मायके की दहलीज और बंदिशें

विवेक आज सुबह से ही बेहद खुश था। उसके चेहरे की रौनक और पैरों की थिरकन साफ बता रही थी कि उसके मन की कोई मुराद पूरी होने वाली है। वजह सिर्फ इतनी थी कि थोड़ी देर पहले ही उसकी पत्नी, काव्या ने अपने मायके जाने की बात कही थी। जब भी काव्या अपने माता-पिता से मिलने का नाम लेती, विवेक खुशी से झूम उठता था।

लेकिन इस खुशी के पीछे काव्या के प्रति उसका प्यार नहीं, बल्कि उसकी अपनी स्वार्थी जिद थी। विवेक कभी भी काव्या को उसके मायके अकेले नहीं जाने देता था। वह हर बार साए की तरह उसके साथ लग जाता था। वहाँ जाकर वह हफ्तों रुका रहता, मनमर्जी की खातिरदारी करवाता और अपनी पसंद के पकवान बनवाता था।

काव्या के लिए अपने मायके जाना एक उत्सव होने के बजाय एक मानसिक बोझ बन जाता था। जब भी वह अपनी माँ से दिल खोलकर कोई बात करना चाहती, या अपने पिता के पास बैठकर बचपन की यादें ताजा करना चाहती, विवेक बीच में आकर बैठ जाता।

एक बेटी अपनी माँ से जो बातें अकेले में साझा करना चाहती है, वे सारी इच्छाएं काव्या के मन में ही दबी रह जाती थीं। वह केवल अपने माता-पिता को देखने की ललक में हर बार विवेक की इस अजीब जिद को बर्दाश्त कर लेती और उसे अपने साथ ले जाती थी।

लेकिन आज काव्या के सब्र का बांध टूट गया। विवेक को अलमारी से अपने कपड़े निकालते और गुनगुनाते देखकर काव्या को अंदर ही अंदर बहुत गुस्सा आया। उसने अपनी भौहें सिकोड़ीं और तीखे स्वर में कहा, “विवेक, तुम्हें इतनी तैयारी करने और ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है। इस बार तुम मेरे साथ नहीं चल रहे हो।”

विवेक के हाथ में पकड़ी शर्ट वहीं रुक गई। उसने चौंककर काव्या की तरफ देखा और बोला, “पर क्यों काव्या? भला ऐसा कैसे हो सकता है कि तुम अपने मायके जाओ और तुम्हारा पति तुम्हारे साथ न हो? दामाद का जाना तो वहां सबका मान बढ़ाता है।”

“अगर तुम इस बार भी जाने की जिद करोगे, तो मैं अपना जाना ही कैंसिल कर दूंगी। पर मैं तुम्हें अपने साथ नहीं ले जाऊंगी,” काव्या ने दो टूक शब्दों में अपना फैसला सुना दिया।

मायके जाने की तीव्र इच्छा और विवेक की बिना वजह की अड़ियल जिद ने काव्या को पूरी तरह मायूस कर दिया। उसका रोने का मन होने लगा। वह सोफे पर बैठकर सिर पकड़कर सोच ही रही थी कि तभी उसके फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर उसकी सास, सुलोचना जी का नाम चमक रहा था। काव्या ने भारी मन से फोन उठाया।

“हेलो माँ…” काव्या की आवाज़ में छुपा दर्द और भारीपन सुलोचना जी से छिपा नहीं रह सका। एक माँ और सास होने के नाते वे अपनी बहू की हर आहट को पहचानती थीं।

सुलोचना जी ने तुरंत पूछा, “क्या हुआ काव्या? क्यों परेशान हो बेटा? तुम्हारी आवाज़ इतनी भारी क्यों लग रही है, क्या विवेक से कोई झगड़ा हुआ है?”

अपनी सास की ममता भरी आवाज़ सुनते ही काव्या का संयम टूट गया। वह फोन पर ही फूट-फूट कर रो पड़ी। उसने हिचकिचाते हुए विवेक की उस पुरानी आदत और आज की बहस के बारे में सब कुछ सच-सच सुलोचना जी को बता दिया। उसने कहा कि कैसे वह इतने सालों से अपने मायके में एक अजनबी की तरह महसूस करती है क्योंकि विवेक कभी उसे अकेला नहीं छोड़ता।

काव्या की पूरी बात सुनने के बाद सुलोचना जी के कमरे में एक गहरी खामोशी छा गई। वे काफी देर तक कुछ नहीं बोलीं। दरअसल, यह खामोशी उनके अपने अतीत के घावों के हरे होने की वजह से थी। इतिहास एक बार फिर खुद को दोहरा रहा था। सुलोचना जी को याद आया कि विवेक के पापा का स्वभाव भी बिल्कुल ऐसा ही था। उन्हें हमेशा इस बात का शक और डर रहता था कि सुलोचना अपने मायके जाकर उनके घर की बातें न बता दे या उनके परिवार की शिकायत न कर दे। इसी असुरक्षा की भावना के कारण वे हमेशा सुलोचना के साथ उसके मायके जाते थे। वे खुद के घर और काम-काज से पंद्रह-पंद्रह दिन गायब रहते थे, सिर्फ इसलिए ताकि अपनी पत्नी पर नजर रख सकें। सुलोचना जी ने उस दौर में जो घुटन महसूस की थी, वे नहीं चाहती थीं कि उनकी बहू भी आज के दौर में वही दर्द सहे। उन्होंने मन ही मन तय कर लिया कि वे अपने बेटे विवेक को सुधारेंगी और उसे उसकी गलती का अहसास कराएंगी।

सुलोचना जी ने फोन पर बहुत ही शांत और गंभीर आवाज़ में काव्या को एक योजना समझाई। उन्होंने उसे धीरे-धीरे कुछ बातें कहीं, जिन्हें सुनकर काव्या के उदास चेहरे पर खोई हुई मुस्कान धीरे-धीरे वापस आने लगी। उसके चेहरे की मायूसी अब एक तसल्ली में बदल चुकी थी।

फोन रखने के बाद, काव्या ने अपना पर्स उठाया और मुख्य दरवाज़े की तरफ मुड़ी। विवेक सोफे पर बैठा मुंह फुलाए उसे ही देख रहा था। जैसे ही उसने काव्या को बाहर जाते देखा, वह तुरंत उठ खड़ा हुआ और बोला, “मैं भी चलूँगा। तुम मुझे इस तरह छोड़कर अकेले नहीं जा सकतीं।”

काव्या इस बार चिढ़ी नहीं। वह हल्के से मुस्कुराई और खामोशी से पलट कर बोली, “ठीक है, अगर तुम्हारी यही जिद है तो आओ। लेकिन एक शर्त है, गाड़ी आज मैं चलाऊंगी।” विवेक खुश हो गया कि उसकी जिद के आगे काव्या हार गई। उसने बिना सोचे-समझे हामी भर दी।

दोनों कार में जाकर बैठ गए। काव्या ने इंजन स्टार्ट किया और गाड़ी सड़क पर दौड़ पड़ी। विवेक हमेशा की तरह बहुत चहक रहा था। वह रास्ते भर बातें करता रहा कि वहां जाकर वह क्या-क्या खाएगा और साले साहब के साथ कहाँ घूमने जाएगा। लेकिन काव्या ने आज एक अजीब सी खामोशी ओढ़ रखी थी। वह बिना कोई जवाब दिए सिर्फ रास्ते पर ध्यान केंद्रित किए हुए थी।

गाड़ी जब शहर के मुख्य ‘राज चौराहे’ पर पहुँची, तो काव्या ने स्टीयरिंग को बाईं ओर मोड़ दिया। बाईं ओर मुड़ते ही विवेक का माथा ठनका। वह चौंक गया क्योंकि काव्या के मायके जाने का रास्ता तो दाईं ओर से जाता था। उसने तुरंत काव्या का हाथ छूते हुए कहा, “अरे काव्या! तुमने गाड़ी गलत रास्ते पर मोड़ दी। यह तुम्हारे घर का रास्ता नहीं है। तुम रास्ता भूल गई क्या?”

काव्या ने कोई जवाब नहीं दिया। वह खामोशी से गाड़ी चलाती रही। विवेक बार-बार पूछता रहा, लेकिन काव्या चुप रही। लगभग दस मिनट बाद, एक शांत रिहायशी इलाके में आकर काव्या ने एक झटके के साथ ब्रेक लगाया। गाड़ी एक सुंदर से मकान के सामने रुकी थी, जिसके मुख्य गेट पर नेमप्लेट लगी थी—”ममता निवास”।

विवेक यह नाम देखकर भौचक्का रह गया। यह तो उसकी माँ, सुलोचना जी का घर था। वह पूरी तरह असमंजस में पड़ गया। काव्या कार से उतरी, उसने गाड़ी को लॉक किया और विवेक की तरफ देखकर शांत लहजे में बोली, “मैंने तुमसे कब कहा था विवेक कि मैं अपने मायके जा रही हूँ? तुमने खुद ही अंदाज़ा लगा लिया था। मैं तो आज तुम्हारे मायके आई हूँ।”

विवेक कुछ बोल पाता, इससे पहले ही घर का दरवाज़ा खुला और सुलोचना जी बाहर आ गईं। उनके चेहरे पर एक गंभीर मुस्कान थी। उन्होंने आगे बढ़कर काव्या को गले से लगा लिया और उसे आदर के साथ अंदर ले गईं। विवेक चुपचाप, अपराधियों की तरह सिर झुकाए उनके पीछे-पीछे घर के अंदर आ गया।

ड्राइंग रूम का नजारा देखकर विवेक की हैरानगी और बढ़ गई। सुलोचना जी ने मेज़ पर तरह-तरह के खाने के आइटम सजा रखे थे। काव्या की पसंदीदा मिठाइयाँ, गरमा-गरम कचौरियाँ और नमकीन सब कुछ वहां मौजूद था। सुलोचना जी काव्या के पास बैठ गईं और उससे बहुत प्यार से बातें करने लगीं, जैसे कोई माँ अपनी बेटी से सालों बाद मिल रही हो। वे दोनों विवेक को पूरी तरह नजरअंदाज कर रही थीं।

विवेक से यह सब बर्दाश्त नहीं हुआ। उसे अपने ही घर में सब कुछ बहुत अजीब और अटपटा लग रहा था। उसने थोड़ा झिझकते हुए कहा, “माँ! यह सब क्या है? अचानक यह सब तैयारी क्यों? और आप दोनों मुझसे बात क्यों नहीं कर रही हैं?”

सुलोचना जी ने उसकी तरफ देखा और कहा, “क्या हुआ विवेक? तुम्हें यह सब अटपटा क्यों लग रहा है? जब तुम काव्या के मायके जाकर हफ्तों बिना बुलाए रहते हो और वहां अपनी मर्जी की मेहमाननवाज़ी करवाते हो, तब तो तुम्हें कुछ अटपटा नहीं लगता?”

विवेक ने बात संभालते हुए कहा, “माँ, पर आपने इतनी मेहनत क्यों की? अगर कुछ खाना ही था तो काव्या खुद रसोई में जाकर हमारे लिए कुछ बना लेती। वह इस घर की बहू है।”

यह सुनते ही सुलोचना जी का चेहरा गंभीर हो गया। उन्होंने विवेक के पास आकर उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा, “विवेक, विवाह एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी और पवित्र बंधन होता है। इस रिश्ते को काव्या ने पिछले कई सालों से बड़े प्यार, त्याग और सम्मान से निभाया है। उसने इस घर को अपना माना, हमारी सेवा की। लेकिन एक पति के रूप में तुम अपनी जिम्मेदारी निभाने में चूक गए बेटा।”

“क्या मतलब माँ? मैंने काव्या को क्या दुख दिया है?” विवेक ने नासमझी से पूछा।

सुलोचना जी ने एक गहरी सांस ली और कहा, “बेटा, विवाह के बाद किसी लड़की का रिश्ता अपने माता-पिता से खत्म नहीं हो जाता। वे वही माता-पिता हैं जिन्होंने उसे पाल-पोसकर बड़ा किया और तुम्हें सौंपा। लेकिन एक पति चाहे तो उस रिश्ते को जबरदस्ती खत्म जरूर कर सकता है, अगर वह अपनी पत्नी को उसके मायके कभी अकेला न जाने दे तो। तुम्हारी यह जो हमेशा साथ जाने की जिद है, यह प्यार नहीं बल्कि एक मानसिक बंदिश है। तुम अनजाने में काव्या से उसकी माँ का वो कोना छीन रहे हो, जहाँ वह खुलकर रो सकती है या हंस सकती है। अपनी इस बेजा जिद से तुम उसके मायके के रिश्ते को खत्म कर रहे हो।”

माँ के मुंह से यह कड़वा सच सुनते ही विवेक के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसे अपनी गलती का अहसास हो गया। उसे याद आया कि कैसे हर बार उसके वहां होने से काव्या चुपचाप रसोई में काम करती रहती थी और कभी अपनी माँ के पास सुकून से नहीं बैठ पाती थी। उसका अहंकार और उसकी नासमझी आज माँ के शब्दों के आगे पिघल चुकी थी।

वह धीरे से उठा, काव्या के पास गया और उसका हाथ थामकर बेहद भावुक आवाज़ में बोला, “मुझे माफ कर दो काव्या। मैं सचमुच बहुत स्वार्थी हो गया था। मैंने कभी तुम्हारे नजरिए से सोचा ही नहीं। मैं वादा करता हूँ कि अब से तुम जब भी अपने माता-पिता से मिलने जाओगी, अकेली जाओगी ताकि तुम वहां सिर्फ एक बेटी बनकर अपना वक्त बिता सको।”

काव्या की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उसे आज अपने ससुराल में ही मायके जैसी आज़ादी और सुरक्षा मिल गई थी, और सुलोचना जी के रूप में एक ऐसी माँ, जिसने सास होने का फर्ज नहीं, बल्कि एक सच्चे मार्गदर्शक का फर्ज निभाया था। उस दिन के बाद से विवेक और काव्या का रिश्ता और भी गहरा और सम्मानजनक हो गया।

क्या आपको भी लगता है कि शादी के बाद बेटियों को अपने माता-पिता के साथ कुछ समय अकेले बिताने का पूरा हक होना चाहिए? क्या पतियों की ऐसी जिद सच में एक बंदिश बन जाती है? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं!

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