जिंदगी कभी-कभी ऐसे दोराहे पर लाकर खड़ा कर देती है जहाँ इंसान की सोचने-समझने की सारी ताकत शून्य हो जाती है। जब भी उस मनहूस दोपहर की याद कौंधती है, मेरी रूह तक कांप उठती है। यह बात तब की है जब मेरे घुटनों और रीढ़ की हड्डी में गंभीर समस्या आ गई थी। चलने-फिरने से लाचार होने के कारण डॉक्टरों ने मुझे तुरंत एक बड़े अस्पताल में फिजियोथेरेपी और विशेष इंजेक्शन थेरेपी करवाने की सलाह दी थी। उन दिनों हम दक्षिणी दिल्ली के कालकाजी इलाके में एक किराए के मकान में रहते थे और इलाज के लिए मुझे हर दूसरे दिन उत्तर-पश्चिम दिल्ली के पीतमपुरा जाना पड़ता था। सड़क के भारी ट्रैफिक और गड्ढों के झटकों से बचने के लिए मेरा बेटा, शांतनु, मुझे हमेशा मेट्रो से ही लेकर जाता था।
शांतनु मेरा इकलौता बेटा था। स्वभाव से बेहद शांत, ज़िम्मेदार और ममता से भरा हुआ। उसने अपनी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी बीच में ही छोड़ दी थी ताकि वह अपनी बीमार माँ की तीमारदारी कर सके। मैं जब भी उसे अपने पीछे दौड़ते-भागते देखती, मेरा कलेजा भर आता।
दिल्ली मेट्रो की एक खूबी मुझे हमेशा भीतर तक छू जाती थी। बाहर की दुनिया चाहे जितनी भी खुदगर्ज और बेपरवाह दिखे, लेकिन मेट्रो के भीतर एक अलग ही तहज़ीब नज़र आती थी। जैसे ही कोई बुज़ुर्ग, लाचार या बीमार व्यक्ति कोच में कदम रखता, युवा लड़के-लड़कियाँ अपनी सीट छोड़कर तुरंत खड़े हो जाते। महिलाओं के डिब्बे में भी यही नज़ाकत देखने को मिलती; गोद में दुधमुंहा बच्चा लिए कोई माँ चढ़ती या कोई गर्भवती महिला आती, तो युवतियाँ फौरन उन्हें अपनी जगह दे देती थीं। इंसानियत की यह सहज धारा देखकर मन को बड़ा सुकून मिलता था।
उस दिन भी मंगलवार की दोपहर थी। हमें कश्मीरी गेट पर इंटरचेंज करके पीतमपुरा की दिशा में जाने वाली रेड लाइन पकड़नी थी। कश्मीरी गेट स्टेशन पर हर बार की तरह यात्रियों का अथाह सैलाब उमड़ा हुआ था। सीढ़ियों, एस्केलेटरों और प्लेटफॉर्म पर केवल सिर ही सिर नज़र आ रहे थे। मेरी कमर और घुटने दर्द से फटे जा रहे थे। जब मेट्रो प्लेटफॉर्म पर आकर रुकी, तो कोच के दरवाजे खुलते ही ऐसा रेला आया मानो बाँध टूट गया हो।
शांतनु ने मुझे दोनों हाथों से घेरकर सुरक्षा घेरा बनाया और बड़ी मशक्कत से भीड़ को चीरते हुए मुझे कोच के भीतर पहुँचा दिया। मेरी सफेद लटों और लड़खड़ाते कदमों को देखकर सामने की सीट पर बैठे एक कॉलेज के छात्र ने बिना एक पल गँवाए अपनी सीट छोड़ दी और हाथ जोड़कर बोला, “माँ जी, आप यहाँ बैठ जाइए।”
मैंने कांपते होठों से उसे ढेरों दुआएँ दीं और बैठ गई। डिब्बे में पैर रखने तक की जगह नहीं थी, इसलिए शांतनु थोड़ी दूरी पर गेट के पास लगे खंभे को पकड़कर खड़ा हो गया। उसने मुस्कुराकर मेरी ओर देखा, जैसे कह रहा हो—’माँ, तुम बेफिक्र रहो, मैं यहीं हूँ।’ उसका यह भरोसा ही मेरी सबसे बड़ी दवा था।
ट्रेन एक-एक स्टेशन पार करती हुई आगे बढ़ रही थी। शास्त्री पार्क, सीलमपुर, नेताजी सुभाष प्लेस… और फिर उद्घोषणा हुई—”अगला स्टेशन पीतमपुरा है। दरवाजे दाईं ओर खुलेंगे।”
जैसे ही मेट्रो की गति धीमी हुई, मैं अपनी सीट से उठकर धीरे-धीरे गेट की तरफ बढ़ने लगी। शांतनु ने भीड़ के बीच से ही मुझे देखा और इशारा किया कि वह उतर रहा है। ट्रेन रुकी, दरवाजे खुले और यात्रियों का रेला बाहर निकलने लगा। मैंने अपने दोनों हाथों से संभलते हुए प्लेटफॉर्म पर कदम रख दिया। बाहर आकर मैं एक खंभे की आड़ में खड़ी हो गई और पीछे मुड़कर शांतनु को ढूँढने लगी ताकि वह मेरा हाथ पकड़ सके।
लेकिन यह क्या? बाहर निकली भीड़ छंट चुकी थी। प्लेटफॉर्म पर उतरने वाले मुसाफिर अपने-अपने गंतव्यों की ओर बढ़ गए थे, कोच के स्वचालित दरवाजे ‘बीप-बीप’ की चेतावनी के साथ बंद हो चुके थे, और मेट्रो अपनी पूरी रफ्तार से सीटी बजाती हुई आगे निकल गई थी।
पूरे प्लेटफॉर्म पर शांतनु कहीं नज़र नहीं आया।
एक पल के लिए मुझे लगा कि शायद वह किसी दूसरे गेट से उतर गया होगा। मैंने अपनी बूढ़ी आँखों को सिकोड़कर हर तरफ देखा। बेंचों पर, सीढ़ियों के पास, लिफ्ट के पास… पर शांतनु का कोई अता-पता नहीं था।
मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन खिसकने लगी। दिल की धड़कनें बेकाबू होकर पसलियों पर चोट करने लगीं। सबसे बड़ी मुसीबत यह थी कि मेरा हैंडबैग, जिसमें मेरा मोबाइल, पैसे, पानी की बोतल और पहचान पत्र रखे थे, वह सब शांतनु के ही कंधे पर टंगा हुआ था। मेरे पास एक फूटी कौड़ी तक नहीं थी।
“शायद भीड़ की वजह से वो गेट तक पहुँच नहीं पाया होगा,” मैंने खुद को झूठा दिलासा दिया। “ज़रूर अगले स्टेशन पर उतरकर वापस आने वाली ट्रेन पकड़ लेगा।”
मैं प्लेटफॉर्म की एक बेंच के किनारे खड़ी होकर टकटकी लगाए आने वाली ट्रेनों को देखने लगी। पाँच मिनट बाद दूसरी ट्रेन आई। लोग उतरे, चढ़े, ट्रेन चली गई… शांतनु नहीं था। फिर तीसरी ट्रेन आई… और चली गई। देखते ही देखते चार ट्रेनें गुजर गईं, लेकिन शांतनु का कोई सुराग नहीं मिला।
अब मेरी घबराहट एक भयानक दहशत में बदलने लगी थी। दोपहर के दो बज रहे थे। प्यास के मारे मेरा गला सूखकर कांटा हो गया था और घुटनों का दर्द अब असहनीय हो चुका था। सबसे बड़ी लाचारी यह थी कि आज के इस डिजिटल दौर में हम सबने दिमाग का इस्तेमाल करना बंद कर दिया है। सारे फोन नंबर मोबाइल की मेमोरी में कैद रहते हैं, किसी को कोई नंबर ज़बानी याद ही नहीं रहता। मुझे भी शांतनु का नंबर याद नहीं था। अगर कोई एक नंबर मेरी स्मृति में छपा था, तो वह था मेरे पति, दीनानाथ जी का लैंडलाइन और मोबाइल नंबर, जिसे उन्होंने बरसों पहले घर की डायरी में लिखवाया था।
मेरी आँखों से आँसू छलक पड़े। लाचारी की इंतहा थी। सामने से एक बीस-बाईस साल का लड़का कानों में ईयरफोन लगाए तेज़ी से जा रहा था। मैंने हिम्मत जुटाकर उसका हाथ पकड़ लिया।
“बेटा… मेरी मदद कर दो। मेरा बच्चा खो गया है। बस एक फोन लगवा दो,” मेरी आवाज़ थरथरा रही थी।
उस लड़के ने मेरी सफेद साड़ी और बहते आँसू देखे तो फौरन ईयरफोन निकाला। उसने बिना कोई सवाल किए अपना फोन मेरी तरफ बढ़ाया। मैंने कांपती उंगलियों से अपने पति का नंबर बताया। घंटी बजी, पतिदेव ने फोन उठाया। मैंने रोते हुए हाँफते स्वर में कहा, “सुनिए! शांतनु कश्मीरी गेट से मेरे साथ चढ़ा था, पर पीतमपुरा में उतरा ही नहीं। चार ट्रेनें निकल गईं, वो कहीं नहीं आया। मेरा बैग भी उसी के पास है। मुझे बहुत डर लग रहा है, आप ज़रा उसके नंबर पर फोन करके पूछिए कि वो कहाँ फँस गया है!”
पतिदेव घबरा गए। उन्होंने कहा, “भाग्यवान, तुम वहीं खड़ी रहना, कहीं हिलना मत। मैं अभी उसे कॉल करता हूँ।”
इससे पहले कि बात पूरी होती, उस भले लड़के की ट्रेन आ गई। उसने हड़बड़ी में कहा, “माँ जी, मेरी ट्रेन आ गई है, मुझे जाना होगा,” और वह भागकर मेट्रो में चढ़ गया।
अब मैं और भी बड़ी उलझन में फँस गई। पतिदेव से संपर्क टूट चुका था। अब वो मुझे वापस कॉल कैसे करते? उनके पास तो उस लड़के का नंबर था जो जा चुका था! मैं उस विशाल, अनजान स्टेशन पर पूरी तरह बेसहारा खड़ी थी। अगर मैं स्टेशन मास्टर के पास जाती या बाहर निकलती, तो शांतनु मुझे कहाँ तलाशता? अपनी जगह छोड़कर जाना मतलब खुद को और भटकाना था।
पंद्रह मिनट बीत गए, जो पंद्रह सदियों जैसे भारी लग रहे थे। मेरी आँखों के आगे अंधेरा छाने लगा। तभी कोट-पैंट पहने एक अधेड़ उम्र के सज्जन फाइल हाथ में लिए पास से गुजरे। मैंने फिर अपने आँसुओं का वास्ता देकर उनसे विनती की, “भाई साहब, भगवान के लिए एक मिनट रुक जाइए। मेरे घर पर एक कॉल मिला दीजिए।”
उन भले मानस ने तुरंत फोन लगाया। जैसे ही पतिदेव से बात हुई, उन्होंने राहत की सांस लेते हुए कहा, “सुमित्रा! घबराओ मत। शांतनु से मेरी बात हो गई है। वो बिल्कुल ठीक है। वो रोहिणी वाले स्टेशन तक चला गया था, अभी अगली ही ट्रेन से तुम्हारे पास पहुँच रहा है। तुम वहीं बेंच के पास रुको।”
यह सुनकर मेरी जान में जान आई। मैंने उस अजनबी सज्जन को हाथ जोड़कर धन्यवाद दिया। कुछ ही पलों बाद सामने से एक ट्रेन आकर रुकी। दरवाजे खुले, और दूर से शांतनु बदहवास हालत में दौड़ता हुआ मेरी तरफ आता दिखाई दिया। उसके बाल बिखरे हुए थे, चेहरा पसीने से तर-बतर था और उसकी सांसें उखड़ रही थीं।
उसे सही-सलामत देखते ही मेरे भीतर की ममता का सारा संयम एक झटके में गुस्से का रूप लेकर फूट पड़ा।
“कहाँ मर गया था तू?” मैं उस पर चीख पड़ी, मेरी आवाज़ में गुस्सा और रुलाई दोनों घुले थे। “जवान लड़का है तू! क्या तुझे अकल नहीं है कि स्टेशन आने पर कैसे उतरना चाहिए? अगर मेरे जैसे बीमार या बूढ़े के साथ ऐसा होता तो बात समझ आती। तू तो रोज़ इसी मेट्रो से चलता है! तुझे भान नहीं था कि तेरी माँ यहाँ लाचार खड़ी है, न पैसा है, न फोन है! अगर मुझे कुछ हो जाता तो?”
शांतनु ने कोई पलटकर जवाब नहीं दिया। वह बस चुपचाप मेरी बातें सुनता रहा। उसका पूरा शरीर अभी भी कांप रहा था। उसने आगे बढ़कर मुझे कसकर अपनी छाती से लगा लिया। जब मैंने उसका कंधा छुआ, तो महसूस हुआ कि वह किसी सूखे पत्ते की तरह थरथरा रहा था।
“माँ… मुझे डाँट ले, जितना मन करे उतना डाँट ले… पर आज मुझे दूसरा जन्म मिला है,” शांतनु फफक-फफक कर रो पड़ा।
उसकी रुलाई देखकर मेरा गुस्सा पल भर में हवा हो गया। मैंने घबराकर उसका चेहरा ऊपर उठाया। “क्या हुआ बेटा? तू रो क्यों रहा है? चोट लगी है क्या कहीं?”
शांतनु ने जो बताया, उसे सुनकर मेरे पैरों तले से न सिर्फ ज़मीन खिसकी, बल्कि मेरा पूरा वजूद सुन्न पड़ गया।
शांतनु ने कांपती आवाज़ में बताया, “माँ, जब पीतमपुरा स्टेशन पर तू आगे-आगे उतर रही थी, तो मैं तेरे ठीक पीछे था। जैसे ही मैंने ट्रेन से प्लेटफॉर्म पर पहला कदम रखा, उसी वक्त पीछे से किसी ने ज़ोरदार धक्का दिया। मेरा संतुलन बिगड़ गया और मेरा दायाँ जूता प्लेटफॉर्म और मेट्रो ट्रेन के बीच बने उस संकरे खाली गैप में फिसलकर बुरी तरह फँस गया।”
यह सुनते ही मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
शांतनु आगे बोला, “माँ, ट्रेन चलने का सायरन बजने लगा था। दरवाजे बंद होने वाले थे। मेरा पैर उस दरार में घुटने तक फँस चुका था। मैं जितना खींचने की कोशिश कर रहा था, जूता उतना ही लोहे की पटरी और सीमेंट के बीच जकड़ता जा रहा था। अगर उस हालत में ट्रेन चल पड़ती, तो मेरा पूरा निचला हिस्सा कटकर पटरियों पर बिखर जाता। मौत मेरे सामने खड़ी थी माँ!”
मेरी आँखों से आँसुओं की धार बह निकली। मैंने अपना कलेजा पकड़ लिया। “फिर… फिर क्या हुआ मेरे बच्चे?”
“माँ, उस वक्त वहाँ कोई अपना नहीं था। लेकिन उसी भीड़ में से तीन अजनबी लड़के झपटे। एक ने अपनी जान की बाज़ी लगाकर दोनों हाथों से मेट्रो के स्वचालित दरवाजों को ज़ोर से पकड़ लिया ताकि वो बंद न हों और सेंसर की वजह से ट्रेन चल न पड़े। दरवाजे उसके हाथों को दबा रहे थे, लेकिन उसने छोड़ा नहीं। वहीं दो अन्य युवक तुरंत घुटनों के बल फर्श पर बैठ गए। उन्होंने अपनी पूरी ताकत झोंककर मुझे दोनों बाजुओं से पकड़ा और एक झटके में मेरे फँसे हुए पैर को जूते समेत उस दरार से बाहर खींच लिया। वो मुझे खींचकर अंदर लाए ही थे कि दरवाजे बंद हो गए और ट्रेन चल पड़ी। अगर वो लड़के एक सेकंड की भी देरी करते, तो आज तेरा शांतनु तेरे सामने ज़िंदा नहीं खड़ा होता।”
शांतनु ने बताया कि जब ट्रेन रोहिणी पहुँची, तो उन लड़कों ने उसे पानी पिलाया, उसके पैर को देखा और उसे संभाला। वे लड़के कॉलेज के छात्र थे। जब शांतनु ने हाथ जोड़कर उनके नाम और पते पूछे ताकि वह उनका शुक्रिया अदा कर सके, तो उन्होंने बस मुस्कुराकर कहा, “भाई, धन्यवाद मत कहो। अगर आपकी जगह हमारा कोई अपना होता, तब भी हम यही करते। बस अपनी माँ के पास जल्दी पहुँचिए, वो परेशान हो रही होंगी।” और वे भीड़ में कहीं ओझल हो गए।
शांतनु की यह बात सुनकर मैं वहीं प्लेटफॉर्म पर घुटनों के बल बैठ गई और फूट-फूट कर रोने लगी। जिन लड़कों को हम जानते तक नहीं थे, जिनका न कोई मजहब पता था, न नाम, न ठिकाना… वे उस भीड़ भरे शहर में मेरे बच्चे के लिए साक्षात भगवान के भेजे हुए देवदूत बनकर आए थे। अगर उन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर उस बंद होते दरवाजे को न रोका होता और शांतनु को न खींचा होता, तो आज मेरा पूरा संसार उजड़ चुका होता।
बाद में जब हमने शांतनु के पैर को देखा, तो उसके टखने पर लोहे की रगड़ के गहरे नीले निशान पड़े हुए थे और उसका जूता एक तरफ से बुरी तरह घिसकर फट चुका था। हम समझ ही नहीं पा रहे थे कि मेट्रो और प्लेटफॉर्म के बीच इतना गैप कैसे हो सकता है, क्योंकि आम तौर पर तो यह फासला बहुत कम होता है। अगले दिन जब हम उसी स्टेशन से गुजरे, तो हमने गौर से देखा कि पीतमपुरा का वह प्लेटफॉर्म सीधा नहीं था, बल्कि वहाँ पटरी पर एक हल्का सा घुमाव (कर्व) था। उस घुमाव की वजह से ट्रेन के डिब्बे और प्लेटफॉर्म के किनारे के बीच लगभग छह से आठ इंच का खतरनाक फासला बन जाता था, जहाँ किसी का भी पैर आसानी से फिसल सकता था।
उस दिन मुझे समझ आया कि हम जिसे ‘पराया’ कहते हैं, वो दरअसल पराए होते ही नहीं। इंसानियत की एक ऐसी डोर है जो हम सबको बिना किसी रिश्ते के भी एक-दूसरे से बाँध कर रखती है। हम अक्सर महानगरों को स्वार्थी, मतलबी और संवेदनहीन कहकर कोसते हैं, लेकिन उसी भीड़ के सीने में भी एक धड़कता हुआ, संवेदनशील दिल छुपा होता है।
उन अनजान फरिश्तों ने हम पर जो अहसान किया था, उसका मोल हम सात जन्मों में भी नहीं चुका सकते थे। आज भी जब मैं मंदिर में दीया जलाती हूँ, तो अपने परिवार के साथ-साथ उन तीन अनाम नौजवानों की लंबी उम्र और सलामती के लिए हाथ जोड़ती हूँ। उन्होंने सिर्फ एक युवक की जान नहीं बचाई थी, उन्होंने एक बूढ़ी बीमार माँ की दुनिया बचाई थी, एक पिता का बुढ़ापा बचाया था।
सच्चे रिश्ते केवल खून की नलियों में नहीं बहते; कभी-कभी रास्ते में मिला एक निस्वार्थ अजनबी भी आपके लिए वो कर जाता है जो कोई सगा भी नहीं कर पाता। उस दिन के बाद से जब भी मैं मेट्रो में किसी ज़रूरतमंद, बुज़ुर्ग या बच्चे को देखती हूँ, तो मेरा हाथ खुद-ब-खुद उनकी मदद के लिए उठ जाता है—शायद उन देवदूतों के उस अनमोल कर्ज को थोड़ा सा उतारने की एक छोटी सी कोशिश के रूप में।
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क्या आपके जीवन में भी कभी किसी अनजान व्यक्ति ने संकट के समय ‘देवदूत’ बनकर आपकी मदद की है? क्या महानगरों की इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में इंसानियत आज भी ज़िंदा है? अपने अनुभव और विचार नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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