अनकही सरगम

 बाबूजी की यह बात अवनि के सीने में तीर की तरह चुभी। ‘किसी अपने के लिए जज्बात…’ इसका मतलब राघव किसी और से प्यार करता था? अवनि को लगा जैसे उसकी पूरी दुनिया ही ढह गई हो। उसका एकतरफा प्रेम, जो बिना किसी उम्मीद के पनप रहा था, अब एक असहनीय दर्द बन चुका था। उसने फैसला किया कि वह अब अपनी इस भावना को यहीं दफन कर देगी। किसी ऐसे इंसान के पीछे अपनी खुशियां क्यों लुटाना, जिसकी मंजिल का रास्ता ही कहीं और जाता हो?

पुराने शहर की तंग गलियों में बसा वह दो मंजिला मकान शाम ढलते ही एक अजीब से सुकून में डूब जाया करता था। आंगन में लगा पारिजात का पेड़ जब हवा के झोंकों से अपने फूल बिखेरता, तो मानों पूरे घर में एक भीनी सी महक तैर जाती। उसी आंगन के एक कोने में मेज पर बिछी बिसात और उस पर रखी मोहरें हर शाम किसी खास के आने की गवाही देती थीं।

अवनि की उँगलियाँ रसोई के चौके में बेलन पर तेजी से चल रही थीं, मगर उसके कान बार-बार मुख्य द्वार की पुरानी सांकल की खनक पर टिके थे। घड़ी की टिक-टिक जैसे दिल की धड़कन के साथ होड़ ले रही थी। ठीक छह बजे दरवाजे पर वही चिर-परिचित आहट हुई। अवनि के हाथ एक पल को थमे, चेहरे पर हल्की सी मुस्कान खिली, जिसे उसने तुरंत आंचल के छोर से छुपा लिया।

दरवाजे पर राघव खड़ा था। सादा सा कुर्ता, कंधे पर लटका चमड़े का थैला, चेहरे पर दिनभर की थकान के बावजूद एक ठहराव और आंखों में वही संजीदगी जो हमेशा से अवनि को असहज कर देती थी।

“बाबूजी, चरण स्पर्श,” राघव की भारी, मगर बेहद शांत आवाज बैठक में गूंजी।

कमरे से दीनानाथ जी की खिलखिलाती आवाज आई, “आओ राघव बेटा, आओ! मैं तो कब से तुम्हारी राह तक रहा था। आज तुम्हें उस चाल का जवाब देना ही होगा जो कल तुमने चली थी।”

अवनि ने चुपचाप चाय की प्याली उठाई और बैठक की ओर बढ़ गई। राघव बाबूजी के सामने तख्त पर बैठ चुका था। दोनों के बीच शतरंज की बिसात सजने लगी थी। अवनि ने चाय की प्याली राघव के सामने रखी। उसने अपनी नजरें झुका रखी थीं, मगर उसका पूरा वजूद राघव की एक नजर का मोहताज था। राघव ने केवल एक हल्की सी गर्दन हिलाई और धीमे स्वर में कहा, “धन्यवाद।” न नजरें उठाईं, न कोई मुस्कान, न कोई अपनापन।

अवनि का दिल एक बार फिर बुझ सा गया। वह चुपचाप मुड़ी और रसोई की चौखट के पीछे खड़ी होकर उन्हें देखने लगी।

राघव और उसके परिवार का रिश्ता भी बड़ा अजीब था। करीब एक साल पहले, जब बाबूजी बाजार में अचानक सीने में उठे दर्द के कारण गिर पड़े थे, तब यह अनजान लड़का ही था जो उन्हें अपनी बाहों में उठाकर तुरंत अस्पताल ले गया था। डॉक्टर ने कहा था कि अगर दस मिनट की भी देरी हो जाती, तो अनहोनी टलना मुश्किल था। उस दिन से राघव दीनानाथ जी के लिए सिर्फ एक मददगार नहीं, बल्कि उनके अकेलेपन का सबसे बड़ा सहारा बन गया था। पत्नी के गुजर जाने के बाद दीनानाथ जी बिल्कुल टूट चुके थे, मगर राघव के आने से उनके चेहरे पर फिर से वही पुरानी चमक लौट आई थी। वह राघव के साथ घंटों बैठकर राजनीति, साहित्य और शतरंज पर बातें करते।

अवनि के लिए भी राघव उस दिन किसी मसीहा से कम नहीं लगा था। जब उसने पहली बार अस्पताल के गलियारे में राघव को पसीने से तर-बतर, घबराए हुए बाबूजी की रिपोर्ट संभालते देखा था, तभी उसके दिल के किसी अनछुए कोने में राघव ने अपना घर बना लिया था। राघव कद-काठी से सामान्य था, पर उसके चेहरे पर एक गजब की सच्चाई थी।

घर लौटने के बाद, जब राघव का आना-जाना बढ़ा, तो अवनि को लगा था कि शायद दोनों के बीच भी कोई बातचीत शुरू होगी। मगर राघव का रवैया हमेशा नपा-तुला रहता। वह बाबूजी से तो खुलकर हंसता, उनकी हर छोटी बात पर तवज्जो देता, लेकिन अवनि के सामने आते ही वह एकदम मौन हो जाता। अवनि कितनी भी कोशिश कर ले, राघव कभी उसकी तरफ सीधे नहीं देखता था।

अवनि अक्सर सोचती कि क्या उसमें कोई कमी है? वह देखने में साधारण थी, पर उसका दिल शीशे की तरह साफ था। वह बाबूजी की हर पसंद का ख्याल रखती, घर को सहेजती, और जब भी राघव आता, तो उसकी पसंदीदा अदरक वाली कड़क चाय या बेसन के लड्डू बनाना कभी नहीं भूलती। एक बार जब बाबूजी ने बातों-बातों में बताया था कि राघव को दक्षिण भारतीय उपमा बहुत भाता है, तो अवनि ने पूरी दोपहर यूट्यूब पर वीडियो देखकर पहली बार उपमा बनाया था। जब उसने राघव के सामने वह प्लेट रखी थी, तो उसकी धड़कनें बेकाबू थीं। राघव ने खाया जरूर, पर सिर्फ इतना कहा, “स्वादिष्ट है।” कोई विशेष तारीफ नहीं, कोई आभार नहीं। उस दिन अवनि को लगा था कि शायद उसकी कोशिशें उस पत्थर दिल को कभी पिघला नहीं पाएंगी।

दिन बीतते गए। दोनों के बीच की यह मूक दूरी अवनि के दिल को धीरे-धीरे छलनी करने लगी थी।

एक रविवार की दोपहर, दीनानाथ जी किसी जरूरी पेंशन के काम से बाहर गए हुए थे। अचानक आसमान में काले बादल घिर आए और मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। राघव ठीक उसी वक्त एक जरूरी दवा का पैकेट देने घर पहुंचा। दरवाजा अवनि ने खोला।

राघव भीग चुका था। अवनि को अकेला देखकर वह दरवाजे पर ही ठिठक गया। “बाबूजी नहीं हैं क्या?” उसने संकोच से पूछा।

“नहीं, वे थोड़ी देर में आते ही होंगे। आप अंदर आ जाइए, बाहर बहुत तेज बारिश है,” अवनि ने एक साफ तौलिया आगे बढ़ाते हुए कहा।

राघव कमरे में आया, पर वह बैठने की बजाय खिड़की के पास खड़ा रहा। कमरे में केवल बारिश की बूंदों की टप-टप और एक अजीब सा सन्नाटा गूंज रहा था। उस सन्नाटे को तोड़ने के लिए अवनि ने हिम्मत जुटाई।

“अगर आप चाहें तो हम शतरंज खेल सकते हैं? जब तक बाबूजी आते हैं,” अवनि ने बिसात की तरफ इशारा किया।

राघव ने पहली बार अपनी पलकें उठाकर अवनि को देखा। उसकी आंखों में एक झिझक थी, पर उसने धीरे से सिर हिला दिया।

दोनों बिसात के आमने-सामने बैठे। अवनि को शतरंज की बारीक चालें नहीं आती थीं, पर बाबूजी को खेलते देख उसने थोड़ा-बहुत सीख लिया था। खेल शुरू हुआ। अवनि पूरे ध्यान से अपनी चालें चल रही थी, मगर राघव आज खोया-खोया सा था। वह जो दीनानाथ जी को एक भी मोहरा आसानी से नहीं लेने देता था, आज अवनि के साधारण से प्यादों के सामने अपने वजीर और घोड़ों को गंवाता जा रहा था। देखते ही देखते, अवनि ने राघव के राजा को मात दे दी।

“मैं जीत गई!” अवनि के मुंह से अनजाने में ही बच्चों जैसी खुशी फूट पड़ी।

राघव मुस्कुराया। एक बहुत ही कोमल, अनकही मुस्कान। “हाँ, आप बहुत अच्छा खेलीं।”

उस दिन अवनि को पहली बार लगा कि शायद राघव के सीने में भी दिल है। मगर इस मुलाकात के बाद हालात सुधरने के बजाय और बिगड़ गए। अगले पूरे हफ्ते राघव घर नहीं आया।

अवनि बेचैन हो उठी। उसका मन किसी काम में नहीं लग रहा था। जब उसने बाबूजी से दबी जुबान में पूछा, तो बाबूजी ने गहरी सांस लेकर कहा, “राघव आजकल बहुत परेशान है बेटा। उसने अपनी नौकरी के साथ-साथ एक नए प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया है। और… शायद उसके मन में कोई बात है जो वह किसी से कह नहीं पा रहा। किसी अपने के लिए उसके दिल में कुछ जज्बात हैं, पर वह खुद को उस काबिल नहीं समझता।”

बाबूजी की यह बात अवनि के सीने में तीर की तरह चुभी। ‘किसी अपने के लिए जज्बात…’ इसका मतलब राघव किसी और से प्यार करता था? अवनि को लगा जैसे उसकी पूरी दुनिया ही ढह गई हो। उसका एकतरफा प्रेम, जो बिना किसी उम्मीद के पनप रहा था, अब एक असहनीय दर्द बन चुका था। उसने फैसला किया कि वह अब अपनी इस भावना को यहीं दफन कर देगी। किसी ऐसे इंसान के पीछे अपनी खुशियां क्यों लुटाना, जिसकी मंजिल का रास्ता ही कहीं और जाता हो?

संयोग से, अगले ही हफ्ते अवनि की मौसी का पत्र आया, जिसमें उन्होंने अवनि को कुछ महीनों के लिए अपने गांव बुलाने का आग्रह किया था। अवनि ने तुरंत हां कर दी। वह इस शहर, इस घर और सबसे ज्यादा राघव की उस चुभती खामोशी से दूर भाग जाना चाहती थी।

जाने से एक शाम पहले, अवनि ने अपनी अलमारी से एक सादा कागज निकाला। आंसुओं से धुंधली होती आंखों के साथ उसने अपने दिल का सारा दर्द उस खत में उड़ेल दिया। उसने लिखा कि कैसे उसने पहली नजर से ही उसे चाहा था, कैसे उसकी खामोशी उसे रोज मारती थी, और कैसे वह आज उसके जीवन से हमेशा के लिए दूर जा रही है ताकि वह अपने उस ‘अनकहे प्यार’ को पा सके जिसके बारे में बाबूजी बात कर रहे थे। उसने वह खत अपने कमरे की मेज पर रखी गीता के पन्नों के बीच दबा दिया, यह सोचकर कि उसके जाने के बाद कभी बाबूजी को मिलेगा तो वे समझ पाएंगे कि उनकी बेटी ने क्या खोया है।

अगली सुबह, जब अवनि अपना सूटकेस लेकर बैठक में आई, तो उसने देखा कि राघव वहां पहले से बैठा हुआ था। आज उसके चेहरे पर कोई थकान नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी चमक थी। उसके हाथ में एक मिठाई का डिब्बा था।

बाबूजी चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान लिए सोफे पर बैठे थे।

अवनि ने सूटकेस जमीन पर रखा और नजरें नीची कर लीं। उसने सोचा कि राघव शायद अपनी किसी सफलता की मिठाई खिलाने आया है या फिर अपनी शादी की खबर देने।

“अवनि बेटा, इधर आओ,” दीनानाथ जी ने स्नेह से पुकारा।

अवनि भारी कदमों से उनके पास जाकर खड़ी हो गई।

दीनानाथ जी ने राघव की ओर देखा और बोले, “राघव, जो बात तुम इतने महीनों से मुझसे घुमा-फिराकर कह रहे थे, आज सबके सामने साफ-साफ कह दो। वरना तुम्हारी इस खामोशी के चक्कर में मेरी बेटी आज घर छोड़कर जा रही है।”

अवनि ने चौंककर नजरें उठाईं।

राघव अपनी जगह से उठा। आज उसकी आंखों में कोई झिझक नहीं थी, कोई बेरुखी नहीं थी। उसने अपनी जेब से एक मुड़ा हुआ कागज निकाला। वह अवनि का वही खत था, जो उसने रात को गीता में रखा था।

“बाबूजी ने सुबह पूजा करते वक्त यह खत देख लिया था,” राघव की आवाज में आज एक बेहद भावुक कंपकंपाहट थी।

अवनि शर्म और घबराहट से पानी-पानी हो गई। वह जमीन में गड़ जाने को तैयार थी।

राघव ने आगे बढ़कर कहा, “अवनि… तुमने इस खत में लिखा है कि मैं पत्थर दिल हूँ, बेरुख हूँ, और किसी और से प्यार करता हूँ। क्या तुम सच में मुझे इतना ही समझ पाईं?”

अवनि की आंखें डबडबा आईं, वह कुछ बोल न सकी।

राघव ने गहरी सांस ली और बोला, “उस दिन जब तुमने मुझे शतरंज में हराया था, क्या तुम्हें वाकई लगा था कि तुम अपनी चालों से जीती थीं? अवनि, मैं उस दिन खेल ही नहीं रहा था, मैं तो सिर्फ यह देख रहा था कि जीतने के बाद तुम्हारी आंखों में कितनी मासूम चमक आ जाती है। उस दिन के बाद मैं इसलिए दूर हुआ क्योंकि मुझे डर था कि कहीं बाबूजी मेरी आंखों में तुम्हारे लिए वह प्यार न पढ़ लें, जिसे मैं अपनी ही नजरों से छुपा रहा था।”

अवनि अवाक रह गई।

राघव आगे बोला, “मैं जानता था कि बाबूजी ने मुझे अपने बेटे की तरह माना है। मैं उनके इस विश्वास का फायदा उठाकर उनकी ही बेटी पर अपनी नजरें नहीं टिकाना चाहता था। मेरे पास कोई पुश्तैनी जायदाद नहीं थी, कोई बड़ा ओहदा नहीं था। मैं पहले खुद को इस काबिल बनाना चाहता था कि एक दिन सीना तानकर बाबूजी के सामने तुम्हारा हाथ मांग सकूं। बाबूजी ने जिस ‘प्यार’ का जिक्र तुमसे किया था, वह कोई और नहीं, तुम ही थीं अवनि! मैं हर दिन, हर पल सिर्फ तुम्हारे लिए मेहनत कर रहा था। आज मुझे एक बड़ी कंपनी में स्थायी पद और सम्मानजनक जिम्मेदारी मिल गई है। आज मैं बाबूजी के सामने यह कहने की हिम्मत जुटा पाया हूँ।”

राघव ने दीनानाथ जी की ओर देखा, जिनकी आंखों में खुशी के आंसू छलक रहे थे।

दीनानाथ जी ने उठकर राघव के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “पगले, मुझे तो उस दिन ही सब समझ आ गया था जिस दिन तू अस्पताल में मेरे साथ था और होश में आते ही सबसे पहले तूने अवनि को सांत्वना दी थी। मैं तो बस यह देखना चाहता था कि तू अपनी जिम्मेदारी को निभाने के लिए कब खुद पर भरोसा करता है। मुझे अपनी बेटी के लिए तुमसे बेहतर इंसान इस पूरी दुनिया में नहीं मिल सकता।”

अवनि के आंसुओं का बांध टूट पड़ा। जिस खामोशी को वह अब तक उपेक्षा समझ रही थी, वह दरअसल राघव का सबसे बड़ा त्याग और उसके प्रति अगाध सम्मान था। राघव ने कभी उसे नजरअंदाज नहीं किया था, बल्कि वह तो उसे अपनी नजरों में इतनी पवित्रता से बसाए हुए था कि समाज और संस्कारों की मर्यादा में रहकर ही उसे पाना चाहता था।

राघव ने धीरे से अवनि की तरफ हाथ बढ़ाया, “क्या अब भी तुम्हें मौसी के यहाँ जाना है, या फिर इस घर को, और मुझे… हमेशा के लिए संभालने का इरादा है?”

अवनि ने भीगी पलकों के बीच से मुस्कुराते हुए अपना सिर ना में हिला दिया। पूरा आंगन पारिजात के फूलों की महक और एक नए, पवित्र रिश्ते की मिठास से भर गया था। सच्चा प्रेम वही है जो केवल शब्दों का मोहताज न होकर, मर्यादा, धैर्य और आत्मसम्मान के साथ फलीभूत होता है।

प्यार केवल बड़ी-बड़ी बातों, तोहफों या दिखावे का नाम नहीं है; सच्चा प्रेम वह है जो मर्यादा में रहकर त्याग करना जानता है और सही वक्त आने पर सम्मान के साथ रिश्ते को अपनाता है।

क्या आपको भी लगता है कि आज के दौर में ऐसे शांत, गंभीर और संस्कारी प्यार की जगह सिर्फ दिखावे ने ले ली है? राघव के इस धैर्य और बाबूजी के विश्वास पर आपकी क्या राय है? अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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