्ची को पीठ पर बाँधकर मेरी सेवा की, अस्पताल के चक्कर काटे, इस घर को मंदिर बनाया… और मैंने? मैंने अपने अहंकार में चूर होकर सिर्फ चार लड्डुओं और मठरियों के लिए तेरे आत्मसम्मान को पैरों तले रौंद दिया। मैंने तुझे कभी पराई बेटी से अपनी बेटी समझा ही नहीं। लेकिन आज मुझे समझ आया है गरिमा कि बेटी तो सिर्फ कोख से जन्म लेती है, पर बहू वो पावन गंगा है जो अपने सारे सुख-दुख भूलकर एक अनजान परिवार को अपनी साँसों से सींचती है।”
मनोरमा जी ने मुड़कर प्रखर की ओर देखा और उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “प्रखर बेटा, तूने ठीक कहा था कि बहू कितना भी कर ले, वह बेटी नहीं बन सकती। लेकिन आज मैं यह कसम खाती हूँ कि इस घर में अब तराज़ू के दो अलग-अलग पलड़े नहीं होंगे। आज से गरिमा इस घर की बहू बाद में है, मेरी सबसे बड़ी और सबसे लाडली बेटी पहले है। जो दर्द मुझे रागिनी के लिए होता है, वही दर्द और वही मान गरिमा के लिए भी होगा।”
मनोरमा जी ने अपने आँचल से गरिमा के आँसू पोंछे और मुस्कुराते हुए कहा, “चल, अब रोना बंद कर। और सुन, कल सुबह मैं और तू दोनों मिलकर अंबाला चलेंगे। हम दोनों मिलकर रागिनी का हाथ बँटाएँगे। और जब उसकी सास लौटेगी, तो मैं उनसे कोई झगड़ा नहीं करूँगी, बल्कि उन्हें भी यही समझाऊँगी कि घर की बहुओं को जब बेटियों जैसा प्यार दिया जाता है, तभी कोई घर सचमुच स्वर्ग बनता है।”
गरिमा के दिल का सारा मैल, सारे पुराने घाव उस एक आत्मीय आलिंगन और सच्चे पश्चाताप से हमेशा के लिए धुल गए। उसने झुककर अपनी सास के चरण छुए। मनोरमा जी ने उसे उठाकर अपने सीने से लगा लिया।
उस शाम ‘शांति निकेतन’ के आँगन में केवल एक सास और बहू नहीं खड़े थे, बल्कि वहाँ ममता और मर्यादा की एक नई सुबह का उदय हुआ था। घर के मंदिर में जलता हुआ दीया हवा के झोंकों के बावजूद अब और अधिक स्थिरता और रोशनी के साथ जगमगा रहा था।
प्रिय पाठकों,
क्या हमारे समाज में आज भी अधिकांश घरों में बेटी और बहू के लिए अलग-अलग तराज़ू का इस्तेमाल नहीं किया जाता? क्या मनोरमा जी की तरह हर सास को यह समझने की ज़रूरत नहीं है कि किसी दूसरे के घर से आई बेटी भी किसी माँ का कलेजा होती है और वह भी उसी सम्मान और ममता की हकदार है? इस मर्मस्पर्शी और आँखें खोल देने वाली कहानी पर आपकी क्या राय है, हमें नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखकर बताएं।
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