प्यार की दीवार

अंजलि बिना झिझक के अपना क्रेडिट कार्ड निकाल कर राहुल की तरफ खिसका देती थी। पिछले छह महीनों में ऐसा कई बार हुआ था। कभी राहुल का रेंट, कभी उसकी बाइक की ईएमआई, तो कभी उसके दोस्तों के साथ पार्टी का बिल। अंजलि को लगता था कि प्यार में ये सब चलता है। आखिर राहुल उसे वो खुशी दे रहा था जो विक्रम के लाखों रुपये उसे नहीं दे पा रहे थे।

मानसून की पहली बारिश ने मौसम को सुहाना तो कर दिया था, लेकिन अंजलि के आलीशान फ्लैट में एक अजीब सी गंध छोड़ दी थी—सीलन की गंध। वह अपने शानदार ‘सी-फेसिंग’ लिविंग रूम में बैठी, माथे पर शिकन लिए उस महंगी वॉलपेपर वाली दीवार को घूर रही थी, जहां से पेंट पपड़ी बनकर झड़ने लगा था।

“ये बिल्डर भी ना, करोड़ों रुपये लेकर ऐसा घटिया काम करते हैं,” अंजलि ने बड़बड़ाते हुए मेंटेनेंस वाले को फोन मिलाया।

अभी कुछ ही महीने हुए थे अंजलि और उसके पति विक्रम को अंधेरी के इस नए, पॉश अपार्टमेंट में शिफ्ट हुए। विक्रम शहर का एक जाना-माना कॉरपोरेट वकील था। उसके पास नाम था, पैसा था, और एक बहुत ही सुलझा हुआ, लेकिन नीरस स्वभाव था। वह उन पतियों में से था जो अपनी पत्नी की हर आर्थिक जरूरत पूरी करते हैं—महंगी गाड़ियां, डिजाइनर कपड़े, विदेशी छुट्टियां—लेकिन उनके पास जो सबसे कीमती चीज होती है, यानी ‘वक्त’, वह देने में हमेशा कंजूसी करते हैं।

विक्रम सुबह जल्दी घर से निकलता और रात को तब लौटता जब अंजलि अक्सर सो चुकी होती थी। वीकेंड्स पर भी उसके क्लाइंट्स या गोल्फ क्लब की मीटिंग्स होती थीं। अंजलि, जो कभी एक बहुत ही चुलबुली और सोशलाइट किस्म की लड़की हुआ करती थी, इस बड़े से घर में खुद को एक महंगे फर्नीचर की तरह महसूस करने लगी थी, जिसे सिर्फ सजाकर रखा गया हो।

“मैडम, दीवार के अंदर पाइप में लीकेज है। बाहर से जो ये वॉलपेपर चमक रहा है ना, उसके पीछे की ईंटें पूरी तरह पानी से गल चुकी हैं। इसे ठीक करने में हफ्ते भर का काम लगेगा और पूरा वॉलपेपर फाड़ना पड़ेगा,” मेंटेनेंस सुपरवाइजर ने दीवार ठोकते हुए कहा।

अंजलि को अजीब सी खीझ हुई। बाहर से इतना खूबसूरत दिखने वाला घर अंदर से इतना खोखला कैसे हो सकता है?

“ठीक है, कल से काम शुरू करवा दो। मुझे ये गंदगी और सीलन बिल्कुल पसंद नहीं है,” अंजलि ने अपना पर्स उठाया और बाहर निकल गई। आज उसे राहुल से मिलना था।

राहुल, अंजलि की जिंदगी का वो नया ‘वॉलपेपर’ था, जिसने उसकी बोरिंग और सीलन भरी जिंदगी को बाहर से बहुत रंगीन बना दिया था। राहुल एक स्ट्रगलिंग इंटीरियर डिजाइनर था, जो अंजलि को एक जिम में मिला था। वह विक्रम से बिल्कुल अलग था। वह बातूनी था, उसे नई-नई जगहों पर कॉफी पीना पसंद था, और सबसे बड़ी बात, वह अंजलि को ‘अटेंशन’ देता था। वह हमेशा नोटिस करता था कि अंजलि ने कौन से ब्रांड का बैग कैरी किया है, या उसके बालों में नया कलर कौन सा है।

अंजलि अपनी मर्सिडीज ड्राइव करते हुए जुहू के एक महंगे कैफे पहुंची। राहुल वहां पहले से मौजूद था।

“हे गॉर्जियस! आज तो तुम इस लाल ड्रेस में कहर ढा रही हो,” राहुल ने अंजलि का हाथ चूमते हुए कहा।

अंजलि के चेहरे पर एक चमक आ गई। विक्रम ने तो शायद महीनों से उसे ढंग से देखा तक नहीं था, तारीफ करना तो दूर की बात।

“थैंक्स राहुल। तुम ही तो हो जो मुझे स्पेशल फील कराते हो,” अंजलि ने मुस्कुराते हुए कहा।

“तुम्हारे लिए तो कुछ भी कर सकता हूं यार। अच्छा सुनो, वो जो लोखंडवाला में नया बुटीक खुला है ना, वहां कुछ नए इटैलियन शूज आए हैं। मैं सोच रहा था क्यों न आज थोड़ी शॉपिंग कर ली जाए?” राहुल ने बहुत ही कैजुअल तरीके से बात छेड़ी।

अंजलि बिना झिझक के अपना क्रेडिट कार्ड निकाल कर राहुल की तरफ खिसका देती थी। पिछले छह महीनों में ऐसा कई बार हुआ था। कभी राहुल का रेंट, कभी उसकी बाइक की ईएमआई, तो कभी उसके दोस्तों के साथ पार्टी का बिल। अंजलि को लगता था कि प्यार में ये सब चलता है। आखिर राहुल उसे वो खुशी दे रहा था जो विक्रम के लाखों रुपये उसे नहीं दे पा रहे थे।

लेकिन आज, कैफे में बैठे हुए अंजलि का ध्यान बार-बार उस सीलन वाली दीवार की तरफ जा रहा था। मेंटेनेंस वाले के शब्द उसके दिमाग में गूंज रहे थे— *’बाहर से जो ये वॉलपेपर चमक रहा है ना, उसके पीछे की ईंटें पूरी तरह पानी से गल चुकी हैं…’*

शॉपिंग मॉल में राहुल ने अपने लिए पचास हजार के कपड़े और जूते खरीदे। बिल काउंटर पर जब अंजलि का कार्ड स्वाइप हुआ, तो राहुल की आंखों में जो एक लालची चमक थी, उसे अंजलि ने पहली बार महसूस किया।

शाम को जब अंजलि घर लौटी, तो विक्रम घर पर था। यह एक दुर्लभ नजारा था।

“तुम आज जल्दी आ गए?” अंजलि ने बैग सोफे पर रखते हुए पूछा।

विक्रम ने अपना लैपटॉप बंद किया और अंजलि की तरफ देखा। उसकी आंखों में एक अजीब सी शांति थी, कोई शक या गुस्सा नहीं। “हां, आज एक बड़ा केस जीत लिया। सोचा तुम्हारे साथ डिनर करूं। मैंने तुम्हारे पसंदीदा चाइनीज रेस्टोरेंट में टेबल बुक की है।”

अंजलि थोड़ी असहज हो गई। विक्रम ने कभी उससे यह नहीं पूछा था कि उसका क्रेडिट कार्ड का बिल इतना क्यों आ रहा है, या वह हर शाम कहां जाती है। वह बस उसे एक आरामदायक जिंदगी देने में जुटा था।

डिनर के दौरान विक्रम ने अंजलि के हाथ पर अपना हाथ रखा। “अंजलि, मैं जानता हूं मैं तुम्हें ज्यादा वक्त नहीं दे पाता। पर तुम जानती हो ना, ये सब मैं हमारे फ्यूचर के लिए ही कर रहा हूं। मैं तुम्हें दुनिया की हर खुशी देना चाहता हूं।”

अंजलि के गले में जैसे निवाला अटक गया। विक्रम का स्पर्श ठंडा जरूर था, लेकिन उसमें एक सच्चाई थी, एक स्थायित्व था। वह कोई दिखावा नहीं कर रहा था।

रात को बिस्तर पर लेटकर अंजलि सोचती रही। क्या राहुल सच में उससे प्यार करता है? या वह सिर्फ उसके पैसों और विक्रम के स्टेटस से प्यार करता है? राहुल की मीठी-मीठी बातें, उसकी तारीफें… क्या ये सब सिर्फ एक चमकीला वॉलपेपर है, जो उसकी नीयत की सीलन को छुपा रहा है?

अगले कुछ हफ्तों में अंजलि ने राहुल को थोड़ा परखना शुरू किया। उसने राहुल से मिलने के बहाने कम कर दिए और जब मिलती, तो अपना कार्ड घर छोड़ जाती।

“यार अंजलि, मुझे आज कुछ क्लाइंट्स को डिनर पर ले जाना है। तुम अपना कार्ड दे दोगी? मैं अगले हफ्ते पक्का लौटा दूंगा,” राहुल ने एक दिन फोन पर कहा।

“सॉरी राहुल, विक्रम ने कार्ड ब्लॉक करवा दिया है। कुछ फ्रॉड ट्रांजैक्शन हुए थे,” अंजलि ने झूठ बोला।

फोन के दूसरी तरफ एक पल का सन्नाटा छा गया। “ओह… ठीक है। कोई बात नहीं, मैं कुछ और जुगाड़ देखता हूं। वैसे आज मेरा मूड ठीक नहीं है, हम कल मिलते हैं।” राहुल ने तुरंत फोन काट दिया।

अंजलि के चेहरे पर एक कड़वी मुस्कान आ गई। दीवार के पीछे की पपड़ी अब साफ नजर आने लगी थी। जैसे ही पैसों की नमी खत्म हुई, राहुल का तथाकथित ‘प्यार’ सूखने लगा था। वह बस एक परजीवी की तरह अंजलि के खोखलेपन का फायदा उठा रहा था।

अंजलि को अचानक विक्रम पर बहुत प्यार आया। विक्रम जो चुपचाप, बिना किसी दिखावे के, उसकी जिंदगी की मजबूत नींव बनकर खड़ा था। और वह बेवकूफ एक नकली वॉलपेपर के पीछे उस नींव को ही कमजोर करने पर तुली थी। विक्रम का प्यार शायद सिनेमाटोग्राफिक नहीं था, लेकिन वह असली था। वह उसे कभी धोखा नहीं देगा, यह अंजलि जानती थी।

घर में दीवार की मरम्मत का काम शुरू हो चुका था। कारीगरों ने सारा पुराना, चमकीला वॉलपेपर फाड़ दिया था और गली हुई ईंटों को निकालकर नई ईंटें और सीमेंट भर रहे थे।

अंजलि उस टूटती हुई दीवार को देख रही थी। उसे महसूस हुआ कि उसकी जिंदगी की दीवार में भी इसी तरह की मरम्मत की जरूरत है। अगर उसने अभी इस रिश्ते की सीलन को नहीं रोका, तो उसका घर, उसकी शादी, सब कुछ ढह जाएगा।

उसका फोन बजा। स्क्रीन पर ‘राहुल’ का नाम फ्लैश हो रहा था।

अंजलि ने फोन उठाया। “हां राहुल?”

“अंजलि बेबी, कैसे हो? यार वो कार्ड का कुछ हुआ क्या?” राहुल की आवाज में अभी भी वही नकली मिठास थी।

“हां राहुल, एक बात बतानी थी,” अंजलि की आवाज में एक गजब की दृढ़ता थी। “मेरे घर की दीवार में बहुत सीलन आ गई थी। वो जो नकली और चमकीला वॉलपेपर था ना, वो ईंटों को अंदर ही अंदर सड़ा रहा था।”

“क्या? तुम किस वॉलपेपर की बात कर रही हो अंजलि?” राहुल कुछ समझ नहीं पा रहा था।

“मैं तुम्हारी बात कर रही हूं, राहुल। तुमने मेरी बोरियत और मेरे अकेलेपन का फायदा उठाया। लेकिन अब मुझे समझ आ गया है कि असली मजबूती नींव में होती है, वॉलपेपर में नहीं। आज के बाद मुझे कभी फोन मत करना।”

अंजलि ने बिना राहुल का जवाब सुने फोन काट दिया और नंबर ब्लॉक कर दिया।

उसने गहरी सांस ली। घर में अभी भी सीमेंट और पुट्टी की महक आ रही थी। यह महक उस नकली सीलन की गंध से बहुत बेहतर थी।

शाम को जब विक्रम घर लौटा, तो अंजलि ने दरवाजा खोला। वह मुस्कुरा रही थी—एक सच्ची और सुकून भरी मुस्कान।

“कैसा रहा आज का दिन?” अंजलि ने विक्रम का कोट लेते हुए पूछा।

“काफी थका देने वाला,” विक्रम ने मुस्कुराकर जवाब दिया। “दीवार का काम कैसा चल रहा है?”

“दीवार का काम तो पूरा हो गया विक्रम,” अंजलि ने विक्रम के कंधे पर सिर रखते हुए कहा। “अब बस उसे एक अच्छे और मजबूत रंग से रंगना है… हम दोनों को मिलकर।”

विक्रम ने अंजलि को अपनी बांहों में भर लिया। उसे शायद पूरी बात समझ नहीं आई थी, लेकिन वह महसूस कर सकता था कि उसकी पत्नी आज पहले से कहीं ज्यादा उसके करीब है। अंजलि जानती थी कि विक्रम कभी राहुल की तरह रोमांटिक बातें नहीं करेगा, लेकिन वह यह भी जानती थी कि विक्रम के प्यार की दीवार कभी गिरेगी नहीं।

बाहर बारिश फिर शुरू हो गई थी, लेकिन अंजलि के घर के अंदर अब कोई सीलन नहीं थी।

दोस्तों, अक्सर हम अपनी जिंदगी में मौजूद ठोस और सच्ची चीजों की कद्र करना भूल जाते हैं और बाहर की नकली चमक के पीछे भागने लगते हैं। जब रिश्तों में अकेलापन या खालीपन आता है, तो अक्सर तीसरे इंसान को घुसने का मौका मिल जाता है। लेकिन क्या वह तीसरा इंसान सच में परवाह करता है, या सिर्फ फायदा उठाता है? आपके अनुसार अंजलि ने जो फैसला लिया, क्या वह सही था? अपने विचार कमेंट्स में जरूर शेयर करें।

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