अवंतिका को जब होश आया, तो उसने अपनी कांपती हुई उंगलियों से मेनका का हाथ पकड़ा। उसने अपनी नवजात बच्ची को देखने की अंतिम इच्छा जताई। मेनका ने रोते हुए बच्ची को उसकी छाती से लगाया। अवंतिका ने बच्ची के माथे को चूमा, उसके आंसुओं की बूंदें बच्ची के गालों पर गिर पड़ीं। उसने लड़खड़ाती आवाज में कहा, “मेनका… मेरी गुड़िया… मेरे आरव को… और इस नन्हीं जान को… अपनी छांव देना। सिद्धार्थ को कभी अकेला मत पड़ने देना…”
खिड़की से आती सर्द हवा के झोंकों ने कमरे के सन्नाटे को और गहरा कर दिया था। सामने दीवार पर टंगी एक तस्वीर पर टिकी डॉ. सिद्धार्थ की आंखें जैसे पथरा सी गई थीं। तस्वीर में मुस्कुराता हुआ चेहरा उसकी दिवंगत पत्नी अवंतिका का था, जिसकी हंसी कभी इस पूरे घर के कोने-कोने में गूंजती थी। गोद में महज सात दिन की नन्हीं जान, जिसे अभी संसार के अर्थ का भी भान नहीं था, अपनी मुट्ठियां भींचे सो रही थी। पास ही गद्दे पर साढ़े तीन साल का आरव अपने पिता की कमीज का सिरा पकड़े गहरी नींद में था। बाहर दुनिया चैन से सो रही थी, परंतु सिद्धार्थ के भीतर सन्नाटे की ऐसी आंधी चल रही थी, जो उसके अस्तित्व को टुकड़े-टुकड़े कर रही थी।
नियति का यह वार इतना अचूक और इतना अचानक था कि वह संभलने का एक अवसर भी नहीं पा सका था। वह खुद एक हृदय रोग विशेषज्ञ था, जिसने न जाने कितने डूबते हुए मरीजों की धड़कनों को वापस लौटाया था, लेकिन विधाता के विधान के आगे उसका पूरा ज्ञान और विज्ञान नतमस्तक होकर रह गया। जब उसे अपनी सबसे प्यारी, अपनी जीवनसंगिनी की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब मौत ने चुपके से आकर उसकी दुनिया को लूट लिया था।
सिद्धार्थ की नम आंखों के सामने अतीत का पर्दा किसी रील की तरह घूमने लगा। जयपुर का वह शांत मोहल्ला, जहां उसका और अवंतिका का बचपन बीता था। दोनों के घर आमने-सामने थे। बचपन की बेफिक्र धूल-मिट्टी वाली गलियों में साथ दौड़ना, पतंगों के पीछे भागना और स्कूल की पुरानी साइकिल पर एक साथ हंसते हुए जाना। वे केवल बालसखा नहीं थे, बल्कि दो ऐसे मन थे जो बिना बोले ही एक-दूसरे के विचारों को भांप लेते थे। जब दोनों ने बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण की, तो दोनों का एक ही ध्येय था—चिकित्सा के क्षेत्र में जाकर मानवता की सेवा करना।
तैयारी के लिए दोनों का चयन इंदौर के प्रतिष्ठित कोचिंग संस्थान में हुआ। घर से दूर उस अनजान शहर में वे दोनों एक-दूसरे का संबल बने। अवंतिका स्वभाव से चंचल, ऊर्जा से भरपूर और हमेशा दूसरों की खुशी में अपनी खुशी तलाशने वाली लड़की थी। वहीं सिद्धार्थ थोड़ा गंभीर, शांत और लक्ष्य के प्रति पूर्णतः समर्पित। इंदौर के उस दौर में, नोट्स साझा करने से लेकर हॉस्टल के मेस के बेस्वाद खाने पर मिलकर हंसने तक, न जाने कब बचपन की निष्कलंक मित्रता ने मौन प्रेम का स्वरूप ले लिया। दोनों ने एक-दूसरे से कभी कुछ कहा नहीं, मगर जब दोनों ने एक ही मेडिकल प्रवेश परीक्षा पास की और भोपाल के शासकीय मेडिकल कॉलेज में प्रवेश मिला, तो दोनों की आंखें एक अनकहे वादे से चमक उठी थीं।
मेडिकल कॉलेज के दिन बेहद व्यस्तता भरे थे। तीसरे वर्ष की एक शाम, जब भारी वर्षा के बाद कॉलेज कैंपस के नीम और गुलमोहर के पेड़ धुले-धुले से लग रहे थे, सिद्धार्थ ने अवंतिका से लाइब्रेरी के पीछे स्थित छोटी सी कैंटीन में मिलने को कहा।
अवंतिका ने गीली जुल्फों को संवारते हुए चिढ़ाया था, “मिस्टर सिद्धार्थ, आज एनाटॉमी के प्रैक्टिकल को छोड़कर मुझे यहां चाय पिलाने का क्या प्रयोजन है?”
सिद्धार्थ ने उसकी आंखों में देखा, जहां एक निर्मल गहरा समंदर था। उसने जेब से एक छोटा सा मखमली डिब्बा निकाला, जिसमें चांदी की एक महीन सी अंगूठी थी। उसने कांपते हाथों से अवंतिका की हथेली थामी और गंभीर स्वर में कहा, “अवंतिका, एमबीबीएस और फिर एमडी की इस लंबी राह पर मैं केवल तुम्हारा सहपाठी बनकर नहीं, बल्कि जिंदगी के हर सफर में तुम्हारा हमसफ़र बनकर चलना चाहता हूं। क्या तुम मुझसे विवाह करोगी?”
अवंतिका अवाक रह गई थी। वह जानती थी कि वह भी सिद्धार्थ के बिना अपने जीवन की कल्पना नहीं कर सकती, पर उसने झिझकते हुए कहा, “सिद्धार्थ, अभी तो इंटर्नशिप बाकी है, पोस्ट ग्रेजुएशन बाकी है। इतनी जल्दी यह जिम्मेदारी कैसे संभालेंगे?”
सिद्धार्थ ने दृढ़ता से उसका हाथ दबाते हुए कहा था, “हम दोनों मिलकर संभालेंगे। जो सपने हमने अलग-अलग देखे हैं, उन्हें एक छत के नीचे रहकर पूरा करेंगे। हमारा प्यार हमारी पढ़ाई में बाधा नहीं, बल्कि हमारी सबसे बड़ी ताकत बनेगा।”
दोनों परिवारों की पुरानी घनिष्ठता थी, इसलिए किसी भी तरफ से कोई विरोध नहीं हुआ। कॉलेज के अंतिम वर्ष में दोनों का विवाह सादगी से संपन्न हो गया। उन्होंने कॉलेज के नजदीक ही एक छोटा सा दो कमरों का फ्लैट किराए पर लिया। गृहस्थी की जिम्मेदारियों और अस्पताल की नाइट ड्यूटी के बीच उनका तालमेल इतना खूबसूरत था कि देखने वाले दांतों तले उंगलियां दबा लेते थे।
शादी के डेढ़ साल बाद, जब दोनों इंटर्नशिप के दौर से गुजर रहे थे, अवंतिका ने सिद्धार्थ को अपनी गर्भावस्था की खबर दी। सिद्धार्थ उस समय चौंक गया था। उसने कहा था, “अवंतिका, अभी करियर की शुरुआत है। पीजी का एंट्रेंस सामने है। क्या हमें थोड़ा ठहरना नहीं चाहिए?”
परंतु अवंतिका की आंखें मातृत्व के सुखद अहसास से चमक रही थीं। उसने कहा, “सिद्धार्थ, संतान ईश्वर का वरदान होती है। मैं अपने मातृत्व को करियर के तराजू पर नहीं तौल सकती। सब कुछ ठीक हो जाएगा, तुम देखना।”
जब अवंतिका की मां ने यह सुना, तो उन्होंने अवंतिका की छोटी बहन मेनका को उनके पास भेज दिया। मेनका बचपन में एक गंभीर बीमारी के कारण एक पैर से कमजोर हो गई थी। वह थोड़ा लंगड़ा कर चलती थी, समाज की संकुचित नजरों में भले ही वह ‘दिव्यांग’ थी, परंतु उसका आत्मसम्मान और इच्छाशक्ति किसी भी सामान्य व्यक्ति से कहीं अधिक दृढ़ थी। उसने अर्थशास्त्र में स्नातक कर लिया था और घर के प्रबंधन में वह अत्यंत कुशल थी।
मेनका जब भोपाल आई, तो उसने घर की पूरी बागडोर अपने हाथों में ले ली। उसने सिद्धार्थ और अवंतिका से कहा, “जीजाजी, दीदी, आप दोनों केवल अपनी पढ़ाई और अस्पताल पर ध्यान दीजिए। यह घर और आने वाला नन्हा मेहमान मेरी जिम्मेदारी है।”
मेनका की उपस्थिति ने उस छोटे से घर को ऐसा संबल दिया कि अवंतिका ने समय पर एक स्वस्थ बेटे, आरव को जन्म दिया। मेनका ने आरव को इस तरह पाला जैसे वह उसकी अपनी संतान हो। रात-रात भर जागकर बच्चे को संभालना, सिद्धार्थ के लिए समय पर टिफिन तैयार करना और दीदी को कभी किसी चिंता में न पड़ने देना, यह सब मेनका की दिनचर्या का हिस्सा बन गया। सिद्धार्थ और अवंतिका ने अपनी इंटर्नशिप पूरी की और सिद्धार्थ ने प्रतिष्ठित संस्थान में एमडी की सीट भी हासिल कर ली।
जिंदगी एक सुंदर, शांत नदी की तरह बह रही थी। दोनों का सपना था कि अपनी विशेषज्ञता पूरी करने के बाद वे एक ऐसा अस्पताल खोलेंगे जहां निर्धन और असहाय लोगों का निःशुल्क उपचार किया जाएगा। इस सुनहरे सपने के बीच अवंतिका दोबारा गर्भवती हुई। पूरा परिवार खुशियों से सराबोर था। आरव भी छोटा भाई या बहन आने की प्रतीक्षा में उत्साहित रहता था।
परंतु, इस बार नियति के मन में कुछ और ही क्रूर योजना चल रही थी। गर्भावस्था के सातवें महीने में अवंतिका का स्वास्थ्य तेजी से गिरने लगा। उसे अक्सर अत्यधिक थकान, चक्कर आना और हल्का बुखार रहने लगा। शुरू में सभी ने इसे गर्भावस्था की सामान्य कमजोरी समझा। सिद्धार्थ ने भी सोचा कि खून की कमी होगी। परंतु मेनका ने भांप लिया कि दीदी की आंखों की चमक दिन-ब-दिन बुझती जा रही है।
अस्पताल में जब अवंतिका की विस्तृत जांच करवाई गई, तो जो रिपोर्ट सामने आई, उसने सिद्धार्थ के पैरों तले से जमीन खिसका दी। अवंतिका एक्यूट मायलोइड ल्यूकेमिया (रक्त कैंसर) के अत्यंत आक्रामक और अंतिम चरण में पहुंच चुकी थी। रोग इतनी तेजी से फैल चुका था कि उसके बचने की संभावना नगण्य थी।
सिद्धार्थ एक डॉक्टर था। उसने न जाने कितने परिवारों को ऐसी दुखद खबरें दी थीं, पर जब खुद के घर पर यह गाज गिरी, तो उसका सारा धैर्य, सारा ज्ञान आंसुओं में बह गया। वह अस्पताल के कॉरिडोर में सिर पकड़कर बैठ गया। वह खुद को कोस रहा था, “मैं कैसा डॉक्टर हूं? अपनी पत्नी की इतनी बड़ी बीमारी को समय पर पहचान नहीं सका!”
अवंतिका की स्थिति दिन-प्रतिदिन बिगड़ने लगी। डॉक्टरों की टीम ने निर्णय लिया कि मां और बच्चे दोनों की जान को खतरा है, इसलिए समय से पूर्व ऑपरेशन करना पड़ेगा। ऑपरेशन थियेटर के बाहर सिद्धार्थ और मेनका सांस रोके खड़े थे। ऊपर वाले की कृपा से एक सुंदर, स्वस्थ बच्ची का जन्म हुआ। परंतु बच्ची के जन्म के साथ ही अवंतिका की जीवन-डोर टूटने लगी।
अवंतिका को जब होश आया, तो उसने अपनी कांपती हुई उंगलियों से मेनका का हाथ पकड़ा। उसने अपनी नवजात बच्ची को देखने की अंतिम इच्छा जताई। मेनका ने रोते हुए बच्ची को उसकी छाती से लगाया। अवंतिका ने बच्ची के माथे को चूमा, उसके आंसुओं की बूंदें बच्ची के गालों पर गिर पड़ीं। उसने लड़खड़ाती आवाज में कहा, “मेनका… मेरी गुड़िया… मेरे आरव को… और इस नन्हीं जान को… अपनी छांव देना। सिद्धार्थ को कभी अकेला मत पड़ने देना…”
और इसके साथ ही, अवंतिका की सांसों की गति थम गई। मॉनिटर पर चलती सीधी रेखा ने घोषित कर दिया कि वह इस नश्वर संसार को छोड़कर जा चुकी थी।
घर में कोहराम मच गया। सिद्धार्थ पूरी तरह टूट चुका था। वह दिन-रात बेसुध सा बैठा रहता। न अस्पताल जाने की सुध थी, न खुद के खाने-पीने की। ऐसे कठिन समय में मेनका ने अपने आंसुओं को पीकर एक अभूतपूर्व साहस का परिचय दिया। उसने चार दिन की बच्ची को चम्मच से दूध पिलाने से लेकर, चार साल के आरव को अपनी मां की कमी महसूस न होने देने तक, सब कुछ संभाला। वह एक पैर से लड़खड़ाती हुई पूरे घर में घूमती रहती, कभी बच्ची का डायपर बदलती, तो कभी आरव को लोरी गाकर सुलाती।
कुछ दिनों बाद सिद्धार्थ के माता-पिता गांव से आए। उन्होंने देखा कि मेनका जिस समर्पण से दोनों बच्चों को संभाल रही है, वह कोई सगी मां भी शायद ही कर पाती। सिद्धार्थ की मां ने एक दिन एकांत में अपने बेटे से कहा, “बेटा सिद्धार्थ, जीवन कभी रुकता नहीं है। अवंतिका चली गई, यह घाव कभी भर नहीं सकता। लेकिन इन मासूमों का क्या कसूर? तुम दिन भर अस्पताल में रहोगे, इन बच्चों को कौन संभालेगा? मेरी मानो तो मेनका से विवाह कर लो। वह इन बच्चों की मौसी ही नहीं, मां बन चुकी है। उसे अपनी अर्धांगिनी बना लो।”
सिद्धार्थ सन्न रह गया। उसके भीतर एक भारी द्वंद्व शुरू हो गया। उसने अपनी मां से कहा, “मां, यह आप क्या कह रही हैं? मेनका अवंतिका की बहन है। उसने अपनी पूरी जवानी, अपनी जिंदगी हमारे बच्चों के लिए दांव पर लगा दी है। वह कोई सामान्य लड़की नहीं, देवी जैसी है। मैं अपनी सुविधा के लिए, अपने बच्चों के पालन-पोषण के लिए उस पर विवाह का यह बोझ कैसे डाल सकता हूं? क्या यह उसके आत्मसम्मान के साथ अन्याय नहीं होगा? और लोग क्या कहेंगे कि उसने अपनी बहन की जगह ले ली?”
सिद्धार्थ कई दिनों तक इस मानसिक कशमकश में जलता रहा। उधर मेनका भी सब समझ रही थी। वह जानती थी कि समाज में एक अविवाहित लड़की का एक विधुर जीजा के घर में हमेशा रहना आसान नहीं होगा। रिश्तेदार तरह-तरह की बातें बनाने लगे थे।
एक रात, जब बच्ची बहुत रो रही थी और सिद्धार्थ उसे चुप कराने में असमर्थ हो रहा था, मेनका दौड़ती हुई आई। उसने बच्ची को गोद में लिया, सीने से लगाया और धीरे-धीरे थपथपाने लगी। कुछ ही पलों में बच्ची शांत होकर सो गई।
सिद्धार्थ ने मेनका के चेहरे को देखा। उसकी आंखों के नीचे काले घेरे पड़ चुके थे, चेहरे पर अत्यधिक थकान थी, मगर उसकी नजरों में उन बच्चों के लिए जो वात्सल्य और ममता थी, वह किसी भी सांसारिक स्वार्थ से परे थी। सिद्धार्थ की आंखें भर आईं। उसने हाथ जोड़ लिए और अत्यंत संकोच तथा याचना भरे स्वर में कहा, “मेनका, आज मैं तुमसे कुछ मांगना चाहता हूं, पर मेरे शब्द मेरा साथ नहीं दे रहे हैं। मैं जानता हूं कि मैं तुम्हारे त्याग और समर्पण के योग्य नहीं हूं। तुमने अपनी पूरी जिंदगी इन बच्चों की खातिर समर्पित कर दी है। क्या तुम… क्या तुम मुझे और इन दोनों अनाथ बच्चों को अपनाकर इस बिखरे हुए घर को एक नई जिंदगी दे सकती हो? क्या तुम इन बच्चों की औपचारिक रूप से मां और मेरी जीवनसंगिनी बनोगी?”
मेनका ने अपनी नजरें झुका लीं। उसके होठों पर एक बहुत ही शांत, करुणामयी मुस्कान उभरी। उसने धीरे से कहा, “जीजाजी… बच्चों की मां तो मैं उसी दिन बन गई थी जिस दिन दीदी ने अंतिम सांस ली थी। मैंने तो अपना जीवन इन्हीं की मुस्कान में समर्पित मान लिया था। पर क्या आपने कभी यह सोचा कि समाज की नजरों में मैं एक दिव्यांग स्त्री हूं, जिसे लोग सहानुभूति की दृष्टि से देखते हैं। क्या आप, जो इतने बड़े सम्मानित डॉक्टर हैं, सचमुच मुझे अपनी पत्नी के रूप में पूरे सम्मान के साथ स्वीकार कर पाएंगे? क्या यह रिश्ता केवल मजबूरी और बच्चों की देखभाल का समझौता बनकर तो नहीं रह जाएगा?”
सिद्धार्थ ने आगे बढ़कर मेनका के आंसुओं से भीगे हाथों को अत्यंत सम्मान और पवित्रता के साथ अपने दोनों हाथों में थाम लिया। उसकी आवाज में एक गहरा संकल्प था, “मेनका, शारीरिक पूर्णता से आत्मा की सुंदरता कहीं अधिक महान होती है। तुमने इस उजड़े हुए चमन को अपने वात्सल्य से फिर से सींचा है। तुम कोई मजबूरी का समझौता नहीं हो, तुम तो ईश्वर का भेजा हुआ वह साक्षात वरदान हो जिसने मुझे और मेरे बच्चों को जीवनदान दिया है। मैं वादा करता हूं कि तुम्हें इस घर में केवल पत्नी का ही नहीं, बल्कि उस देवी का दर्जा मिलेगा जिसने हमारी दुनिया को बिखरने से बचाया है।”
आरव, जो पास ही खड़ा यह सब देख रहा था, दौड़कर आया और मेनका की टांगों से लिपट गया, “छोटी मां! आप कहीं मत जाना, हम सब साथ रहेंगे।”
मेनका ने रोते हुए आरव को गले से लगा लिया और बच्ची को अपनी छाती से चिपका लिया। सिद्धार्थ ने भी उन तीनों को अपने मजबूत आलिंगन में समेट लिया। उस कमरे में फैली निराशा और शोक की धुंध छंट चुकी थी और एक नए, पवित्र रिश्ते का सवेरा हो रहा था।
समय का पहिया आगे बढ़ा। मेनका और सिद्धार्थ का विवाह अत्यंत सादगी के साथ संपन्न हुआ। समाज के संकीर्ण सोच वाले लोगों ने कानाफूसी करने का प्रयास किया, परंतु दोनों के अगाध विश्वास, सम्मान और प्रेम के आगे सारी बातें व्यर्थ सिद्ध हुईं। कुछ वर्षों बाद, सिद्धार्थ और मेनका ने मिलकर शहर के बाहरी इलाके में ‘अवंतिका मेमोरियल चैरिटेबल हॉस्पिटल’ की नींव रखी।
वहां हर रोज सैकड़ों गरीब और बेसहारा मरीजों का निःशुल्क इलाज होता था। अस्पताल के मुख्य द्वार पर अवंतिका की एक मुस्कुराती हुई प्रतिमा स्थापित थी, और अस्पताल का संचालन पूरी कर्मठता से मेनका संभालती थी। बच्चे बड़े हो रहे थे और वे अपनी मां मेनका को संसार की सबसे श्रेष्ठ मां मानते थे।
जिंदगी ने सिद्धार्थ से उसकी खुशियां छीनी थीं, परंतु नियति के उसी चक्रव्यूह से उसने त्याग, समझदारी और सच्चे समर्पण के बल पर एक ऐसा सुंदर संसार फिर से रच लिया, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए त्याग और कर्तव्य का जीवंत उदाहरण बन गया। दुख और सुख जीवन के दो पहलू हैं; जो अंधकार में भी उम्मीद का दीया जलाए रखता है, भोर की पहली किरण उसी के आंगन में दस्तक देती है।
क्या आपको लगता है कि समाज की परवाह किए बिना सिद्धार्थ और मेनका द्वारा लिया गया यह फैसला बच्चों के भविष्य और परिवार की मर्यादा के लिए सर्वथा उचित था? ऐसे संवेदनशील पारिवारिक हालातों में एक पुरुष और स्त्री को किस प्रकार निर्णय लेना चाहिए? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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