“अंजलि, बेटा… सब ठीक तो है ना? तू मुंह से तो कुछ नहीं कहती, लेकिन एक माँ अपनी बेटी की खामोशी भी पढ़ लेती है। तेरी आवाज़ में वो पुरानी वाली खनक नहीं है, एक अजीब सी उदासी झलकती है। अगर कोई बात है तो मुझे बता दे।” फोन के दूसरी तरफ से अंजलि की माँ, सुमित्रा जी की आवाज़ में एक गहरी चिंता साफ छलक रही थी।
अंजलि ने अपने आँसुओं को पलकों के किनारे ही रोक लिया और अपनी आवाज़ को सामान्य करते हुए एक हल्की सी हँसी का आवरण ओढ़ लिया। “अरे माँ, आप भी ना, खामखां परेशान होती रहती हैं। मुझे यहाँ क्या कमी है? सब कुछ तो बहुत अच्छा है। बस, कभी-कभी लगता है कि इस बड़े से घर में अभी भी मैं एक मेहमान ही हूँ। रोज सुबह उठकर यही कोशिश करती हूँ कि इस अजनबी से लगने वाले ससुराल को पूरी तरह से अपना बना लूँ। न जाने वो दिन कब आएगा जब मैं इस घर की दीवारों में अपनी परछाई देख सकूँगी। पर आप मेरी चिंता मत कीजिए माँ, आपकी बेटी इतनी जल्दी हार मानने वालों में से नहीं है। मैं इस घर को अपना बनाकर ही रहूँगी।”
इतना कहकर अंजलि ने जल्दी से फोन काट दिया, क्योंकि उसे डर था कि अगर वो एक पल भी और बोली, तो उसके गले में अटका हुआ रुलाई का गोला फूट पड़ेगा। आज अंजलि और रोहन की शादी की दूसरी सालगिरह थी। रोहन अपने ऑफिस के किसी बहुत जरूरी प्रोजेक्ट के सिलसिले में पिछले पंद्रह दिनों से शहर से बाहर, बैंगलोर गया हुआ था। सुबह-सुबह रोहन का फोन आ चुका था और उसने ढेर सारी बधाइयाँ भी दी थीं, लेकिन इस खास दिन पर पति का पास न होना अंजलि के मन में एक खालीपन सा भर रहा था। फोन रखने के बाद अंजलि ने एक गहरी सांस ली। उसने अपने मन से सारी नकारात्मक बातों को झटकने का फैसला किया। “आज का दिन उदास होने का नहीं है,” उसने खुद से कहा और नहा-धोकर पूजा घर की तरफ चल दी।
पूजा घर में अंजलि ने धूपबत्ती जलाई और भगवान की मूर्ति के सामने हाथ जोड़कर बैठ गई। धूप की वो भीनी-भीनी खुशबू और पूजा की घंटी की मीठी ध्वनि ने जैसे उसके मन के सारे जालों को साफ कर दिया। उसके अंदर चल रही उथल-पुथल शांत होने लगी और एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार होने लगा। पूजा खत्म करने के बाद अंजलि सीधे रसोई में गई। आज सालगिरह का दिन था, तो उसने सोचा कि क्यों न भगवान को भोग लगाने और घरवालों का मुँह मीठा करने के लिए खीर बनाई जाए। वैसे भी रोहन को उसके हाथ की बनी केसर पिस्ते वाली खीर बहुत पसंद थी। उसने फ्रिज से दूध निकाला, चावल धोए और बहुत प्यार से, धीमी आंच पर खीर पकने के लिए रख दी। धीरे-धीरे पूरे घर में इलायची और केसर की सोंधी महक फैलने लगी।
तभी रसोई के दरवाजे पर उसकी सास, सावित्री देवी आकर खड़ी हो गईं। उनकी नाक सिकुड़ी हुई थी और माथे पर बल पड़े हुए थे। “ये सुबह-सुबह रसोई में इतनी महक किस चीज़ की उठ रही है? लगता है आज फिर दूध और मेवों का सत्यानाश किया जा रहा है।” सावित्री देवी की आवाज़ में हमेशा की तरह वही कड़वाहट और ताने का पुट था, जो अंजलि के कानों में किसी सीसे की तरह पिघल कर गिरता था।
अंजलि ने घबराहट में गैस धीमी की और पल्लू सही करते हुए अपनी सास की तरफ पलटी। वह मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोली, “माँ जी, आज मेरी और रोहन की शादी की सालगिरह है। रोहन तो यहाँ हैं नहीं, तो मैंने सोचा कि भगवान के लिए कुछ मीठा बना दूँ। बस थोड़ी सी खीर बनाई है, प्रसाद के लिए।”
सावित्री देवी ने हाथ नचाते हुए मुँह बनाया और व्यंग्यात्मक लहजे में बोलीं, “अरे महारानी, प्रसाद ही चढ़ाना था तो दो रुपये के बताशे या गुड़ की डली रख देतीं भगवान के सामने। भगवान क्या तुमसे छप्पन भोग मांग रहे हैं? तुम आजकल की लड़कियों को तो बस बहाना चाहिए पैसे फूंकने का। दूध कितना महंगा आता है, ऊपर से ये काजू-बादाम। ये कोई तुम्हारे बाप का घर नहीं है जहाँ जब मन किया रईसी दिखा दी। जब बेटा घर पर है ही नहीं, तो ये सब दिखावा करने की क्या जरूरत थी? बस चूल्हा जलाना और फालतू का खर्च करना आता है तुम्हें।”
सास के ये शब्द अंजलि के दिल को किसी तीर की तरह बेध गए। उसका चेहरा फक पड़ गया। उसने तो बस एक छोटी सी खुशी बाँटने की कोशिश की थी, लेकिन बदले में उसे फिर वही ताने मिले। उसने अपनी रुलाई रोकते हुए धीमी आवाज़ में कहा, “माँ जी, मैंने बहुत थोड़ा सा दूध इस्तेमाल किया है, और ज्यादा मेवे भी नहीं डाले। बस एक-एक कटोरी ही बनेगी सबके लिए।”
“रहने दो, अब मुझे मत सिखाओ कि रसोई कैसे चलती है। तुम्हारे आते ही इस घर की बरकत जैसे कहीं चली गई है।” सावित्री देवी बड़बड़ाती हुई वहां से मुड़ गईं। अंजलि वहीं रसोई के स्लैब के पास खड़ी रह गई। उसकी आँखों से दो बूँद आँसू छलक कर गैस के चूल्हे पर गिरे और छन्न से उड़ गए।
तभी पीछे से एक भारी लेकिन शांत आवाज़ गूंजी। अंजलि के ससुर, रामनाथ जी, जो अपने कमरे से निकलकर अखबार हाथ में लिए बाहर आ रहे थे, उन्होंने अपनी पत्नी सावित्री की सारी बातें सुन ली थीं। वो चलते हुए डाइनिंग टेबल के पास आए और अपनी पत्नी को टोकते हुए बोले, “सावित्री, मुझे लगता है कि तुम्हें अपनी ज़ुबान पर थोड़ा लगाम लगानी चाहिए। तुम हमेशा इस बच्ची के पीछे क्यों पड़ी रहती हो? उससे दूसरों की एक छोटी सी खुशी भी बर्दाश्त नहीं होती क्या?”
सावित्री देवी पलटीं और झल्लाते हुए बोलीं, “मैं क्या गलत कह रही हूँ? पैसे क्या पेड़ पर उगते हैं? लड़का है नहीं घर पर, और इन्हें सालगिरह की पार्टी मनानी है। घर का नुकसान मुझे ही तो देखना पड़ेगा।”
रामनाथ जी ने अपना चश्मा नाक पर ठीक किया और गहरी साँस लेते हुए कहा, “सावित्री, पैसे पेड़ पर नहीं उगते, लेकिन खुशियाँ भी किसी बाज़ार में नहीं बिकतीं। तुम भूल गई क्या अपने वो दिन जब तुम इस घर में नई-नई ब्याह कर आई थी? तब मेरी माँ, यानी तुम्हारी सास, तुम्हें भी बात-बात पर ऐसे ही ताने देती थीं। तब तुम कमरे में छुपकर कितना रोती थी, याद है तुम्हें? क्या तुम चाहती हो कि जो तुमने झेला, वही ये बच्ची भी झेले? आज वो कल की सावित्री है, और तुम आज की सास बन गई हो। अंजलि इस घर की बहू है, और इस घर पर जितना मेरा और तुम्हारा हक है, उतना ही उसका भी है। वो कोई गैर नहीं है। उसने ये खीर सिर्फ अपने लिए या रोहन के लिए नहीं बनाई है, बल्कि इस पूरे परिवार के लिए बनाई है ताकि हम सब मिलकर उसकी खुशी में शरीक हो सकें। और तुम हो कि चार काजू-बादाम का हिसाब लेकर बैठ गई।”
सावित्री देवी अपने पति की इस फटकार से एकदम खामोश हो गईं। रामनाथ जी आगे बोले, “जब बच्चे कुछ अच्छा करने की कोशिश करें, तो उन्हें आशीर्वाद देना चाहिए, उनका हौसला तोड़ना नहीं चाहिए। जाओ अंजलि बेटा, तुम आराम से अपनी खीर बनाओ। मैं तो आज कटोरी भर के खाऊंगा। मेरी तरफ से तुम्हें सालगिरह की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ।” रामनाथ जी ने प्यार से अंजलि के सिर पर हाथ रखा और अखबार लेकर बाहर धूप में कुर्सी पर जाकर बैठ गए।
ससुर के इस अपनेपन और समर्थन ने अंजलि के दिल में उमड़ रहे दुखों के सैलाब को एकदम से शांत कर दिया। उसे लगा कि इस विशाल, बेगाने से घर में कोई तो है जो उसे समझता है, जो उसे एक इंसान का दर्जा देता है। उसने अपने आँसू पोंछे और चेहरे पर एक सच्ची मुस्कान लाते हुए वापस खीर चलाने लगी।
खीर जब पककर तैयार हो गई, तो अंजलि ने सबसे पहले भगवान को भोग लगाया। उसके बाद उसने एक सुंदर सी ट्रे में दो कटोरियों में खीर निकाली, ऊपर से थोड़े से पिस्ते सजाए और बाहर धूप में बैठे ससुर जी और कमरे में बैठी सास के लिए ले गई। जब उसने रामनाथ जी को खीर दी, तो उन्होंने बड़े चाव से उसे खाया और खूब तारीफ की। “वाह बेटा, बिल्कुल अमृत जैसी बनी है। रोहन सचमुच बहुत लकी है जो उसे तुम्हारे जैसी गुणवान पत्नी मिली।”
अंजलि मुस्कुराई और फिर वह कांपते हाथों से एक कटोरी लेकर सावित्री देवी के कमरे में गई। सावित्री देवी पलंग पर बैठी टीवी देख रही थीं। अंजलि ने झिझकते हुए कटोरी उनके सामने की मेज पर रखी। “माँ जी, प्रसाद… आप खाकर देखिए, मीठा ठीक है या नहीं।”
सावित्री देवी ने अंजलि की तरफ एक नज़र देखा। रामनाथ जी की बातों ने कहीं न कहीं उनके अंदर की उस कठोर औरत को झकझोर दिया था। उन्हें सच में अपने पुराने दिन याद आ गए थे जब वह भी एक नई नवेली दुल्हन के रूप में इस घर में अपनी जगह बनाने के लिए तरसती थीं। उन्होंने चुपचाप कटोरी उठा ली। खीर सच में बहुत स्वादिष्ट थी। उसमें केवल दूध और मेवे ही नहीं थे, बल्कि अंजलि का वह समर्पण और प्यार भी घुला था जिसे सावित्री देवी अपने अहंकार के कारण देख नहीं पा रही थीं।
पहली बार सावित्री देवी की आँखों में एक अजीब सी नरमी दिखाई दी। उन्होंने खीर खत्म की और धीमी सी आवाज़ में कहा, “खीर… खीर अच्छी बनी है। और… सालगिरह मुबारक हो बहु।”
ये चंद शब्द अंजलि के लिए किसी बड़े खजाने से कम नहीं थे। आज उसे लगा कि उसके सब्र का फल उसे मिलना शुरू हो गया है। एक झटके में तो कोई भी रिश्ता नहीं बदलता, लेकिन आज सावित्री देवी के व्यवहार में आई ये छोटी सी दरार इस बात का सबूत थी कि अंजलि के प्यार की गर्माहट इस घर की बर्फ को पिघला रही है।
दोपहर को जब रोहन का दोबारा फोन आया, तो अंजलि की आवाज़ में सुबह वाली वह छिपी हुई उदासी नहीं थी। उसने बड़ी चहकती हुई आवाज़ में रोहन से बात की और उसे खीर वाले पूरे वाकये के बारे में बताया, लेकिन उसने अपनी सास के तानों का ज़िक्र नहीं किया, बल्कि ससुर जी की तारीफ और सास द्वारा दी गई बधाई की बात बड़े चाव से बताई। रोहन भी अपनी पत्नी की खुशी सुनकर बहुत खुश हुआ।
अंजलि को आज एक बात बहुत गहराई से समझ आ गई थी कि रिश्ते पेड़ की तरह होते हैं। उन्हें अपनेपन और प्यार के पानी से सींचना पड़ता है। कभी-कभी आंधियां आती हैं, तानों के रूप में, कड़वाहट के रूप में, लेकिन अगर जड़ें सब्र और आदर से मजबूत हों, तो पेड़ कभी नहीं उखड़ता। मायके से विदा होकर आई एक लड़की के लिए ससुराल कभी भी एक दिन में अपना नहीं होता। यह एक लंबा सफर है, जहाँ हर दिन खुद को साबित करना पड़ता है, हर दिन नई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। लेकिन अंजलि अब इन चुनौतियों से डरने वाली नहीं थी। उसे पता था कि रामनाथ जी जैसे ससुर के रूप में उसके पास एक मजबूत छाता है, और सावित्री देवी का दिल जीतने के लिए उसके पास प्यार का वह अथाह समंदर है, जो कभी खत्म नहीं होगा।
आज घर में गूंजती पूजा की घंटी की आवाज़ और खीर की उस मीठी महक ने अंजलि को इस अजनबी आँगन में अपनी खुद की जड़ें जमाने का एक नया हौसला दे दिया था। उसे यकीन हो गया था कि वह दिन दूर नहीं जब यह घर सिर्फ रोहन का या उसके माता-पिता का नहीं, बल्कि पूरी तरह से ‘उसका’ अपना घर होगा।
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लेखिका : रमा शुक्ला