अंकिता ने आंसुओं से भीगा चेहरा उठाया और विवेक के सामने हाथ जोड़ दिए, “विवेक, मुझे सजा दे लो, मुझे जो कहना है कह लो। लेकिन मुझे आज समझ आया है कि अपनी संतान से दूर होने का दर्द क्या होता है। जब मेरा बेटा मुझसे एक दिन बात नहीं कर रहा तो मेरी जान हलक में आ गई है, सोचो उस बूढ़े पिता पर क्या गुजरी होगी जिसने अपने जिगर के टुकड़े को अपने हाथों से विदा कर दिया! चलो विवेक, हम दोनों अभी हरिद्वार चलेंगे। मैं बाबूजी के पैरों में गिरकर अपनी गलतियों की माफी मांगूंगी। अगर वो नहीं लौटे, तो मैं भी वहीं उनके चरणों में बैठ जाऊंगी।”
सोफे पर बैठे विवेक के लैपटॉप के कीबोर्ड की खट-खट गूंज रही थी। विवेक आईटी कंपनी में ऊंचे ओहदे पर था, पर काम के बोझ और अंदरूनी खालीपन ने उसके चेहरे की रौनक छीन ली थी।
तभी उसकी पत्नी अंकिता दबे पांव आई और उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बहुत ही मुलायम आवाज में बोली, “विवेक, ज़रा मेरी बात सुनिए ना…”
विवेक ने बिना स्क्रीन से नजरें हटाए चिड़चिड़ाते हुए जवाब दिया, “हां, अंकिता! सुन रहा हूं। कान मेरे बिल्कुल सही सलामत हैं। जो भी कहना है जल्दी बोलो, अगली मीटिंग के लिए मेरे पास बिल्कुल वक्त नहीं है।”
अंकिता ने एक गहरी सांस ली और उसका हाथ पकड़ते हुए बोली, “विवेक, तुम तो हर वक्त घड़ी की सुइयों पर भागते रहते हो। मशीन को भी कभी-कभार ठंडा होने का वक्त चाहिए होता है। खैर, मैं एक जरूरी बात कह रही थी… क्यों ना हम बाबूजी को वापस अपने घर ले आएं? अब उनका बुढ़ापा है, उन्हें हमारे साथ ही रहना चाहिए।”
विवेक की उंगलियां कीबोर्ड पर अचानक थम गईं। उसने अपना सिर उठाया और अंकिता की आंखों में देखा। उसकी नम आंखों में अविश्वास, दर्द और आक्रोश का एक अजीब सा संगम था।
विवेक ने कड़वाहट से मुस्कुराते हुए कहा, “अंकिता! आज पूरे सात साल बाद तुम्हें अचानक मेरे बाबूजी की याद कैसे आ गई? यह वही बाबूजी हैं ना, जिनकी मौजूदगी से इस घर में तुम्हारा दम घुटता था? मुझे उनसे अलग करने के लिए, उन्हें नीचा दिखाने के लिए क्या-क्या पैंतरे नहीं आजमाए तुमने? अंत में बाबूजी ने जब देखा कि उनके रहने से उनके इकलौते बेटे की बसी-बसाई गृहस्थी बिखर रही है, तो उन्होंने खुद ही अपने कदम पीछे खींच लिए। वो शांति निकेतन वृद्धाश्रम चले गए ताकि मेरे घर में शांति रह सके। तुम्हें क्या लगता है, एक पिता के लिए अपने ही बनाए घर को छोड़ना, अपने बेटे से दूर अजनबियों के बीच रहना आसान रहा होगा?”
अंकिता की नजरें झुक गईं। उसने झिझकते हुए कहा, “विवेक, प्लीज पुरानी बातों को मत कुरेदो। जो हो गया सो हो गया, अब गड़े मुर्दे उखाड़ने से क्या फायदा? मैं सच कह रही हूं, मैं दिल से चाहती हूं कि बाबूजी अब हमारे साथ रहें।”
विवेक ने उसकी आंखों में गहराई से झांकते हुए पूछा, “कहीं इस दिखावे के पीछे भी तुम्हारा कोई नया स्वार्थ तो नहीं छिपा है? मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूं अंकिता, बिना मतलब के तो तुम कभी किसी से प्यार से बात भी नहीं करतीं। सच बताओ, माजरा क्या है?”
अंकिता की आंखें छलक पड़ीं। उसने आहत होकर कहा, “विवेक, मुझे नहीं मालूम था कि तुम्हारी नजरों में मेरी इतनी गिरी हुई तस्वीर है। आज बात मेरे अपने बेटे आरव की है। उसने कल शाम से खाना-पीना छोड़ रखा है। कमरे का दरवाजा बंद करके बैठा है और बस एक ही जिद लगाए है कि जब तक उसके दादू घर वापस नहीं आएंगे, वह न तो स्कूल जाएगा और न ही एक निवाला खाएगा।”
विवेक ने एक ठंडी सांस भरी और कुर्सी से उठते हुए बोला, “तुम्हें क्या लगता है अंकिता, हमारे सिर्फ एक बार कह देने से बाबूजी अपनी झोली उठाकर दौड़े चले आएंगे? मेरे बाबूजी जितने सीधे हैं, उससे कहीं ज्यादा खुद्दार और स्वाभिमानी हैं। वो तिल-तिल कर जी लेंगे, पर उस चौखट पर दोबारा कदम नहीं रखेंगे जहां से उन्हें अपमानित होकर जाना पड़ा था।”
विवेक की बात सुनकर अंकिता बालकनी की रेलिंग के सहारे खड़ी हो गई। उसकी आंखें शून्य में ताक रही थीं और मन अतीत के उन पन्नों को पलटने लगा जिन्हें वह जानबूझकर भूल जाना चाहती थी।
विवेक अपने माता-पिता की इकलौती संतान था। जब वह मुश्किल से चार साल का था, तभी उसकी मां एक गंभीर बीमारी के कारण दुनिया छोड़ गई थीं। उस वक्त उसके पिता सोमनाथ जी की उम्र ही क्या थी। नाते-रिश्तेदारों ने हाथ धोकर पीछे पड़ गए कि दूसरी शादी कर लो, जिंदगी बहुत लंबी है और बच्चे को मां की जरूरत है। लेकिन सोमनाथ जी ने साफ इनकार कर दिया था। उनका एक ही जवाब होता था, “मेरी दूसरी शादी मेरे बच्चे के लिए सौतेली मां लाएगी। अगर उसने मेरे मासूम बच्चे को प्यार नहीं दिया, तो मेरा कलेजा फट जाएगा। मैं अकेला ही इसके लिए बाप भी बनूंगा और मां भी।”
सोमनाथ जी ने अपनी पूरी जवानी, अपनी सारी खुशियां विवेक की परवरिश पर न्योछावर कर दीं। वे सुबह चार बजे उठकर टिफिन बनाते, विवेक को तैयार करके स्कूल छोड़ते, फिर अपनी सरकारी नौकरी पर जाते। शाम को लौटकर उसे पढ़ाते, उसके कपड़े धोते और रात को अपनी छाती से चिपकाकर थपकियां देते। उन्होंने कभी विवेक को किसी चीज की कमी नहीं होने दी। विवेक ने भी अपने पिता की तपस्या का मान रखा। वह पढ़ाई में अव्वल रहा, बड़ा होकर एक मल्टीनेशनल कंपनी में ऊंचे पद पर पहुंचा।
ऑफिस में ही विवेक की मुलाकात अंकिता से हुई थी। अंकिता आधुनिक सोच वाली, आजाद ख्यालों की लड़की थी। जब विवेक ने अपने पिता से अंकिता के बारे में बताया, तो सोमनाथ जी की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए। उन्होंने बिना किसी दहेज, बिना किसी शर्त के अंकिता को बड़े चाव से अपनी बहू बनाकर घर में प्रवेश कराया। उन्हें लगा था कि घर में बहू नहीं, एक बेटी आ रही है जो इस खाली आंगन को फिर से चहका देगी।
लेकिन अंकिता की सोच अलग थी। उसे संयुक्त परिवार की मर्यादाएं और एक बुजुर्ग का घर में होना बंदिश लगने लगा था। सोमनाथ जी का सुबह जल्दी उठकर भजन सुनना, सादा खाना पसंद करना या विवेक से घर-गृहस्थी की बातें करना अंकिता को नागवार गुजरता था। वह चाहती थी कि विवेक का सारा ध्यान, सारा समय और सारा पैसा सिर्फ उस पर रहे। वह अक्सर विवेक के कान भरती, “तुम्हारे बाबूजी बहुत पुराने ख्यालों के हैं। मेरी प्राइवेसी नाम की कोई चीज ही नहीं बची। इनके खांसने से मेरी नींद खराब होती है।”
विवेक अपनी पत्नी और पिता के बीच पिसता रहता था। वह न तो अंकिता को छोड़ सकता था और न ही अपने पिता का अपमान बर्दाश्त कर सकता था। लेकिन अंकिता ने रोज-रोज के झगड़ों से घर का माहौल नारकीय बना दिया था। कभी खाने में नमक ज्यादा होने का नाटक, तो कभी बाबूजी के दोस्तों के आने पर मुंह फुला लेना।
सोमनाथ जी सब देख रहे थे। वे समझ गए थे कि उनकी मौजूदगी उनके बेटे के वैवाहिक जीवन में जहर घोल रही है। एक दिन जब विवेक और अंकिता दोनों ऑफिस गए हुए थे, सोमनाथ जी ने अपना एक पुराना सूटकेस उठाया, उसमें चार जोड़ी धोती-कुर्ते रखे और मेज पर एक चिट्ठी रखकर चुपचाप घर की दहलीज पार कर गए।
उस चिट्ठी में लिखा था:“बेटा विवेक, तुम बिल्कुल परेशान मत होना और मुझे ढूंढने की कोशिश भी मत करना। मैं अपनी मर्जी से हरिद्वार के पास एक शांत वृद्धाश्रम जा रहा हूं। वहां मेरे जैसे कई साथी हैं, ईश्वर का भजन-कीर्तन है। मेरी पेंशन मेरे गुजारे के लिए बहुत है। मैं नहीं चाहता कि मेरी ढलती उम्र तुम्हारे नए संसार के आड़े आए। तुम और बहू हमेशा खुश रहो, मेरा आशीर्वाद हर सांस के साथ तुम्हारे साथ है।”
उस दिन विवेक बच्चों की तरह रोया था। उसने कई बार जाकर बाबूजी से वापस लौटने की मिन्नतें कीं, लेकिन सोमनाथ जी ने मुस्कुराते हुए उसके सिर पर हाथ रखकर कह दिया था, “बेटा, अब यही मेरी दुनिया है। तुम अपना घर संभालो।” और देखते ही देखते सात साल बीत गए। इस बीच अंकिता ने एक प्यारे से बेटे को जन्म दिया—आरव।
आरव अब छह साल का हो चुका था। कुछ दिन पहले स्कूल के ग्रैंडपेरेंट्स डे के मौके पर उसने देखा कि उसके सभी दोस्तों के दादा-दादी उनके साथ आए थे। उन्होंने अपने पोते-पोतियों को गोद में उठाया, कहानियां सुनाईं और प्यार लुटाया। लेकिन आरव अकेला बैठा था। जब उसने घर आकर पूछा, तो विवेक की अलमारी से उसे अपने दादाजी की एक तस्वीर मिली। विवेक ने रोते हुए आरव को बताया था कि उसके दादू कितने महान हैं और वे कितनी दूर एक आश्रम में रहते हैं। बस, उसी दिन से उस मासूम के दिल में यह बात बैठ गई थी कि उसे उसके दादू चाहिए।
अंकिता ने जब अपने मासूम बेटे को भूख से बिलखते देखा, तो उसके भीतर की मां तड़प उठी। और उस ममता की तड़प ने पहली बार उसे यह अहसास कराया कि सात साल पहले उसने एक पिता से उसका बेटा छीनकर कितना बड़ा पाप किया था।
अंकिता ने आंसुओं से भीगा चेहरा उठाया और विवेक के सामने हाथ जोड़ दिए, “विवेक, मुझे सजा दे लो, मुझे जो कहना है कह लो। लेकिन मुझे आज समझ आया है कि अपनी संतान से दूर होने का दर्द क्या होता है। जब मेरा बेटा मुझसे एक दिन बात नहीं कर रहा तो मेरी जान हलक में आ गई है, सोचो उस बूढ़े पिता पर क्या गुजरी होगी जिसने अपने जिगर के टुकड़े को अपने हाथों से विदा कर दिया! चलो विवेक, हम दोनों अभी हरिद्वार चलेंगे। मैं बाबूजी के पैरों में गिरकर अपनी गलतियों की माफी मांगूंगी। अगर वो नहीं लौटे, तो मैं भी वहीं उनके चरणों में बैठ जाऊंगी।”
विवेक ने अंकिता की आंखों में सच्चा पश्चाताप देखा। वह पहली बार अपनी गलती पर रो रही थी, किसी दिखावे के लिए नहीं, बल्कि अंतरात्मा की आवाज पर। विवेक ने धीरे से आरव के कमरे का दरवाजा खोला। आरव अपनी दादू की तस्वीर सीने से लगाए रो रहा था।
विवेक ने उसे गोद में उठाया और कहा, “चलो बेटा, हम सब तुम्हारे दादू को लेने चल रहे हैं।”
अगली सुबह की सुनहरी धूप जब गंगा की लहरों पर बिखर रही थी, हरिद्वार के उस शांत आश्रम के बगीचे में सोमनाथ जी एक नीम के पेड़ के नीचे बैठकर रामायण का पाठ कर रहे थे। सफेद बाल, चेहरे पर गहरी झुर्रियां, लेकिन आंखों में वही शांत और ममतामयी चमक।
तभी एक नन्हीं सी आवाज गूंजी, “दादू!”
सोमनाथ जी ने चौंककर चश्मे के ऊपर से देखा। एक गोलमटोल, मासूम बच्चा दौड़ता हुआ उनकी तरफ आ रहा था। उसके पीछे विवेक और अंकिता हाथ जोड़े सिर झुकाए खड़े थे।
आरव ने आकर सीधे सोमनाथ जी के घुटनों को पकड़ लिया, “दादू, आप इतने दिनों से यहां क्यों बैठे हो? घर चलो ना, मुझे आपके पास सोना है, मुझे परियों की कहानी सुननी है।”
सोमनाथ जी के हाथ से रामायण की पोथी छूट गई। उनका पूरा बदन कांपने लगा। उन्होंने उस बच्चे को उठाकर अपनी छाती से भींच लिया। खून का रिश्ता अपनी पहचान खुद बयां कर रहा था। उनकी आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। सात साल का सूखा एक पल में बह गया।
तभी अंकिता आगे बढ़ी और उसने सीधे सोमनाथ जी के चरणों में अपना सिर रख दिया। वह फूट-फूट कर रोने लगी, “बाबूजी… मुझे माफ कर दीजिए। मैं बहुत खुदगर्ज थी, बहुत अंधी थी। मैंने उस इंसान का दिल दुखाया जिसने अपना पूरा जीवन अपने बेटे पर न्योछावर कर दिया। आज जब मेरा अपना बेटा मुझसे दूर होने लगा, तब मुझे समझ आया कि ममता और वात्सल्य का मोल क्या होता है। आपके बिना हमारा घर सिर्फ ईंट-पत्थरों का एक ठंडा मकान है बाबूजी। अपनी इस नादान बहू को क्षमा कर दीजिए और अपने घर वापस चलिए।”
विवेक भी अपने पिता के पैरों में बैठ गया और उसका गला रुंध गया, “बाबूजी, बहुत रह लिए हम इस अधूरेपन में। अब और नहीं। आपके बिना हमारी कोई पहचान नहीं है।”
सोमनाथ जी ने एक पल के लिए अपनी आंखें बंद कीं। ईश्वर का धन्यवाद किया कि देर से ही सही, उनके परिवार की सोच में उजाला हुआ। उन्होंने एक हाथ से अंकिता के सिर पर हाथ रखा और दूसरे हाथ से विवेक को उठाया।
“पगली, बहू भी कभी पराई होती है क्या? मां-बाप कभी अपने बच्चों से नाराज नहीं रहते। अगर बर्तन आपस में टकराए नहीं, तो समझो घर में जिंदगी ही नहीं है। मैंने तो उसी दिन तुम्हें माफ कर दिया था जिस दिन यह घर छोड़ा था। मेरा आशीर्वाद तो हमेशा तुम्हारे साथ था।”
सोमनाथ जी ने आरव को अपनी गोद में उठाया और उसके माथे को चूमते हुए मुस्कुराए, “चल बेटा, अब जब तू लेने आ ही गया है, तो तेरे दादू यहां अकेले कैसे रह सकते हैं!”
आरव खुशी से ताली बजाने लगा। अंकिता ने आगे बढ़कर सोमनाथ जी का पुराना सूटकेस अपने हाथों में उठा लिया—यह संकल्प लेते हुए कि अब जीवन भर इस सूटकेस को कभी पैक नहीं होने देगी।
गंगा के घाटों से आती घंटियों की पावन ध्वनि के बीच वह बिखरा हुआ परिवार फिर से एक हो चुका था। चंडीगढ़ के उस मकान की चौखट आज सात साल बाद अपने असली बुजुर्ग की छांव पाकर धन्य होने जा रही थी।
परिवार केवल साथ रहने से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के त्याग को समझने और बुजुर्गों के मान-सम्मान से बनता है। क्या आपको भी लगता है कि जब तक घर में बुजुर्गों का आशीर्वाद न हो, तब तक कोई भी आशियाना मुकम्मल नहीं हो सकता? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद .
लेखिका : सीमा पवार