सावित्री देवी के कमरे की खिड़की से छनकर आती सुबह की धूप भी आज उनके चेहरे की उदासी को कम नहीं कर पा रही थी। उनके हाथ में फोन था और दूसरी तरफ उनकी छोटी बहन लता थी। सावित्री देवी भारी आवाज़ में कह रही थीं, “सच ही कहती थी तू लता, जब तक बेटा कुंवारा है, तभी तक वो माँ का है। शादी होते ही जैसे पराया हो जाता है। अब मेरे ही बेटे रोहन को देख ले। बचपन से लेकर आज तक मैंने उसे अकेले पाला, उसकी हर छोटी-बड़ी खुशी के लिए अपनी इच्छाओं का गला घोंट दिया। लेकिन अब? अब तो जैसे उसे मेरी जरूरत ही नहीं रही। सुबह उठता है तो पत्नी का चेहरा देखता है, शाम को ऑफिस से आता है तो सीधा अपने कमरे में चला जाता है। छुट्टी के दिन भी दोनों पति-पत्नी बाहर घूमने निकल जाते हैं। मेरे लिए तो उसके पास फुर्सत ही नहीं बची है।”
दरवाजे के ठीक बाहर खड़ी उनकी बहू मीरा के कदम वहीं ठिठक गए। उसके हाथ में चाय की ट्रे थी और कप से उठती भाप धीरे-धीरे हवा में विलीन हो रही थी, बिल्कुल वैसे ही जैसे उसकी सारी उम्मीदें टूटकर बिखर रही थीं। मीरा की आंखें भर आईं। वह बिना कोई आवाज़ किए वापस रसोई में लौट गई।
जब से मीरा इस घर में ब्याह कर आई थी, उसने हर संभव कोशिश की थी कि वह इस घर को, इस परिवार को अपना बना सके। सावित्री देवी का स्वभाव शुरू से ही थोड़ा रूखा था, लेकिन मीरा ने इसे एक माँ का प्यार समझकर कभी बुरा नहीं माना। वह सुबह सबसे पहले उठकर घर का सारा काम संभालती, सावित्री देवी की पसंद का नाश्ता बनाती और उनके हर छोटे-बड़े काम का ध्यान रखती। लेकिन पिछले कुछ हफ्तों से सावित्री देवी का व्यवहार बहुत बदल गया था। वो हर बात पर ताने मारतीं, छोटी-छोटी गलतियों पर पहाड़ खड़ा कर देतीं और कई बार तो बिना बात के ही रूठ कर बैठ जाती थीं। मीरा को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर उससे ऐसी क्या खता हो गई है कि उसकी सास उससे इतनी खफा रहने लगी हैं।
उस रात खाने की मेज पर अजीब सा सन्नाटा पसरा था। रोहन ने अपनी माँ की तरफ देखा जो बिना मन के खाना खा रही थीं। उसने पूछा, “क्या बात है माँ, आज खाना अच्छा नहीं लगा क्या? आपने तो कुछ खाया ही नहीं।”
सावित्री देवी ने रूखेपन से जवाब दिया, “खाना तो बहुत अच्छा है, लेकिन मेरी भूख ही मर गई है। तुम लोग खा लो, मैं सोने जा रही हूँ।” इतना कहकर वह उठ गईं और अपने कमरे में चली गईं।
रोहन ने सवालिया नज़रों से मीरा की तरफ देखा। मीरा की आंखें झुकी हुई थीं और वह चुपचाप अपने आंसुओं को पीने की कोशिश कर रही थी। रोहन समझ गया कि कुछ तो ऐसा है जो दोनों उससे छिपा रहे हैं।
अगली सुबह, जब रोहन ऑफिस जाने के लिए तैयार हो रहा था, मीरा ने हिम्मत जुटाई और सावित्री देवी के कमरे में गई। वह रोज़ की तरह उनके लिए उनके घुटनों के दर्द के तेल की शीशी लेकर गई थी। सावित्री देवी ने उसे देखते ही मुंह फेर लिया और अपनी अलमारी ठीक करने का नाटक करने लगीं।
मीरा से अब और नहीं रहा गया। वह भरे हुए गले से बोली, “माँ जी, आखिर मेरी गलती क्या है? मैं पिछले एक महीने से देख रही हूँ कि आप मुझसे सीधे मुंह बात तक नहीं करतीं। मैं कुछ भी कर लूँ, आपको उसमें कोई न कोई कमी नज़र आ ही जाती है। कल मैंने आपकी बातें सुन ली थीं जो आप मौसी जी से कह रही थीं। क्या आपको सच में लगता है कि मैंने रोहन को आपसे दूर कर दिया है?”
सावित्री देवी पलट कर तल्ख आवाज़ में बोलीं, “तो क्या मैंने कुछ गलत कहा? जब से तुम इस घर में आई हो, रोहन का तो जैसे दुनिया ही बदल गई है। पहले वो ऑफिस से आते ही मेरे पास बैठता था, मुझे अपनी सारी बातें बताता था। अब वो सीधा तुम्हारे पास आता है। पहले हम दोनों वीकेंड पर मंदिर जाते थे, अब तुम दोनों मॉल घूमने जाते हो। मुझे तो ऐसा लगता है जैसे इस घर में मेरी कोई जगह ही नहीं बची है। बस एक पुरानी फर्नीचर की तरह पड़ी हूँ।”
मीरा फूट-फूट कर रो पड़ी। वह कुछ कहना चाहती थी, लेकिन उसके गले से आवाज़ ही नहीं निकल रही थी। तभी कमरे के दरवाज़े पर रोहन आ खड़ा हुआ। उसने अपनी माँ की सारी बातें सुन ली थीं। उसका चेहरा गंभीर था। वह धीरे-धीरे चलकर अपनी माँ के पास आया और उनके दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए।
“माँ, आपको ऐसा क्यों लगता है कि प्यार बांटने से कम हो जाता है?” रोहन की आवाज़ शांत थी लेकिन उसमें एक अजीब सी कशिश थी। “आपने मुझे बचपन से यही सिखाया है ना कि रिश्तों की कद्र करनी चाहिए? जब मेरी शादी हुई, तो आपने ही तो कहा था कि अब मीरा मेरी जिम्मेदारी है, उसे इस घर में कभी परायापन महसूस नहीं होना चाहिए। मैं तो बस आपकी दी हुई सीख पर अमल कर रहा हूँ।”
सावित्री देवी ने रोहन के हाथ झटकते हुए कहा, “तो उस जिम्मेदारी को निभाने के चक्कर में तू अपनी माँ को ही भूल जाएगा? तुझे याद है पिछली बार तूने मेरे साथ बैठकर कब तसल्ली से चाय पी थी?”
रोहन की आँखों में भी अब नमी तैरने लगी थी। उसने एक गहरी सांस ली और बोला, “माँ, मैं ऑफिस से आते ही सीधा अपने कमरे में इसलिए जाता हूँ क्योंकि मैं वहां जाकर अपने कपड़े बदलता हूँ और मीरा से कहता हूँ कि वो आपके लिए शाम की चाय बनाए ताकि हम तीनों बैठकर पी सकें। लेकिन आप तो हमेशा किसी न किसी बात पर नाराज़ होकर कमरे में बंद हो जाती हैं। आप कहती हैं कि हम मॉल जाते हैं? माँ, हम पिछले तीन वीकेंड से मॉल नहीं, बल्कि शहर के सबसे अच्छे ऑर्थोपेडिक डॉक्टर के चक्कर लगा रहे थे। आपके घुटनों का दर्द बढ़ता जा रहा है, और आप किसी डॉक्टर के पास जाने को तैयार नहीं थीं। मीरा ने उस डॉक्टर से न सिर्फ अप्वाइंटमेंट लिया, बल्कि आपके लिए वो स्पेशल फुटवियर भी आर्डर किए हैं जो आपको चलने में मदद करेंगे। वो मुझे बाहर इसलिए लेकर जाती थी ताकि हम आपके लिए सही चीजें ढूंढ सकें।”
सावित्री देवी सन्न रह गईं। वह अवाक होकर कभी रोहन को तो कभी मीरा को देखने लगीं।
रोहन ने अपनी बात जारी रखी, “माँ, जब एक बेटा शादी करता है, तो वो बदलता नहीं है, बल्कि उसकी जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं। उसे एक ऐसा संतुलन बनाना पड़ता है जहां उसकी माँ को भी ऐसा न लगे कि वो पीछे छूट गई है, और उसकी पत्नी को भी ऐसा न लगे कि उसका इस घर में कोई वजूद नहीं है। मीरा ने अपना घर, अपने माता-पिता सब कुछ छोड़ दिया सिर्फ मेरे लिए, हमारे परिवार के लिए। अगर मैं उसकी खुशी का, उसके आराम का ध्यान नहीं रखूंगा, तो क्या मैं एक अच्छा इंसान कहलाऊंगा? और अगर मैं एक अच्छा इंसान नहीं हूँ, तो इसमें मेरी नहीं, आपकी परवरिश की हार होगी।”
मीरा रोते हुए सावित्री देवी के पैरों के पास बैठ गई और उनके घुटनों पर सिर रख दिया। “माँ जी, मैं कभी आपकी जगह नहीं लेना चाहती, और न ही कोई ले सकता है। रोहन आज जो कुछ भी है, आपकी वजह से है। मैं तो बस इस परिवार का हिस्सा बनना चाहती थी। अगर मेरे किसी काम से आपको ठेस पहुंची है, तो मुझे माफ़ कर दीजिए। लेकिन प्लीज ऐसे मुझसे बात करना बंद मत कीजिए, मुझे बहुत घुटन होती है।”
सावित्री देवी का कलेजा मुंह को आ गया। उनके अंदर का सारा अहम, सारी असुरक्षा, सारे भ्रम आंसुओं के रूप में उनकी आंखों से बह निकले। उन्होंने झुककर मीरा को उठाया और उसे अपने सीने से लगा लिया।
“मुझे माफ़ कर दे बेटी,” सावित्री देवी सुबकते हुए बोलीं। “मैं ही अंधी हो गई थी। अपने डर और अपनी असुरक्षा में मैंने ये देखा ही नहीं कि तू मेरी जगह लेने नहीं, बल्कि मेरा सहारा बनने आई है। मैंने एक माँ होने का सारा हक़ जताया, लेकिन एक सास होकर भी तुझे बेटी का प्यार नहीं दे पाई। मेरी उम्र तो बढ़ गई, लेकिन मेरी समझ छोटी रह गई।”
रोहन ने मुस्कुराते हुए अपनी माँ और पत्नी को गले लगा लिया। उस दिन उस घर के आंगन में खिली धूप बहुत उजली लग रही थी, क्योंकि आज घर के अंदर के सारे जाले साफ़ हो गए थे। एक माँ को उसका बेटा वापस मिल गया था, और एक बहू को उसका असली घर।
रिश्ते कभी भी अपने आप नहीं टूटते, उन्हें तोड़ती है हमारी खामोशी, हमारी गलतफहमियां और हमारा ये डर कि कोई दूसरा आकर हमारी जगह ले लेगा। जबकि सच तो ये है कि दिल में प्यार हो तो हर किसी के लिए जगह अपने आप बन जाती है।
आपको क्या लगता है, क्या सच में शादी के बाद बेटे बदल जाते हैं या फिर एक माँ को अपने बेटे पर और एक पत्नी को अपने पति पर विश्वास रखने की ज़रूरत होती है? अपने विचार कमेंट में जरूर बताएं।
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लेखिका : निधि गुप्ता