रसोई में बर्तनों के टकराने की आवाज़ आज कुछ ज़्यादा ही तीखी थी। दिल्ली की उस सर्द शाम में भी मीरा के माथे पर पसीने की बूंदें झलक रही थीं। उसने गैस का बर्नर बंद किया और गीले हाथों को अपने एप्रन से पोंछते हुए बाहर हॉल की तरफ देखा। वहाँ सोफे पर उसका पति, समीर, दोनों हाथों से अपना सिर पकड़े बैठा था। पूरे घर में फिनाइल और कड़वी दवाइयों की एक अजीब सी गंध पसरी हुई थी, जिसने पिछले आठ महीनों से मयूर विहार के इस छोटे से टू-बीएचके फ्लैट को जैसे एक घुटन भरे अस्पताल के वार्ड में तब्दील कर दिया था। मीरा के भीतर महीनों से उबल रहा गुस्सा आज बर्दाश्त की सारी हदें पार कर चुका था। वह तमतमाते हुए हॉल में आई और समीर के सामने खड़ी हो गई।
“आखिर कब तक चलेगा ये सब?” मीरा की आवाज़ में थकान और क्रोध का मिश्रण था, जिसे वह दबाने की नाकाम कोशिश कर रही थी। “मैं कोई मशीन नहीं हूँ, समीर! सुबह छह बजे उठकर बच्चों का टिफिन बनाओ, फिर तुम्हारी और बाबूजी की चाय, फिर माँ जी की दवाइयाँ, उनका बिस्तर साफ करो, उन्हें नहलाओ… और फिर भागकर अपने ऑफिस जाओ! मैं एक इंसान हूँ, कोई नर्स नहीं जिसे तुमने चौबीस घंटे की ड्यूटी पर रखा हुआ है। और ऊपर से ये तंगी! हर महीने घर का बजट ऐसे बिगड़ता है जैसे कोई मजाक हो। दाल-सब्जी के भाव आसमान छू रहे हैं और तुम्हारी आधी से ज़्यादा तनख्वाह इन दवाइयों और डॉक्टर की फीस में स्वाहा हो जाती है।”
समीर ने बिना सिर उठाए धीमी आवाज़ में कहा, “तो मैं क्या करूँ मीरा? सड़क पर छोड़ दूँ उन्हें? माँ की हालत तुमने देखी है… उनके गुर्दे काम नहीं कर रहे हैं। बाबूजी बेबस हैं। मैं उनका बेटा हूँ, क्या उन्हें इस हालत में मरने के लिए छोड़ दूँ?”
“बेटे तो तुम्हारे बड़े भाई राजीव भी हैं!” मीरा की आवाज़ अब तेज हो गई थी। “गुरुग्राम के उस आलीशान पेंटहाउस में बैठकर क्या उन्हें अपनी माँ की बीमारी नजर नहीं आती? उनके पास तो पैसा भी है और नौकर-चाकर भी। वो क्यों नहीं उठाते जिम्मेदारी? लेकिन नहीं, उन्हें तो अपना स्टेटस मेन्टेन करना है! और यहाँ? यहाँ हम अपनी एक-एक पाई जोड़कर सिर्फ इसलिए घुट रहे हैं ताकि तुम्हारे भाई का आराम न छिने। बाबूजी से कहो कि वो राजीव भैया से बात करें। कब तक हम इस शहर में इस घुटन भरी जिंदगी को ढोते रहेंगे?”
समीर का चेहरा पीला पड़ गया। वह जानता था कि मीरा पूरी तरह से गलत नहीं थी। एक प्राइवेट कंपनी में अकाउंटेंट की नौकरी करने वाले समीर के लिए दिल्ली जैसे शहर में चार लोगों का पेट पालना ही मुश्किल था, उस पर से डायलिसिस का यह पहाड़। बाबूजी, यानी दीनानाथ जी, ने अपनी पत्नी सावित्री के इलाज के लिए अपने रिटायरमेंट का सारा पैसा लगा दिया था। जब बनारस में इलाज मुमकिन नहीं हुआ, तो वे दिल्ली आ गए। शुरुआत में राजीव ने कुछ पैसे भेजे थे, लेकिन फिर उसने यह कहकर हाथ खींच लिए कि उसका नया बिजनेस शुरू हुआ है और वह बहुत बड़े कर्ज में है। अब आलम यह था कि दीनानाथ जी बनारस का अपना पुश्तैनी मकान भी बेचने की सोच रहे थे।
“बाबूजी ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया है, मीरा,” समीर ने भारी गले से कहा। “बनारस वाला घर अगर बिक गया, तो वो जीवन भर के लिए बेघर हो जाएंगे। मैं कम से कम उन्हें यह अहसास तो नहीं दिलाना चाहता कि बुढ़ापे में उनका कोई नहीं है।”
“तो क्या तुम हमें सड़क पर लाओगे?” मीरा की आँखों में आँसू आ गए थे। “कल बच्चों के स्कूल से फीस के लिए तीसरी बार मैसेज आया है। हम अपनी जिंदगी की बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं कर पा रहे हैं। और अगर बनारस का घर बिक भी गया, तो तुम्हें लगता है राजीव भैया उसका एक हिस्सा नहीं मांगेंगे? वो सब ले लेंगे और बाबूजी-माँ जी पूरी जिंदगी के लिए यहीं इसी छोटे से घर में हमारे सिर पर बैठ जाएंगे। मैं यह नहीं सह सकती समीर! मैं अब और टूट नहीं सकती!”
कमरे के दरवाजे के पीछे खड़े दीनानाथ जी ने यह सब सुन लिया था। उनके हाथों में पानी का वह खाली गिलास कांप रहा था जिसे भरने वे रसोई की तरफ आ रहे थे। उनके चेहरे की झुर्रियों में जैसे अचानक कई और रेखाएं खिंच गई थीं। वे दबे पाँव वापस कमरे में लौट गए। बिस्तर पर सावित्री अचेत सी लेटी थीं। मशीन की लयबद्ध आवाज़ कमरे के सन्नाटे को और डरावना बना रही थी। दीनानाथ जी अपनी पत्नी के सिरहाने बैठ गए और उनके कमजोर, ठंडे हाथ को अपने हाथों में ले लिया। उनकी आँखों से आँसू की दो बूंदें छलक कर सावित्री के हाथ पर गिरीं।
“क्या दिन आ गए हैं सावित्री,” दीनानाथ जी बुदबुदाए। “जिन बच्चों को हमने अपनी उँगलियाँ पकड़कर चलना सिखाया, आज उनके लिए हम ही बोझ बन गए हैं। और गलती भी मेरी है… बड़ा बेटा पैसे के गुरूर में अंधा हो गया और छोटे बेटे की रीढ़ पर मैंने अपनी जिम्मेदारियों का इतना बोझ डाल दिया कि उसका अपना घर टूटने की कगार पर है।”
अगली सुबह घर का माहौल बर्फ की तरह ठंडा था। मीरा बिना कुछ कहे नाश्ता बना रही थी और समीर चुपचाप अखबार में नज़रें गड़ाए बैठा था, हालाँकि वह एक भी शब्द पढ़ नहीं पा रहा था। तभी दीनानाथ जी कमरे से बाहर आए। उनके कंधे पर एक पुराना चमड़े का बैग था और हाथों में सावित्री की दवाइयों का थैला। समीर उन्हें इस हालत में देखकर तुरंत खड़ा हो गया।
“बाबूजी, ये क्या? आप बैग लेकर कहाँ…” समीर की आवाज़ हलक में ही अटक गई।
दीनानाथ जी ने एक गहरी सांस ली और समीर के कंधे पर हाथ रखा। “बेटा, हम बनारस वापस जा रहे हैं। मैंने रात को ही शर्मा जी से बात कर ली है। वो हमारा मकान खरीदने को तैयार हैं। जो पैसा मिलेगा, उससे बनारस के ही सरकारी अस्पताल में तेरी माँ का इलाज चलेगा।”
“बाबूजी, आप पागल हो गए हैं? सरकारी अस्पताल में माँ की क्या हालत होगी, आप जानते हैं? और आप मकान कैसे बेच सकते हैं? वह आपकी जीवन भर की पूँजी है!” समीर की आँखों में घबराहट तैर गई। मीरा भी रसोई के दरवाजे पर आकर खड़ी हो गई थी; वह भी अवाक थी।
“पूँजी इंसान के लिए होती है बेटा, इंसान पूँजी के लिए नहीं,” दीनानाथ जी ने एक फीकी मुस्कान के साथ कहा। “और मेरी सबसे बड़ी पूँजी मेरे दोनों बेटे थे। एक तो बड़ा आदमी बनकर बहुत दूर जा चुका है, और दूसरे को मैं अपनी आँखों के सामने तिल-तिल कर मरते नहीं देख सकता। मीरा बेटी बिल्कुल सही कह रही थी। मैं एक पिता होकर अपने ही बेटे का घर नहीं उजाड़ सकता। तुम्हारी भी एक जिंदगी है, तुम्हारे बच्चे हैं। उनके भविष्य की कीमत पर मैं अपनी पत्नी की चंद साँसें नहीं खरीदूंगा।”
“बाबूजी, प्लीज ऐसा मत कहिए। मैं सब संभाल लूँगा। मैं कोई पार्ट-टाइम नौकरी कर लूँगा, लेकिन आप माँ को लेकर ऐसे नहीं जा सकते!” समीर फूट-फूट कर रोने लगा। उसने बाबूजी के पैर पकड़ लिए।
मीरा का दिल भी यह दृश्य देखकर दहल गया। वह जानती थी कि उसने कल रात गुस्से में बहुत कुछ ऐसा कह दिया था जो उसे नहीं कहना चाहिए था। उसका गुस्सा परिस्थितियों पर था, इस क्रूर शहर की महंगाई पर था, और उस बड़े भाई राजीव की बेरुखी पर था जिसने अपने परिवार को ऐसे वक्त में लावारिस छोड़ दिया था। वह भागकर बाबूजी के पास आई।
“मुझे माफ़ कर दीजिए बाबूजी,” मीरा रोते हुए बोली। “मेरा वह मतलब नहीं था। मैं बस बहुत थक गई हूँ। मैं माँ जी को कहीं नहीं जाने दूँगी। हम मिलकर कोई न कोई रास्ता निकाल लेंगे।”
लेकिन दीनानाथ जी ने मीरा के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “नहीं बेटी, इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है। जब जेब खाली हो और जिम्मेदारियाँ पहाड़ जैसी, तो अच्छे-अच्छों का धैर्य जवाब दे जाता है। तुमने आठ महीने तक बिना किसी शिकायत के हमारी सेवा की है, यही बहुत है। पर अब और नहीं। मैंने राजीव से भी बात कर ली है।”
समीर ने चौंककर पूछा, “भैया से? क्या कहा उन्होंने?”
दीनानाथ जी की आँखों में एक अजीब सी शून्यता आ गई। “उसने कहा कि वो मकान बिकने पर अपने हिस्से का कोई दावा नहीं करेगा, बशर्ते मैं उसे दोबारा पैसों के लिए फोन न करूँ। उसने अपनी जिम्मेदारी से मुँह मोड़ लिया है। पर कोई बात नहीं… ईश्वर ने मुझे इतनी ताकत तो दी ही है कि मैं अपने आखिरी सफर को अकेले तय कर सकूँ। अब तुम दोनों हमें जाने दो।”
उस दिन समीर और मीरा ने बहुत कोशिश की, लेकिन दीनानाथ जी नहीं माने। दोपहर की ट्रेन से वे सावित्री को एम्बुलेंस के जरिये रेलवे स्टेशन ले गए। स्टेशन पर भीड़-भाड़ के बीच समीर अपने माता-पिता को व्हीलचेयर पर ले जाते हुए इस कदर बेबस महसूस कर रहा था मानो दुनिया का सबसे नाकारा इंसान वही हो।
ट्रेन ने जब सीटी मारी, तो दीनानाथ जी ने खिड़की से हाथ बाहर निकाला। समीर ने उस कांपते हुए हाथ को चूम लिया। मीरा भी प्लेटफार्म पर खड़ी आँसू बहा रही थी। ट्रेन धीरे-धीरे स्टेशन से बाहर निकलने लगी और समीर वहीं घुटनों के बल बैठ गया। इस बड़े महानगर की ऊँची इमारतें और चमचमाती सड़कें आज उसे काट खाने को दौड़ रही थीं। शहर बड़ा हो गया था, लेकिन उसके अंदर इंसानियत और रिश्तों की जगह जैसे पूरी तरह से सिकुड़ गई थी। एक पिता अपने स्वाभिमान और अपने बेटे के परिवार को बचाने के लिए अपनी बीमार पत्नी के साथ वापस उसी अंधेरे में जा रहा था जहाँ से वे रोशनी की तलाश में आए थे।
समीर को समझ नहीं आ रहा था कि इसमें हार किसकी हुई है? उसकी, जो अपने माता-पिता की रक्षा नहीं कर सका? मीरा की, जो परिस्थितियों के आगे टूट गई? राजीव की, जिसने पैसा तो कमाया पर अपना परिवार खो दिया? या इस समाज की, जहाँ इलाज और जिंदगी इतनी महँगी हो गई है कि वह रिश्तों का खून पीकर ही शांत होती है? जवाब किसी के पास नहीं था, बस पीछे छूट गया था एक गहरा सन्नाटा और काँच की तरह दरक चुके रिश्तों की चुभन।
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लेखिका : आरती देवी