रसोई से अदरक और इलायची वाली चाय की महक उठ रही थी, जो सीधे बरामदे तक पहुँच रही थी जहाँ रिटायर्ड मास्टर दीनानाथ जी अपनी पुरानी आरामकुर्सी पर बैठे अख़बार पढ़ रहे थे। पैंसठ वर्षीय दीनानाथ जी का जीवन बेहद अनुशासित और शांत था। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी की जमा-पूंजी और अपना खून-पसीना लगाकर शहर के इस शांत इलाके में यह दो मंज़िला मकान बनाया था। घर की हर ईंट में उनकी पत्नी सुमित्रा जी के त्याग और दीनानाथ जी की अनगिनत रातों की नींद छिपी थी। उनका इकलौता बेटा, वैभव, अब बड़ा हो गया था और मल्टीनेशनल कंपनी में एक बड़े पद पर काम कर रहा था। वैभव की शादी को तीन साल हो चुके थे और उसकी पत्नी तान्या के आने के बाद से घर का माहौल थोड़ा आधुनिक ज़रूर हो गया था, लेकिन दीनानाथ जी और सुमित्रा जी ने वक़्त के साथ समझौता करना सीख लिया था। सब कुछ सामान्य लग रहा था, एक खुशहाल परिवार की एक शांत सुबह।
तभी अचानक बाहर गेट की घंटी बजी। “सुनते हो, ज़रा देखना तो इतनी सुबह-सुबह कौन आ गया?” सुमित्रा जी ने रसोई से ही चाय छानते हुए आवाज़ लगाई। दीनानाथ जी ने अख़बार को मेज़ पर मोड़कर रखा और अपने चश्मे को उँगलियों से ठीक करते हुए बोले, “हाँ-हाँ, देखता हूँ। शायद दूध वाला होगा, आज थोड़ा लेट हो गया है।” दीनानाथ जी अपनी शॉल को कंधों पर लपेटते हुए धीरे-धीरे कदमों से मुख्य दरवाज़े की तरफ बढ़े। गेट खोलने पर सामने दूध वाला नहीं, बल्कि खाकी वर्दी पहने एक डाकिया खड़ा था। कोहरे के बीच से डाकिए ने एक पीले रंग का बड़ा-सा लिफ़ाफ़ा उनकी ओर बढ़ाते हुए कहा, “बाबूजी, एक रजिस्टर्ड चिट्ठी है, यहाँ आपके दस्तखत चाहिए।” दीनानाथ जी ने थोड़ा अचरज से लिफ़ाफ़ा लिया। रिटायरमेंट के बाद अब उन्हें कोई ख़ास चिट्ठी नहीं आती थी। पेंशन के कागज़ भी अब ऑनलाइन ही आ जाते थे। उन्होंने कांपते हाथों से पेन पकड़ा और रसीद पर हस्ताक्षर कर दिए। डाकिया चला गया और दीनानाथ जी वहीं गेट के पास खड़े होकर उस भारी लिफ़ाफ़े को देखने लगे। प्रेषक की जगह पर किसी बड़े लॉ फर्म (वकील) का नाम छपा था और मुहर एक बैंक की लगी थी।
अंदर आते-आते दीनानाथ जी ने लिफ़ाफ़ा फाड़कर उसमें से कुछ पन्ने निकाले। पन्ने अंग्रेज़ी में टाइप किए हुए थे और ऊपर मोटे अक्षरों में ‘लीगल नोटिस’ लिखा था। जैसे-जैसे दीनानाथ जी की नज़रें उन शब्दों पर दौड़ने लगीं, उनके पैरों तले से मानो ज़मीन खिसकने लगी। सर्दियों की उस ठिठुरती सुबह में भी उनके माथे पर पसीने की बूंदें छलक आईं। उनका सीना धौंकनी की तरह चलने लगा और उन्हें महसूस हुआ कि जैसे किसी ने उनके दिल को मुट्ठी में भींच लिया हो। शरीर का सारा खून जैसे जम सा गया था। वे लड़खड़ाए और वहीं बरामदे में रखी बेंत की कुर्सी पर धम्म से बैठ गए। उनके हाथों से वे कागज़ छूटकर ज़मीन पर बिखर गए। उनका पूरा शरीर थर-थर कांप रहा था, मानो उन्हें लकवा मार गया हो।
“क्या हुआ? कौन था?” सुमित्रा जी ने रसोई से बाहर आते हुए पूछा। उनके हाथ में चाय के दो प्याले थे। जब उन्होंने अपने पति को इस तरह पसीने से तर-बतर और कुर्सी पर बेसुध सा गिरा हुआ देखा, तो उनके हाथों से प्याले छूटकर ज़मीन पर गिर पड़े। चाय ज़मीन पर फैल गई और कप के टुकड़े चारों ओर बिखर गए। सुमित्रा जी दौड़कर दीनानाथ जी के पास पहुँचीं। “क्या हुआ आपको? आपकी तबियत तो ठीक है? सीने में दर्द हो रहा है क्या?” सुमित्रा जी की आवाज़ में घबराहट और खौफ़ था। उन्होंने दीनानाथ जी के गालों को थपथपाया। लेकिन दीनानाथ जी की आँखें फटी की फटी रह गई थीं और वे बस सामने ज़मीन पर पड़े उन कागज़ों को घूरे जा रहे थे।
तभी ऊपर की मंज़िल से वैभव भी नीचे आ गया। चाय के कपों के टूटने की आवाज़ ने उसकी नींद तोड़ दी थी। वह अपने नाइटसूट में आँखें मलता हुआ सीढ़ियों से उतरा। “क्या हुआ माँ? इतनी सुबह-सुबह यह कैसा शोर है?” उसने झुंझलाते हुए पूछा।
दीनानाथ जी ने बड़ी मुश्किल से अपनी सूखी हुई ज़बान को हिलाया। उनकी आवाज़ किसी गहरी खाई से आती हुई महसूस हो रही थी। उन्होंने अपनी कांपती हुई उंगली से ज़मीन पर पड़े उन कागज़ों की ओर इशारा किया और रुंधे हुए गले से वैभव की ओर देखकर बोले, “यह… यह क्या है वैभव? यह बैंक का नोटिस… नीलाम? हमारा घर?”
वैभव के चेहरे का रंग एक पल के लिए उड़ा, लेकिन फिर उसने खुद को संभाल लिया। उसने ज़मीन से वे कागज़ उठाए, उन्हें झाड़कर सीधा किया और बड़ी ही बेशर्मी से अपने पिता की आँखों में देखते हुए कहा, “ओह! तो यह आ गया। मैंने सोचा था कि यह अगले हफ्ते आएगा। हाँ पिताजी, यह बैंक का नोटिस है। बैंक इस घर को कब्ज़े में ले रहा है क्योंकि मैंने जो बिज़नेस लोन लिया था, मैं उसकी किश्तें नहीं चुका पाया हूँ।”
“लोन? कैसा लोन? और इस घर से उसका क्या मतलब? यह घर तो मेरे नाम पर है!” दीनानाथ जी ने अपनी बची-खुची ताकत को समेटते हुए पूछा। उनके स्वर में दर्द और अविश्वास का ऐसा मिश्रण था जो किसी भी पत्थर दिल को पिघला दे।
“पिताजी, याद है छह महीने पहले मैंने आपसे कुछ कागज़ों पर दस्तखत करवाए थे? मैंने कहा था कि मुझे बिज़नेस के लिए एक गारंटर चाहिए। दरअसल, वो गारंटर के कागज़ नहीं थे, वो इस घर को गिरवी रखने के कागज़ थे। मुझे अपने नए स्टार्टअप के लिए बहुत बड़े फंड की ज़रूरत थी। मुझे लगा था कि बिज़नेस चल पड़ेगा और मैं बैंक का पैसा लौटा दूँगा। लेकिन बिज़नेस डूब गया। मेरे पास अब कोई रास्ता नहीं बचा है। बैंक अगले दस दिनों में इस घर को सील कर देगा।” वैभव ने यह सब इतनी सहजता से कहा जैसे वह घर छिन जाने की नहीं, बल्कि बाज़ार से कोई सामान भूल आने की बात कर रहा हो।
सुमित्रा जी छाती पीट कर रोने लगीं। “अरे निर्दयी! तूने अपने ही बाप को धोखा दिया? जिस घर को बनाने के लिए तेरे पिता ने पूरी उम्र एक ही स्वेटर में सर्दियाँ गुज़ार दीं, अपनी दवाइयों के पैसे काटकर तेरी इंजीनियरिंग की फीस भरी, तूने उस घर को दांव पर लगा दिया? और हमें बताया तक नहीं?”
वैभव ने चिढ़ते हुए जवाब दिया, “माँ, आप लोग हमेशा इमोशनल ड्रामा शुरू कर देते हैं। बिज़नेस में रिस्क लेना पड़ता है। मैं क्या जानबूझ कर नुकसान करवाता? और वैसे भी, आप दोनों को इतने बड़े घर की क्या ज़रूरत है? तान्या और मैं तो वैसे भी विदेश शिफ्ट होने का सोच रहे थे। आप दोनों के लिए मैंने शहर के बाहर एक छोटे से ओल्ड एज होम में बात कर ली है। वहां का माहौल बहुत अच्छा है। आप लोग वहां आराम से रहिएगा।”
दीनानाथ जी को लगा जैसे किसी ने उनके कानों में पिघला हुआ सीसा डाल दिया हो। ओल्ड एज होम? जिस बेटे को उन्होंने अपने बुढ़ापे की लाठी समझा था, वह न केवल उनके सिर की छत छीन चुका था, बल्कि उन्हें उनके ही घर से निकालकर एक अनाथालय में फेंकने का इंतज़ाम भी कर चुका था। दीनानाथ जी की आँखों से आँसू नहीं निकले। कभी-कभी दर्द इतना गहरा होता है कि वह आंसुओं को भी सुखा देता है। वे चुपचाप कुर्सी से उठे। उनके कांपते हुए पैर अब स्थिर हो चुके थे। चेहरे पर जो हवाइयां उड़ रही थीं, उनकी जगह अब एक अजीब सी शांति और कठोरता ने ले ली थी।
उन्होंने सुमित्रा जी के कंधे पर हाथ रखा और बेहद शांत स्वर में बोले, “चुप हो जाओ सुमित्रा। जो मर गया हो, उसके लिए रोया जाता है। जो ज़िंदा होकर भी मर जाए, उस पर आंसू बहाना आंसुओं का अपमान है।”
“पिताजी, आप बात को समझ नहीं रहे हैं…” वैभव ने आगे बढ़कर कुछ कहना चाहा।
“चुप रहो!” दीनानाथ जी की आवाज़ में वह पुरानी कड़क थी, जिससे कभी पूरा स्कूल शांत हो जाया करता था। वैभव एकदम ठिठक गया। “तुमने मुझसे मेरा घर नहीं छीना है वैभव, तुमने मुझसे मेरा भ्रम छीना है। मुझे लगता था कि मेरी सबसे बड़ी संपत्ति यह मकान नहीं, मेरा बेटा है। लेकिन आज तुमने साबित कर दिया कि मैंने अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी पूंजी एक खोखले इंसान पर लगा दी।”
दीनानाथ जी ने सुमित्रा जी की ओर देखा, “चलो सुमित्रा, अंदर चलो। हमें बैंक के दस दिन का इंतज़ार नहीं करना है। हम आज ही यह घर छोड़ेंगे। हम अपने साथ सिर्फ वही सामान ले जाएंगे जो हमने खुद अपनी मेहनत से कमाया है। इस लड़के की दी हुई एक सुई भी मुझे अपने साथ नहीं चाहिए।”
सुमित्रा जी रोती रहीं, लेकिन उन्होंने अपने पति का हाथ कसकर पकड़ लिया। दोनों बुजुर्ग उस घर के अंदर गए जिसे उन्होंने अपने सपनों से सजाया था। कुछ ही घंटों में उन्होंने अपने पुराने कपड़े, कुछ किताबें और रामचरितमानस की एक प्रति एक पुराने बक्से में रखी। वैभव और उसकी पत्नी तान्या चुपचाप तमाशा देखते रहे। उन्हें लग रहा था कि शायद शाम तक माता-पिता मान जाएंगे, आखिर जाएंगे कहाँ?
लेकिन दीनानाथ जी का स्वाभिमान उस ईंट-पत्थर के मकान से कहीं बड़ा था। दोपहर होते-होते दोनों अपना छोटा सा बक्सा लेकर मुख्य दरवाज़े पर आ खड़े हुए। दीनानाथ जी ने पलटकर एक बार ‘आशीर्वाद’ भवन को देखा। उनकी आँखों में घर के लिए प्यार था, लेकिन बेटे के लिए कोई मोह नहीं बचा था। उन्होंने घर की चाबियों का गुच्छा चौखट पर रख दिया।
“पिताजी, आप लोग कहाँ जाएंगे ऐसे? लोग क्या कहेंगे?” वैभव ने आख़िरी बार एक खोखली चिंता जताने की कोशिश की।
दीनानाथ जी ने बिना उसकी तरफ देखे कहा, “लोग क्या कहेंगे, इसकी चिंता अब तुम करना मिस्टर वैभव। हमने तो अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कर दी। यह घर बैंक ले जाएगा, लेकिन याद रखना, जो इंसान अपने स्वार्थ के लिए अपने जन्मदाताओं की छत नीलाम कर सकता है, वो ज़िंदगी में कभी चैन की नींद नहीं सो पाएगा। खुश रहना।”
दोनों बुजुर्ग उस कोहरे भरी दोपहर में घर से बाहर निकल गए। उनके पास अब कोई घर नहीं था, लेकिन उनके पास एक-दूसरे का साथ और अपना अखंड स्वाभिमान था। सड़क पर चलते हुए दीनानाथ जी ने सुमित्रा जी का हाथ अपने हाथ में ले लिया। ठंड बहुत थी, लेकिन उस स्पर्श में एक भरोसा था कि भले ही कागज़ के रिश्ते नीलाम हो गए हों, लेकिन उनकी रूहानी मोहब्बत और आत्मसम्मान की कोई कीमत नहीं लगा सकता।
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दोस्तों, जब एक पिता अपना सब कुछ लुटाकर बेटे को बड़ा करता है और वही बेटा बुढ़ापे में ऐसा धोखा दे, तो क्या पिता का घर छोड़कर चले जाना सही फैसला था? या उन्हें अपने ही घर के लिए बेटे और बैंक से कानूनी लड़ाई लड़नी चाहिए थी? कमेंट करके अपने विचार ज़रूर साझा करें।
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लेखिका : पुष्पा खंडेलवाल