अमरेंद्र की आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। उसने कांपते हाथों से अपने बड़े भाई का हाथ पकड़ लिया। आवाज इतनी कमजोर थी कि बमुश्किल निकल पा रही थी, “भैया… आप? आपने मुझे माफ कर दिया भैया? मैंने आपके साथ कितना गलत किया… उस मामूली जमीन के लिए मैंने अपने उस भाई से मुंह मोड़ लिया जो मेरे लिए पिता समान था। मैंने आपके मान-सम्मान को ठेस पहुंचाई, और आज आप ही मेरी जिंदगी बनकर खड़े हैं… मुझे माफ कर दीजिए भैया, मैं आपका गुनहगार हूं।” अमरेंद्र बच्चों की तरह सिसकने लगा।
रात के करीब दो बज रहे थे।त्रिलोकीनाथ जी अपने कमरे में गहरी नींद में थे, तभी सिरहाने रखे मोबाइल फोन की तेज घंटी बजी। इतनी बेवकत घंटी बजने से उनकी आंख अचानक खुल गई। चश्मा लगाकर जब उन्होंने स्क्रीन पर चमकता हुआ अनजान नंबर देखा, तो मन में अजीब सी आशंका हुई। फोन उठाया तो दूसरी तरफ से कांपती हुई, सिसकियों से भरी एक लड़की की आवाज गूंजी, “बड़े ताऊ जी… मैं स्नेहा बोल रही हूं… छोटे चाचा जी की बेटी… ताऊ जी, प्लीज जल्दी आ जाइए, पापा को न जाने क्या हो गया है! वो सांस नहीं ले पा रहे हैं, बहुत तड़प रहे हैं ताऊ जी… हमारी मदद कीजिए!”
एक पल के लिए त्रिलोकीनाथ जी की सांसें थम गईं। दिमाग सुन्न सा हो गया। पिछले सात सालों से जिस भाई का नाम तक इस घर में नहीं लिया गया था, उसकी बेटी आधी रात को गिड़गिड़ा रही थी। सात साल पहले पुश्तैनी जमीन के बंटवारे को लेकर छोटे भाई अमरेंद्र के साथ ऐसी कड़वाहट घुली थी कि दोनों परिवारों के रिश्ते राख हो गए थे। एक ही शहर में रहते हुए भी दोनों ऐसे अजनबी बन चुके थे कि किसी शादी-ब्याह में भी न्योता नहीं भेजा जाता था। कभी रास्ते में आमना-सामना हो जाता तो आंखें चुराकर निकल जाते थे।
त्रिलोकीनाथ जी के मन में एक क्षण के लिए विचार कौंधा कि जिसने भरे समाज में मेरा अपमान किया, मेरी बात नहीं रखी, आज उसके लिए आधी रात को अपनी नींद क्यों खराब करूं? सुबह देखा जाएगा। लेकिन तभी फोन पर स्नेहा की सिसकी और “बड़े ताऊ जी बचा लीजिए” की पुकार उनके कानों में हथौड़े की तरह बजी। खून की प्यास और नाराजगी एक तरफ रह गई, और बड़े भाई का वो पुराना वात्सल्य जाग उठा जो कभी अमरेंद्र की उंगली पकड़कर उसे स्कूल ले जाता था।
त्रिलोकीनाथ जी ने एक पल भी नहीं गंवाया। बिस्तर से उतरे, अपने दोनों बेटों—अभिषेक और मयंक को जगाया और बोले, “जल्दी उठो, गाड़ी निकालो। तुम्हारे चाचा की तबीयत बहुत खराब है, हमें फौरन वहां पहुंचना होगा।” बेटों ने हैरानी से पिता की ओर देखा, क्योंकि उन्होंने सालों से चाचा के प्रति सिर्फ नाराजगी ही देखी थी, पर पिता के चेहरे का तनाव देखकर दोनों तुरंत तैयार हो गए। घर से निकलते ही त्रिलोकीनाथ जी ने अपने पारिवारिक फिजीशियन डॉ. वर्मा को फोन मिलाया। डॉ. वर्मा उनके पुराने मित्र भी थे। उन्होंने संक्षेप में स्थिति बताई और हाथ जोड़कर विनती की कि वे बिना वक्त गंवाए अमरेंद्र के घर पहुंचें।
गाड़ी जब अमरेंद्र के दरवाजे पर रुकी, तो घर का मुख्य दरवाजा खुला हुआ था। अंदर से रोने की आवाजें आ रही थीं। ठीक उसी समय डॉ. वर्मा की गाड़ी भी बाहर आकर रुकी। त्रिलोकीनाथ जी बिना किसी औपचारिकता के तेज कदमों से सीधे अंदर कमरे में दाखिल हुए। कमरे का मंजर देखकर उनका कलेजा मुंह को आ गया। उनका छोटा भाई अमरेंद्र बिस्तर पर बेसुध पड़ा था, पूरा बदन ठंडे पसीने से भीगा हुआ था और वह छाती पकड़कर बुरी तरह छटपटा रहा था। अमरेंद्र की पत्नी सरोज बदहवास होकर अपने पति की छाती मल रही थी और रो-रोकर बेहाल थी।
त्रिलोकीनाथ जी सब कुछ भूल गए। उन्होंने आगे बढ़कर अमरेंद्र का सिर अपनी गोद में रख लिया। अपनी कांपती हथेलियों से छोटे भाई का पसीना पोंछते हुए बेहद रुंधे गले से बोले, “अमरू… देख तेरा बड़ा भाई आ गया है। तू बिल्कुल फिक्र मत कर मेरे भाई, कुछ नहीं होगा तुझे। देख, मैं डॉ. वर्मा को साथ लेकर आया हूं। तू हिम्मत रख, बस थोड़ी ही देर में सब ठीक हो जाएगा।” कहते-कहते त्रिलोकीनाथ जी की आंखों से आंसुओं की दो बूंदें टपक कर अमरेंद्र के माथे पर गिर पड़ीं। उन्होंने जल्दी से अपनी गीली आंखें पोंछ लीं ताकि परिवार के सामने खुद को कमजोर न दिखाएं।
डॉ. वर्मा ने बिना एक पल गंवाए अमरेंद्र की नब्ज जांची, स्टेथोस्कोप लगाया और तुरंत ब्लड प्रेशर चेक किया। बीपी खतरनाक स्तर तक गिर चुका था और पल्स बहुत धीमी चल रही थी। डॉक्टर ने तुरंत अपनी इमरजेंसी किट से दो जरूरी इंजेक्शन निकाले और अमरेंद्र को लगाए, साथ ही जीभ के नीचे रखने वाली एक गोली मुंह में डाली। करीब बीस मिनट तक कमरे में सन्नाटा पसरा रहा, सिर्फ अमरेंद्र की उखड़ती सांसों की आवाज सुनाई दे रही थी। त्रिलोकीनाथ जी लगातार अमरेंद्र के हाथ सहला रहे थे और मन ही मन भगवान से अपने भाई की सलामती की भीख मांग रहे थे।
करीब आधे घंटे की मशक्कत के बाद अमरेंद्र की सांसें कुछ सामान्य हुईं और उसके चेहरे की तड़प धीरे-धीरे कम होने लगी। डॉ. वर्मा ने माथे का पसीना पोंछते हुए राहत की सांस ली और बोले, “त्रिलोकी जी, इनका बीपी अचानक क्रिटिकल लेवल तक गिर गया था। कार्डियक शॉक जैसी स्थिति बन रही थी। अगर आप दस-पंद्रह मिनट और देर कर देते या मुझे समय पर यहां नहीं बुलाते, तो शायद अनहोनी हो जाती। अब स्थिति नियंत्रण में है और खतरे की कोई बात नहीं है। मैंने जरूरी दवाएं दे दी हैं। फिलहाल इन्हें पूरी तरह आराम करने दें। सुबह मैं दोबारा आऊंगा, तब तय करेंगे कि अस्पताल ले जाकर विस्तृत जांच कराने की जरूरत है या नहीं। अब आप लोग निश्चिंत रहें।” डॉ. वर्मा जरूरी हिदायतें देकर विदा हो गए।
डॉक्टर के जाते ही स्नेहा, जो अब तक एक कोने में कांपती हुई खड़ी थी, दौड़कर त्रिलोकीनाथ जी के पैरों से लिपट गई और फूट-फूट कर रो पड़ी। “बड़े ताऊ जी… आपने मेरा फोन पहली ही घंटी पर उठा लिया! मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा था कि आप बात भी करेंगे। आज रात जब पापा की तबीयत बिगड़ी, तो मैंने अपनी कई सहेलियों, पापा के दोस्तों और रिश्तेदारों को फोन लगाया, लेकिन आधी रात को किसी ने मेरा फोन नहीं उठाया। किसी का फोन स्विच ऑफ था तो किसी ने काटकर रख दिया। मैं पूरी तरह टूट चुकी थी, तभी मुझे आपकी याद आई। मेरे मन ने कहा कि चाहे जो हो जाए, बड़े ताऊ जी अपनी इस बच्ची का फोन कभी नहीं काटेंगे। और सचमुच, आपने आकर मेरे पापा की जान बचा ली ताऊ जी! आज अगर आप न होते, तो हम सब अनाथ हो जाते… मैं जिंदगी भर आपका यह अहसान नहीं भूलूंगी।”
त्रिलोकीनाथ जी का दिल भर आया। उन्होंने झुककर स्नेहा को उठाया और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले, “पगली, अपनों के बीच अहसान कैसे? हम तो किसी अनजान और पराए के लिए भी आधी रात को दौड़ पड़ते, फिर तुम सब तो मेरा अपना परिवार हो, मेरी अपनी देह का हिस्सा हो। हमारे और तेरे पापा के बीच जमीन-जायदाद को लेकर लाख मतभेद रहे हों, लेकिन इस बड़े भाई के दिल ने कभी अपने छोटे भाई का बुरा नहीं सोचा। हम नाराज जरूर थे, लेकिन हमारे भीतर का खून कभी ठंडा नहीं हुआ था। मैंने हमेशा भगवान से यही मांगा कि भले ही तू मुझसे दूर रह अमरू, लेकिन जहां भी रहे, हंसता-खेलता रहे।”
त्रिलोकीनाथ जी ने अपनी नम आंखों से कमरे में मौजूद अमरेंद्र की पत्नी सरोज की ओर देखा, जो हाथ जोड़े सिर झुकाए पश्चाताप के आंसुओं में भीगी खड़ी थी। त्रिलोकीनाथ जी ने उससे कहा, “बहू, तुम बिल्कुल परेशान मत हो। जब तक मैं जिंदा हूं, इस घर पर कोई आंच नहीं आने दूंगा। स्नेहा, तू जब भी किसी मुसीबत में हो, बिना झिझक अपने इस बड़े ताऊ को आवाज देना, हम सब दौड़े चले आएंगे। अब जब तक मेरा अमरू पूरी तरह होश में आकर मुझसे बात नहीं कर लेता, मैं इस चौखट से एक कदम भी बाहर नहीं रखूंगा।” यह कहकर त्रिलोकीनाथ जी ने अमरेंद्र के बिस्तर के पास ही एक कुर्सी खींच ली और वहीं बैठ गए।
कमरे में खामोशी थी, लेकिन उस खामोशी में बरसों की कड़वाहट धुल रही थी। त्रिलोकीनाथ जी भाई का चेहरा देखते हुए अतीत के पन्नों में खो गए। उन्हें याद आने लगा वह बचपन, जब मां-बाबूजी के गुजर जाने के बाद उन्होंने ही अमरेंद्र को पाला-पोसा था। अमरू को जब पहली बार साइकिल चलानी सिखाई थी, तो वह गिरकर रोने लगा था और त्रिलोकीनाथ जी ने उसे अपनी पीठ पर बिठाकर पूरा मोहल्ला घुमाया था। अपनी पढ़ाई के खर्चे काटकर उन्होंने अमरू की इंजीनियरिंग की फीस भरी थी। जब अमरू की बारात निकली थी, तो सबसे आगे नाचने वाले वही थे।
फिर अचानक क्या हो गया था? चंद गज जमीन का टुकड़ा और चार रिश्तेदारों की लगाई हुई आग ने दोनों भाइयों के बीच ऐसी दीवार खड़ी कर दी कि बरसों का प्यार एक झटके में बेगाना हो गया। त्रिलोकीनाथ जी सोचने लगे कि हम इंसान भी कितने नादान होते हैं। जिस मिट्टी के लिए हम अपनों से लड़ते हैं, वह मिट्टी यहीं रह जाती है और जिंदगी हाथ से फिसल जाती है। अगर आज अमरू को कुछ हो जाता, तो उस जमीन के टुकड़े को लेकर वे क्या करते? क्या वह जमीन कभी उनके भाई की मुस्कान लौटा पाती?
सुबह की पहली किरण खिड़की से छनकर कमरे में आई। पंछियों की चहचहाहट के बीच अमरेंद्र की पलकें धीरे-धीरे हिलीं। उसने भारी मन से आंखें खोलीं। धुंधली नजरों से जब उसने अपने सिरहाने देखा, तो उसे लगा कि वह कोई सपना देख रहा है। सामने उसके बड़े भाई त्रिलोकीनाथ जी बैठे थे, उनके चेहरे पर रात भर जागने की थकान और आंखों में सिर्फ और सिर्फ चिंता और ममता का भाव था।
अमरेंद्र की आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। उसने कांपते हाथों से अपने बड़े भाई का हाथ पकड़ लिया। आवाज इतनी कमजोर थी कि बमुश्किल निकल पा रही थी, “भैया… आप? आपने मुझे माफ कर दिया भैया? मैंने आपके साथ कितना गलत किया… उस मामूली जमीन के लिए मैंने अपने उस भाई से मुंह मोड़ लिया जो मेरे लिए पिता समान था। मैंने आपके मान-सम्मान को ठेस पहुंचाई, और आज आप ही मेरी जिंदगी बनकर खड़े हैं… मुझे माफ कर दीजिए भैया, मैं आपका गुनहगार हूं।” अमरेंद्र बच्चों की तरह सिसकने लगा।
त्रिलोकीनाथ जी ने आगे बढ़कर अपने छोटे भाई को सीने से लगा लिया। दोनों भाइयों के आंसुओं ने सात सालों की जमी हुई मैल को एक ही पल में धो डाला। त्रिलोकीनाथ जी बोले, “चुप रह अमरू, अब एक शब्द भी पुरानी बातों का मत निकालना। सब गिले-शिकवे इसी कमरे में दफन हो गए। जमीन-जायदाद तो हाथ की मैल है रे, भाई का साया दुनिया की सबसे बड़ी दौलत होती है। तू ठीक हो गया, मेरे लिए इससे बड़ी कोई जायदाद नहीं है।”
कमरे में खड़े अभिषेक, मयंक, सरोज और स्नेहा की आंखें भी नम थीं, लेकिन उन आंसुओं में अब कोई खौफ नहीं था, बल्कि एक टूटे हुए परिवार के फिर से जुड़ जाने का असीम सुकून था। सुबह की ताजी धूप ने घर के आंगन को रोशनी से भर दिया था, और बरसों बाद उस आंगन में फिर से अपनत्व की महक लौट आई थी।
अक्सर झूठे अहंकार और चंद कागजों के टुकड़ों के लिए हम अपने सगे रिश्तों को दांव पर लगा देते हैं। पर सच यही है कि विपत्ति के समय केवल वही हाथ आगे बढ़ते हैं जिनमें अपनापन और साझा खून बहता है। क्या आपको भी लगता है कि नाराजगी कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अपनों के लिए दिल का एक कोना हमेशा खुला रहना चाहिए? अपने विचार नीचे कमेंट में जरूर साझा करें।
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