रेत पर खिली धूप

किचन के स्लैब पर रखा मोबाइल फोन लगातार थरथरा रहा था और हर कंपन के साथ देवयानी की सांसें अटक रही थीं। स्क्रीन पर जगमगाता नाम था—‘अन्वी’। वही अन्वी, जिसकी एक आह पर कभी देवयानी ने अपनी पूरी रातें कुर्बान कर दी थीं, आज उसी बेटी का फोन उठाने में उसके हाथ कांप रहे थे। क्या कहेगी वह अन्वी से? क्या वह अपनी ही बेटी की नज़रों में गिर चुकी थी? बेबसी, ग्लानि और डर के मिले-जुले सैलाब ने आंसुओं का रूप धर लिया और देवयानी के गालों से फिसलकर संगमरमर के फर्श पर टपक पड़े। उसे बार-बार यही लग रहा था कि शायद उसने जीवन के उस अघोषित नियम को तोड़ने की हिमाकत कर दी थी, जिसे हमारा समाज एक उम्रदराज़ विधवा के लिए लोहे की लकीर मान बैठता है।

बात सिर्फ दो दिन पुरानी थी। शहर के रवींद्र कला भवन में लगी शास्त्रीय संगीत और चित्रकला की प्रदर्शनी में वह गई हुई थी। वहीं प्रोफेसर राघवेंद्र वर्मा मिल गए थे। दोनों कॉलेज में लंबे समय तक साथ पढ़ा चुके थे, लेकिन वर्षों बाद ऐसी मुलाकात हुई थी। प्रदर्शनी खत्म होने के बाद हल्की बारिश शुरू हो गई थी। राघवेंद्र जी ने बड़ी सहजता से कह दिया, “देवयानी जी, अरसा हो गया किसी अच्छे कॉफी हाउस में बैठकर कला और साहित्य पर सुकून से बात किए हुए। अगर ऐतराज़ न हो, तो पास के उसी पुराने कैफे में एक कप कॉफी हो जाए?” देवयानी के मन में एक हल्की सी झिझक जरूर उठी थी, पर राघवेंद्र जी की सौम्य और आत्मीय हंसी के आगे वह इनकार नहीं कर सकी। दोनों कैफे के एक कोने में बैठकर पुरानी कविताओं, किताबों और कॉलेज के दिनों की खट्टी-मीठी यादों में खो गए। दोनों की हंसी बेसाख्ता थी, जैसे पतझड़ के पत्तों पर बरसों बाद किसी ने ताज़ा पानी छिड़क दिया हो।

पर तकदीर की चाल देखिए, उसी कैफे में अन्वी की ननद की सास, यानी रिश्ते की समधन कल्याणी जी अपनी सहेलियों के साथ किटी पार्टी के लिए आई हुई थीं। अचानक जब कल्याणी जी की नज़र कोने की मेज़ पर पड़ी, तो उनकी भौंहें तन गईं। वे मुस्कुराते हुए आगे बढ़ीं, “अरे देवयानी जी! आप यहां? क्या बात है, आज तो बड़ी महफिल जमी है!” देवयानी ने सामान्य शिष्टाचार के साथ उनका अभिवादन किया, पर कल्याणी जी की आंखों में तैरता व्यंग्य और अधरों पर चिपकी जहरीली मुस्कान किसी अनिष्ट का संकेत दे रही थी।

और वही हुआ। वह मुलाकात उस बवंडर की शुरुआत थी जो आज सुबह देवयानी के घर फोन के जरिए दाखिल हुआ। सुबह-सुबह अन्वी की सास दमयंती देवी का भारी और तल्ख स्वर फोन पर गूंज उठा, “देवयानी जी, बेहद अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि आपसे इस तरह के आचरण की उम्मीद कतई नहीं थी। समधन जी ने कल जो देखा, सुनकर मेरे तो पैरों तले ज़मीन खिसक गई। अरे, पचास पार की उम्र में यह सब चोंचलेबाजी आपको शोभा देती है? पूरी जवानी आपने दिवंगत समधी जी के नाम पर सती-सावित्री बनकर काट दी, अब बुढ़ापे की दहलीज़ पर यह कैसा रंग-ढंग? ज़रा अपनी बेटी की ससुराल की प्रतिष्ठा का तो ख्याल किया होता! खानदानी घराने हैं हमारे, कल को लोग मुंह पर थूकेंगे कि कैसी मां की बेटी ब्याह कर लाए हैं। अगर घर में जी नहीं लगता तो वृंदावन जाकर भजन-कीर्तन कीजिए, यह गैर मर्दों के साथ कैफे में कहकहे लगाना संभ्रांत औरतों का काम नहीं है।”

देवयानी का गला सूख गया था। वह कोई सफाई दे पाती, इससे पहले ही उधर से फोन काट दिया गया। वह स्तब्ध रह गई। लगा जैसे किसी ने भरे चौराहे पर उसके चरित्र के टुकड़े-टुकड़े कर दिए हों। वह खुद को एक गुनहगार की तरह कमरे में बंद करके बैठ गई। अतीत की राख कुरेदने लगी तो केवल कसक और संघर्ष की लपटें ही हाथ लगीं।

कितना कठिन था वह सफर। देवयानी ने अपने युवा दिनों में बैंक अधिकारी सुशांत से प्रेम विवाह किया था। दोनों के परिवारों ने इस शादी को अपनी प्रतिष्ठा के खिलाफ मानकर उनसे सारे नाते तोड़ लिए थे। जीवन की शुरुआत किराए के एक छोटे से कमरे से हुई थी, जहां सपनों की पूंजी के सिवा कुछ न था। अभी शादी को महज़ छह साल ही हुए थे और नन्ही अन्वी मुश्किल से पांच बरस की थी, जब एक सड़क हादसे में सुशांत उसे हमेशा के लिए अकेला छोड़कर चले गए। उस दिन देवयानी पर दुखों का ऐसा पहाड़ टूटा जिसकी कल्पना भी रूह कंपा दे। किसी रिश्तेदार ने पल्लू पकड़कर सहारा नहीं दिया। मायके वालों ने कहा कि अपनी मर्जी से ब्याह रचाया था तो भुगतो, और ससुराल वालों ने मनहूस कहकर दरवाज़ा बंद कर दिया।

उस अकेलेपन के भयावह समंदर में देवयानी ने हार नहीं मानी। उसने अपनी स्नातकोत्तर की डिग्री को ढाल बनाया, रात-रात भर जागकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की और शहर के प्रतिष्ठित सरकारी कॉलेज में राजनीति विज्ञान की प्रवक्ता बनी। उसने अपनी हर सांस अन्वी के नाम कर दी थी। न कभी अच्छे कपड़े पहनने की हसरत रखी, न कभी किसी त्योहार पर अपने लिए कुछ खरीदा। जब कॉलेज की अन्य साथी महिलाएं पिकनिक या पार्टियों की योजना बनातीं, देवयानी चुपचाप घर लौटती ताकि अन्वी को ट्यूशन पढ़ा सके, उसके लिए गर्म खाना बना सके। उसने अन्वी को पिता और मां दोनों का प्यार दिया।

जब अन्वी बड़ी हुई, तो उसने एक प्रतिष्ठित इंजीनियर अर्णव से विवाह करने की इच्छा जताई। देवयानी ने बिना किसी संकोच के, अपनी ज़िंदगी भर की जमा-पूंजी और पेंशन का बड़ा हिस्सा लगाकर अन्वी की शादी बहुत धूमधाम से की ताकि बेटी को ससुराल में कभी यह ताना न सुनना पड़े कि उसका कोई बाप नहीं था। अर्णव बहुत सुलझा हुआ लड़का था और शादी के बाद उसने कई बार आग्रह किया, “मां जी, आप हमारे साथ मेट्रो सिटी चलिए, वहां साथ रहेंगे।” लेकिन देवयानी ने मना कर दिया। वह कॉलेज में अब वाइस प्रिंसिपल के पद तक पहुंच चुकी थी और अपनी बची हुई ज़िंदगी को अपनी आत्म-निर्भरता के साथ जीना चाहती थी।

अन्वी के जाने के बाद घर का सन्नाटा उसे अक्सर काटने दौड़ता था। उसी खालीपन को भरने के लिए उसने वंचित वर्ग की लड़कियों को निशुल्क पढ़ाने का एक प्रकल्प शुरू किया। इसी सिलसिले में उसकी मुलाकात राघवेंद्र जी से गहरी हुई थी। राघवेंद्र जी के जीवन की त्रासदी भी कुछ कम न थी। उनकी धर्मपत्नी कैंसर से लड़ते हुए दस साल पहले चल बसी थीं, और उनका इकलौता बेटा सीमा पर देश की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गया था। उस अथाह शून्य के बावजूद राघवेंद्र जी ने जीवन से मुंह नहीं मोड़ा था। वे एक ट्रस्ट चलाते थे जो दिव्यांग बच्चों की शिक्षा और पुनर्वास का काम करता था। उनका मानना था कि घावों को भरने का सबसे बेहतरीन तरीका दूसरों के आंसुओं को पोंछना है। राघवेंद्र जी का जीवन के प्रति सकारात्मक नज़रिया, उनकी शालीनता और उनका बौद्धिक स्तर देवयानी को एक संबल जैसा लगता था। उनके बीच जो था, वह दो अकेलेपन का एक-दूसरे को बिना किसी शर्त के समझना था—एक पावन, बौद्धिक और गरिमामय साहचर्य।

पर समाज? समाज तो केवल स्त्री की देह और उसकी सीमाओं को नापना जानता है। वह यह नहीं समझता कि आत्मा को भी संवाद की भूख होती है, मन को भी एक हमसफर की तलाश होती है जो बिना किसी अपेक्षा के सिर्फ सुन सके।

फोन की घंटी फिर बजी। इस बार देवयानी ने थरथराते हाथों से हरे बटन को स्वाइप कर कान से लगाया।

“ह… हैलो, अन्वी बेटा…” आवाज़ आंसुओं के बोझ से भारी थी।

“मां! आप फोन क्यों नहीं उठा रही थीं? आपको अंदाज़ा भी है कि मेरी क्या हालत हो रही थी? मैं तो अर्णव से बस की टिकट कराने को कह रही थी!” अन्वी की आवाज़ में चिंता की घबराहट साफ झलक रही थी।

“बेटा… वो… मुझे समझ नहीं आ रहा था कि तुमसे क्या कहूं,” देवयानी सिसक पड़ी, “मुझे माफ कर दे बच्ची। मेरी वजह से आज तुझे अपनी ससुराल में नीचा देखना पड़ा। तेरी सास ने… बहुत कुछ कहा। शायद मुझसे ही भूल हो गई। इस उम्र में मुझे इन सब बातों से दूर रहना चाहिए था। मेरी नासमझी ने तेरे वैवाहिक जीवन में कड़वाहट घोल दी।”

फोन के उस पार कुछ पलों के लिए गहरा सन्नाटा छा गया। फिर एक लंबी, गहरी सांस के बाद अन्वी का दृढ़ और सधा हुआ स्वर गूंजा, “मां, सासू जी ने जो आपसे कहा, उसके लिए मैं हाथ जोड़कर आपसे माफी मांगती हूं। पर मुझे सबसे ज़्यादा दुख इस बात का है कि मेरी मां, जिसने मुझे दुनिया से लड़ना सिखाया, वह आज खुद को अपराधी मानकर रो रही है! क्या गुनाह किया है आपने? किसी परिचित, सम्माननीय व्यक्ति के साथ बैठकर कॉफी पीना और बातें करना क्या कोई पाप है?”

“लेकिन बेटा, समाज… लोग क्या कहेंगे…”

“मां, भाड़ में जाए ऐसा समाज!” अन्वी का स्वर भावुक किंतु चट्टान की तरह मजबूत था। “जब पापा की मौत के बाद आप एक-एक पैसे के लिए मोहताज थीं, जब मैं बीमार होती थी और आप मुझे गोद में उठाकर रात के दो बजे अस्पताल की तरफ दौड़ती थीं, तब यह समाज कहां था? तब दमयंती देवी या कल्याणी चाची दूध का एक पैकेट लेकर भी आपकी चौखट पर नहीं आई थीं। आपने अपनी जवानी, अपने सपने, अपनी खुशियां, अपनी भूख-प्यास सब मुझ पर न्योछावर कर दीं। आपने पच्चीस साल एक तपस्विनी की तरह काट दिए ताकि मैं अपने पैरों पर खड़ी हो सकूं। अब जब मेरा अपना संसार बस गया है, तो क्या आपकी कोई निजी ज़िंदगी नहीं है?”

देवयानी अवाक रह गई। उसकी आंखों से बहते आंसू अब डर के नहीं, बल्कि अपनी बेटी के इस विराट रूप को देखकर उमड़े गर्व के थे।

अन्वी ने आगे कहा, “मां, अर्णव मेरे पास ही बैठे हैं और वे भी पूरी तरह मेरे साथ हैं। उन्होंने अपनी मां से साफ कह दिया है कि मां जी ने जो किया उसमें कुछ भी अनुचित नहीं है, और आइंदा कोई उन पर उंगली उठाने की जुर्रत न करे। मां, किसी के चले जाने से ज़िंदगी खत्म नहीं होती। राघवेंद्र अंकल एक बेहद नेक, सुशिक्षित और गरिमामय इंसान हैं। अगर उनके साथ बैठकर आपको दो घड़ी सुकून मिलता है, बौद्धिक चर्चा करने का अवसर मिलता है, तो यह आपका अधिकार है। उम्र का खुशियों से, जीने की चाह से कोई लेना-देना नहीं होता। अपनी अंतरात्मा को सुनिए मां। अब आपको किसी के सामने सिर झुकाने की ज़रूरत नहीं है। अपनी ज़िंदगी को अपनी शर्तों पर खुलकर जीजिए। अगर कल को आप दोनों एक-दूसरे का आधिकारिक सहारा भी बनना चाहें, तो आपकी बेटी सबसे आगे खड़े होकर तालियां बजाएगी।”

फोन कटने के बाद देवयानी ने गहरी सांस ली। लगा जैसे छाती पर रखा सदियों पुराना पत्थर एकाएक हट गया हो। खिड़की से आती सुबह की ताज़ा हवा उसके चेहरे को छू गई। उसने अपने आंसू पोंछे, आईने के सामने जाकर अपने बिखरे बालों को संवारा और चेहरे पर एक आत्मविश्वासी मुस्कान तैर गई। उसने मेज़ से फोन उठाया और पहली बार बिना किसी अपराधबोध या संकोच के राघवेंद्र जी का नंबर मिलाया, “हैलो राघवेंद्र जी… कल शाम वाली किताब पर चर्चा अधूरी रह गई थी, क्या आज शाम हम दोबारा मिल सकते हैं?”

क्या हमारी माताओं और बुजुर्गों को अपनी ज़िंदगी के अंतिम पड़ाव पर अपनी पसंद की खुशियां, दोस्ती या साहचर्य चुनने का अधिकार केवल इसलिए नहीं मिलना चाहिए क्योंकि समाज ने उनके लिए त्याग और उदासी का चोला पहले से तय कर रखा है? आपकी इस बारे में क्या राय है, कमेंट बॉक्स में अपनी सोच ज़रूर साझा करें।

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