अहंकार की दरार

 कल्याणी जी ने प्राची के दोनों कंधों को अपनी हथेलियों से कसकर पकड़ा और उसकी आँखों में आँखें डालकर बहुत ही मार्मिक मगर तीखे स्वर में कहा, “प्राची! मैं न तो अपनी बहू की बेजा तरफदारी कर रही हूँ और न ही तुझसे कोई दुश्मनी निभा रही हूँ। मैं सिर्फ अपनी उस बेटी को सच का आईना दिखाना चाहती हूँ जिसकी आँखें ससुराल के पैसों की चमक में अंधी हो चुकी हैं।

  देवराज जी का परिवार एक मध्यवर्गीय मगर बेहद सम्मानित और संस्कारवान परिवार माना जाता था। उनके बड़े बेटे अर्पित की शादी को अभी मुश्किल से छह महीने ही बीते थे। घर की नई बहू सुनयना एक छोटे शहर के साधारण और सीधे-सादे शिक्षक परिवार से आई थी। रूप-रंग में सौम्य, चेहरे पर संकोच भरी मुस्कान और स्वभाव से इतनी भोली कि किसी की कड़वी बात का भी बुरा न माने। वह सुबह से शाम तक पूरे घर को सहेजने, अपनी सास कल्याणी जी की सेवा करने और रसोई का काम सीखने में जुटी रहती थी।

अर्पित की एक छोटी बहन थी, जिसका नाम प्राची था। प्राची बचपन से ही पूरे घर की लाडली रही थी। देवराज जी और कल्याणी जी ने अपनी सामर्थ्य से बढ़कर प्राची की हर छोटी-बड़ी ख्वाहिश को पूरा किया था। लगभग दो साल पहले प्राची का ब्याह रायपुर के एक बहुत बड़े उद्योगपति घराने के इकलौते बेटे समर के साथ हुआ था। समर का परिवार करोड़ों का व्यापार करता था। बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ, नौकर-चाकर, विदेशों की यात्राएँ और महंगे डिजाइनर कपड़े—शादी के बाद प्राची का रहन-सहन रातों-रात पूरी तरह बदल गया था। ससुराल की इस बेहिसाब दौलत और विलासिता ने प्राची के भीतर अनजाने में ही एक गहरा अहंकार भर दिया था। वह जब भी मायके आती, अपने ससुराल की रईसी की डींगें हाँकना और मायके के मध्यमवर्गीय तौर-तरीकों में नुक्स निकालना उसकी आदत बन चुका था।

इस बार प्राची पूरे आठ महीने बाद अपने मायके आई थी। उसके आने से घर में खुशी का माहौल था। अर्पित और कल्याणी जी ने उसके स्वागत में कोई कमी नहीं छोड़ी। सुनयना ने भी अपनी ननद की पसंद की सारी मिठाइयाँ और पकवान अपने हाथों से बनाए थे। प्राची अपने साथ तीन बड़े-बड़े विदेशी सूटकेस लेकर आई थी, जो महंगे ब्रांडेड कपड़ों, इत्र, घड़ियों और सोने-हीरे के आभूषणों से भरे हुए थे। वह घर के हर सदस्य को यह बताना नहीं भूलती थी कि उसकी कौन सी साड़ी कितने हज़ार की है और उसका बैग किस अंतरराष्ट्रीय डिज़ाइनर का है। सुनयना बड़े अचरज और सादगी से उसकी बातें सुनती और मन ही मन खुश होती कि उसकी ननद इतने बड़े और सुखी घराने में ब्याही गई है।

प्राची के आने के तीसरे दिन की दोपहर थी। अर्पित अपने ऑफिस में थे और ससुर देवराज जी पास के पुस्तकालय गए हुए थे। कल्याणी जी बैठक में बैठकर रामायण का पाठ कर रही थीं। प्राची अपनी किसी सहेली से मिलने पास के कैफे गई हुई थी। घर में चारों तरफ दोपहर की नीरवता छाई हुई थी। सुनयना प्राची के कमरे में चादर बदलने और झाड़ू लगाने के लिए गई। कमरा अस्त-व्यस्त पड़ा था। प्राची का एक बड़ा लेदर का ट्रैवल बैग बेड पर खुला पड़ा था और उसके ऊपर कुछ कपड़े और डिब्बे बिखरे थे।

जब सुनयना बेडशीट समेट रही थी, तभी बैग के खुले हुए हिस्से से एक बहुत ही खूबसूरत और अनोखा क्लच पर्स फर्श पर गिर पड़ा। उस पर्स पर बेहद बारीक नक्काशी की गई थी, मोतियों और नगीनों का ऐसा महीन काम था जो सुनयना ने अपनी ज़िंदगी में कभी नहीं देखा था। धूप की किरणें जब खिड़की से आकर उस पर्स पर पड़ रही थीं, तो वह सतरंगी आभा से जगमगा रहा था। सुनयना ने बड़े कौतूहल और मुग्ध भाव से उस पर्स को हाथ में उठा लिया। उसकी उंगलियाँ उस पर्स की बनावट को छूने लगीं। उसके मन में कोई लालच या चोरी का मैल नहीं था, बस एक साधारण लड़की का आश्चर्य था जो किसी सुंदर कलाकृति को देखकर दंग रह जाती है।

सुनयना ने सोचा कि माँ जी को भी यह पर्स ज़रूर दिखाना चाहिए कि ननद के पास कितनी प्यारी चीज़ है। वह पर्स को दोनों हाथों में बड़े आदर से थामे हुए बैठक की तरफ बढ़ी।

तभी मुख्य दरवाज़ा खुला और प्राची बाहर से अंदर आई। जैसे ही प्राची की नज़र सुनयना के दोनों हाथों में थमे उस चमचमाते पर्स पर पड़ी, प्राची के माथे पर त्योरियाँ चढ़ गईं। उसका चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। उसने एक पल भी नहीं सोचा, न ही कोई सवाल किया।

प्राची ने एक झटके में आगे बढ़कर सुनयना के हाथ से वह पर्स छीन लिया और चीख पड़ी, “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे कमरे में घुसकर मेरा बैग टटोलने की? तुम्हें शर्म नहीं आती दूसरों के सामान पर हाथ साफ करते हुए? यह पर्स इटली का ऑरिजिनल ब्रांडेड पीस है, इसकी कीमत तुम्हारी पूरी अलमारी के कपड़ों से भी ज़्यादा है! इसे चुराकर कहाँ ले जा रही थीं तुम?”

सुनयना के पैरों तले से मानो ज़मीन खिसक गई। ‘चोरी’ शब्द उसके कानों में किसी गरम सीसे की तरह पिघल कर उतरा। उसका पूरा शरीर कांपने लगा। उसकी आँखें आंसुओं से भर आईं और होंठ थरथराने लगे।

उसने हाथ जोड़ते हुए रुंधे गले से कहा, “नहीं दीदी… भगवान के लिए ऐसा मत कहिए। मैं चोरी नहीं कर रही थी। मैं तो बस आपका कमरा साफ कर रही थी, यह पर्स नीचे गिर गया था। यह देखने में इतना सुंदर लगा कि मैं बस माँ जी को दिखाने बैठक में ला रही थी। मुझे माफ कर दीजिए, मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई… आई एम सॉरी दीदी, मुझे आपका सामान नहीं छूना चाहिए था।”

लेकिन प्राची का अहंकार उस वक्त सातवें आसमान पर था। उसने सुनयना के आंसुओं और उसकी माफी को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया। वह और तेज़ आवाज़ में चिल्लाने लगी, “बस करो यह रोने का ढोंग! मुझे पता है तुम जैसी छोटे घरों की लड़कियों की नीयत कैसी होती है। अमीर ससुराल की चीजें देखकर लार टपकने लगती है। माँ जी को दिखाने जा रही थी या अपने बक्से में छिपाने? अगर मैं दो मिनट देर से आती तो यह पर्स तुम्हारी अलमारी में होता। मेरे भाई की किस्मत ही खराब थी जो इस घर में ऐसी गिरी हुई सोच वाली औरत को ब्याह कर ले आए!”

बैठक में पाठ कर रहीं कल्याणी जी शोर सुनकर घबराकर बाहर आईं। उन्होंने देखा कि सुनयना फर्श पर बैठी दोनों हाथों से अपना मुँह छिपाकर हिचकियाँ ले-लेकर रो रही थी और प्राची गुस्से में कांपते हुए ज़हर उगल रही थी।

“क्या हो गया प्राची? यह क्या अनर्थ बोल रही है तू? इतना कोहराम क्यों मचा रखा है?” कल्याणी जी ने डांटते हुए पूछा।

प्राची ने गुस्से में पर्स लहराते हुए कहा, “माँ, अपनी इस लाडली संस्कारी बहू के करतूत देखो! मेरे बंद कमरे से मेरा लाख रुपये का पर्स चुराकर ले जा रही थी। रंगे हाथों पकड़ा है मैंने इसे। अब यहाँ एक पल भी मेरा दम घुटता है। जिस घर में मेरी चीज़ें सुरक्षित नहीं हैं, जहाँ की बहू चोर हो, वहाँ मैं नहीं रह सकती। मैं अभी इसी वक्त अपनी गाड़ी बुलवाती हूँ और अपने ससुराल रायपुर लौट रही हूँ। मेरे ससुराल में इज़्ज़त है, नौकर भी बिना पूछे किसी चीज़ को हाथ नहीं लगाते!”

इतना कहकर प्राची तमतमाते हुए अपने कमरे में गई और धड़ाधड़ अलमारी से अपने कपड़े निकालकर सूटकेस में ठूंसने लगी। वह गुस्से में बड़बड़ाए जा रही थी। सुनयना वहीं बैठक के कोने में सिर झुकाए सिसक रही थी, मानो उस पर बिजली गिर गई हो।

कल्याणी जी कुछ देर तक स्तब्ध खड़ी रहीं। फिर उन्होंने एक गहरी साँस ली। उनके चेहरे पर दुख और एक सख्त माँ का संकल्प साफ दिखाई दे रहा था। वे धीरे-धीरे कदमों से प्राची के कमरे में गईं। प्राची गुस्से में ज़ोर-ज़ोर से बैग की ज़िप बंद कर रही थी।

कल्याणी जी ने आगे बढ़कर प्राची का हाथ पकड़ लिया और बड़े सधे हुए, गंभीर स्वर में कहा, “बस कर बेटा… इतना अहंकार अच्छा नहीं है। क्या ही बिगड़ जाएगा अगर तू अपनी समझदारी दिखाकर उसे माफ़ कर देगी? ज़रा सोच तो सही कि तू बोल क्या रही है।”

प्राची ने झटके से अपना हाथ छुड़ाया और कड़वाहट से बोली, “माँ, तुम भी मुझे ही समझा रही हो? मुझे डांट रही हो? आखिर तुमने भी आज साबित कर ही दिया कि बहू के घर में आ जाने के बाद बेटी का मायका, मायका नहीं रह जाता! पराए घर की लड़की तुम्हारे लिए अपनी हो गई और अपनी कोख से जन्मी बेटी पराई हो गई ना?”

कल्याणी जी ने प्राची के दोनों कंधों को अपनी हथेलियों से कसकर पकड़ा और उसकी आँखों में आँखें डालकर बहुत ही मार्मिक मगर तीखे स्वर में कहा, “प्राची! मैं न तो अपनी बहू की बेजा तरफदारी कर रही हूँ और न ही तुझसे कोई दुश्मनी निभा रही हूँ। मैं सिर्फ अपनी उस बेटी को सच का आईना दिखाना चाहती हूँ जिसकी आँखें ससुराल के पैसों की चमक में अंधी हो चुकी हैं। तेरी भाभी सीधी-सादी है, उसने दुनियादारी और ये बड़े-बड़े विदेशी ब्रांड्स नहीं देखे। उसने ज़िंदगी में कभी इतनी चमक-दमक वाली चीज़ नहीं देखी थी। उसे वह पर्स सुंदर लगा, तो वह एक मासूम बच्चे की तरह दौड़कर मुझे दिखाने आ रही थी। उसके हाथ में पर्स देखकर तूने बिना सोचे-समझे उसे चोर बना दिया? तूने एक बार भी सोचा कि तू किस पर कीचड़ उछाल रही है?”

प्राची ने मुँह बिचकाते हुए कहा, “तो क्या बिना पूछे किसी की चीज़ छूना सही है?”

“गलती छूने की हो सकती है, पर नीयत में खोट नहीं था!” कल्याणी जी ने आवाज़ को और कड़ा करते हुए कहा, “उस बेचारी ने दस बार तेरे आगे हाथ जोड़े, सौ बार ‘सॉरी’ बोला, अपने आँसुओं से तेरे पैर धो दिए, लेकिन तेरे इस पत्थर जैसे घमंड ने एक बार भी उस पर तरस नहीं खाया। तूने उसे क्या-क्या नहीं सुनाया? उसके मायके की गरीबी का मज़ाक उड़ाया, उसके संस्कारों को नीचा दिखाया। और अब इतनी सी बात पर तू पूरे घर में आग लगाकर ससुराल भागने की धमकी दे रही है?”

कल्याणी जी की आँखों में आँसू छलक आए, उन्होंने भर्राए गले से कहा, “बेटा, हमने तेरी शादी इतने बड़े और उच्च घराने में इसलिए की थी ताकि हमारी फूल जैसी बच्ची को दुनिया का हर सुख मिले, हर ऐशो-आराम मिले। हमने कभी यह नहीं सोचा था कि उस घर की दौलत तुझे इतना क्रूर और अहंकारी बना देगी कि तू रिश्तों की कीमत ही भूल जाएगी। ज़रा एक पल के लिए अपनी इस अमीरी के नशे से बाहर निकल और सोच… शाम को जब तेरा भाई अर्पित थका-हारा दफ़्तर से लौटेगा, और उसे पता चलेगा कि जिस बहन को उसने अपनी पलकों पर बिठाकर पाला, जिसके ब्याह के लिए उसने अपनी खुशियाँ तक गिरवी रख दी थीं, उसी नाजों से पली बहन ने उसकी सीधी-सादी पत्नी के चरित्र पर चोरी का कलंक लगा दिया है… तो उसके दिल पर क्या गुज़रेगी? क्या कभी सोचा है तूने?”

प्राची के हाथ वहीं थम गए। कल्याणी जी के इन शब्दों ने उसके सीने पर हथौड़े की तरह वार किया था।

कल्याणी जी ने आगे कहा, “याद रख प्राची, तिजोरी में रखे ब्रांडेड कपड़े, हीरे-मोती और विदेशी गाड़ियाँ इंसान को बड़ा नहीं बनातीं। इंसान बड़ा बनता है अपने दिल के बड़प्पन से, अपने संस्कारों से और अपनों को माफ करने की क्षमता से। अगर आज तू इस झूठे घमंड में इस घर की चौखट लांघकर चली गई, तो कल जब तू पीछे मुड़कर देखेगी, तो तुझे यहाँ कोई अपना नहीं मिलेगा। रिश्ते एक बार टूट जाएँ तो फिर कभी किसी ब्रांडेड धागे से नहीं जुड़ते। अपने इस अहंकार के जहर को यहीं थूक दे, और जाकर अपनी उस भाभी से नज़रें मिला जिसने तेरे आने पर तीन रातों से अपनी नींद कुर्बान कर रखी थी।”

माँ के ये शब्द किसी दिव्य प्रकाश की तरह प्राची के अंतर्मन में उतर गए। उसके दिमाग से वह सारा खोखला नशा एक पल में काफूर हो गया। उसे अपनी आँखों के सामने सुनयना का वह भीगा हुआ, कांपता हुआ मासूम चेहरा और उसके जुड़े हुए हाथ दिखाई देने लगे। प्राची को याद आया कि कैसे सुनयना रोज़ सुबह उसके उठने से पहले उसके लिए गरम पानी और बादाम रखती थी, कैसे उसकी हर छोटी आदत का ध्यान रखती थी। और बदले में उसने क्या दिया? केवल अपनी दौलत की हनक और अपमान के तीखे तीर!

प्राची का अहंकार पूरी तरह टूटकर बिखर चुका था। उसके हाथों से वह बैग छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा। उसकी आँखों से पश्चाताप के आँसू अविरल बहने लगे।

वह बिना एक शब्द बोले अपने कमरे से बाहर निकली। बैठक में सुनयना अभी भी खिड़की के पास एक खंभे की ओट में खड़ी अपनी सिसकियाँ दबाने की कोशिश कर रही थी। उसका चेहरा रो-रोकर सूज चुका था।

प्राची तेज़ी से कदमों से सुनयना के पास पहुँची। सुनयना ने डर के मारे अपनी नज़रें और झुका लीं, उसे लगा कि ननद शायद फिर से कुछ खरी-खोटी सुनाने आई है। लेकिन अगले ही पल जो हुआ, उसकी कल्पना सुनयना ने कभी नहीं की थी।

प्राची ने आगे बढ़कर सुनयना के दोनों हाथ अपने हाथों में थाम लिए और फूट-फूट कर रो पड़ी, “भाभी… मुझे माफ कर दो! भगवान के लिए मुझे माफ कर दो। मैं अपनी दौलत और घमंड में इतनी अंधी हो गई थी कि मैंने आपकी उस निस्वार्थ ममता और सादगी का अपमान कर दिया। मैं भूल गई थी कि आप मेरे भैया का सम्मान हैं, इस घर की लक्ष्मी हैं। मैंने आपको चोर कहा, जबकि असल में चोर तो मैं हूँ जिसने अपने अहंकार से आपके दिल का चैन चुरा लिया। प्लीज़ भाभी, मुझे अपनी छोटी बहन समझकर एक बार माफ कर दो।”

सुनयना ने जब अपनी ननद को इस तरह बिलखते और अपने आगे झुकते देखा, तो उसका कोमल हृदय एक पल में पिघल गया। उसने बिना किसी शिकवे, बिना किसी शिकायत के प्राची को अपने सीने से लगा लिया। दोनों ननद-भाभी एक-दूसरे के गले लगकर रोने लगीं।

सुनयना ने प्राची की पीठ सहलाते हुए कहा, “दीदी, आप ऐसा मत कहिए। आप इस घर की लाडली हैं। मुझसे गलती हुई थी कि मैंने बिना पूछे आपका सामान छुआ। आप मुझसे नाराज़ हो सकती हैं, लेकिन कभी इस घर से मुँह मोड़कर जाने की बात मत कहिएगा। आप खुश रहेंगी तभी तो यह मायका खुश रहेगा।”

कमरे के दरवाज़े पर खड़ी कल्याणी जी की आँखों से भी खुशी के आँसू बह निकले। उन्होंने देखा कि ममता और संस्कारों की डोर ने अहंकार की उस भयानक दरार को हमेशा के लिए भर दिया था। उस शाम जब अर्पित दफ़्तर से लौटे, तो उन्होंने देखा कि रसोई में दोनों ननद-भाभी एक साथ हँसते-खिलखिलाते हुए शाम की चाय और नाश्ता तैयार कर रही थीं। घर के उस पुराने आँगन में अब कोई कड़वाहट नहीं थी, बल्कि रिश्तों की वह सोंधी और पवित्र महक थी जो किसी भी सांसारिक दौलत से कहीं अधिक कीमती होती है।

ससुराल की संपन्नता और भौतिक साधनों की चमक कभी-कभी इंसान की आँखों पर ऐसा पर्दा डाल देती है कि वह अपने ही मायके के निस्वार्थ प्रेम और सादगी को भूल बैठता है। क्या आपकी नज़रों में भी किसी बहू या ननद के रिश्ते को बचाने के लिए एक माँ का निष्पक्ष होना और सही समय पर सही सीख देना सबसे ज़रूरी होता है? अपनी राय और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर ज़रूर साझा करें।

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