पराए जो अपने से लगे – मधु वशिष्ठ

सुबह-सुबह राठौर जी घर के बाहर बैठकर चाय की चुस्कियां ले रहे थे। मुझे देखते ही उन्होंने अंदर आने का इशारा किया। उनका मेरा संबंध आज का नहीं पिछले 40 सालों का है ।जी हां  हमने और राठौड़ जी ने लगभग साथ साथ ही घर बनाया था। एक दूसरे की दुख तकलीफों को भी यथासंभव हमने बांटने की कोशिश भी की थी।

सच कहते हैं अपने रिश्तेदार भले ही बाद में आए लेकिन पड़ोसी अच्छे होने ज्यादा जरूरी है क्योंकि वह तो हर समय ही साथ होते हैं चाहे खून का रिश्ता ना हो पर यह रिश्ता अच्छा हो तो जिंदगी बहुत अच्छी तरह से कट जाती है।

       हम जब भी मिलते हैं तो अक्सर पुरानी यादें ही ताजा करते थे उस वक्त दोनों के घर में माता पिता और बच्चों की भीड़-भाड़ ही रहती थी। धीरे धीरे मेरी भी दोनों लड़कियों का विवाह हो गया और राठौर जी के भी तीनों बच्चे नौकरी के कारण घर से दूर ही चले गए थे।

एक बेटा तो हैदराबाद में था लेकिन बाकी दोनों बच्चे विदेश में थे। मैं और मेरी पत्नी ऐसे ही राठौर जी और उनकी पत्नी ही घर में रह गए थे।हम दोनों के रिटायर होने के बाद अक्सर हम शाम की चाय पुरानी यादों को याद करते हुए साथ ही पीते थे।

    तब समय का कितना अभाव था और अब समय है कि काटे ही नहीं कटता था। कभी-कभी जब बच्चे मिलने आते थे तो घर थोड़ा भरा सा लगता वरना हम दोनों अक्सर यही सोचते थे कि दो घर भी बनाने की क्या जरूरत थी कितना अच्छा होता यदि हम दोनों एक ही घर में रह रहे होते ।बच्चों ने तो वैसे भी अलग ही ठिकाना कर लिया था।

      यूं भी समय बीतता रहता तो बहुत अच्छा था लेकिन पिछले साल राठौर जी की पत्नी को हुआ मौसमी बुखार टाइफाइड में बदल गया और उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई । हालांकि उनके बच्चे उन्हें अपने साथ ले भी गए थे लेकिन ना तो वह विदेश में और ना ही स्वदेश के दूसरे शहर में वह अपना ठिकाना बना पाए।

उनके जाने के बाद हम भी बहुत अकेले से ही हो गए थे। कुछ महीनों के बाद वे वापस अपने घर लौट आए।हालांकि मैं और मेरी पत्नी यथासंभव कोशिश करते थे कि वह हमारे साथ ही खाना खा ले या चाय पी ले लेकिन शायद उनका मन इस बात को स्वीकृति नहीं देता था अंततः उन्होंने अपने घर में एक रोटी बनाने वाला और झाड़ू पोछा करने वाला ड्राइवर ही रख लिया था।

उनके पास ड्राइवर होने का फायदा यह होता था कि हम अक्सर उनके साथ ही मंदिरों में या अपने घर दिल्ली से वृंदावन की यात्रा को या कभी ऐसे कहीं घूमने चले जाते थे। साथ घूमने से कुछ समय तो अच्छे से कट जाता था

लेकिन शायद ऐसा लगता था कि उनके अंदर की उदासी दिनों दिन बढ़ती ही जा रही है क्योंकि कई बार वह चाय पीते हुए भी हम को अनदेखा कर देते थे और अपने ख्यालों में ही खोए रहते थे। चाह कर भी उनके लिए हम कुछ नहीं कर पाते थे।

            हमारे घर के पीछे वाले घर में मिस्टर अवस्थी अपने परिवार के साथ रहते थे ।उनकी पत्नी भी बहुत समय पहले गुजर चुकी थी लेकिन उनके बेटा बहू और पोता पोती भी  साथ में ही थे।काफी समय से मिस्टर अवस्थी भी पार्क में आते हुए नहीं दिख रहे थे तो मेरे कहने पर हम दोनों उनके घर गए

तो हमने देखा कि मिस्टर अवस्थी बीमार अवस्था में घर में सो रहे थे और उनका पूरा परिवार कहीं घूमने के लिए कुछ दिनों के लिए गया हुआ था। यहां से ही राठौर जी की दिनचर्या बदल गई वह अवस्थी जी को अपने साथ ले आए और उनका पूरा ख्याल रखा और जल्दी ही अवस्थी जी बहुत स्वस्थ हो गए थे।

वापिस आने के बाद अवस्थी जी के बच्चों ने भी राठौर जी का और मेरा बहुत धन्यवाद किया। शायद अवस्थी जी की सहायता करके राठौर जी को बहुत अच्छा लगा होगा तब से उन्होंने अपने घर के कमरों को उन सीनियर सिटीजंस के लिए खुला छोड़ दिया था जो कि किसी भी कारणवश किसी के सहारे को ढूंढ रहे होते थे।

धीरे-धीरे अवस्थी जी और उनके दोस्तों की हर समय ही वहां पर भीड़ भाड़ रहने लगी। उनका एक कमरा क्लब में परिवर्तित हो चुका था और अक्सर ऐसे वृद्धजन जिनके बच्चे कहीं जाना चाहते थे लेकिन अपने माता-पिता को अकेला छोड़ना भी नहीं चाहते थे ऐसे उनके दोस्त उनके कमरे में रह भी जाते थे।

हालांकि इसके बदले में अब धीरे-धीरे उन्होंने पेमेंट करना भी शुरू कर दिया था। बहुत से जवान बच्चे भी हम लोगों का हालचाल और ज़रूरतें पूछने या कोई भी सहायता करने के लिए अक्सर आते रहते थे। 

         धीरे धीरे उनका पूरा घर अब उनके दोस्तों से हर समय भरा ही रहता था। काम तो उनका ड्राइवर करता ही था जल्दी ही उन्होंने चाय बनाने और रोटी बनाने के लिए एक अलग नौकर भी रख लिया था। अब उनका घर एक क्लब हाउस में परिवर्तित हो गया था जहां पर कई बुजुर्गवार अपना अखबार मंगवाते थे और वहां ही छोड़ जाते थे

जो कि औरों के पढ़ने के भी काम आता था इसी तरह से बहुत सी किताबें भी उनके बाहर के बरामदे की अलमारी में शोभा पा रही थी। उनके घर के क्लब हाउस में पढ़ती हुई जगह की कमी को देखते हुए मैंने भी अपने घर की बीच की दीवार खोल दी थी हैरानी तो तब हुई जब मेरी पत्नी के पास भी बहुत सी महिलाएं आने लगी।

अब हम लोगों को बिल्कुल अकेलापन महसूस नहीं होता सारा दिन घर में ठहाके चलते रहते हैं। एक्सरसाइज करवाने के लिए योगा ट्रेनर भी घर पर ही आने लगा। सोचा भी नहीं था कि घर इनकम और खुशी दोनों दे सकता है।

      जल्द ही हम लोगों ने अपने घर की ऊपर भी मंजिलें बनवा ली थी बच्चों के लिए अलग ऊपर कमरे रख दिए गए थे अब बच्चे जब भी आते तो हमारी तरफ से बेहद निश्चिंत और खुश होते। 

       अब तो हमें ऐसा लगने लगा था मानो हमारा परिवार ही बदल गया हो।  हम सब अब बहुत खुश थे और अकेले तो बिल्कुल नहीं थे। अब हम पहले की तरह ही व्यस्त थे और हमारी दिनचर्या भी नियमित हो चुकी थी। आने वाले सब लोगों का स्नेहिल व्यवहार हमें अपनापन ही देता था हमें कभी महसूस नहीं हुआ कि वह सब पराए हैं अभी तो वह सब पराए हमारे परिवार का हिस्सा ही बन चुके थे। 

मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा

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