पिता का अभेद्य कवच

नंदिनी फूट-फूट कर रो पड़ी, “बापूजी… मुझे बचा लीजिए! मुझसे बहुत बड़ा गुनाह हो गया। मैं रिसर्च के लिए नहीं आई थी, मैं झूठ बोलकर एक बहुत गंदी जगह फँस गई हूँ। बापूजी, मुझे डर लग रहा है!”

त्रिलोकी नाथ जी के पैरों तले ज़मीन नहीं हिली, बल्कि एक पिता का सोया हुआ शेर जाग उठा। उन्होंने न कोई डाँट लगाई, न कोई गुस्सा दिखाया। उन्होंने बहुत ही शांत और चट्टान जैसी दृढ़ आवाज़ में कहा, “नंदिनी, मेरी बच्ची, हिम्मत मत हारना। तू जहाँ भी है, अपनी लाइव लोकेशन मुझे भेज और किसी सुरक्षित जगह छिप जा। तेरा बाप अभी आ रहा है।”

 त्रिलोकी नाथ पांडे एक बेहद उसूलपसंद और अनुशासनप्रिय व्यक्ति थे। रेलवे के सेवानिवृत्त वरिष्ठ अनुभाग अभियंता होने के नाते उनके जीवन का हर एक पल घड़ी की सुइयों पर चलता था। उनके घर में एक अलिखित संविधान लागू था। सुबह ठीक छह बजे घर के सभी सदस्यों का उठना अनिवार्य था। यदि कोई देर तक सोता रह जाता, तो उसे सुबह का नाश्ता नसीब नहीं होता था, बल्कि सीधे दोपहर का भोजन मिलता और वह भोजन भी उस व्यक्ति को खुद अपनी निगरानी में रसोई में बनवाना पड़ता था। चाहे उनकी इकलौती बेटी नंदिनी हो या बेटा अक्षत, नियम सबके लिए एक समान थे।

शाम सात बजे के बाद घर की दहलीज लांघने पर सख्त पाबंदी थी। रात को भोजन की मेज़ पर सबका एक साथ बैठना और पूरे दिन का हिसाब-किताब साझा करना उनका रोज़ का दस्तूर था। त्रिलोकी नाथ जी की पत्नी कल्याणी अक्सर अपने पति के इस सख्त रवैये पर झल्ला उठती थीं। वे चाय की चुस्कियाँ लेते हुए अपने बच्चों से कहतीं, “तुम्हारे बापूजी को देखो, जैसे घर नहीं कोई मिलिट्री की छावनी चला रहे हों। किसी को ज़रा सी भी आज़ादी नहीं। ज़माने के साथ चलना इन्होंने सीखा ही नहीं। इनका प्यार तो नारियल के उस सख्त खोल जैसा है, जो ऊपर से सिर्फ चोट पहुँचाता है। मुझे तो डर लगता है कि इस ज़रूरत से ज्यादा सख्ती के चक्कर में हमारे बच्चे कहीं घुटकर ही न रह जाएँ।” माँ की इन बातों पर नंदिनी और अक्षत दबी हँसी हँस देते, लेकिन नंदिनी के मन में यह बात गहरे तक बैठ गई थी कि उसके पिता की सोच बहुत दकियानूसी है और वे उस पर अकारण ही शक करते हैं।

नंदिनी शहर के प्रतिष्ठित कॉलेज में वनस्पति विज्ञान में स्नातकोत्तर कर रही थी। कॉलेज में उसकी मुलाकात पिछले कुछ महीनों में राधिका नाम की लड़की से हुई थी। राधिका का रहन-सहन कॉलेज की बाकी लड़कियों से बिल्कुल अलग था। महंगे ब्रांडेड कपड़े, हर हफ्ते बदलती गाड़ियाँ, हाथ में नवीनतम आईफोन और बात करने का बेहद बिंदास और पश्चिमी अंदाज़। राधिका का पहनावा इतना अत्याधुनिक और खुला था कि पारंपरिक सोच वाले लोग उसे देखकर असहज हो जाते, पर नंदिनी को उसकी चकाचौंध और आत्मविश्वास में एक अलग ही आकर्षण दिखता था। नंदिनी बहुत सीधी-सादी और घरेलू लड़की थी। उसे राधिका की पारिवारिक पृष्ठभूमि, उसके अतीत या उसकी असल ज़िंदगी के बारे में कुछ भी नहीं पता था। उसने केवल राधिका के चेहरे की चमक और उसकी लच्छेदार बातों पर भरोसा कर लिया था।

एक दिन कॉलेज के कैंटीन में बैठे हुए राधिका ने नंदिनी से कहा, “नंदिनी, कल मेरा जन्मदिन है। शाम को मेरे घर पर एक बहुत बड़ी पार्टी है। शहर के कई जाने-माने लोग आ रहे हैं। तुम्हें हर हाल में आना होगा।”

नंदिनी ने उदास मन से सिर झुकाते हुए कहा, “राधिका, तुम जानती हो कि मेरे बापूजी कितने सख्त हैं। शाम सात बजे के बाद वे मुझे घर से बाहर कदम भी नहीं रखने देते। पार्टी तो रात की होगी, वे मुझे कभी इजाज़त नहीं देंगे।”

राधिका ने अपनी आँखें मटकाते हुए एक गहरी मुस्कान के साथ कहा, “अरे यार, तुम भी कितनी पुरानी दुनिया में जीती हो! बापूजी को सच बताने की ज़रूरत ही क्या है? उनसे कह देना कि कल वनस्पति विज्ञान विभाग का एक विशेष सेमिनार और फील्ड रिसर्च प्रोजेक्ट है। हमें पास के संरक्षित वन क्षेत्र से औषधीय पौधों के नमूने एकत्र करने हैं और लैब में उनकी स्लाइड तैयार करनी है, इसलिए रात के दस-ग्यारह बज सकते हैं। तुम मेरे घर आ जाना, थोड़ी देर पार्टी एन्जॉय करना और फिर मैं अपनी गाड़ी से तुम्हें घर छुड़वा दूँगी।”

नंदिनी पहले तो हिचकिचाई। उसने ज़िंदगी में कभी अपने पिता से झूठ नहीं बोला था। उसे डर था कि अगर बापूजी को पता चला तो वे घर में प्रलय ला देंगे। लेकिन राधिका के जन्मदिन की उस भव्य पार्टी में शामिल होने का लालच और उस चकाचौंध को नज़दीक से देखने की ललक उसके मन के डर पर हावी हो गई। उसने सहमति में सिर हिला दिया।

अगले दिन शाम को राधिका खुद अपनी शानदार गाड़ी लेकर नंदिनी के घर पहुँच गई। उसने त्रिलोकी नाथ जी के सामने हाथ जोड़कर इतनी मासूमियत और सलीके से बात की कि कोई सोच भी नहीं सकता था कि इस चेहरे के पीछे कोई फरेब हो सकता है। राधिका ने कहा, “प्रणाम अंकल जी! आज कॉलेज की प्रोफेसर डॉ. वर्मा के मार्गदर्शन में हमारा एक बहुत महत्वपूर्ण रिसर्च प्रोजेक्ट है। यदि आज का प्रैक्टिकल पूरा नहीं हुआ, तो नंदिनी के इंटरनल मार्क्स कट जाएंगे। आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए, मेरी मम्मी भी कॉलेज के ट्रस्ट में हैं, हम दोनों नंदिनी को सुरक्षित रात नौ-साढ़े नौ बजे तक खुद अपनी गाड़ी से घर छोड़ जाएंगे।”

त्रिलोकी नाथ जी ने अपने चश्मे के ऊपर से राधिका को गौर से देखा। उनके चेहरे पर गहरी चिंता की लकीरें उभर आईं। उन्होंने भारी आवाज़ में कहा, “बेटा, रिसर्च अपनी जगह है, लेकिन रात का समय बेटियों के लिए बाहर रहने का नहीं होता। फिर भी, यदि पढ़ाई का सवाल है, तो जैसे ही तुम्हारा काम खत्म हो, मुझे फोन कर देना, मैं खुद स्कूटर लेकर तुम्हें लेने आ जाऊँगा।”

राधिका ने तुरंत हँसते हुए बात संभाल ली, “अरे नहीं अंकल जी, आपको परेशान होने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं है। हम समय से इसे पहुँचा देंगे।”

झूठ का एक मज़बूत ताना-बाना बुनकर नंदिनी अपने पिता की बंदिशों के घेरे से बाहर निकल गई। गाड़ी में बैठते ही राधिका का अंदाज़ बदल गया। उसने तेज़ आवाज़ में पॉप संगीत चला दिया और सिगरेट सुलगा ली। नंदिनी यह देखकर हैरान रह गई, लेकिन उसने सोचा कि शायद बड़े घर के आधुनिक बच्चों के लिए यह सब सामान्य बात होगी।

राधिका का घर शहर के बाहरी इलाके में एक वीरान सड़क पर बने एक बड़े और आलीशान बंगले में था। बाहर से देखने पर वह बंगला बहुत भव्य था, लेकिन वहाँ एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था। घर के अंदर कदम रखते ही नंदिनी के होश उड़ गए। बैठक में कोई पारिवारिक माहौल नहीं था। हर तरफ महंगी विदेशी शराब की बोतलें, सिगरेट का धुआँ और अजीब सी खुशबू फैली हुई थी।

तभी अंदर के कमरे से एक महिला बाहर आई। गहरा लाल भड़कीला मेकअप, पारदर्शी और चटक सितारों वाली साड़ी, और होठों के बीच दबा सिगरेट का कश। उसके हाव-भाव और चाल-ढाल में किसी भी तरह की शराफत या मातृत्व की झलक नहीं थी।

राधिका ने कहा, “नंदिनी, मिलो मेरी मॉम से! इन्हें सब मोहिनी कहते हैं।”

नंदिनी ने संकोच से हाथ जोड़ते हुए कहा, “नमस्ते आंटी।”

मोहिनी ने एक अजीब सी तिरछी मुस्कान के साथ नंदिनी को ऊपर से नीचे तक घूरा, मानो किसी मंडी में किसी वस्तु की कीमत आँक रही हो। उसने नंदिनी की ठोड़ी को उंगली से ऊपर उठाते हुए भारी आवाज़ में कहा, “आंटी नहीं डार्लिंग, मुझे मोहिनी कहा करो। बहुत प्यारी और ताज़ा सूरत है तुम्हारी। राधिका, तुम्हारी पसंद की दाद देनी पड़ेगी। इस चेहरे की तो बहुत भारी कद्र होगी।”

मोहिनी की यह बातें और उसकी नज़रों की तपिश नंदिनी के बदन में सिहरन पैदा कर गई। उसे लगा जैसे वह किसी गलत जगह आ फँसी है। राधिका दो गिलासों में जूस लेकर आई और मोहिनी व्हिस्की का ग्लास थामे सोफे पर पैर पसार कर बैठ गई।

अभी नंदिनी ने घबराहट में जूस का एक घूंट ही लिया था कि बंगले की डोरबेल बजी। मोहिनी ने दरवाज़ा खोला। बाहर एक सफ़ेद खादी का कुर्ता-पाजामा पहने अधेड़ उम्र का रसूखदार आदमी खड़ा था, जिसके पीछे दो हथियारबंद सुरक्षाकर्मी खड़े थे। मोहिनी ने बहुत ही कामुक और लाड़ली आवाज़ में उसका स्वागत किया, “आइए मंत्री जी, आपका ही इंतज़ार था।” वह आदमी मुस्कुराते हुए सीधे अंदर के मुख्य बेडरूम की तरफ बढ़ गया और मोहिनी भी उसके पीछे-पीछे कमरे में चली गई और अंदर से दरवाज़ा बंद हो गया।

कमरे के भीतर से आती हँसी और अश्लील फुसफुसाहट सुनकर नंदिनी के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। वह झटके से अपनी जगह से खड़ी हो गई। उसकी साँसें फूलने लगी थीं।

उसने कांपते हुए राधिका से पूछा, “राधिका! यह सब क्या है? यह आदमी कौन है और तुम्हारी माँ उसके साथ अंदर क्यों गई? तुम्हारे पिता कहाँ हैं? यह कैसा जन्मदिन है जहाँ कोई मेहमान नहीं, सिर्फ ऐसा गंदा माहौल है? मुझे अभी इसी वक्त घर जाना है।” नंदिनी ने अपने कांपते हाथों से मोबाइल निकालकर कैब बुक करने की कोशिश की।

तभी राधिका ने आगे बढ़कर नंदिनी का हाथ पकड़ लिया। राधिका की आँखों से वह आधुनिकता का मुखौटा उतर चुका था और उसकी जगह एक लाचार, डरी हुई और असहाय लड़की का चेहरा सामने आ गया। राधिका की आँखों से आँसू छलक पड़े।

राधिका ने रुंधे गले से फुसफुसाते हुए कहा, “नंदिनी, भाग जाओ यहाँ से! जितनी जल्दी हो सके यहाँ से निकल जाओ। यह कोई जन्मदिन की पार्टी नहीं है। मेरे पिता एक सच्चे और ईमानदार इंसान थे, जो मेरी माँ के इस घिनौने धंधे को देखकर बरसों पहले हमें छोड़कर कहीं चले गए थे। यह औरत मेरी माँ नहीं, एक शैतान है। यह पूरे संभाग में फैले जिस्मफरोशी और हाई-प्रोफाइल ब्लैकमेलिंग के सिंडिकेट की सरगना है। बड़े-बड़े अफ़सर, राजनेता और रईसज़ादे इसके इशारों पर नाचते हैं। यह देहातों और छोटे शहरों की गरीब और मजबूर लड़कियों को नौकरी का झाँसा देकर लाती है और उन्हें इन दरिंदों के आगे परोस देती है।”

नंदिनी का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। उसका पूरा शरीर पसीने से भीग गया।

राधिका ने रोते हुए आगे कहा, “मैंने कॉलेज में तुमसे दोस्ती इसलिए की थी क्योंकि तुम्हारी सादगी और संस्कारों को देखकर मुझे अपने खोए हुए बचपन की याद आती थी। मैं इस गटर से निकलना चाहती थी। लेकिन इस औरत ने कल मुझे धमकी दी कि अगर मैं कल किसी नई, संभ्रांत और मासूम लड़की को यहाँ नहीं लाई, तो वह आज रात मुझे ही इन भेड़ियों के हवाले कर देगी। इसने आज तुम्हारी कीमत सात लाख रुपये तय की है उस मंत्री से! मुझे माफ कर दो नंदिनी, मैं बहुत मजबूर थी, लेकिन अब मेरा ज़मीर गवाही नहीं दे रहा। पीछे के बगीचे का दरवाज़ा खुला है, तुम तुरंत भाग जाओ, वरना तुम्हारी ज़िंदगी तबाह हो जाएगी!”

नंदिनी के होश उड़ गए। उसे अपनी आँखों के सामने सिर्फ और सिर्फ अपने पिता त्रिलोकी नाथ जी का गंभीर चेहरा दिखाई दे रहा था। वे हमेशा कहते थे—’बाहर की दुनिया भेड़ियों से भरी है, जहाँ मासूमियत को निगलने के लिए लोग घात लगाए बैठे हैं।’ नंदिनी बिना एक पल गँवाए राधिका का हाथ खींचते हुए बोली, “मैं तुम्हें इस नर्क में अकेला छोड़कर नहीं जाऊँगी राधिका। चलो मेरे साथ! मेरे बापूजी सख्त ज़रूर हैं, पर वे किसी भी अन्याय के आगे झुकना नहीं जानते। वे हमें बचा लेंगे।”

दोनों लड़कियाँ चुपचाप पीछे के दरवाज़े से बाहर निकलीं और उस अंधेरी, वीरान सड़क पर पागलों की तरह दौड़ने लगीं। सड़क पर आते ही नंदिनी ने कांपती उंगलियों से अपने पिता का नंबर मिलाया।

फोन की दूसरी ही घंटी पर त्रिलोकी नाथ जी ने फोन उठाया। वे सोए नहीं थे, बेचैनी से घर के बाहर बरामदे में टहल रहे थे।

नंदिनी फूट-फूट कर रो पड़ी, “बापूजी… मुझे बचा लीजिए! मुझसे बहुत बड़ा गुनाह हो गया। मैं रिसर्च के लिए नहीं आई थी, मैं झूठ बोलकर एक बहुत गंदी जगह फँस गई हूँ। बापूजी, मुझे डर लग रहा है!”

त्रिलोकी नाथ जी के पैरों तले ज़मीन नहीं हिली, बल्कि एक पिता का सोया हुआ शेर जाग उठा। उन्होंने न कोई डाँट लगाई, न कोई गुस्सा दिखाया। उन्होंने बहुत ही शांत और चट्टान जैसी दृढ़ आवाज़ में कहा, “नंदिनी, मेरी बच्ची, हिम्मत मत हारना। तू जहाँ भी है, अपनी लाइव लोकेशन मुझे भेज और किसी सुरक्षित जगह छिप जा। तेरा बाप अभी आ रहा है।”

त्रिलोकी नाथ जी ने तुरंत अपना पुराना स्कूटर स्टार्ट नहीं किया, क्योंकि वे स्थिति की गंभीरता को समझ चुके थे। उन्होंने अपने एक पुराने और परम मित्र अवधेश शर्मा को फोन मिलाया, जो शहर के पुलिस उपमहानिरीक्षक (डीआईजी) के पद पर तैनात थे। त्रिलोकी नाथ जी ने संक्षेप में पूरी बात बताई। पंद्रह मिनट के भीतर डीआईजी के आदेश पर स्पेशल टास्क फोर्स और महिला पुलिस की तीन गाड़ियाँ सायरन बजाते हुए उस वीरान हाईवे की तरफ दौड़ पड़ीं, और उनके साथ सबसे आगे वाली जीप में खुद त्रिलोकी नाथ जी बैठे थे।

हाईवे के किनारे एक बंद पड़े पेट्रोल पंप के पीछे दोनों लड़कियाँ कांपती हुई छिपी थीं। कुछ ही देर में पुलिस की गाड़ियों की नीली-लाल बत्ती चमकती हुई दिखाई दी। त्रिलोकी नाथ जी जीप से उतरे और दौड़कर अपनी बेटी के पास पहुँचे। नंदिनी दौड़कर अपने पिता के सीने से लिपट गई और बच्चों की तरह हिचकियाँ ले-लेकर रोने लगी।

त्रिलोकी नाथ जी ने अपनी बेटी के सिर पर हाथ फेरा। उनकी आँखों में भी आँसू थे, पर आवाज़ में फौलाद था। उन्होंने कहा, “रो मत बेटा, जब तक तेरा बाप ज़िंदा है, कोई तेरी तरफ आँख उठाकर भी नहीं देख सकता।”

नंदिनी ने राधिका की तरफ इशारा किया, जो सहमी हुई एक कोने में खड़ी थी। राधिका ने रोते हुए डीआईजी और त्रिलोकी नाथ जी को उस बंगले के अंदर की पूरी सच्चाई, मंत्री की मौजूदगी और उस पूरे रैकेट के बारे में सब कुछ बता दिया।

बिना एक पल की देरी किए पुलिस बल ने उस आलीशान बंगले पर चारों तरफ से धावा बोल दिया। दरवाज़ा तोड़कर जब पुलिस अंदर दाखिल हुई, तो उस रसूखदार मंत्री और मोहिनी को आपत्तिजनक स्थिति में रंगे हाथों पकड़ लिया गया। बंगले के तहखाने की तलाशी ली गई तो वहाँ से छह और मासूम लड़कियाँ बरामद हुईं, जिन्हें बंधक बनाकर रखा गया था। साथ ही करोड़ों के अवैध लेन-देन, नशीले पदार्थों और हिडेन कैमरों से बनाए गए ब्लैकमेलिंग के वीडियो के चिप्स ज़ब्त किए गए।

पूरी रात शहर के पुलिस कंट्रोल रूम में हड़कंप मचा रहा। सुबह होते-होते यह खबर पूरे राज्य के मुख्य समाचार पत्रों और न्यूज़ चैनलों की सबसे बड़ी सुर्खी बन चुकी थी। मोहिनी और उसके पूरे गिरोह के चेहरे बेनकाब हो चुके थे। उस रसूखदार मंत्री को अपनी कुर्सी गँवानी पड़ी और जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ा।

कानूनी प्रक्रियाओं के बाद राधिका को नारी संरक्षण गृह के माध्यम से सुरक्षा दी गई। त्रिलोकी नाथ जी ने खुद आगे बढ़कर अदालत में राधिका के पुनर्वास और शिक्षा की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ली और उसे उस दलदल से निकालकर एक सुरक्षित छात्रावास में प्रवेश दिलवाया, ताकि वह सम्मान के साथ अपना जीवन जी सके।

अगले दिन सुबह, जबलपुर की हवेली में वही सुबह की धूप खिली थी। आँगन में तुलसी का पौधा हवा में डोल रहा था। ठीक छह बजे अलार्म बजा। नंदिनी अपने बिस्तर से उठी, उसने अपनी आँखें पोंछीं और सीधे बाहर बरामदे में आई।

वहाँ त्रिलोकी नाथ जी अखबार पढ़ रहे थे। नंदिनी चुपचाप जाकर अपने पिता के चरणों में बैठ गई और उनका पैर पकड़कर रोने लगी।

उसने रुंधे हुए गले से कहा, “बापूजी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं आपकी बंदिशों को, आपके नियमों को अपनी आज़ादी की दुश्मन समझती थी। मुझे लगता था कि आप मुझ पर भरोसा नहीं करते, आप हिटलर हैं। लेकिन उस काली रात ने मेरी आँखें खोल दीं। अगर आपके संस्कार और आपका दिया हुआ आत्मबल मेरे साथ न होता, तो शायद मैं आज ज़िंदा भी न होती। मुझे समझ आ गया कि एक पिता का अनुशासन कोई जेल नहीं, बल्कि वह अदृश्य ढाल होती है जो अपनी औलाद को दुनिया की हर गंदगी से बचाकर रखती है।”

कल्याणी जी और अक्षत भी दरवाज़े पर खड़े यह सब देख रहे थे। कल्याणी जी की आँखें भी भीगी हुई थीं। उन्हें भी अपनी उस पुरानी सोच पर पछतावा हो रहा था जिसमें वे हमेशा अपने पति के अनुशासन को नुक्स निकालती थीं।

त्रिलोकी नाथ जी ने अखबार एक तरफ रखा। उन्होंने झुककर अपनी बेटी को उठाया और अपने सीने से लगा लिया।

उन्होंने बहुत ही कोमल स्वर में कहा, “पगflowsली, एक कुम्हार जब मिट्टी के कच्चे घड़े को आकार देता है, तो बाहर से उस पर ज़ोर-ज़ोर से थाप मारता है, लेकिन अंदर से अपना हाथ लगाकर सहारा भी देता है ताकि घड़ा टूट न जाए। माँ-बाप का अनुशासन उस थाप की तरह होता है। नियम कड़े ज़रूर होते हैं, पर उनकी जड़ में सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी सुरक्षा और तुम्हारी खुशियों की चिंता होती है। जिस दिन औलाद इस कड़वे सच को समझ जाती है, उस दिन कोई भी बुराई उसका बाल भी बांका नहीं कर सकती।”

घर की रसोई में उस दिन कल्याणी जी ने नाश्ता बनाया और पूरा परिवार एक साथ मेज़ पर बैठा। घर में वही अनुशासन था, वही छह बजे उठने का नियम था, लेकिन अब किसी के मन में कोई घुटन नहीं थी। नंदिनी को अब अपने पिता की बंदिशों में कैद नहीं, बल्कि उस बरगद की वह घनी और शीतल छाया महसूस हो रही थी, जो हर तूफ़ान के सामने सीना ताने मुस्कुराती हुई खड़ी रहती है।

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