रिश्तों की छाँव : एक नई शुरुआत

भोपाल शहर के कोलाहल से दूर एक शांत इलाके में स्थित ‘आश्रय’ वृद्धाश्रम की इमारत वैसे तो बहुत खूबसूरत थी, लेकिन इसके भीतर रहने वालों के दिलों में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा रहता था। इसी आश्रम के एक कोने में स्थित बेंच पर सावित्री देवी का पूरा दिन बीत जाता था। सावित्री देवी को यहाँ आए हुए पूरे चार साल हो चुके थे। इन चार सालों में उन्होंने कभी किसी से कोई शिकायत नहीं की, न ही किसी से ज्यादा बातचीत की। उनकी दिनचर्या बस इतनी थी कि सुबह उठना, पूजा करना और फिर ऊन और सलाई लेकर स्वेटर बुनने बैठ जाना। वे अपनी ही दुनिया में खोई रहती थीं। आश्रम में रहने वाली मालती ही एकमात्र ऐसी महिला थीं जिनके साथ सावित्री देवी कभी-कभार दो शब्द बोल लिया करती थीं। आश्रम के बाकी लोगों को लगता था कि सावित्री देवी बहुत रूखे स्वभाव की हैं, लेकिन मालती जानती थीं कि उस खामोशी के पीछे एक गहरा दर्द छिपा है।

सावित्री देवी की एक पुरानी आदत थी। वे दिन में कई बार अपनी चश्मे के डिब्बे से एक मुड़ी-तुड़ी तस्वीर निकालतीं, उसे अपनी साड़ी के पल्लू से साफ करतीं, कुछ देर निहारतीं और फिर एक गहरी सांस लेकर उसे वापस रख देतीं।

एक दिन आश्रम में कुछ युवाओं का एक समूह आया। वे एक स्थानीय कॉलेज के छात्र थे जो समाज सेवा के एक प्रोजेक्ट के तहत बुजुर्गों के साथ समय बिताने आए थे। उसी समूह में एक लड़की थी निहारिका। निहारिका बहुत ही चुलबुली, संवेदनशील और प्यारी सी लड़की थी। जब बाकी बच्चे आश्रम के अन्य बुजुर्गों के साथ कैरम और शतरंज खेल रहे थे, तब निहारिका की नजर कोने में बैठी सावित्री देवी पर पड़ी जो एक छोटा सा लाल रंग का स्वेटर बुनने में मग्न थीं। निहारिका उनके पास गई और धीरे से उनके पास बैठ गई। सावित्री देवी ने एक नजर उसे देखा और फिर अपने काम में लग गईं।

निहारिका ने बड़ी ही मिठास के साथ पूछा कि आप यह किसके लिए बना रही हैं, यह तो बहुत छोटा है। सावित्री देवी ने कोई जवाब नहीं दिया। निहारिका ने हार नहीं मानी। वह अगले दिन फिर आई। उसके बाद वह लगभग रोज आने लगी। कभी वह उनके लिए उनके पसंद की गजक ले आती, तो कभी उनके उलझे हुए ऊन के गोलों को सुलझाने में उनकी मदद करने लगती। निहारिका की निश्छल मुस्कान और उसकी बातों में एक अजीब सा अपनापन था। धीरे-धीरे उस बर्फ जैसी खामोशी में दरार पड़ने लगी। सावित्री देवी को निहारिका में एक ऐसी सच्चाई नजर आई जिसने उनके अंदर के जमे हुए आंसुओं को पिघला दिया।

एक शाम जब हल्की-हल्की बारिश हो रही थी और मिट्टी की सोंधी महक वातावरण में फैली थी, निहारिका ने सावित्री देवी के कंधे पर सिर रखते हुए कहा कि दादी, आप हमेशा इतनी उदास क्यों रहती हैं? क्या आप मुझे अपने मन की बात नहीं बताएंगी? निहारिका के मुंह से ‘दादी’ शब्द सुनकर सावित्री देवी के हाथ रुक गए। उनकी आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। निहारिका ने घबराकर उन्हें गले लगा लिया। उस दिन सावित्री देवी ने अपने सीने में दबे उस तूफान को बाहर आने दिया जो चार सालों से उन्हें अंदर ही अंदर खोखला कर रहा था।

सावित्री देवी ने कांपती आवाज में अपनी कहानी सुनानी शुरू की। उनके पति एक सरकारी स्कूल में मास्टर थे। उनका एक ही बेटा था, समीर। जब समीर महज बारह साल का था, तब एक भयंकर बीमारी ने उनके पति को उनसे छीन लिया। सावित्री देवी पर तो जैसे दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने लोगों के कपड़े सिले, टिफिन बनाकर बेचे और दिन-रात एक करके अपने बेटे को पढ़ाया। समीर पढ़ने में बहुत होशियार था। उसने अपनी माँ के संघर्ष को देखा था और वह भी खूब मेहनत करता था। समीर ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और उसे एक बहुत बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी मिल गई।

सावित्री देवी के लिए वह दिन उनके जीवन का सबसे खुशी का दिन था। उन्हें लगा कि अब उनके संघर्षों का अंत हो गया है। नौकरी के कुछ समय बाद समीर ने अपनी पसंद की एक लड़की, रिया से शादी करने की इच्छा जताई। सावित्री देवी ने बिना किसी हिचकिचाहट के खुशी-खुशी हामी भर दी। शादी बहुत धूमधाम से हुई। सावित्री देवी ने अपनी जिंदगी भर की जमा-पूंजी उस शादी में लगा दी। शुरुआत में सब कुछ बहुत अच्छा था। रिया एक आधुनिक ख्यालों वाली लड़की थी, लेकिन सावित्री देवी ने खुद को उसके हिसाब से ढालने की पूरी कोशिश की।

शादी के दो साल बाद समीर को कंपनी की तरफ से एक प्रोजेक्ट के लिए लंदन जाने का मौका मिला। यह उनके करियर के लिए एक बहुत बड़ी छलांग थी। घर में जश्न का माहौल था। लेकिन एक रात समीर सावित्री देवी के कमरे में आया और उसने जो कहा, उसने उनके पैरों तले जमीन खिसका दी। समीर ने कहा कि माँ, हम दोनों लंदन जा रहे हैं। वहां का रहन-सहन और मौसम आपके अनुकूल नहीं होगा। और वैसे भी, हम दोनों वहां काम में इतने व्यस्त रहेंगे कि आपको समय नहीं दे पाएंगे। आप यहां अकेली रहेंगी तो हमें आपकी चिंता सताती रहेगी। इसलिए मैंने आपके लिए एक बहुत अच्छा ‘रिटायरमेंट होम’ देखा है। वहां आपके उम्र के लोग होंगे, आपको अच्छा लगेगा। बस दो-तीन साल की बात है, जैसे ही हम वापस इंडिया शिफ्ट होंगे, हम आपको वापस ले आएंगे।

सावित्री देवी ने रोते हुए कहा था कि बेटा, मैं घर के किसी भी कोने में पड़ी रहूंगी, मुझे कोई सुख-सुविधा नहीं चाहिए, बस अपने इस घर से मुझे दूर मत कर। लेकिन समीर और रिया ने उनकी एक न सुनी। वे उन्हें इस आश्रम में छोड़ गए। शुरुआत में समीर रोज फोन करता था। फिर फोन हफ्तों में, और फिर महीनों में आने लगे। एक दिन समीर का फोन आया तो उसने बड़ी खुशी से बताया कि उसे एक बेटा हुआ है, जिसका नाम उसने ‘आरव’ रखा है। सावित्री देवी खुशी से झूम उठीं। उन्होंने अपने पोते को देखने की बहुत मिन्नतें कीं, लेकिन समीर ने बस एक फोटो भेज दी।

सावित्री देवी ने निहारिका को वह फोटो दिखाई जो वे हमेशा अपने पास रखती थीं। वे सिसकते हुए बोलीं कि निहारिका, मेरा पोता अब तीन साल का हो गया होगा। मैं रोज उसके लिए नए-नए स्वेटर बुनती हूं, यह सोचकर कि किसी दिन समीर आएगा और मुझे वापस ले जाएगा। लेकिन अब तो उनका फोन आना भी बंद हो गया है। वो दो साल कहकर गए थे, आज चार साल बीत गए। मुझे पता है कि अब वे कभी नहीं आएंगे। मैं बस अपने पोते को एक बार गले लगाना चाहती हूं।

सावित्री देवी की कहानी सुनकर निहारिका की आंखें भी नम हो गईं। उसे समझ नहीं आ रहा था कि कोई अपने जन्म देने वाली माँ के साथ ऐसा कैसे कर सकता है। निहारिका ने सावित्री देवी के आंसू पोंछे और उनका हाथ अपने हाथों में लेकर कहा कि दादी, जो लोग हीरे की कद्र नहीं जानते, उनके लिए आंसू बहाना बेकार है। आप मेरे साथ चलेंगी?

सावित्री देवी ने हैरानी से पूछा कि कहां? निहारिका ने मुस्कुराते हुए कहा कि आप कल सुबह तैयार रहिएगा, मैं आपको एक ऐसी जगह ले जाऊंगी जहां आपके बिना सब सूना है।

अगले दिन सुबह निहारिका एक टैक्सी लेकर आश्रम पहुंची। उसने आश्रम के संचालक से अनुमति ली और सावित्री देवी को अपने साथ ले गई। टैक्सी शहर के दूसरे छोर पर एक पुरानी लेकिन बहुत ही रंग-बिरंगी इमारत के सामने रुकी। उस इमारत के बाहर एक बड़ा सा बोर्ड लगा था जिस पर लिखा था- ‘उड़ान बाल गृह’। यह अनाथ और बेसहारा बच्चों का एक अनाथालय था जिसे निहारिका की एक संस्था चलाती थी।

जैसे ही सावित्री देवी ने अंदर कदम रखा, कई सारे छोटे-छोटे बच्चे दौड़ते हुए आए और निहारिका से लिपट गए। निहारिका ने बच्चों को शांत किया और सावित्री देवी की तरफ इशारा करते हुए कहा, “बच्चों, देखो मैं आज किसे लेकर आई हूं। तुम सब कहते थे न कि कहानियों वाली एक दादी होनी चाहिए? तो लो, आज से ये तुम्हारी दादी हैं।”

बच्चे खुशी से तालियां बजाने लगे। एक छोटी सी बच्ची, जो मुश्किल से चार साल की होगी, उसने सावित्री देवी का हाथ पकड़ लिया और अपनी तोतली जुबान में बोली, “दादी, क्या आप मुझे राजा-रानी की कहानी सुनाएंगी?” सावित्री देवी का मातृत्व जो सालों से एक आश्रम के कोने में घुट रहा था, वह उन मासूम बच्चों को देखकर एक झटके में बाहर आ गया। उन्होंने उस बच्ची को गोद में उठा लिया और उनके चेहरे पर एक ऐसी चमक आ गई जो निहारिका ने पहले कभी नहीं देखी थी।

निहारिका ने सावित्री देवी से कहा कि दादी, मेरे माता-पिता का स्वर्गवास बचपन में ही हो गया था। मैंने इन बच्चों में अपना परिवार ढूंढा है। लेकिन इन बच्चों को अनुशासन, प्यार और वो संस्कार देने के लिए एक बड़े-बुजुर्ग के साये की जरूरत है, जो मेरे पास नहीं है। क्या आप मेरे इन बच्चों की दादी बनेंगी? क्या आप इस ‘उड़ान’ की नींव बनेंगी?

सावित्री देवी के पास शब्द नहीं थे। उन्होंने अपने बुने हुए सारे स्वेटर उन बच्चों को पहना दिए। जो स्वेटर उन्होंने अपने एक पोते के लिए बुने थे, वे आज उन बच्चों को ठंड से बचा रहे थे जिनके पास अपना कोई नहीं था। उसी दिन सावित्री देवी ने उस वृद्धाश्रम को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया और बाल गृह में शिफ्ट हो गईं।

समय बीतता गया। सावित्री देवी अब केवल एक समीर की माँ नहीं थीं, बल्कि पचास से ज्यादा बच्चों की ‘दादी माँ’ थीं। बाल गृह का पूरा माहौल बदल गया था। बच्चों के शोरगुल, उनके साथ खेलना, उन्हें कहानियां सुनाना और उनके लिए अपने हाथों से खाना बनाना—इन सबमें सावित्री देवी का जीवन एक नए अर्थ से भर गया था। उन्होंने इंतजार करना छोड़ दिया था, क्योंकि अब उनके पास वर्तमान में जीने के लिए बहुत कुछ था। जिस बेटे ने उन्हें एक बोझ समझकर छोड़ दिया था, आज वही सावित्री देवी कई बेसहारा बच्चों का सबसे बड़ा सहारा बन गई थीं।

यह कहानी हमें यह सिखाती है कि जीवन कभी खत्म नहीं होता, बस कभी-कभी वह अपना रास्ता बदल लेता है। खून के रिश्ते अगर धोखा दे दें, तो इसका मतलब यह नहीं कि दुनिया में प्यार खत्म हो गया है। प्यार और वात्सल्य बांटने से बढ़ता है। अक्सर इंसान अपने करियर और सुख-सुविधाओं की अंधी दौड़ में उन जड़ों को ही काट देता है जो उसे जीवन रूपी वृक्ष में खड़ा रखती हैं। जिन माता-पिता ने हमारी उंगली पकड़कर हमें चलना सिखाया, बुढ़ापे में उनकी उंगली छोड़ना सबसे बड़ा पाप है। लेकिन सावित्री देवी जैसी माताएं यह साबित करती हैं कि उनका प्यार किसी एक इंसान का मोहताज नहीं होता। अगर हम अपनी सोच बदलें, तो हर वृद्धाश्रम और अनाथालय को मिलाकर एक प्यारा सा घर बनाया जा सकता है।

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