संस्मरण – मधु वशिष्ठ

 जीवन में अब तक बहुत से दोस्त मिले। कुछ अच्छे और कुछ बहुत अच्छे। लेकिन वह दोस्त भले ही हमारे ऑफिस के सहकर्मी थे या हम जब सरकारी मकान में रहते थे, वहां के पड़ोसी लेकिन यह बात नितांत सत्य है कि जब जब भी वह सहकर्मी ट्रांसफर होकर दूसरे विभाग में चले जाते थे … Read more

कुलकलकंनी – सुदर्शन सचदेवा

सुबह की पहली किरण आँगन में उतर आई थी, लेकिन घर के भीतर पसरा सन्नाटा किसी अमावस्या की रात जैसा था। तुलसी के चौरे पर रखा दीपक बुझ चुका था और उसके पास बैठी शारदा की आँखों में भी जैसे उजाला समाप्त हो गया था। उसने धीरे से अपने माथे का सिंदूर छुआ। वर्षों से … Read more

कुलकलंकिनी – खुशी

मंदा ओ मंदा कहा मर गई कब तक सोती रहेगी।कल्याणी चिल्लाते हुए मंदा के कमरे में आई पर मंदा अपने बिस्तर पर नहीं थी।पास एक चिट्ठी पड़ी थी भाभी मै अपने सपनों को पूरा करने जा रही हूं।मै तुम्हारे शराबी भाई के साथ अपना जीवन नरक नहीं बना सकती क्योंकि मां बाबा के जाने के … Read more

कुलकलंकिनी – डाॅ संजु झा

जीवन की आपाधापी में  व्यक्ति अपनी इच्छाओं और महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए गलत कदम उठाने से भी नहीं डरता है।परिणामस्वरूप अपनी जिंदगी तो बर्बाद होती ही है, परिवार और समाज में भी बदनामी हो जाती है।उसके कुकृत्यों के कारण समाज उसे कुलकलंक या कुलकलंकिनी का नाम दे देता है। सोलह वर्षीया रीना बड़ी-बड़ी ऑंखें, … Read more

आँखों पर बंधी पट्टी

“अगर तुम्हें इस घर की छत के नीचे रहना है, तो मेरी माँ के साथ कदम से कदम मिलाकर रसोई संभालनी होगी। तुम बाहर जाकर महारानी की तरह कुर्सी तोड़ो और मेरी बूढ़ी माँ यहाँ चूल्हे के आगे अपनी हड्डियाँ गलाए, यह तमाशा अब इस घर में और नहीं चलेगा!” विकास की दहाड़ से ड्रॉइंग … Read more

खूबसूरत रिश्तें

सुलोचना जी आज सुबह से ही थोड़ी परेशान और घबराई हुई थीं। घर में सब कुछ सामान्य था, लेकिन उनका मन एक अजीब सी उलझन में फंसा था। उन्होंने अपने पति रमेश जी को आवाज़ दी, “सुनिए जी, कल छोटी बहू अंजलि के मम्मी-पापा आ रहे हैं। मुझे समझ नहीं आ रहा कि नाश्ते और … Read more

अब से अपने स्वाभिमान के साथ जीऊँगी

रसोई के एक कोने में खड़ी मीरा की आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। गैस पर चाय उबल रही थी और उसकी ज़िंदगी भी इसी तरह अंदर ही अंदर खौल रही थी। उसने जल्दी से पल्लू से अपनी आँखें पोंछीं क्योंकि बाहर से उसकी सास, सुमित्रा देवी की तेज़ आवाज़ आ … Read more

कश्मीर का सफर

सरिता जी रसोई में रात के खाने की तैयारी कर रही थीं। तवे पर रोटियां सिंक रही थीं और कुकर की सीटी बजने ही वाली थी कि उनका बेटा आर्यन और बहू शिखा एक रंग-बिरंगा लिफाफा लेकर अंदर आए। आर्यन की आँखों में एक अजीब सी चमक थी और शिखा के चेहरे पर एक प्यारी … Read more

कुल पर कलंक – गीता वाधवानी

 सरला देवी ने निराशा और गुस्से में चीखते हुए कहा-” इंस्पेक्टर साहब,ले जाइए इसे मेरी आंखों के सामने से और हो सके तो फांसी पर लटका दीजिए। इसने तो हमारे कुल की इज्जत की धज्जियां उड़ा दी। इस कुल कलंकिनी को जल्द से जल्द सजा दिलवाइए।”   गर्विता-” मम्मी यह तुम क्या कह रही हो, कौन … Read more

अनुपमा का आत्मसम्मान

मेघा ने व्यंग्यात्मक हंसी हंसते हुए कहा, “ओहो! कितनी भोली बन रही है। जैसे मुझे कुछ पता ही नहीं। अरे, नौकरानी तो बाहर आंगन में थी। माँ पूजा घर में थीं और मैं सो रही थी। तो फिर गहने किसने उड़ाए? तू ही तो पूरे घर में नागिन की तरह घूम रही थी।” दीवाली का … Read more

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