“आप इतने बदल कैसे गए? मेरा मतलब है… मैंने कभी सोचा नहीं था कि आप मेरा इतना खयाल रखेंगे। मुझे तो लगता था कि आपको कोई फर्क ही नहीं पड़ता कि मैं हूं या नहीं।”
विवान के हाथ पल भर के लिए रुक गए। उसने गहरी सांस ली और सुमेधा की आंखों में देखते हुए कहा, “सुमेधा, मुझे पता है मैं दुनिया का सबसे अच्छा पति नहीं हूं। मुझे तुम्हारी सहेलियों के पतियों की तरह बड़े-बड़े गिफ्ट्स लाने नहीं आते। मुझे मीठी बातें बनानी नहीं आतीं। मैं अपनी दुनिया में इतना खोया रहता हूं कि अक्सर भूल जाता हूं कि मेरी दुनिया तुम ही हो।
सुमेधा हमेशा से ही कहानियों और कविताओं की दीवानी रही थी। बचपन से ही उसने अपने ख्यालों में एक ऐसे जीवनसाथी की कल्पना की थी जो उसे गुलाब लाकर दे, उसके बिना कहे उसके मन की बातें पढ़ ले और हर छोटी-बड़ी खुशी में उसे खास महसूस करवाए। लेकिन कहते हैं ना, असल ज़िंदगी और किताबों की दुनिया में बहुत फासला होता है। सुमेधा की शादी को आठ साल हो चुके थे। उसका पति, विवान, एक बेहद व्यावहारिक और चुपचाप रहने वाला इंसान था। एक सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करने वाले विवान की ज़िंदगी लैपटॉप, मीटिंग्स और ऑफिस के टारगेट्स के इर्द-गिर्द ही घूमती थी।
शादी के शुरुआती दिनों में सुमेधा ने बहुत कोशिश की कि विवान भी फिल्मों के नायकों की तरह कुछ रोमांटिक करे। कभी वह उसकी पसंद का खाना बनाती, कभी वीकेंड पर घूमने जाने की ज़िद करती। विवान कभी मना नहीं करता था, लेकिन उसकी तरफ से कभी कोई पहल भी नहीं होती थी। सुमेधा के लिए तो सरप्राइज़ गिफ्ट या एनिवर्सरी पर रोमांटिक डिनर जैसी बातें किसी सपने जैसी थीं। जब उसकी सहेलियां सोशल मीडिया पर अपने पतियों द्वारा दिए गए महंगे गिफ्ट्स या सरप्राइज़ ट्रिप्स की तस्वीरें डालतीं, तो सुमेधा के दिल में एक अजीब सी टीस उठती थी। वह सोचती, “क्या मेरी किस्मत में बस यही एक मशीन की तरह चलने वाली ज़िंदगी लिखी है? क्या विवान मुझसे प्यार नहीं करते, या उनके लिए मेरी अहमियत सिर्फ एक केयरटेकर जितनी है?”
समय के साथ सुमेधा ने शिकायत करना बंद कर दिया था। उसने मान लिया था कि उसका वैवाहिक जीवन एक शांत नदी की तरह है, जिसमें कोई लहरें नहीं हैं, बस एक ठहराव है। वह घर संभालती, विवान की हर ज़रूरत का खयाल रखती और बदले में एक ऐसे इंसान के साथ ज़िंदगी गुज़ार रही थी जो शायद ही कभी उसकी तारीफ करता हो। “ये शर्ट अच्छी लग रही है,” या “खाना बहुत स्वादिष्ट बना है,” जैसे शब्द विवान की डिक्शनरी में थे ही नहीं। सुमेधा कभी-कभी सोचती कि अगर वो रूठ जाए, तो क्या विवान उसे मनाएगा? जवाब हमेशा न में ही मिलता, क्योंकि विवान को तो शायद पता भी नहीं चलता था कि वो रूठी हुई है।
दिन ऐसे ही बीत रहे थे। नवंबर का महीना था और ठंड ने अपनी दस्तक दे दी थी। घर में साफ-सफाई का काम चल रहा था। सुमेधा सुबह से ही काम में जुटी थी। उसे सीढ़ियों के ऊपर वाले छज्जे से कुछ पुराने बक्से उतारने थे। विवान अपने कमरे में ऑफिस की एक ज़रूरी वीडियो कॉल पर था। सुमेधा ने स्टूल लगाया और एक भारी बक्सा उतारने लगी। अचानक उसका पैर फिसला। वह संभल नहीं पाई और सीधे धड़ाम से नीचे मार्बल के फर्श पर आ गिरी।
गिरते ही उसके मुंह से एक तेज़ चीख निकल गई। उसके दाहिने पैर के टखने में ऐसा दर्द उठा जैसे किसी ने हथौड़ा मार दिया हो। वह वहीं ज़मीन पर बैठ गई और दर्द से तड़पने लगी। उसकी चीख सुनकर विवान दौड़ता हुआ कमरे से बाहर आया। सुमेधा ने आंखें मींच लीं। उसे लगा कि अब विवान कहेगा, “तुम्हें ध्यान से काम नहीं करना चाहिए था? पता था ना मैं मीटिंग में हूं।” उसे विवान की डांट सुनने की आदत सी हो गई थी।
लेकिन जो हुआ, उसने सुमेधा को हैरान कर दिया।
विवान के चेहरे पर ऐसी घबराहट थी जो सुमेधा ने आठ सालों में कभी नहीं देखी थी। उसका हमेशा शांत और भावहीन रहने वाला चेहरा उस वक्त डर से पीला पड़ गया था। “सुमेधा! क्या हुआ? कहां लगी?” कहते हुए वह ज़मीन पर उसके पास बैठ गया।
“पैर… पैर में बहुत दर्द है, उठा नहीं जा रहा,” सुमेधा ने रोते हुए कहा।
बिना एक पल गंवाए विवान ने उसे अपनी बांहों में उठा लिया। सुमेधा स्तब्ध रह गई। शादी के बाद शायद यह पहला मौका था जब विवान ने उसे इस तरह गोद में उठाया था। उसे अपनी शादी का वो दिन याद आ गया जब विवान ने जयमाला के वक्त उसका हाथ थामा था। आज भी विवान के हाथों में वही गर्माहट थी, बल्कि आज उसमें एक सुरक्षा का एहसास ज्यादा था।
विवान ने उसे कार की फ्रंट सीट पर बहुत सावधानी से बैठाया, सीट बेल्ट लगाई और खुद भी जल्दी से ड्राइविंग सीट पर आ गया। अस्पताल के रास्ते भर विवान ने उसका हाथ मजबूती से थामे रखा। “कुछ नहीं होगा सुमेधा, हम बस पहुंच रहे हैं। हिम्मत रखो,” विवान की आवाज़ कांप रही थी। सुमेधा अपने दर्द के बावजूद विवान के इस रूप को देखकर अचंभित थी। जिस इंसान को कभी उसके सजने-संवरने का एहसास नहीं होता था, उसे आज उसकी एक खरोंच से इतना दर्द हो रहा था?
अस्पताल पहुंचकर डॉक्टर ने एक्स-रे किया और बताया कि टखने में गंभीर फ्रैक्चर है। प्लास्टर चढ़ाना पड़ेगा और कम से कम तीन हफ्ते का पूरा बेड रेस्ट रहेगा। डॉक्टर जब यह बता रहे थे, तब विवान सुमेधा के पास ही खड़ा था। उसने डॉक्टर से इतने सवाल पूछे कि सुमेधा देखती ही रह गई—”डॉक्टर साहब, दर्द की दवा कौन सी सबसे अच्छी रहेगी? इन्हें खाने में क्या देना है? क्या पैर को तकिये पर रखना होगा?”
घर वापस आने के बाद विवान ने सुमेधा को बेडरूम में लेटाया। उसने खुद सारे तकिये सेट किए, उसे रजाई ओढ़ाई और ऑफिस में फोन करके कह दिया कि वह अगले एक हफ्ते तक छुट्टी पर है और कोई बहुत ज़रूरी काम हो तभी उसे डिस्टर्ब किया जाए। सुमेधा अपनी आंखों पर विश्वास नहीं कर पा रही थी।
“तुम्हें छुट्टी लेने की क्या ज़रूरत थी? कोई मेड बुला लेते या पड़ोस की आंटी को बोल देते,” सुमेधा ने संकोच करते हुए कहा।
विवान ने उसकी तरफ देखा, उसकी आंखों में एक अजीब सी नरमी थी। “मेड तुम्हारा उस तरह से खयाल नहीं रख सकती जैसे मैं रख सकता हूं। और मुझे किसी और पर भरोसा नहीं है।”
अगले कुछ दिन सुमेधा के लिए किसी अचरज भरे सपने से कम नहीं थे। विवान सुबह जल्दी उठता। वह किचन में जाकर यूट्यूब पर वीडियो देखकर नाश्ता बनाता। जो इंसान कभी अपने हाथ से एक गिलास पानी नहीं लेता था, वो आज सूजी का चीला और ओट्स बना रहा था। दोपहर में वह सुमेधा को दवाइयां देता, उसके बालों में कंघी करता और उसे बोरियत न हो इसलिए उसके साथ बैठकर उसकी पसंद के पुराने टीवी सीरियल्स देखता।
एक रात सुमेधा को पैर में बहुत दर्द हो रहा था। वह करवटें बदल रही थी। विवान जाग गया। उसने बिना कुछ कहे बाम निकाला और बहुत हल्के हाथों से सुमेधा के पैर की मालिश करने लगा।
“रहने दीजिए, मैं ठीक हूं,” सुमेधा ने कहा।
“चुपचाप लेटी रहो। मुझे पता है तुम्हें दर्द हो रहा है,” विवान ने कहा।
कमरे में हल्की सी पीली रोशनी थी। सुमेधा ने हिम्मत करके पूछ ही लिया, “विवान, एक बात पूछूं?”
“हम्म, पूछो।”
“आप इतने बदल कैसे गए? मेरा मतलब है… मैंने कभी सोचा नहीं था कि आप मेरा इतना खयाल रखेंगे। मुझे तो लगता था कि आपको कोई फर्क ही नहीं पड़ता कि मैं हूं या नहीं।”
विवान के हाथ पल भर के लिए रुक गए। उसने गहरी सांस ली और सुमेधा की आंखों में देखते हुए कहा, “सुमेधा, मुझे पता है मैं दुनिया का सबसे अच्छा पति नहीं हूं। मुझे तुम्हारी सहेलियों के पतियों की तरह बड़े-बड़े गिफ्ट्स लाने नहीं आते। मुझे मीठी बातें बनानी नहीं आतीं। मैं अपनी दुनिया में इतना खोया रहता हूं कि अक्सर भूल जाता हूं कि मेरी दुनिया तुम ही हो। जब तुम उस दिन सीढ़ियों से गिरीं और मैंने तुम्हें दर्द में देखा… मुझे लगा जैसे मेरी सांस ही रुक गई हो। मुझे एहसास हुआ कि मैं तुम्हारे बिना एक दिन भी नहीं गुज़ार सकता। तुम इस घर की आत्मा हो सुमेधा। मैं प्यार जताना नहीं जानता, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं तुमसे प्यार नहीं करता।”
सुमेधा की आंखों से आंसू छलक पड़े। ये दुख के नहीं, उस अथाह खुशी के आंसू थे जिसके लिए वह आठ साल से तरस रही थी। उसने विवान का हाथ पकड़ लिया।
अगली सुबह विवान सुमेधा के लिए चाय और सैंडविच लेकर आया।
“ये सैंडविच मैंने खुद बनाए हैं, हालांकि तुम्हारे जितने क्रिस्पी नहीं हैं, पर खाकर देखो,” विवान ने मुस्कुराते हुए कहा।
सुमेधा ने सैंडविच का एक टुकड़ा खाया और चाय का घूंट भरा। “दुनिया के सबसे बेहतरीन सैंडविच हैं ये,” उसने कहा।
उस दिन सुमेधा ने मन ही मन सोचा कि ज़िंदगी में कभी-कभी बीमार होना या चोटिल होना भी कितना अच्छा होता है। यह दर्द उसे वो एहसास दे गया था, जो शायद सालों की अच्छी सेहत उसे कभी नहीं दे पाती। उसे समझ आ गया था कि प्यार सिर्फ महंगे तोहफों, गुलाब के फूलों या आई लव यू कहने में नहीं होता। असली प्यार तो उस परवाह में छिपा होता है जो ज़रूरत के वक्त बिना मांगे मिल जाए। विवान का प्यार किताबों वाला नहीं था, लेकिन वो सच्चा था, गहरा था और सिर्फ उसका था।
आज जब सुमेधा अपने प्लास्टर वाले पैर को देखती है, तो उसे दर्द नहीं होता, बल्कि उसे विवान की वो चिंता, वो खामोश प्यार और वो एहसास याद आता है जिसने उनके रिश्ते को एक नई ज़िंदगी दे दी थी। वाकई, कभी-कभी कुछ रिश्ते टूटने के बाद ही असली मायने में जुड़ते हैं।
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