सौम्या ने अपने आँसू पोंछे और उसके चेहरे पर एक दृढ़ निश्चय चमक उठा। “तुम बिल्कुल ठीक कह रही हो पल्लवी। मैं चित्रा भाभी की तरह अवसाद के अंधेरे में नहीं डूबना चाहती, न ही अपने बच्चों से उनके दादा-दादी का प्यार छीनना चाहती हूँ। आज तक मैंने अपनी आँखों पर जो स्वार्थ और झूठी शान का चश्मा चढ़ा रखा था, आज मृदुला और तुम्हारी बातों ने उसे उतार फेंका है। आज रात प्रतीक के आते ही मैं उनसे बात करूँगी। कल रविवार है, मैं खुद जाकर माँजी के चरणों में गिरकर अपनी नादानी की माफी मांगूंगी और अपनी देवरानी को गले लगाकर वापस अपने घर लौट जाऊँगी।”
कॉलोनी के पार्क के कोने में बने पल्लवी के घर की बालकनी में आज फिर मोहल्ले की तीन सहेलियों की बैठक जमी थी। मेज पर रखे समोसे ठंडे हो रहे थे और अदरक वाली चाय की भाप कब की उड़ चुकी थी, लेकिन सबकी निगाहें मुख्य द्वार पर टिकी थीं। तभी साड़ी का पल्लू संभालती और एक हाथ में भारी-भरकम राशन का थैला लटकाए मृदुला हांफती हुई भीतर दाखिल हुई।
“अरे भई मृदुला, घड़ी देखा है तुमने? पूरे पैंतालीस मिनट देर से आई हो। हम सब तुम्हारे इंतजार में चाय तक नहीं पी रहे थे कि तुम आओ तो साथ में गरमागरम चुस्कियाँ लें,” सौम्या ने अपनी कलाई घड़ी की तरफ इशारा करते हुए थोड़ी खीझ और थोड़ी शिकायत के सुर में कहा।
मृदुला ने धम्म से सोफे पर बैठते हुए अपने माथे का पसीना पोंछा और थैला जमीन पर टिका दिया। “क्या करूँ सौम्या, तुम तो जानती हो कि भरे-पूरे संयुक्त परिवार की बड़ी बहू हूँ। घर से निकलने से पहले दस काम निपटाने पड़ते हैं। बाबूजी की दवाई का वक्त था, फिर देवर के बच्चों को दूध दिया और रास्ते में लौटते वक्त याद आया कि कल सुबह के नाश्ते के लिए सूजी और सब्जियाँ खत्म हैं, तो बाजार से वो भी लेती आई। सच कहूँ तो कभी-कभी तुम्हारी इस राजा जैसी जिंदगी से बड़ी रश्क होती है मुझे। एकल परिवार का क्या सुख है! न सास-ससुर के नियमों की पाबंदी, न बारह लोगों की रसोई का झंझट। जब मन किया बनाया, जब मन नहीं हुआ तो फोन घुमाया और बाहर से खाना मँगवा लिया। हमारे यहाँ तो अगर एक दिन बाहर से खाना मँगवाने की सोचो, तो पूरे महीने का बजट ही बिगड़ जाए,” मृदुला ने ठंडी सांस भरते हुए सौम्या के सजे-धजे और शांत घर की तरफ देखकर कहा।
मृदुला की बात सुनकर सौम्या के चेहरे पर जो मुस्कान थी, वह अचानक गायब हो गई और उसकी जगह एक गहरी उदासी और खीज ने ले ली। उसने मेज पर रखा चाय का कप उठाते हुए थोड़े तीखे स्वर में कहा, “मृदुला, बाहर से खड़े होकर दूसरे के घर की छत बड़ी चमकीली दिखती है, लेकिन उस छत के नीचे कितनी सीलन है, यह तो रहने वाला ही जानता है। तुम्हें लगता है कि अकेले रहने में मजे हैं? अरे, यहाँ तो अगर सिर में तेज दर्द भी हो और बुखार से बदन तप रहा हो, तब भी उठकर खुद ही अपने लिए चाय बनानी पड़ती है और बच्चों का टिफिन भी तैयार करना पड़ता है। संयुक्त परिवार में तो तुम एक दिन बीमार पड़ जाओ, तो सास या जेठानी-देवरानी में से कोई न कोई रसोई संभाल लेता है। यहाँ तो पतिदेव भी दफ्तर का बहाना बनाकर पल्ला झाड़ लेते हैं।”
मृदुला ने सौम्या की बात को हवा में उड़ाते हुए हँसकर कहा, “अरे रहने भी दे सौम्या, अपनी आजादी की नजर मत उतार। सच बताऊँ तो तुम्हें देखकर मैंने भी अपने पति अनिरुद्ध के कान भरने शुरू कर दिए हैं। रोज रात को उन्हें समझाती हूँ कि अब बहुत हो गया, हम भी किसी दूसरे सेक्टर में छोटा सा फ्लैट लेकर अलग रहेंगे। बस एक बार अनिरुद्ध मान जाएं, फिर देखना मैं भी तुम्हारी तरह पंछी बनकर उड़ूँगी। न सुबह पांच बजे उठने की टेंशन, न किसी के ताने, न किसी से पूछकर मायके जाने की मजबूरी। बस मैं, अनिरुद्ध और हमारे बच्चे—अपनी मर्जी के मालिक!”
सौम्या ने मृदुला का हाथ पकड़ लिया और उसकी आँखों में झांकते हुए बेहद गंभीर आवाज में बोली, “मृदुला, भगवान के लिए अपने बसे-बसाए स्वर्ग में आग लगाने की गलती मत करना, वरना मेरी तरह ताउम्र पछताएगी। तू जिस रोक-टोक से भागना चाहती है न, असल में वही तो परिवार का सुरक्षा कवच है। तू बाहर के खाने की बात कर रही है? अरे, हमारे घर में इसी आलस और आजादी के चक्कर में हफ्ते में चार दिन बाहर से पिज्जा, बर्गर और चाउमीन आता है। नतीजा यह हुआ कि मेरे दस साल के बेटे के लिवर में सूजन आ गई है। डॉक्टर ने सख्त हिदायत दी है कि इसे सिर्फ घर का सादा खाना और हरी सब्जियाँ दो। पर अब बच्चे की जुबान को बाहर के मसालों की ऐसी लत लग गई है कि वो लौकी-तोरई देखकर थाली फेंक देता है। जब हम ससुराल में साथ रहते थे, तो दादा-दादी और चाचा के बच्चों के साथ बैठकर वो खेल-खेल में दाल-रोटी और दही खा लेता था। वहाँ एक-दूसरे को देखकर बच्चों में खाने-पीने के नखरे नहीं होते थे।”
मृदुला के चेहरे की हँसी अब थोड़ी थम गई थी। उसने हैरानी से पूछा, “क्या सच में सौम्या? पर जब तू तीन साल पहले अपनी ससुराल छोड़कर अलग हुई थी, तब तो कितनी खुश थी। फिर अब क्या हो गया?”
सौम्या की आँखों की कोरें भीग गईं। उसने पल्लू से आँख का कोना पोंछते हुए कहा, “हाँ मृदुला, तब मेरी आँखों पर अहंकार और झूठी आजादी की पट्टी बंधी थी। मुझे लगता था कि मैं ही सारा काम करती हूँ। लेकिन यहाँ आकर समझ आया कि काम का असली बोझ क्या होता है। ससुराल में मेरी देवरानी बैंक में नौकरी करती थी, तो सुबह का नाश्ता और दोपहर का खाना मेरी जिम्मेदारी होती थी, लेकिन शाम को पांच बजे जब वो लौटती थी, तो रात के खाने और बर्तन-रसोई की सारी जिम्मेदारी वो खुद संभाल लेती थी। शाम के वक्त मैं आराम से छत पर टहलती थी या टीवी देखती थी। और अब? अब सुबह आंख खुलने से लेकर रात को ग्यारह बजे तक मैं ही रसोई में खड़ी रहती हूँ, मैं ही कपड़े धोती हूँ, मैं ही बच्चों को ट्यूशन छोड़ने जाती हूँ और मैं ही बिजली-पानी के बिल की चिंता करती हूँ।”
सौम्या ने एक गहरी सांस ली और अपनी बात जारी रखी, “और सबसे ज्यादा दुख तब होता है जब मैं अपने पति प्रतीक से थोड़ी मदद मांगती हूँ। वो साफ मुंह पर कह देते हैं कि सौम्या, अलग घर बसाने की जिद तुम्हारी थी, मैंने तो पहले ही कहा था कि मेरे पास दफ्तर से फुर्सत नहीं होती, अब तुमने ओखली में सिर दिया है तो मूसल से क्या डरना, खुद ही संभालो। मृदुला, संयुक्त परिवार में कुछ नियम और बंधन जरूर होते हैं, लेकिन एकल परिवार का बंधन तो अदृश्य हथकड़ियों जैसा है। यहाँ अगर मुझे बाजार से एक सुई भी लानी हो, तो पहले पूरे घर के पांचों ताले बंद करने पड़ते हैं और दोनों बच्चों को साथ घसीटना पड़ता है। ससुराल में बच्चों को दादी के पास छोड़कर मैं निश्चिंत होकर कहीं भी चली जाती थी। वहाँ घर के खर्चे तीन हिस्सों में बंट जाते थे, तो हर महीने अच्छी-खासी बचत हो जाती थी। यहाँ तो फ्लैट का किराया, बिजली का बिल और राशन का खर्च अकेले प्रतीक की जेब पर पड़ता है, जिससे घर में हर महीने की पच्चीस तारीख के बाद पैसों को लेकर किचकिच शुरू हो जाती है। सच ही कहा है बुजुर्गों ने कि दूर के ढोल बड़े सुहावने लगते हैं।”
तभी मेजबान पल्लवी रसोई से गरमागरम चाय की ट्रे और पकौड़ियाँ लेकर आ गई। सौम्या की बातों ने माहौल को इतना गंभीर बना दिया था कि कुछ देर तक बालकनी में सिर्फ कपों और प्लेटों के टकराने की आवाज ही गूंजती रही।
चुप्पी तोड़ते हुए पल्लवी ने चाय का कप मृदुला को थमाया और धीमी आवाज में बोली, “अच्छा तुम लोगों ने सुना? अपने सी-ब्लॉक वाली चित्रा भाभी को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा है। डॉक्टर बता रहे हैं कि उन्हें गहरा डिप्रेशन यानी अवसाद हो गया है और नींद की गोलियाँ देनी पड़ रही हैं।”
“हे भगवान! चित्रा भाभी को? वो तो कितनी हँसमुख और शान से रहने वाली महिला थीं, उन्हें अचानक ये क्या हो गया?” मृदुला और सौम्या दोनों एक साथ चौंककर बोल पड़ीं।
पल्लवी ने कुर्सी खींचकर बैठते हुए बताया, “वही अकेलापन, जिसकी बात अभी सौम्या कर रही थी। चित्रा भाभी ने भी शादी के कुछ साल बाद ही सास-ससुर और ननद से झगड़ा करके अलग घर बसा लिया था। उन्हें किसी का दखल पसंद नहीं था। जब तक दोनों बच्चे छोटे थे और स्कूल जाते थे, तब तक तो उनका वक्त बच्चों के पीछे भागते हुए कट गया। लेकिन पिछले साल उनका बेटा पुणे चला गया और इस साल बेटी को भी दिल्ली के कॉलेज में हॉस्टल मिल गया। उनके पति सुबह आठ बजे अपनी फैक्ट्री निकल जाते हैं और रात को नौ बजे थके-हारे लौटते हैं। सुबह नौ बजे से रात नौ बजे तक उस बड़े से तीन मंजिला मकान में चित्रा भाभी बिल्कुल अकेली काटने को दौड़ती दीवारों को ताकती रहती थीं। अपने घमंड में उन्होंने रिश्तेदारों से तो पहले ही नाता तोड़ लिया था, तो कोई आने-जाने वाला भी नहीं बचा। बस इसी भयानक सूनेपन ने उन्हें अंदर ही अंदर खोखला कर दिया।”
पल्लवी ने अपनी चाय का एक घूंट भरा और एक संतोष भरी मुस्कान के साथ बोली, “अब मुझे ही देख लो। मेरे भी दोनों बच्चे उच्च शिक्षा के लिए घर से बाहर हैं। लेकिन मेरे घर में मेरी सासु माँ और ससुर जी हमारे साथ रहते हैं। बच्चों के जाने के बाद मुझे एक दिन भी घर सूना नहीं लगा। सुबह उठती हूँ तो बाबूजी के साथ बगीचे में पौधों को पानी देती हूँ, दोपहर में सासु माँ के साथ बैठकर पुराने भजन सुनती हूँ या अचार-बड़ियाँ डालती हूँ। बुजुर्गों के घर में होने से नाते-रिश्तेदारों का भी मान-सम्मान से आना-जाना लगा रहता है। कभी बुआ सास आ जाती हैं, कभी मामाजी आ जाते हैं। घर में हमेशा रौनक बनी रहती है। बुजुर्गों की छांव बरगद के पेड़ जैसी होती है, जो भले ही थोड़ी जगह घेरती है, पर धूप और आंधी से पूरे परिवार को बचाकर रखती है।”
पल्लवी और सौम्या की बातों ने मृदुला के दिमाग की सारी परतें खोलकर रख दी थीं। जिस चकाचौंध और आजादी के पीछे वह भाग रही थी, उसके पीछे का अंधेरा इतना डरावना होगा, उसने सपने में भी नहीं सोचा था। अचानक मृदुला ने घड़ी देखी और तेजी से अपना राशन का थैला उठाते हुए खड़ी हो गई।
“अरे मैं तो बातों-बातों में समय ही भूल गई! मुझे तुरंत निकलना होगा। घर में माँजी और बाबूजी रात को आठ बजे ही खाना खा लेते हैं और उन्हें चूल्हे से उतरी हुई गरम और फूली हुई रोटियाँ ही पचती हैं। मेरी देवरानी ने अब तक दाल-सब्जी बना ली होगी, बस मुझे जाकर आटा गूंथना है,” मृदुला ने चप्पल पहनते हुए कहा, लेकिन आज उसकी आवाज में काम की झुंझलाहट नहीं, बल्कि अपनों की परवाह और जिम्मेदारी का एक गौरव झलक रहा था।
मृदुला को जाते देख सौम्या की आँखों में फिर से नमी तैर गई। उसने मन ही मन सोचा कि मृदुला कितनी किस्मत वाली है। वह सास-ससुर के लिए गरम रोटियाँ सेकेगी, तो खुद भी सबके साथ बैठकर गरम निवाला खाएगी। और यहाँ मैं हूँ, जिसे रात को आलस के मारे सुबह की बची हुई ठंडी रोटी अचार के साथ अकेले चबानी पड़ती है। उसे अपनी सासु माँ की वो आवाज कानों में गूंजने लगी, जब वह रसोई में रोटी सेकती थी और सासु माँ बाहर से आवाज लगाती थीं— ‘बहू, अब गैस बंद करके अपनी भी दो गरम रोटी सेक कर ले आ, मेरी थाली में से ही सब्जी ले लेना, दोनों सास-बहू साथ बैठकर खाएंगे।’
सौम्या को शून्य में निहारते और आँसू बहाते देख पल्लवी ने उसके कंधे पर स्नेह से हाथ रखा और कहा, “सौम्या, सुबह का भूला अगर शाम को घर लौट आए, तो उसे भूला नहीं कहते। तुम्हारी सासु माँ और देवरानी बहुत नेक दिल हैं। अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है। अपने अहम की इस दीवार को गिरा दो और वापस अपने आँगन में लौट जाओ।”
सौम्या ने अपने आँसू पोंछे और उसके चेहरे पर एक दृढ़ निश्चय चमक उठा। “तुम बिल्कुल ठीक कह रही हो पल्लवी। मैं चित्रा भाभी की तरह अवसाद के अंधेरे में नहीं डूबना चाहती, न ही अपने बच्चों से उनके दादा-दादी का प्यार छीनना चाहती हूँ। आज तक मैंने अपनी आँखों पर जो स्वार्थ और झूठी शान का चश्मा चढ़ा रखा था, आज मृदुला और तुम्हारी बातों ने उसे उतार फेंका है। आज रात प्रतीक के आते ही मैं उनसे बात करूँगी। कल रविवार है, मैं खुद जाकर माँजी के चरणों में गिरकर अपनी नादानी की माफी मांगूंगी और अपनी देवरानी को गले लगाकर वापस अपने घर लौट जाऊँगी।”
अगले ही हफ्ते सौम्या ने किराए का वह सूना फ्लैट खाली कर दिया और वापस अपने संयुक्त परिवार के उसी चहकते हुए आँगन में लौट आई। सासु माँ ने भी पुरानी सारी कड़वाहट भुलाकर अपनी बड़ी बहू को सीने से लगा लिया और पूरे मोहल्ले में लड्डू बांटे। उस रात जब सौम्या ने पूरे परिवार के साथ आँगन में दरी बिछाकर खाना खाया और सासु माँ ने अपने हाथों से उसके सिर में तेल की मालिश की, तो सौम्या को महसूस हुआ कि असली आजादी अपनों से कटकर जीने में नहीं, बल्कि अपनों के प्रेम के बंधन में बंधकर जीने में है। उधर मृदुला ने भी अपने पति अनिरुद्ध से अलग घर लेने की जिद हमेशा के लिए छोड़ दी और अपने परिवार की डोर को और भी मजबूती से थाम लिया।
जीवन की यही कड़वी सच्चाई है कि इंसान को हमेशा अपनी थाली का घी कम और दूसरे की थाली का ज्यादा नजर आता है। जो हमारे पास होता है, हम उसकी कद्र नहीं करते और जो नहीं है, उसके पीछे दौड़ते रहते हैं। जैसे किसी के बच्चे अगर विदेश में ऊँचे पद पर काम कर रहे हों, तो समाज के लोग सोचते हैं कि वाह, इनके तो क्या कहने, बेटा विदेश से लाखों रुपये भेजता होगा, इनकी तो चांदी ही चांदी है। लेकिन यह केवल सिक्के का एक पहलू है। जरा दूसरे पहलू से झांककर देखिए—विदेश की उस बर्फीली ठंड में अपने देश, अपने त्योहारों और माँ के हाथ के खाने के लिए तरसते उस बच्चे का अकेलापन, और इधर भारत में अपने विशाल मकान के बरामदे में बैठे उन बूढ़े माँ-बाप की पथराई आँखें, जो दिवाली और होली पर पड़ोसियों के घरों में बच्चों की रौनक देखकर चुपके से रो पड़ते हैं। बैंक खाते में आने वाले विदेशी नोट कभी भी बुढ़ापे में काँपते हाथों को थामने वाले बेटे की उंगलियों की जगह नहीं ले सकते। इसलिए अपनी खुशियों को दूसरों के तराजू में तौलना बंद कीजिए और जो रिश्ते ईश्वर ने आपको दिए हैं, उन्हें सहेज कर रखिए।
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